सामाजिक विज्ञान: एक परिचय और मानव विकास की गाथा

सामाजिक विज्ञान: एक परिचय और मानव विकास की गाथा

प्रस्तावना

कल्पना कीजिए कि आपके पास एक समय मशीन है। आप अतीत में यात्रा करते हैं और पाते हैं कि आपके दादा-दादी के बचपन का समय, आपका घर, आस-पास का वातावरण, यहाँ तक कि खाना-पीना, पहनावा और भाषा भी आज से बहुत भिन्न है। और पीछे जाने पर, आपको यह जानकर और भी आश्चर्य होगा कि उस समय के लोगों का रहन-सहन कितना अलग था। यह सब भूतकाल में क्या हुआ था, यह एक रहस्य जैसा लगता है जिसे हम सुलझा सकते हैं। इस रहस्य को समझने के लिए हमें उन तत्वों का प्रयोग करना होगा जो हमें इतिहास से आज तक को समझने में मदद करते हैं।

उद्देश्य

इस अध्याय को पढ़ने के बाद, आप निम्नलिखित बातें समझ पाएंगे:

  • सामाजिक विज्ञान में इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, राजनैतिक विज्ञान तथा समाजशास्त्र जैसे विषय शामिल हैं।

  • यह समझ जाएंगे कि ये सारे विषय आपस में संबंधित हैं और सब मिलकर सामाजिक विज्ञान का निर्माण करते हैं।

  • मनुष्य समाज में कैसे रहता है, इस पर मंथन कर सकेंगे।

  • सामाजिक समस्याओं को पहचान सकेंगे और उनका सामना करने के तरीकों पर विचार कर सकेंगे।


0.1 सामाजिक विज्ञान

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, सामाजिक विज्ञान हमारे समाज से संबंधित है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज के हर पहलू को समझने और सुलझाने में मदद करना है। इसके ज्ञान का दायरा बहुत व्यापक है और इसमें कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं:

  • इतिहास और ऐतिहासिक भवन: भूतकाल की घटनाओं, लोगों और समाजों का अध्ययन।

  • भूगोल: पृथ्वी की सतह, उसके भौतिक स्वरूप, जलवायु, जनसंख्या और मानव गतिविधियों का अध्ययन।

  • राजनैतिक विज्ञान: सरकार, शासन प्रणाली, राजनैतिक व्यवहार और शक्ति संबंधों का अध्ययन।

  • समाजशास्त्र: मानव व्यवहार, सामाजिक संरचनाओं, समूहों और समाजों का अध्ययन।

  • अर्थशास्त्र: उत्पादन, वितरण और उपभोग के साथ-साथ सीमित संसाधनों के प्रबंधन का अध्ययन।

सामाजिक विज्ञान का अध्ययन हमें यह जानने में मदद करता है कि मानव सभ्यता ने गुफाओं में रहने से लेकर आज के विकसित समाजों तक का सफर कैसे तय किया है। हम इतिहास को केवल एक विषय के रूप में न देखकर, बल्कि उससे ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जिससे हम भूत, वर्तमान और भविष्य को आपस में जोड़ सकें और इन सबका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसे समझ सकें।

महत्व: सामान्य विज्ञान हमारे जीवन में अत्यधिक महत्व रखता है। उदाहरण के लिए, यह हमें यह समझने में मदद करता है कि विभिन्न संस्कृतियों और समाजों के लोग कैसे रहते हैं, जिससे सहिष्णुता और समझ बढ़ती है। दूसरा, यह हमें आर्थिक निर्णय लेने, सरकारी नीतियों को समझने और सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने में सक्षम बनाता है।


0.2 सामान्य विज्ञान का अध्ययन

अध्ययन के क्षेत्र में कई शाखाएं हैं, और सामाजिक विज्ञान ऐसी ही एक प्रमुख शाखा है। इसकी मुख्य शाखाएं अर्थशास्त्र, इतिहास, भूगोल, राजनैतिक विज्ञान और मनोविज्ञान हैं।

शुरुआत में, दर्शनशास्त्र जैसे केवल एक ही विषय होते थे, जिसका अर्थ था ज्ञान और जानकारी प्राप्त करना। जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया, विषयों को अलग-अलग शाखाओं में बांटने की आवश्यकता महसूस हुई। इस प्रकार, 'विज्ञान' और 'सामाजिक विज्ञान' को अलग किया गया। जहाँ पर्यावरण विज्ञान हमें विश्व के बारे में समझाता है, वहीं सामाजिक विज्ञान हमें समाज और इंसानों के रहन-सहन के बारे में सिखाता है।

0.2.1 इतिहास और ऐतिहासिक भवन

इतिहास क्या है?

