वन-लाइनर प्रश्न (30) और उत्तर
गुप्तकाल के बाद का समय किस कला रूप की प्रगति का युग कहलाता है? मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला
दक्षिण भारत में कला को प्रोत्साहन देने वाले प्रमुख वंश कौन से थे? पल्लव, चोल, होयसल
पूर्वी भारत में कला को प्रोत्साहन देने वाले प्रमुख वंश कौन से थे? पाल, सेन, गंगेज
महाबलीपुरम का दूसरा नाम क्या है? मामल्लपुरम
मामल्लपुरम में कौन से वास्तुशिल्प ढाँचे देखने को मिलते हैं? पचरथ तथा मंडप
पल्लव और पश्चिमी चालुक्य किसलिए याद किए जाते हैं? वास्तुकला संबंधी क्रियाओं के लिए
चोल और होयसल किसलिए याद किए जाएंगे? अपने मंदिर संबंधी शिल्पकला के लिए
किस राजवंश के कलाकार कांस्य की ढलाई में सबसे आगे थे? चोल
चोलों द्वारा निर्मित दो महत्वपूर्ण मंदिर कौन से हैं? गंगकोण्डाचोलापुरम मंदिर तथा बृहदेश्वर मंदिर
होयसल कला शैली किस विशेषता के लिए जानी जाती है? अपनी जटिल कलात्मकता तथा विस्तार के लिए
मंदिर की शिल्पकला एवं वास्तुकला में अच्छा समन्वय किस युग के मंदिरों की विशेषता है? होयसल युग
गंग वंशीय शासकों ने किस क्षेत्र में मंदिर निर्माण परियोजनाएं प्रारम्भ कीं? पूर्वी भारत
उड़ीसा के दो विशिष्ट मंदिर कौन से हैं? मुक्तेश्वर मंदिर, लिंगराज मंदिर, राजारानी मंदिर
'अर्जुन का चिन्तन' किस माध्यम से बना है? पत्थर
'अर्जुन का चिन्तन' किस काल की कृति है? पल्लव काल (सातवीं शताब्दी ईस्वी)
'अर्जुन का चिन्तन' कहाँ स्थित है? मामल्लपुरम (चेन्नई)
'अर्जुन का चिन्तन' का आकार क्या है? लगभग 91 फीट x 152 फीट
'अर्जुन का चिन्तन' का दूसरा नाम क्या है? गंगावतरण
'अर्जुन का चिन्तन' की उभरी हुई मूर्तिकला में कितनी शिला-खण्डों पर आकृति उभरी है? दो
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' किस माध्यम से बना है? पत्थर
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' किस काल की कृति है? होयसल काल
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' कहाँ पाया गया? बेलूर
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' मूर्ति का आकार क्या है? 3 फीट
हेलीबिड का पूर्व का नाम क्या था? द्वार समुद्र
होयसल राजवंश का उदय कब हुआ? ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य से
'कोणार्क की सुरसुंदरी' का माध्यम क्या है? पत्थर
'कोणार्क की सुरसुंदरी' किस राजवंश से संबंधित है? गंग राजवंश (12वीं शती ईस्वी)
कोणार्क का सूर्य मंदिर किसने बनवाया था? गंग वंश के राजा नरसिंह देव
कोणार्क का सूर्य मंदिर कहाँ स्थित है? कोणार्क, उड़ीसा (पुरी के निकट)
'सुरसुंदरी' की प्रतिमा में नारी संगीतज्ञ क्या बजाते हुए दिखाया गया है? ड्रम
II. अति लघूत्तरात्मक प्रश्न (30) और उत्तर
गुप्तकाल के बाद कला संबंधी गतिविधियों के केंद्र कहाँ स्थानांतरित हो गए? उत्तर: दक्षिण तथा पूर्वी भारत की ओर।
सातवीं शती (AD) में कौन से वंशीय शासक शक्तिशाली हो गए? उत्तर: पल्लव वंशीय शासक।
पल्लवों की राजधानी क्या थी? उत्तर: मामल्लपुरम या महाबलीपुरम।
पल्लव वंशीय युग में कला के मुख्य केंद्र कौन से बन गए? उत्तर: मामल्लपुरम तथा कांचीपुरम।
महाबलीपुरम में पल्लवों के समय की कुछ प्रसिद्ध कलाकृतियाँ कौन सी हैं? उत्तर: पंचरथ, अर्जुन का चिन्तन, मंडप तथा उभरी हुई मूर्तिकला।
पल्लवों के बाद दक्षिण भारतीय क्षेत्र में शासन करने वाले प्रमुख राजवंश कौन थे? उत्तर: चालुक्य, चोल तथा होयसल।
पल्लव, चालुक्य तथा चोल वंशीय मूर्तियों की कौन सी विशेषता पहले कभी नहीं देखी गई थी? उत्तर: कोमलता एवं सौम्यता।
चोल युग के कलाकारों ने किस तकनीक में निपुणता हासिल की? उत्तर: कांस्य की मूर्तियों की तकनीक।
किस काल को पत्थर की मूर्तियों का युग माना जाता है? उत्तर: होयसल काल को।
