सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक कला का इतिहास तथा मूल्यांकन

 

I. परिचय

  • गुप्तकाल के बाद का समय भारतीय इतिहास में मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला की प्रगति का युग कहलाता है।

  • इस काल में विभिन्न राजवंशों (पल्लव, चोल, होयसल, पाल, सेन, गंग) ने कला को संरक्षण और प्रोत्साहन दिया, जिससे कलात्मक गतिविधियाँ दक्षिण और पूर्वी भारत में केंद्रित हो गईं।

II. दक्षिण भारतीय कला का विकास

A. पल्लव वंश (सातवीं शताब्दी ईस्वी)

  • कला केंद्र: मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) और कांचीपुरम।

  • प्रमुख कलाकृतियाँ:

    • गुफा मंदिर, मंदिर इमारतें, एकाश्म ढाँचे।

    • उदाहरण: मामल्लपुरम में पंचरथ, मंडप ढाँचे, उभरी हुई मूर्तिकलाएँ।

  • विशिष्ट उदाहरण:

    • अर्जुन का चिन्तन अथवा गंगावतरण:

      • माध्यम: पत्थर।

      • समय: पल्लव काल, सातवीं शताब्दी ईस्वी।

      • स्थान: मामल्लपुरम (चेन्नई)।

      • आकार: लगभग 91 फीट x 152 फीट।

      • विशेषताएँ:

        • दो शिलाखंडों पर उभरी हुई मूर्तिकला।

        • स्पष्ट, स्वाभाविक और सहज प्रस्तुति, संपूर्ण प्रस्तुति में प्रवाह।

        • विभिन्न आकार के मनुष्य, पशुओं का झुंड (देवता, अर्ध-देव, योगी) उड़ते हुए दिखाए गए हैं।

        • दो शिलाखंडों के बीच एक दरार है, जिसकी ओर सभी आकृतियाँ देखती हुई खोदी गई हैं।

        • ऊपरी हिस्से में गति और शक्ति का प्रदर्शन, निचले हिस्से में शांत जीवन।

        • कुछ योगियों को ध्यानमग्न अवस्था में दिखाया गया है।

        • विषय वस्तु पर विवाद:

          • कुछ विद्वान इसे गंगावतरण मानते हैं, जिसमें शंकर जी को पृथ्वी पर आती गंगा की धारा को अपनी जटाओं में रोकते हुए दिखाया गया है (शंकर जी की चतुर्भुजी आकृति और शिष्य दिखाई देते हैं)।

          • कुछ इसे अर्जुन का चिन्तन मानते हैं, जिसमें एक पुरुष ध्यानमग्न अवस्था में दिखाया गया है (जिसे अर्जुन माना जाता है)।

        • कलात्मक गुण: तीव्र गति, विशालता, पशुओं की विभिन्न विशेषताओं का सजीव चित्रण (सोता हाथी का बच्चा, बंदर, हिरण), कोमलता, आकृतियों की गोलाई। यह दक्षिण भारत की महान वास्तुशिल्प कृतियों में से एक है।

B. चालुक्य वंश (पल्लवों के समकालीन)

  • वास्तुकला संबंधी क्रियाओं के लिए याद किए जाते हैं।

  • इनकी मूर्तियाँ कोमल एवं सौम्य थीं।

C. चोल वंश

  • विशेषता: मंदिर संबंधी शिल्पकला में अग्रणी।

  • कांस्य ढलाई: कांसे की ढलाई द्वारा धातुओं की मूर्तियों में शरीर की लयात्मक गति दिखाने में सबसे आगे। जटिल कांस्य मूर्तियाँ बनाईं।

  • मंदिर निर्माण: दक्षिण में कई प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण।

    • उदाहरण: गंगकोंडाचोलापुरम मंदिर, बृहदेश्वर मंदिर।

    • विशेषताएँ: सरलता (अकृत्रिमता), स्मारकीय विशालता, राजसी गुण।

D. होयसल वंश (11वीं शती के मध्य से 14वीं शती के मध्य)

  • राजधानी: हेलीबिड (पूर्व नाम द्वार समुद्र)।

  • कला शैली: अपनी जटिल कलात्मकता और विस्तार के लिए जानी जाती है।

  • मंदिर वास्तुकला: अत्यंत प्रचलित, प्रत्येक मंदिर में मूर्तियों की आंतरिक सजावट पर जोर। मंदिर शिल्पकला और वास्तुकला में अच्छा समन्वय।

    • उदाहरण: बेलूर में मुख्य आदिकालीन मंदिर, हालेबिड स्थित होयसलेश्वर मंदिर, केशव मंदिर, सोमनाथपुर के मंदिर।