इतिहास भूतकाल में घटित हुई सच्ची घटनाओं और सच्चे लोगों से संबंधित है। यह केवल विचारों या कल्पनाओं पर आधारित नहीं है कि क्या होना चाहिए था, बल्कि यह इस बात का ज्ञान है कि वास्तव में क्या हुआ था। यह किसी एक व्यक्ति, राजा या रानी के बारे में नहीं है, बल्कि पूरे समाज, व्यक्तियों (नर या मादा, अमीर या गरीब, किसी भी धर्म या जाति के) और देशों के बारे में है। इतिहास हमें अपने पूर्वजों के बीते हुए समय की जानकारी देता है।

हम इतिहास क्यों पढ़ते हैं?

इतिहास की शिक्षा हमें अपनी जड़ों, पूर्वजों की ताकत और उनकी उपलब्धियों के विषय में बताती है, जिन पर हमें गर्व होता है और जिनसे हमें आगे बढ़ने की दिशा मिलती है। भूतकाल हमारे वर्तमान और भविष्य में काफी महत्व रखता है, क्योंकि इतिहास का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में वृद्धि का कारण बन सकता है। ऐतिहासिक भवनों और स्थलों से जुड़कर हमें अपने अतीत पर गर्व महसूस होता है, और हम इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखते हैं।

ऐतिहासिक ज्ञान (पुरातत्व विज्ञान):

ऐतिहासिक विज्ञान (पुरातत्व) एक ऐसा विज्ञान है जो हमें भूतकाल के समाजों और संस्कृतियों के बारे में जानकारी देता है। इसकी जड़ें कलाकृतियों, दफन स्थलों, टूटी हुई इमारतों और ऐतिहासिक भवनों जैसी वस्तुओं में मिलती हैं। पुरातत्वविद् इन वस्तुओं का अध्ययन करके उनकी समयावधि निर्धारित करते हैं। इस अध्ययन से हमें पुराने शिल्प और लिखित रिकॉर्ड भी प्राप्त होते हैं, जो अधिक जानकारी प्रदान करते हैं।

ज्यादातर ये तत्व जमीन में दफन होते हैं और उन्हें निकालने के लिए खुदाई करनी पड़ती है। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और नालंदा जैसे स्थान इसी तरह की खुदाई से मिले हैं, जहाँ बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। गुजरात के निकट समुद्र से मिली प्रसी फिठालू की खोज (जो हिन्दू भगवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारका मानी जाती है) और हरियाणा में राखीगढ़ी जैसी खोजें हमें अतीत से जोड़ती हैं।

प्राचीन सामग्री में लिखित हस्तलिपियाँ, स्तंभ, लोहे की तख्तियाँ, सिक्के, मोहरें, औजार, खिलौने और तस्वीरें शामिल हैं। ये हमें उस समय के जीवन का एक सुझाव देते हैं। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) जैसी संस्थाएँ प्राचीन खोजों, उनके संरक्षण और नई खोजों का कार्य करती हैं।

0.2.2 भूगोल

भूगोल एक ऐसा ज्ञान है जो हमें जमीन का नक्शा, वहाँ के लोग, स्थान तथा वहाँ के वातावरण का ज्ञान देता है। यह हमें उस संसार के बारे में बताता है जहाँ हम रहते हैं। भूगोल सामान्य विज्ञान को वास्तविक विज्ञान से जोड़ता है।

यह हमें विभिन्न स्थानों, वहाँ के रहन-सहन, राजनैतिक शास्त्र, अर्थशास्त्र और वातावरण का ज्ञान देता है, और इन सबको आपस में जोड़ने का काम करता है। भूगोल हमें अन्य विषयों का भी ज्ञान देता है। उदाहरण के लिए, किसी देश के भूगोल को जानकर हम उसके इतिहास को भी समझ सकते हैं (जैसे गंगा के उपजाऊ मैदान में बड़े साम्राज्यों का विकास)। भूगोल हमें यह समझने में मदद करता है कि वातावरण में बदलाव कैसे हुए, जैसे बर्फ युग के बाद घने जंगल समाप्त हुए और घास खाने वाले जानवरों की संख्या बढ़ी, जिससे मनुष्य को हल्के हथियार बनाने पड़े।