होयसल मूर्तियों की मुख्य पहचान क्या है? उत्तर: निपुणता से प्रदर्शित भाव-भंगिमाएँ, लयात्मकता तथा गति।
होयसल युग में मंदिर वास्तुकला के उच्च स्तरीय नमूने कहाँ देखने को मिलते हैं? उत्तर: हालेबिड स्थित होयसलेश्वर मंदिर, केशव मंदिर तथा सोमनाथपुर के मंदिर।
पाल तथा सेन राजवंश के बाद पूर्वी भारत में कौन सा राजवंश प्रमुख हुआ? उत्तर: गंग राजवंश।
गंग राजवंश किसलिए प्रसिद्ध है? उत्तर: अच्छे मंदिर बनाने के लिए।
कोणार्क सूर्य मंदिर की संरचना कैसी है? उत्तर: घोड़ों द्वारा खींचते हुए एक रथ बना है।
'अर्जुन का चिन्तन' में कौन-कौन सी आकृतियाँ दिखाई गई हैं? उत्तर: विभिन्न आकार के मनुष्य, पशुओं का झुंड, देवता, अर्ध-देव, तथा योगी।
'अर्जुन का चिन्तन' में दरार के दाहिनी ओर किसकी आकृति दिखाई गई है? उत्तर: एक चतुर्भुजी आकृति (शंकर जी)।
'अर्जुन का चिन्तन' में पशुओं के किस सूक्ष्म चित्रण का उदाहरण मिलता है? उत्तर: सोते हुए हाथी के बच्चे का चित्र, बंदरों की आकृति, हिरन का नाक खुजाना।
होयसल मूर्तियों में किस प्रकार की कला देखने को मिलती है? उत्तर: गहरी खुदाई तथा गहरी तराश की कला।
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' मूर्ति में कृष्ण को किस रूप में दर्शाया गया है? उत्तर: नायक के रूप में।
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' मूर्ति में पशुओं का चित्रण कैसा है? उत्तर: सजीव, रोचक और आकर्षक।
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' मूर्ति में स्त्रियों के चित्रण की क्या विशेषता है? उत्तर: भारी स्तन तथा नितंब, गहनों का अलंकरण तथा विशिष्टतापूर्ण भारतीय केश विन्यास।
कोणार्क सूर्य मंदिर अपनी किस विशेषता के लिए प्रसिद्ध है? उत्तर: विशाल ढाँचे तथा प्राकृत आकार (आदमकद) के लिए।
कोणार्क की बड़ी मूर्तियाँ किस पत्थर से बनी हैं? उत्तर: प्रायः काले पत्थर से।
कोणार्क मूर्तियों का प्रतिरूपण कैसा है? उत्तर: कसा हुआ है तथा कुछ चौड़े चेहरे पर मुस्कराहट है।
कोणार्क की कलाकृतियाँ कैसी हैं? उत्तर: मजबूत हैं तथा बंधनमुक्त सौम्यता लिए हुए हैं।
कोणार्क के सूर्य मंदिर में कौन सी बड़ी प्रतिमाएँ मंदिर की विशेषताएँ बढ़ाती हैं? उत्तर: सूर्य की बड़ी प्रतिमा तथा नारी संगीतज्ञों की आकृतियाँ।
'सुरसुंदरी' की मूर्ति में नारी संगीतज्ञ कहाँ बैठी हैं? उत्तर: नीचे और मध्य भाग के ऊपर चबूतरे पर।
'सुरसुंदरी' की मूर्ति में अंगों की लयात्मकता के साथ सिर कैसा है? उत्तर: थोड़ा-सा झुका हुआ।
'सुरसुंदरी' की मूर्ति में स्त्री के वक्षस्थलों के बीच क्या गढ़ा गया है? उत्तर: आभूषण।
मूर्तियों की वक्रता तथा झुकाव कोणार्क की मूर्तियों में क्या प्रस्तुत करता है? उत्तर: एक लयात्मकता।
III. लघूत्तरात्मक प्रश्न (20) और उत्तर
सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक भारतीय कला में कौन से प्रमुख राजवंशों ने योगदान दिया? उत्तर: इस काल में पल्लव, चोल, होयसल (दक्षिण में) तथा पाल, सेन और गंग वंशों (पूर्वी भारत में) ने मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला की प्रगति को प्रोत्साहन दिया।
पल्लव और पश्चिमी चालुक्य राजवंशों को वास्तुकला के क्षेत्र में क्यों याद किया जाता है? उत्तर: पल्लव वंश ने मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) में पंचरथ और मंडप जैसे एकाश्म ढाँचों और मंदिर इमारतों का निर्माण किया। उनके प्रतिद्वंद्वी पश्चिमी चालुक्य भी अपनी वास्तुकला संबंधी गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं, जो इस काल की मंदिर वास्तुकला के विकास में महत्वपूर्ण थे।
