3000 ई.पू. से 600 ईस्वी तक कला का इतिहास एवं मूल्यांकन

 

I. परिचय

  • भारतीय कला का क्रमिक विकास 2500 ई.पू. से 1750 ई.पू. (सिंधु घाटी सभ्यता) से शुरू होकर मौर्य, सांगा, कुषाण और गुप्तकाल तक जारी रहा।

  • यह कालखंड कलात्मक अभिव्यक्ति, तकनीकी कौशल और सांस्कृतिक पहचान के विकास का साक्षी है।

II. सिंधु घाटी सभ्यता (2500 ई.पू. - 1750 ई.पू.)

  • कलाकार: उच्च कोटि के कलाकार।

  • कलाकृतियाँ: मोहरें, चीनी मिट्टी का सामान, जेवर, औज़ार, खिलौने, लघु प्रतिमाएं (जैसे 'नृत्य करती हुई लड़की') और उपयोगी वस्तुएं।

  • प्रमुख उदाहरण:

    • नृत्य करती हुई लड़की:

      • माध्यम: धातु।

      • समय: हड़प्पन काल (2500 ई.पू.)।

      • स्थान: मोहनजो-दाड़ो।

      • आकार: लगभग 4 इंच।

      • संग्रह: भारतीय संग्रहालय, नई दिल्ली।

      • विशेषताएँ: पतली, लंबी, लयात्मकता, निःवस्त्र लेकिन बाएं हाथ में कंधों तक चूड़ियाँ (गुजरात/राजस्थान के आदिवासियों के समान), विशिष्ट केश विन्यास (जूड़े के तौर पर बंधे बाल), कमर पर दायाँ हाथ और बाईं जांघ पर बायाँ हाथ रखकर लेटने की मुद्रा। उच्च स्तरीय धातु कला का प्रदर्शन।

III. मौर्य युग (ईसा पूर्व तीसरी सदी)

  • महत्व: भारतीय कला के इतिहास में नए युग का सूत्रपात।

  • प्रमुख कला रूप: स्तंभ, चट्टानों पर शिलालेख (सम्राट अशोक द्वारा)।

  • कलात्मक विशेषताएँ:

    • अशोक के स्तम्भ: उच्च स्तरीय कला के नमूने, भारतीय कला की विशाल धरोहर।

    • संरचना: आधार (दण्डु), सजा हुआ शीर्ष स्थान (शीर्ष)।

    • शीर्ष: अधिकांशतः एक या अधिक पशुओं की आकृतियाँ (उलटे कमल के साथ), जिनके ऊपर शीर्ष फलक (Abacus) होता था।

    • उदाहरण:

      • रामपुरवा बुल कैपिटल (बैल का शीर्ष):

        • माध्यम: पॉलिश किया हुआ बालुका पत्थर।

        • समय: मौर्यकाल (ईसा पूर्व तीसरी सदी)।

        • स्थान: रामपुरवा।

        • आकार: लगभग 7 फीट।

        • संग्रह: भारतीय संग्रहालय, कोलकाता।

        • विशेषताएँ: घंटी के आकार के उलटे कमल पर आधारित, शीर्षफलक पर पेड़-पौधों की चित्रकारी, राजकीय बैल का प्रभावशाली सिर। सूक्ष्मता व विशुद्धता से की गई नक्काशी।

        • पॉलिश: उच्च स्तरीय पॉलिश की चमक मौर्य युगीन मूर्तिकारों की सर्वप्रमुख विशेषता रही है (संभवतः मध्य-पूर्व से प्रेरित)।

  • अन्य: आम व्यक्ति द्वारा अभिव्यक्ति की प्रथा तथा देवी की विभिन्न मूर्तियों के नमूने उपलब्ध।

IV. सांगा, सातवाहन और कुषाण काल

  • सांगा काल: मध्य प्रदेश के सांची में वास्तुकला के सर्वोत्तम उदाहरण मिलते हैं।

  • कुषाण काल:

    • कला की प्रगति में बड़ा सहयोग।

    • पहली बार वास्तुकला में प्रतिमाओं के निर्माण कार्य की प्रगति देखी गई।

V. गुप्तकालीन युग (दूसरी शताब्दी ईस्वी - छठी शताब्दी ईस्वी)

  • महत्व: भारतीय कला के इतिहास का 'स्वर्ण युग' या 'प्रतिष्ठित युग' माना जाता है।

  • विशेषताएँ:

    • मानवीय आकृतियों के प्रस्तुतीकरण में सुधार।

    • कला, निपुणता, पूर्णता तथा कल्पना की शक्ति का अपूर्व मिश्रण।

    • धार्मिक कलाओं में दैवीय गुण।

    • प्रमुख गुण: होंठों का थोड़ा-सा टेढ़ापन, मूर्ति की आकृति में गोलाई, लकड़ी पर की गई खुदाई तथा सरलता।

    • धार्मिक मूर्तियों के साथ-साथ धर्मनिरपेक्ष कलाकृतियाँ भी बनाई गईं।

  • मुख्य कला-केन्द्र: मथुरा, सारनाथ, उज्जैन, अहिछत्र।

  • प्रमुख कला रूप:

    • चित्रकला:

      • उदाहरण: अजंता के प्रसिद्ध चित्र (वाकाटक काल में बने)।

      • पद्धति: परम्परावादी टैम्परा पद्धति (फ्रैस्को नहीं)।

      • विषय: मूलरूप से धार्मिक, किंतु कलाकारों को रचनात्मक एवं कल्पनात्मक प्रदर्शन की अनुमति।

      • विशेषताएँ: स्वतंत्र रेखाओं का प्रयोग, अंगों का गूढ़ सामंजस्य, चेहरे का थोड़ा-सा तिरछापन, आँखों की नक्काशी, अपनी तूलिका पर कलाकार का नियंत्रण। क्षतिग्रस्त चित्र भी रंगों का सौंदर्य प्रस्तुत करते हैं। संगीत की गीतात्मकता का अनुभव।

      • सर्वोत्तम कृति: अश्वेत राजकुमारी (Black Princess)

        • माध्यम: भित्ति-चित्र।

        • समय: दूसरी शताब्दी (AD) से छठी शताब्दी (AD) (गुप्त-वाकाटक का काल)।

        • स्थान: अजंता।

        • आकार: लगभग 20 फीट x 6 फीट।

        • विशेषताएँ: सहज रंगों का प्रयोग (चटकीलेपन का अभाव), शरीर के अंगों की परिरेखाएं, कोमलता, गर्दन का सूक्ष्म झुकाव तथा सरलता (दिव्य विशेषता)।

    • गुफाओं तथा मन्दिर वास्तुकला:

      • काफी उन्नति हुई, प्रारम्भ एवं उत्थान इसी काल में देखने को मिलता है।

      • उदाहरण: मध्य प्रदेश की उदयगिरि गुफाएँ, नाचना व भूमरा में मंदिर वास्तुकला।

VI. मूल्यांकन

  • यह काल भारतीय कला के लिए एक रचनात्मक और परिवर्तनकारी अवधि थी।

  • तकनीकी कौशल में वृद्धि हुई (धातु ढलाई, पॉलिश)।

  • कला धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष दोनों अभिव्यक्तियों के लिए एक माध्यम बनी।

  • मौर्य युग में राजकीय संरक्षण में कला का विकास हुआ, जबकि गुप्तकाल में कला मानवीयकरण और सौंदर्यशास्त्र में एक नया शिखर पर पहुँची।

  • इन युगों की कलाकृतियाँ आज भी भारतीय कला की विशाल और अमूल्य धरोहर का हिस्सा हैं।

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