0.2.3 राजनैतिक विज्ञान

सरकार एक ऐसा शब्द है जिससे हम सभी परिचित हैं। यह नियमों का एक समूह है जिसे देश में रहने वाले सभी व्यक्तियों को मानना पड़ता है। प्रजातंत्र में, आम इंसान ही उन व्यक्तियों को चुनते हैं जो मिलकर सरकार बनाते हैं। राजतंत्र में, राजा या रानी नियम बनाते हैं।

राजनैतिक विज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है जो हमें राजनीति से परिचित कराता है। यह हमें सिखाता है कि सरकार कैसे चुनी जाती है, राजनैतिक गतिविधियों और हालातों में क्या संबंध है, और इसमें सरकार, जनसमूह, राजनैतिक संबंध और राजनैतिक बर्ताव के बारे में पता चलता है। यह विषय देश को कैसे चलाना चाहिए, इस पर केंद्रित है।

0.2.4 समाजशास्त्र

समाजशास्त्र भी एक बहुत ही जरूरी सामाजिक विज्ञान का भाग है। यह इंसान का व्यवहार समाज में कैसे होता है, इसका अध्ययन करता है। यह लेटिन शब्द 'सोशोलोजी' से बना है, जिसका अर्थ है अपने साथी के बारे में जानकारी प्राप्त करना। समाजशास्त्र समाज को समझने तथा उसके काम करने के तरीके के बारे में जानकारी देता है। इसमें जाति, लिंग की पहचान, संस्कृति, सभ्यता, धर्म और सरकार भी शामिल हैं। समाजशास्त्र में यह देखा जाता है कि समाज को चलाने में एक अकेले मनुष्य तथा समूह कैसा व्यवहार करता है।

0.2.5 अर्थशास्त्र

समाज में रहने का मतलब है कि हमें अपने जीवन को कैसे संगठित करना होता है। हमें अपनी आय, समय और अन्य सीमित संचित कोष का कुशलतापूर्वक प्रयोग करना आना चाहिए। अर्थशास्त्र एक वैज्ञानिक विद्या है जो इंसान को उत्पादन, उपभोग और धन का इस्तेमाल करने में मदद करता है। यह हमारी जरूरतों और सीमित साधनों के बीच तालमेल बिठाता है, जैसे कि बजट बनाना या समय सारणी बनाना। यह सभी विषय हमें अपने जीवन की तरक्की के लिए जरूरी हैं।


0.3 मनुष्य का विकास

लगभग दो करोड़ वर्ष पूर्व पहला मनुष्य देखा गया था, जिसे वैज्ञानिक 'होमो सेपियन्स' कहते हैं (अर्थात वह व्यक्ति जिसमें दिमाग होता है)। शुरुआती मनुष्य वनमानुष जैसे दिखते थे, खेती करना या मकान बनाना नहीं जानते थे। वे गुफाओं तथा पेड़ों पर रहते थे। जब वे जमीन पर रहने लगे, तब भी उन्हें लिखना नहीं आता था। लेखन कला की खोज एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम था। इतिहासकार और खोज करने वाले इन शुरुआती मनुष्यों के हथियार, जेवरात और गुफाओं में बने चित्रों की समीक्षा करते हैं।

0.3.1 भ्रमणकारी जीवन: पाषाण युग व्यतीत करता

पूर्व जीवन में मनुष्य एक भ्रमणकारी (खानाबदोश) जीवन व्यतीत करता था। वे खाने की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। वे समूह में रहते थे ताकि जंगली जानवरों से अपना बचाव कर सकें। वे पत्थरों से औजार तथा हथियार बनाने लगे, जिससे उनके रहन-सहन में विकास हुआ।

  1. पूरा पाषाण युग (500,000 ई. पू. से 10,000 ई. पू.):

    • मनुष्य पहाड़ों के नजदीक रहते थे, जहाँ नदियाँ बहती थीं, जिससे उन्हें पीने का पानी और शिकार मिलता था।