चोल कला में कांस्य मूर्तियों की क्या विशेषता थी? उत्तर: चोल कलाकार कांस्य की ढलाई द्वारा धातुओं की मूर्तियों में शरीर की लयात्मक गति को दिखाने की कला में सबसे आगे थे। उन्होंने अपनी कला से अत्यंत जटिल कांस्य और धातु की मूर्तियाँ बनाईं, जो उनकी तकनीकी निपुणता को दर्शाती हैं।
चोल वंश द्वारा निर्मित दो प्रसिद्ध मंदिरों की विशेषताएँ बताएँ। उत्तर: चोल शासकों ने गंगकोंडाचolaपुरम मंदिर तथा बृहदेश्वर मंदिर जैसे प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण कराया। ये मंदिर अपनी सरलता (अकृत्रिमता), स्मारकीय विशालता और राजसी गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं, जो चोल वास्तुकला की भव्यता को दर्शाते हैं।
होयसल कला शैली की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? उत्तर: होयसल कला शैली अपनी जटिल कलात्मकता और विस्तार के लिए जानी जाती है। होयसल मूर्तियों में गहरी खुदाई और तराश, कोमलता, शरीर के अंगों की लयात्मकता और जटिल दृश्य देखने को मिलते हैं। मंदिर की शिल्पकला और वास्तुकला में अच्छा समन्वय इस युग के मंदिरों की विशेषता है।
'अर्जुन का चिन्तन' नामक उभरी हुई मूर्तिकला का सामान्य विवरण दें। उत्तर: यह मामल्लपुरम में स्थित पल्लव काल की एक विशाल (91 फीट x 152 फीट) उभरी हुई मूर्तिकला है। यह दो शिलाखंडों पर उभरी हुई है, जिसमें देवता, अर्ध-देव, योगी, मनुष्य और पशुओं के झुंड को एक प्राकृतिक प्रवाह में दिखाया गया है। इसकी प्रस्तुति स्पष्ट, स्वाभाविक और सहज है, जिसमें तीव्र गति और विशालता का आभास होता है।
'अर्जुन का चिन्तन' के विषय वस्तु पर विद्वानों के बीच क्या मतभेद हैं? उत्तर: कुछ विद्वान इसे 'गंगावतरण' मानते हैं, जिसमें शंकर जी को गंगा की धारा को अपनी जटाओं में रोकते हुए दिखाया गया है। जबकि अन्य इसे 'अर्जुन का चिन्तन' के रूप में देखते हैं, जहाँ एक पुरुष आकृति ध्यानमग्न अवस्था में है, जिसे अर्जुन माना जाता है।
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' मूर्ति होयसल कला का सर्वोत्तम उदाहरण क्यों मानी जाती है? उत्तर: यह मूर्ति क्लिष्ट और सूक्ष्म होयसल नक्काशी का सर्वोत्तम उदाहरण है। समस्त घटना को अलग-अलग परतों में दिखाया गया है, जहाँ कृष्ण केंद्रीय पात्र हैं और अन्य पशु व मनुष्य विभिन्न परतों पर एक मनोरंजक कथानक गढ़ते हैं। उनकी खड़ी मुद्रा और अंगों की लयात्मकता संयोजन में कोमलता लाती है, और पशुओं का सजीव चित्रण अत्यंत रोचक है।
होयसल युग की मूर्तिकला की मुख्य विशेषताएं क्या हैं? उत्तर: होयसल युग की मूर्तिकला पत्थर पर की गई बड़ी जटिल और सूक्ष्म नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। ये मूर्तियां निपुणता से प्रदर्शित भाव-भंगिमाओं, लयात्मकता और गति के लिए जानी जाती हैं। पत्थर की कोमलता के कारण गहरी कटाई संभव हो पाती थी, जिससे जटिल दृश्यों का निर्माण सरल हो जाता था।
कोणार्क का सूर्य मंदिर कहाँ है और इसकी क्या विशेषताएँ हैं? उत्तर: कोणार्क का सूर्य मंदिर उड़ीसा में पुरी के निकट भारतीय पूर्वी समुद्री तट पर स्थित है। इसे गंग वंश के राजा नरसिंह देव ने बनवाया था। यह मंदिर अपने विशाल ढाँचे और प्राकृत आकार के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें घोड़ों द्वारा खींचते हुए एक रथ बना है। यह अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला और मूर्तियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
कोणार्क मूर्तिकला की क्या विशेषताएं हैं? उत्तर: कोणार्क की मूर्तियाँ प्रायः काले पत्थर से बनी हैं, जिनमें बंगाल की शैली से कुछ समानता मिलती है। प्रतिरूपण कसा हुआ है, चौड़े चेहरों पर मुस्कराहट है। कलाकृतियाँ मजबूत और बंधनमुक्त सौम्यता लिए हुए हैं। इनमें गति और विशालता का आभास होता है, और नारी संगीतज्ञों की आकृतियाँ मंदिर की सुंदरता में वृद्धि करती हैं।