  • मूर्तिकला: पत्थर की मूर्तियों का युग। गहरी खुदाई, गहरी तराश, कोमलता, शरीर के अंगों की लयात्मकता, जटिल दृश्य। पत्थर की कोमलता के कारण जटिल दृश्यों की कटाई संभव।

    • उदाहरण:

      • गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण:

        • माध्यम: पत्थर।

        • समय: होयसल काल।

        • स्थान: बेलूर।

        • आकार: 3 फीट।

        • विशेषताएँ: क्लिष्ट और सूक्ष्म नक्काशी का सर्वोत्तम उदाहरण। पूरी घटना को अलग-अलग परतों में दिखाया गया है। कृष्ण को नायक के रूप में, अन्य पात्रों (पशु, मनुष्य) को विभिन्न परतों पर। खड़ी मुद्रा और अंगों की लयात्मकता से कोमलता का आभास। पशुओं का सजीव चित्रण। स्त्रियों के भारी स्तन और नितंब, गहनों का अलंकरण, विशिष्ट भारतीय केश विन्यास होयसल शैली की पहचान। पत्थर की सूक्ष्म कटाई कलाकार की कुशलता दर्शाती है।

  • अद्वितीयता: निपुणता से प्रदर्शित भाव-भंगिमाएँ, मूर्तियों में लयात्मकता तथा गति इनके विशिष्ट आकर्षण हैं।

V. पूर्वी भारतीय कला का विकास

A. पाल तथा सेन राजवंश

  • इन राजवंशों के बाद पूर्वी भारत में कला का विकास हुआ।

B. गंग राजवंश (12वीं शती ईस्वी)

  • विशेषता: अच्छे मंदिर बनाने के लिए प्रसिद्ध।

  • प्रमुख परियोजनाएँ: उड़ीसा में मंदिर निर्माण।

  • उदाहरण:

    • मुक्तेश्वर मंदिर, लिंगराज मंदिर, राजारानी मंदिर (उड़ीसा)।

    • कोणार्क सूर्य मंदिर (उड़िया वास्तुशास्त्र का सर्वोत्तम मंदिर):

      • स्थान: कोणार्क, पुरी के निकट, उड़ीसा के पूर्वी समुद्री तट पर।

      • निर्माता: गंग वंश के राजा नरसिंह देव।

      • संरचना: विशाल ढाँचा, घोड़े द्वारा खींचते हुए रथ बना है।

      • विशेषताएँ:

        • उत्कृष्ट वास्तुकला और मूर्तियों के लिए विश्व प्रसिद्ध।

        • बड़ी मूर्तियाँ (प्रायः काले पत्थर से बनी), बंगाल शैली से मिलती-जुलती।

        • प्रतिरूपण कसा हुआ, चौड़े चेहरे पर मुस्कराहट।

        • कलाकृतियाँ मजबूत और बंधनमुक्त सौम्यता लिए हुए।

        • मंदिर की शोभा बढ़ाने वाली सूर्य की बड़ी प्रतिमाएँ और नारी संगीतज्ञों की आकृतियाँ।

        • सुरसुन्दरी (नारी संगीतज्ञ):

          • माध्यम: पत्थर।

          • समय: गंग राजवंश (12वीं शती ईस्वी)।

          • स्थान: कोणार्क, उड़ीसा।

          • आकार: प्राकृत आकार से कुछ ज्यादा।

          • विशेषताएँ: ड्रम बजाती हुई, मुस्कराहट भरा बड़ा चेहरा, बड़े आकार के बावजूद लय और गति, अंगों की लयात्मकता के साथ सिर थोड़ा झुका हुआ। सौंदर्ययुक्त और मोहक प्रस्तुति। वक्षस्थलों के बीच आभूषणों की कोमलता से नक्काशी, मूर्तियों की वक्रता और झुकाव में लयात्मकता, वेश विन्यास और मुद्राएं सौंदर्यपूर्ण।

  • कलाकारों की प्रवीणता: इस युग तक कलाकार खुदाई और अन्य कलाओं में बहुत प्रवीण और निपुण हो गए थे।

VI. निष्कर्ष

  • सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक का काल भारतीय कला, विशेषकर मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला के लिए एक स्वर्ण युग था।

  • विभिन्न क्षेत्रीय शैलियों (पल्लव, चोल, होयसल, गंग) का विकास हुआ, जो अपनी विशिष्टताओं (जैसे चोलों का कांस्य, होयसलों की जटिल नक्काशी, गंगों की स्मारकीयता) के लिए जानी जाती हैं।

  • कलाकारों ने तकनीकी कौशल और कलात्मक अभिव्यक्ति दोनों में उल्लेखनीय प्रगति की, जिससे भारतीय कला विरासत में अद्वितीय योगदान हुआ।

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