    • गुफाएँ उन्हें रहने का स्थान प्रदान करती थीं।

    • शरीर को ठंड और गर्मी से बचाने के लिए पेड़ की खाल और जानवरों की खाल पहनते थे।

    • भीमबेटका जैसी गुफाओं में शिकार के चित्र मिले हैं, जो उनकी जीवन शैली को दर्शाते हैं।

    • वे अपने पूर्वजों को पूजते थे और उन्हें औजारों व भोजन के साथ दफनाते थे (यह भावनात्मक भावनाओं से संबंधित परंपरा थी)।

    • वे सूर्य, चाँद, बिजली और बादलों की गर्जन की पूजा करते थे क्योंकि उन्हें समझ नहीं पाते थे, लेकिन प्रकृति के साथ कोई खिलवाड़ नहीं करते थे और केवल उतनी ही चीजें लेते थे जितनी उन्हें जरूरत होती थी।

  2. मध्य पाषाण युग (10,000 ई. पू. से 8,000 ई. पू.):

    • इस युग में आग की खोज हुई। संभवतः दो पत्थरों के टकराने से निकली चिंगारी से सूखे पत्तों में आग लग गई होगी।

    • मनुष्य ने आग का प्रयोग जानवरों को डराने, रात में रोशनी करने, खाना पकाने (स्वाद में सुधार) और ठंड से बचाव के लिए करना सीख लिया। आग एक आश्चर्यजनक और पूजनीय वस्तु बन गई।

    • औजारों का प्रयोग भी एक महत्वपूर्ण खोज थी। इस समय के औजारों को 'माइक्रोलिथ्स' (छोटे पत्थर) या 'साइको लिथसा' कहते हैं। ये तेज और उपयोगी थे, जो जानवरों की हड्डियों से भी बनाए जाते थे।

    • इन औजारों में छेद करने वाले, उठाने वाले, तीर, कांटे, तीर के नुकीले कोण, हथौड़ी, काटने वाले औजार और कुल्हाड़ी शामिल थे।

    • छोटे पत्थरों को तराश कर चाकू की तेज धार वाला बनाया गया और उन्हें तीर व भाले में जोड़कर सुरक्षित दूरी से शिकार करना संभव हुआ। ऐसे औजार पंजाब, कश्मीर, हिमालय के निचले हिस्सों और नर्मदा घाटी में मिले हैं।

  3. नवपाषाण युग (नवीन पत्थरों का युग) (8,000 ई. पू. - 4,000 ई. पू.):

    • यह वह युग था जब मनुष्य ने खेती करना (खाद्य उत्पादन) शुरू किया। शायद कुछ बीज जमीन पर गिर गए और उनसे पौधे उग आए।

    • खेती की शुरुआत ने लोगों को एक जगह रुककर रहने को मजबूर किया, जिससे स्थायी बस्तियाँ और गाँव विकसित हुए।

    • गाँवों में कई परिवार एक-दूसरे का संरक्षण करते थे।

    • पशुपालन भी इसी युग में शुरू हुआ। कुत्ता पहला पालतू जानवर बना, जिसके बाद बकरी, गाय, भैंस और भेड़ जैसे जानवर पाले जाने लगे जिनसे दूध, गोश्त और ऊन मिलता था।

    • भेड़ों के बालों और खालों से वस्त्र बनाने लगे।

    • पृथ्वी की पूजा करना आरम्भ कर दिया क्योंकि उन्होंने देखा कि कैसे बीज से पौधे निकलते हैं और माँ बच्चों को पालती है। अंधविश्वास अभी भी मौजूद था।

    • औजारों में सुधार: अच्छे और तेज औजारों की आवश्यकता महसूस हुई। कुल्हाड़ी जैसे मजबूत पत्थर के औजार बनाए गए, जो लकड़ी के हैंडल से जुड़े होते थे। हंसिया जैसे औजार फसल काटने के काम आते थे।

    • पहिये की खोज: पहिये की खोज एक क्रांतिकारी परिवर्तन था। इसका उपयोग कुएँ से पानी निकालने (पुली), धागा बुनने और कपड़े बनाने (चक्र), मिट्टी के बर्तन बनाने और सबसे महत्वपूर्ण, सामान ढोने के लिए गाड़ी में किया जाने लगा।