'सुरसुंदरी' की प्रतिमा में कलाकार की कुशलता कैसे दिखती है? उत्तर: 'सुरसुंदरी' की प्रतिमा में मुस्कराहट भरा बड़ा चेहरा और बड़े आकार के बावजूद एक लय और गति है। अंगों की लयात्मकता के साथ सिर थोड़ा झुका हुआ है। वक्षस्थलों के बीच आभूषणों को कोमलता से गढ़ा गया है, और मूर्तियों की वक्रता तथा झुकाव उन्हें लयात्मक बनाते हैं, जो कलाकार की सूक्ष्म दृष्टि और निपुणता को दर्शाता है।
गुप्त काल के बाद कला संबंधी गतिविधियों के केंद्र में क्या बदलाव आया? उत्तर: गुप्त काल के स्वर्णिम युग के बाद, कला संबंधी गतिविधियों के केंद्र उत्तर भारत से दक्षिण और पूर्वी भारत की ओर स्थानांतरित हो गए। इस बदलाव ने विभिन्न क्षेत्रीय शैलियों के विकास को बढ़ावा दिया।
महाबलीपुरम में पल्लवों की कौन-कौन सी कलाकृतियाँ उपलब्ध हैं? उत्तर: महाबलीपुरम में पल्लवों के समय की कई प्रसिद्ध कलाकृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें पंचरथ (एक ही पत्थर से तराशे गए पांच रथों का समूह), अर्जुन का चिन्तन (विशाल उभरी हुई मूर्तिकला), मंडप (गुफा मंदिर) और अन्य उभरी हुई मूर्तिकलाएँ शामिल हैं।
दक्षिण भारतीय मूर्तिकला में पल्लव, चालुक्य और चोल वंश की मूर्तियों की क्या अद्वितीय विशेषता थी? उत्तर: पल्लव, चालुक्य और चोल वंशीय मूर्तियाँ अपनी कोमलता एवं सौम्यता के लिए प्रसिद्ध थीं। मूर्तियों में ये गुण इससे पहले कभी नहीं देखे गए थे, जो इन राजवंशों की कलात्मक परिपक्वता को दर्शाता है।
होयसल काल को 'पत्थर की मूर्तियों का युग' क्यों कहा जाता है? उत्तर: होयसल काल को पत्थर की मूर्तियों का युग इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दौरान पत्थर पर बड़ी जटिल और सूक्ष्म नक्काशी की गई। कलाकारों ने पत्थर की कोमलता का लाभ उठाते हुए अत्यंत विस्तृत और बारीक काम किया, जिससे मूर्तियाँ निपुणता से प्रदर्शित भाव-भंगिमाओं, लयात्मकता और गति के लिए प्रसिद्ध हुईं।
गंग राजवंश के शासक किस लिए प्रसिद्ध थे और उनका सबसे प्रसिद्ध निर्माण क्या है? उत्तर: गंग राजवंश के शासक अच्छे मंदिर बनाने के लिए प्रसिद्ध थे। उनका सबसे शानदार और राजसी निर्माण उड़ीसा स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर है, जो अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला और मूर्तियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
कोणार्क सूर्य मंदिर की वर्तमान स्थिति कला के मूल्यांकन के लिए कैसे महत्वपूर्ण है? उत्तर: यद्यपि कोणार्क सूर्य मंदिर की वास्तुकला बुरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है, परन्तु जो कुछ बचा है, वह उस युग के कलाकारों तथा उनकी कला की महानता को समझने के लिए काफी है। यह दर्शाता है कि अपनी वर्तमान स्थिति में भी, यह मंदिर उस काल की असाधारण कलात्मकता और स्थापत्य कौशल का प्रमाण है।
इस युग में कलाकारों की प्रवीणता किस रूप में देखी जा सकती है? उत्तर: इस युग तक कलाकार खुदाई और अन्य कलाओं में बहुत प्रवीण और निपुण हो गए थे। यह उनकी मूर्तियों और वास्तुशिल्प में दिखाई देने वाली बारीकियों, जटिलताओं और कलात्मक पूर्णता से स्पष्ट होता है।
सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक के मंदिरों की वास्तुकला की सामान्य विशेषता क्या थी? उत्तर: इस युग में निर्मित मंदिरों की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि मंदिर की शिल्पकला एवं वास्तुकला में बहुत अच्छा समन्वय किया गया था। इसका अर्थ है कि मंदिरों के बाहरी और आंतरिक हिस्सों पर मूर्तियों और नक्काशी का प्रयोग वास्तुकला के साथ सामंजस्य बिठाकर किया जाता था, जिससे एक समग्र कलात्मक अनुभव प्राप्त होता था।
IV. निबंधात्मक प्रश्न (10) और उत्तर
सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक भारतीय कला में मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला की प्रगति का विस्तृत विश्लेषण करें। उत्तर: सातवीं से बारहवीं शताब्दी का काल भारतीय इतिहास में मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला की प्रगति का एक महत्वपूर्ण युग था, जिसे गुप्तकाल के बाद कला संबंधी गतिविधियों के केंद्र के रूप में दक्षिण और पूर्वी भारत में स्थानांतरण द्वारा चिह्नित किया गया। इस अवधि में पल्लव, चोल, होयसल (दक्षिण में) और पाल, सेन, गंग (पूर्वी भारत में) जैसे शक्तिशाली राजवंशों ने कला और वास्तुकला को अभूतपूर्व प्रोत्साहन दिया।
पल्लव: मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) और कांचीपुरम उनके कला के मुख्य केंद्र थे। पंचरथ और मंडप जैसे एकाश्म ढाँचे उनकी वास्तुकला के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। 'अर्जुन का चिन्तन' या 'गंगावतरण' जैसी विशाल उभरी हुई मूर्तिकलाएँ उनकी तकनीकी और कलात्मक प्रवीणता का प्रमाण हैं, जिनमें तीव्र गति और पशुओं का सूक्ष्म चित्रण देखने को मिलता है।
चोल: ये मंदिर संबंधी शिल्पकला में अग्रणी थे और कांस्य ढलाई की कला में निपुणता हासिल की। उन्होंने धातुओं की मूर्तियों में शरीर की लयात्मक गति को कुशलता से दर्शाया। गंगकोंडाचोलापुरम और बृहदेश्वर मंदिर उनकी सरलता, स्मारकीय विशालता और राजसी गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं।
होयसल: होयसल कला अपनी जटिल कलात्मकता और विस्तार के लिए जानी जाती है। उनके शासनकाल में बेलूर, हेलीबिड (द्वार समुद्र) और सोमनाथपुर में कई मंदिर परियोजनाएँ साकार हुईं। 'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' जैसी पत्थर की मूर्तियाँ गहरी खुदाई, तराश, कोमलता, और जटिल दृश्यों का सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जिनमें भाव-भंगिमाओं, लयात्मकता और गति का अद्भुत प्रदर्शन है।
गंग: पूर्वी भारत में गंग राजवंश ने उड़ीसा में कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे शानदार और राजसी मंदिरों का निर्माण किया। यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला, विशाल ढाँचे (घोड़ों द्वारा खींचते हुए रथ) और आदमकद मूर्तियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 'सुरसुंदरी' जैसी आकृतियाँ इस युग की मूर्तिकला में गति, लय और सौंदर्य का प्रतीक हैं। कुल मिलाकर, इस युग में मंदिर की शिल्पकला और वास्तुकला का अद्भुत समन्वय हुआ, और कलाकारों ने विभिन्न माध्यमों में असाधारण निपुणता प्रदर्शित की, जिससे भारतीय कला विरासत में स्थायी योगदान हुआ।
पल्लव और चोल राजवंशों की कला और वास्तुकला की मुख्य विशेषताओं और उनके योगदान की तुलना और विरोधाभास करें। उत्तर: पल्लव और चोल दोनों दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश थे जिन्होंने सातवीं से बारहवीं शताब्दी के दौरान कला और वास्तुकला के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन उनकी शैलियों और प्राथमिकताओं में कुछ अंतर थे। पल्लव कला और वास्तुकला (7वीं शताब्दी):
वास्तुकला में अग्रणी: पल्लव वास्तुकला ने द्रविड़ मंदिर वास्तुकला की नींव रखी। उनके प्रारंभिक कार्य एकाश्म (monolithic) थे, जैसे महाबलीपुरम के पंचरथ, जो एक ही चट्टान से तराशे गए हैं।
मंडप और गुफा मंदिर: उन्होंने मंडप (मंडप संरचनाएँ) और गुफा मंदिरों का निर्माण किया, जो उनके स्थापत्य कौशल का प्रदर्शन करते हैं।