0.3.2 धातु का प्रयोग

मनुष्य पाषाण युग से काफी आगे आ चुका था, लेकिन संतुष्ट नहीं था।

  1. ताम्र युग: शीघ्र ही उन्होंने ताँबे की खोज कर ली। यह पहला धातु था जिसे पिघलाकर औजार और वस्तुएँ बनाने में इस्तेमाल किया गया। मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए आग की भट्टी का उपयोग इसी युग में धातु गलाने के लिए भी होने लगा।

  2. कांस्य युग: जैसे-जैसे धातुओं का ज्ञान बढ़ा, मनुष्य ने ताँबे को दूसरे धातुओं जैसे जस्ता और टिन के साथ मिलाकर काँसा तैयार किया। काँसे के औजार पत्थर और ताँबे के औजारों से ज्यादा फायदेमंद साबित हुए।

  3. लौह युग: जब मनुष्य लोहा और पत्थरों के मिले-जुले औजारों का प्रयोग करने लगे, तो यह युग लौह युग कहलाने लगा। लोहे की खोज मनुष्य की प्रगति की बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी थी, क्योंकि इससे बने औजार ज्यादा मजबूत और देर तक चलने वाले थे। ब्रह्मगिरी, नवाब नोली और छोटा नागपुर में लौह युग की वस्तुएँ मिली हैं।

जन समूह की शुरूआत:

खेतीवाड़ी, पशुपालन, औजारों की प्रगति और पहिये की खोज से मनुष्य एक जगह समूह में रहने लगा, जिसे गाँव कहा गया। ये समूह धीरे-धीरे बढ़ने लगे। इन बढ़ते हुए समूहों को नियंत्रित करने के लिए एक नेता की जरूरत पड़ी, जो कानून बनाए और लोगों को मिल-जुलकर रहने में सहायता करे। यह नेता आमतौर पर कोई बुजुर्ग या ताकतवर व्यक्ति होता था जो विवादों को सुलझाता था। धीरे-धीरे समूह बढ़ते गए और नगर व शहर बनने लगे। सरस्वती और सिंधु में 2500 ई.पू. में पहला कस्बा बना, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता कहा जाता है (जैसे हड़प्पा)।

धर्म:

पूरे विश्व में मनुष्यों को अनहोनी का भय लगा रहता था। वे प्रकृति की शक्तियों जैसे जमीन (जो भोजन देती थी), सूर्य (जो जीवन और गर्मी देता था), चाँद, तारे और बारिश को पूजने लगे। वे उनके सम्मान में गीत गाते थे और कुर्बानियाँ देते थे। जादू-टोना करने वाले लोग उभरे जो लोगों की मदद करने का दावा करते थे। बाद में पूजा-पाठ करने वाले लोग 'पंडित' कहलाने लगे।

मनुष्य यह जान गए थे कि मृत्यु एक ऐसा सफर है जहाँ से कोई वापस नहीं आता। उन्होंने मरे हुए लोगों के लिए कब्र खोदनी शुरू कर दी और उन्हें ढकने के लिए बड़े पत्थरों का इस्तेमाल किया, जिन्हें मेगालिथ्स कहते हैं। कभी-कभी रोजमर्रा की वस्तुएँ भी कब्र में रख दी जाती थीं।

0.3.3 लौह युग और आगे

लोहे की खोज मनुष्य की प्रगति की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी, क्योंकि इससे बने औजार ज्यादा मजबूत और देर तक चलने वाले थे। बाद में, मनुष्य ने दो धातुओं को मिलाकर नई धातुएँ बनाईं, जैसे पीतल (ताँबा और जस्ता), और फिर स्टील (कार्बन और लोहे का मिश्रण)। आधुनिक युग में प्लास्टिक का निर्माण हुआ, जो दूसरे धातुओं से ज्यादा फायदेमंद लगा, लेकिन इसके वातावरण पर गलत प्रभाव के कारण अब इसका प्रयोग कम होने लगा है। यह दर्शाता है कि मनुष्य की हर खोज एक नई चुनौती छोड़ जाती है, जो हमारी आगे बढ़ने की प्रेरणा बनती है।

मनुष्य की प्रगति के विभिन्न चरण:

  1. शिकार युग (पाषाण युग का प्रारंभिक भाग): मनुष्य शिकारी-संग्राहक जीवन व्यतीत करता था, पूरी तरह वातावरण पर निर्भर था। जानवरों, पक्षियों, मछलियों का शिकार करते थे। यह चरण तब तक रहा जब तक पशुपालन शुरू नहीं हुआ।