उभरी हुई मूर्तिकला: 'अर्जुन का चिन्तन' या 'गंगावतरण' जैसी विशाल उभरी हुई मूर्तिकलाएँ उनकी विशिष्टता थीं, जिनमें प्राकृतिक गति, पशुओं का सूक्ष्म चित्रण और कथात्मक प्रस्तुति पर जोर दिया गया।
कला केंद्र: मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) और कांचीपुरम उनके प्रमुख कला केंद्र थे।
चोल कला और वास्तुकला (9वीं-13वीं शताब्दी):
भव्य मंदिर निर्माण: चोलों ने विशाल और भव्य पत्थर के मंदिरों का निर्माण किया, जैसे गंगकोंडाचोलापुरम और बृहदेश्वर मंदिर। ये मंदिर अपनी स्मारकीय विशालता, राजसी गुणों और जटिल मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध हैं।
कांस्य मूर्तिकला में निपुणता: चोल कलाकार कांस्य की ढलाई में अद्वितीय रूप से कुशल थे। उनकी कांस्य मूर्तियाँ, विशेषकर नटराज (नृत्य करते शिव) की मूर्तियाँ, अपने सौंदर्य, शरीर की लयात्मक गति और तकनीकी पूर्णता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। यह उनकी धातुकला की सर्वोच्च उपलब्धि थी।
शिल्पकला पर जोर: चोल मंदिर केवल वास्तुकला के लिए ही नहीं, बल्कि उनमें की गई विस्तृत शिल्पकला के लिए भी जाने जाते हैं।
तुलना और विरोधाभास:
विकास का चरण: पल्लवों ने द्रविड़ वास्तुकला की प्रारंभिक शैलियों का विकास किया (गुफा मंदिर, एकाश्म रथ), जबकि चोलों ने इस शैली को उसके चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया (विशाल बहुमंजिला मंदिर)।
सामग्री: पल्लवों ने पत्थरों को काटकर मूर्तिकला और वास्तुकला पर ध्यान दिया (विशेषकर उभरी हुई मूर्तिकला), जबकि चोलों ने पत्थर के विशाल मंदिरों के साथ-साथ कांस्य मूर्तिकला को भी ऊँचाई पर पहुँचाया।
कला का ध्यान: जहाँ पल्लव वास्तुकला संबंधी क्रियाओं और उभरी हुई मूर्तियों पर केंद्रित थे, वहीं चोल मंदिर संबंधी शिल्पकला और विशेषकर कांस्य की ढलाई में निपुण थे।
कलात्मक गुण: पल्लव मूर्तियों में गति और विशालता दिखती है, जबकि चोल कांस्य मूर्तियों में अद्वितीय लयात्मकता और भावनात्मक गहराई पाई जाती है।
संक्षेप में, पल्लवों ने दक्षिण भारतीय कला के लिए मार्ग प्रशस्त किया, और चोलों ने उनकी नींव पर निर्माण करते हुए इसे भव्यता और तकनीकी उत्कृष्टता के नए आयाम दिए, विशेषकर उनके विशाल मंदिरों और अद्वितीय कांस्य मूर्तियों के माध्यम से।
'अर्जुन का चिन्तन' या 'गंगावतरण' नामक विशाल उभरी हुई मूर्तिकला का विस्तृत वर्णन करें और भारतीय कला में इसके महत्व पर प्रकाश डालें। उत्तर: मामल्लपुरम (चेन्नई) में स्थित 'अर्जुन का चिन्तन' या 'गंगावतरण' पल्लव काल (सातवीं शताब्दी ईस्वी) की एक विशाल और प्रभावशाली उभरी हुई मूर्तिकला है। यह लगभग 91 फीट x 152 फीट आकार की दो शिलाखंडों पर उकेरी गई एक भू-आकृति है। सामान्य विवरण: यह मूर्ति समतल न होते हुए भी अत्यंत स्पष्ट, स्वाभाविक और सहज प्रस्तुति के साथ एक अद्वितीय प्रवाह प्रदर्शित करती है। इसमें विभिन्न आकार के मनुष्य और पशुओं का एक विशाल झुंड दिखाया गया है, जिसमें देवता, अर्ध-देव (अंशावतार) और योगी सभी उड़ते हुए दिखाई देते हैं। दो शिलाखंडों के बीच एक प्राकृतिक दरार है, और उसमें दिखलाई गई सभी आकृतियाँ इसी दरार की ओर देखते हुए खोदी गई हैं। इस उभरी हुई मूर्तिकला के ऊपरी हिस्से में काफी गतिविधियों और शक्ति का प्रदर्शन है, जबकि नीचे के हिस्से में जीवन में सब कुछ शांत प्रतीत होता है, जिसमें ध्यानमग्न योगी भी शामिल हैं। पशुओं का चित्रण अत्यंत सूक्ष्म और यथार्थवादी है, जैसे सोते हुए हाथी के बच्चे का चित्र, बंदरों की आकृति, और हिरन का नाक खुजाना, जो कलाकार की गहन और शोधपरक दृष्टि का परिचायक है। आकृतियों की कोमलता और उनकी गोलाई कलाकार की कुशलता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
विषय वस्तु पर मतभेद:
गंगावतरण: कुछ विद्वान इसे 'गंगावतरण' के रूप में पहचानते हैं, जहाँ शंकर जी को पृथ्वी पर आती गंगा की धारा के प्रवाह को अपनी जटाओं में रोकते हुए दिखाया गया है। दरार के दाहिनी ओर एक चतुर्भुजी आकृति (शंकर जी) अन्य आकृतियों से बड़ी है, जिसे उनके कंधों के ऊपर त्रिशूल से पहचाना जा सकता है, और उनके पास शिष्य भी दिखाए गए हैं।
अर्जुन का चिन्तन: अन्य विद्वानों का मत है कि इसे 'अर्जुन के चिन्तन' के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें एक पुरुष आकृति एक तरफ ध्यानमग्न अवस्था में दिखाई गई है, जिसे वे महाभारत के अर्जुन मानते हैं, जो पशुपतास्त्र प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रहे थे।
भारतीय कला में महत्व: यह कृति दीर्घकाल से दक्षिण में भारतीय वास्तुकला की महान कृति मानी जा रही है। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है:
यह पल्लव युगीन कला की तीव्रता, गति और विशालता का स्पष्ट उदाहरण है।
यह कलाकार की पशुओं की विशेषताओं और मानव आकृतियों की कोमलता को दर्शाने की अद्भुत क्षमता को प्रदर्शित करती है।
यह मूर्तिकला और वास्तुकला के समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ एक प्राकृतिक भू-भाग को एक जटिल और अर्थपूर्ण कलाकृति में बदल दिया गया।
यह भारतीय मूर्तिकला में कथात्मकता और यथार्थवाद के सम्मिश्रण का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो उस युग की कलात्मक परिपक्वता को दर्शाता है।
होयसल कला शैली की जटिलता और सूक्ष्मता का मूल्यांकन करें, जिसमें 'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' मूर्ति का विशेष उल्लेख हो। उत्तर: होयसल कला शैली (11वीं से 14वीं शताब्दी) दक्षिण भारतीय कला के इतिहास में अपनी अपूर्व और अति विशिष्ट जटिल कलात्मकता तथा विस्तार के लिए जानी जाती है। होयसल राजाओं के शासनकाल में मंदिर वास्तुकला बहुत प्रचलित थी, जहाँ न केवल विस्तृत मंदिर ढाँचे बनाए गए, बल्कि प्रत्येक मंदिर में मूर्तियों की आंतरिक सजावट पर भी अत्यधिक ध्यान दिया गया। होयसल मूर्तिकला की विशेषताएँ:
गहरी खुदाई और तराश: होयसल मूर्तियों में गहरी खुदाई और तराश की कला देखने को मिलती है। पत्थर की कोमलता के कारण गहरी कटाई सफल हो पाती थी, जिससे जटिल दृश्यों की कटाई सरल हो जाती थी।
कोमलता और लयात्मकता: इन मूर्तियों में कोमलता तथा शरीर के अंगों की लयात्मकता और जटिल दृश्य देखने को मिलते हैं। मूर्तियों की निपुणता से प्रदर्शित भाव-भंगिमाएँ, लयात्मकता और गति इनके विशिष्ट आकर्षण हैं।
सूक्ष्मता और विवरण: होयसल कलाकार अपनी मूर्तियों में अत्यधिक सूक्ष्म विवरण शामिल करते थे, चाहे वह गहनों का अलंकरण हो, केश विन्यास हो, या पशुओं का चित्रण।
'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' मूर्ति का महत्व: बेलूर में प्राप्त कृष्ण की यह मूर्ति क्लिष्ट और सूक्ष्म होयसल नक्काशी का सर्वोत्तम उदाहरण है।
बहु-स्तरीय चित्रण: इस मूर्ति में समस्त घटना को अलग-अलग परतों में दिखाया गया है। कृष्ण को मध्य में मुख्य पात्र के रूप में दर्शाया गया है, जबकि अन्य विभिन्न परतों पर पशु और अन्य मनुष्यों को दिखाकर एक मनोरंजक और विस्तृत कथानक जैसा बन गया है।
भाव और लयात्मकता: यद्यपि कृष्ण को नायक के रूप में दर्शाया गया है, फिर भी इस सारे दृश्य में उनके खड़े होने की मुद्रा और उनके अंगों की लयात्मकता से पूरे संयोजन में एक कोमलता का आभास होता है।
सजीव चित्रण: पशुओं का सजीव चित्रण बहुत ही रोचक और आकर्षक लगता है, जो कलाकार की सूक्ष्म अवलोकन शक्ति को दर्शाता है।
मानव आकृतियों की विशिष्टता: स्त्रियों के भारी स्तन तथा नितंब, गहनों का अलंकरण और विशिष्टतापूर्ण भारतीय केश विन्यास के साथ यह संयोजन होयसल शैली का विशिष्ट उदाहरण माना जाता है।