  2. गाँव का जीवन (देहात): खेतीवाड़ी की वजह से मनुष्य एक जगह रुककर रहने लगे। उन्होंने बीज बोकर फसल उगाना सीखा। यह तकनीक उन्हें स्थायी रूप से रहने और गाँवों का निर्माण करने में मदद मिली, जहाँ सभ्यता ने सही मायने में जन्म लिया। इसे देहाती काल भी कह सकते हैं।

  3. शहरी जीवन: जनसंख्या वृद्धि के साथ, मनुष्य केवल भोजन संग्राहक या उत्पादक नहीं रहे, बल्कि समाज में विविधता आई। कुछ लोग कुम्हार, कपड़ा बुनने वाले, या बढ़ई बन गए। धातुओं की खोज (ताँबा, काँसा, लोहा) से जीवन में और प्रगति हुई। कारीगर अपनी कुशलता से बर्तन, चमड़े का काम और राजगिरी करने लगे। सामान का आदान-प्रदान केंद्रीय स्थानों पर होने लगा। लेखन कला की खोज (जैसे हड़प्पा अभिलेख) एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसने व्यापार और कानून के रखरखाव में मदद की। शहरों का निर्माण सुनियोजित तरीके से हुआ (जैसे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, कालीबंगन), जिनमें पक्की सड़कें, जल निकासी सुविधाएँ और ईंटों के भवन थे। विज्ञान और शिल्प विज्ञान की उन्नति से सामान बनाने की विद्या में सुधार आया। कुछ लोगों के लिए जीवन आरामदायक हो गया, और शहरों ने अपनी पहचान बनाई, कुछ तो राजधानी बन गए।


0.4 सामान्य विज्ञान और आज के समाज में संबंध

मानव सभ्यता ने जंगल में शिकारी जीवन से लेकर आज के उस युग तक का लंबा सफर तय किया है, जहाँ हम अन्य ग्रहों की खोज करते हैं और जानकारी को कंप्यूटर में संचित करते हैं। हम एक ऐसे युग में हैं जहाँ जानकारी और आपसी वार्तालाप की शिल्पकारी से समृद्ध हैं। इसके बावजूद, हम निरंतर बदल रहे हैं, आगे बढ़ रहे हैं और प्रगति की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

यह समझ लेना चाहिए कि पत्थर युग से नवीन सभ्यता तक का सफर एक लंबा सफर रहा है, जिसमें हमने नई खोजों और विभिन्न परिस्थितियों का सामना किया और उनका लाभ उठाया। यह संबंध मनुष्य का केवल अपने आप से ही नहीं, बल्कि समाज और वातावरण में प्रेरणा डालकर समाज में हम सब मिलकर उन्नति की ओर आगे बढ़े ताकि इसका फायदा केवल कुछ लोग ही नहीं, बल्कि अन्य भी पा सकें।

हालांकि हमने बहुत प्रगति कर ली है, फिर भी ऐसी कई समस्याएँ हैं जिनका हमको सामना करना है। ये समस्याएँ सामाजिक विज्ञान के अध्ययन से जुड़ी हुई हैं और हमें इनका समाधान खोजना होगा:

  1. गरीबी व भूखमरी

  2. धन का सामान्य विभाजन न होना

  3. बेरोजगारी या कम आँके जाने वाला काम

  4. सामान्य अर्थशास्त्र, कर की चोरी और काला धन

  5. सामान्य जीवन में घोटाला

  6. वायु प्रदूषण (पर्यावरण संबंधी)

  7. अपने देश के प्रति कम लगाव (सामाजिक/राजनैतिक)

  8. लिंग से संबंधित समस्याएँ, औरतों के खिलाफ जुर्म तथा दहेज, लिंग की पहचान तथा वेश्यावृत्ति (सामाजिक)

  9. बदमाशी और गुंडार्गदी, देश में गड़बड़ी मचाना आदि (सामाजिक/राजनैतिक)

  10. देश की उन्नति व प्रगति में रुकावटें: जैसे कि भाषा, धर्म, जातपात और आपसी भेदभाव आदि (सामाजिक/राजनैतिक)

सामाजिक विज्ञान हमें इन समस्याओं को समझने, उनके मूल कारणों की पहचान करने और उनके स्थायी समाधान खोजने के लिए आवश्यक उपकरण और दृष्टिकोण प्रदान करता है।

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