कलाकार की कुशलता: इस मूर्ति में पत्थर की सूक्ष्म रूप से की गई कटाई उस काल के कलाकारों की असाधारण कुशलता को दर्शाती है, जो पत्थर पर इतनी बारीकी से काम कर सकते थे।
कुल मिलाकर, होयसल कला अपनी जटिलता, सूक्ष्मता, लयात्मकता और विस्तृत चित्रण के लिए प्रसिद्ध है, और 'गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण' जैसी मूर्तियाँ इस शैली की पराकाष्ठा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
पूर्वी भारत में गंग राजवंश के मंदिर निर्माण की परियोजनाओं और कोणार्क सूर्य मंदिर के कलात्मक महत्व पर एक निबंध लिखें। उत्तर: पूर्वी भारत में, विशेषकर उड़ीसा क्षेत्र में, गंग राजवंश (12वीं शती ईस्वी) ने मंदिर निर्माण कला में एक नया अध्याय लिखा। पाल और सेन राजवंशों के बाद, गंग राजवंश एक प्रमुख और प्रतिष्ठित शक्ति के रूप में उभरा, जो अपने भव्य मंदिरों के लिए विख्यात हुआ। गंग राजवंश की मंदिर निर्माण परियोजनाएँ: गंग वंशीय शासकों ने पूर्वी भारत में कई महत्वपूर्ण मंदिर निर्माण परियोजनाएँ प्रारम्भ कीं। इनमें उड़ीसा के मुक्तेश्वर मंदिर, लिंगराज मंदिर और राजारानी मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जो अपनी अनूठी स्थापत्य शैली और मूर्तिकला के लिए जाने जाते हैं।
कोणार्क सूर्य मंदिर का कलात्मक महत्व: गंग वंश के राजा नरसिंह देव ने उड़ीसा में पुरी के निकट भारतीय पूर्वी समुद्री तट पर कोणार्क में उड़िया वास्तुशास्त्र का सर्वोत्तम मंदिर, सूर्य मंदिर, बनवाया। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक असाधारण कलात्मक उपलब्धि है, जिसका महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है:
विशालता और मौलिकता: यह मंदिर अपने विशाल ढाँचे और प्राकृत आकार (आदमकद) के लिए प्रसिद्ध है। इसकी सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसे एक विशाल रथ के रूप में कल्पना की गई है, जिसे घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा है। यह स्थापत्य कल्पना की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
मूर्तिकला की उत्कृष्टता: मंदिर की बड़ी मूर्तियाँ, जो प्रायः काले पत्थर से बनी हैं, बंगाल की शैली से कुछ मिलती-जुलती हैं। मूर्तियों का प्रतिरूपण कसा हुआ है, और कुछ चौड़े चेहरों पर मुस्कराहट है। कलाकृतियाँ मजबूत हैं और बंधनमुक्त सौम्यता लिए हुए हैं। सूर्य की बड़ी प्रतिमाएँ और नारी संगीतज्ञों की आकृतियाँ (जैसे 'सुरसुंदरी') मंदिर की विशेषताओं में वृद्धि करती हैं।
गति और लय: 'सुरसुंदरी' जैसी मूर्तियाँ, अपने बड़े आकार के बावजूद, एक अद्भुत लय और गति प्रदर्शित करती हैं। अंगों की लयात्मकता, सिर का सूक्ष्म झुकाव, और गहनों का कोमल अलंकरण इन मूर्तियों को सौंदर्ययुक्त और मोहक बनाता है। मूर्तियों की वक्रता और झुकाव उनमें एक अद्वितीय लयात्मकता प्रस्तुत करता है।
कलाकारों की निपुणता: यद्यपि इस मंदिर की वास्तुकला बुरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है, परन्तु जो कुछ बचा है, वह उस युग के कलाकारों की असाधारण कलात्मक महानता और तकनीकी कौशल को समझने के लिए काफी है। यह दर्शाता है कि गंग वंश के कलाकार खुदाई और मूर्तिकला में अत्यंत प्रवीण और निपुण थे। कोणार्क सूर्य मंदिर भारतीय कला और वास्तुकला के इतिहास में एक मील का पत्थर है, जो अपनी भव्यता, कल्पनाशीलता और मूर्तिकला की उत्कृष्टता के लिए विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है। यह गंग राजवंश के कलात्मक संरक्षण और पूर्वी भारत की स्थापत्य कला की सर्वोच्च उपलब्धि का प्रतीक है।
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