कक्षा बारहवीं हिंदी पाठ12 'जिजीविषा की विजय' (कैलाश चंद्र भाटिया) पर आधारित प्रश्नोत्तर


​📝 एक पंक्ति (One-Liner) प्रश्नोत्तर (30 प्रश्न)

  1. प्रश्न: 'जिजीविषा की विजय' पाठ किस विधा में लिखा गया है?
    • उत्तर: संस्मरण विधा में।
  2. प्रश्न: डॉ. रघुवंश का पूरा नाम क्या था?
    • उत्तर: डॉ. रघुवंश सहाय वर्मा।
  3. प्रश्न: डॉ. रघुवंश का जन्म कहाँ हुआ था?
    • उत्तर: गोपामऊ (हरदोई) निवासी श्री रामसहाय के घर में।
  4. प्रश्न: लेखक की डॉ. रघुवंश से सर्वप्रथम भेंट कब और कहाँ हुई?
    • उत्तर: 1954 ई. में भारतीय हिंदी परिषद् के जयपुर अधिवेशन में।
  5. प्रश्न: डॉ. रघुवंश लेखन-कार्य कैसे करते थे?
    • उत्तर: पैर की उँगलियों में कलम फँसाकर निरंतर तेजी से लिखते थे।
  6. प्रश्न: डॉ. रघुवंश ने किस विश्वविद्यालय से एम.ए. और डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की थी?
    • उत्तर: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से।
  7. प्रश्न: डॉ. रघुवंश के डी.फिल. का विषय क्या था?
    • उत्तर: 'हिंदी साहित्य के भक्तिकाल और रीतिकाल में प्रकृति और काव्य'।
  8. प्रश्न: डॉ. रघुवंश किस परिषद् के मंत्री थे?
    • उत्तर: भारतीय हिंदी परिषद् के।
  9. प्रश्न: भारतीय हिंदी परिषद् के जयपुर अधिवेशन की पूरी कार्यवाही की रिपोर्टिंग कौन कर रहे थे?
    • उत्तर: डॉ. रघुवंश।
  10. प्रश्न: विद्वानों ने 'मन' को कितने मंजिला भवन जैसा माना है?
    • उत्तर: तीन मंजिला भवन जैसा (नववल्कल, वत्सल और सर्पिल)।
  11. प्रश्न: डॉ. रघुवंश किसका ज्वलंत उदाहरण थे?
    • उत्तर: अर्थ की शुचिता (पवित्रता) का।
  12. प्रश्न: डॉ. रघुवंश की प्रतिष्ठा का आधार क्या था?
    • उत्तर: मन की मजबूती और संकल्प शक्ति।
  13. प्रश्न: डॉ. रघुवंश की किसी एक कृति का नाम बताइए।
    • उत्तर: हरिघाटी (यात्रा संस्मरण), मानस पुत्र ईसा (जीवनी), नाट्यकला, आदि।
  14. प्रश्न: केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा से डॉ. रघुवंश का कौन-सा भाषण संग्रह प्रकाशित हुआ?
    • उत्तर: 'समसामयिक हिंदी कविता और चेतना'।
  15. प्रश्न: डॉ. रघुवंश को महाकवि प्रसाद की कौन-सी पंक्तियाँ स्मरण आती थीं?
    • उत्तर: "मन जब निश्चित-सा कर लेता कोई मत है अपना। बुद्धि-देव-बल से प्रमाण का सतत निरखता सपना।"
  16. प्रश्न: डॉ. रघुवंश का व्यक्तित्व कैसा रहा?
    • उत्तर: सौम्य और तेज से दमकता हुआ।
  17. प्रश्न: लेखक को डॉ. रघुवंश को अधिक निकट से देखने का सौभाग्य कब मिला?
    • उत्तर: 1963 में भारतीय हिंदी परिषद् के अखिल भारतीय अधिवेशन में।
  18. प्रश्न: 'हिंदी साहित्य कोश' के निर्माण में डॉ. रघुवंश की क्या भूमिका थी?
    • उत्तर: वह संपादक मंडल में थे और परियोजना का संयोजकत्व भी किया।
  19. प्रश्न: डॉ. रघुवंश किस विचारधारा से प्रभावित थे?
    • उत्तर: लोहिया जी की विचारधारा से।
  20. प्रश्न: भारतीय हिंदी परिषद् के मुख्यपत्र का नाम क्या है जिसका संपादन डॉ. रघुवंश ने किया?
    • उत्तर: 'अनुशीलन'।
  21. प्रश्न: डॉ. रघुवंश द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका का नाम क्या है?
    • उत्तर: 'क ख ग'।
  22. प्रश्न: डॉ. रघुवंश की कृति 'मानस पुत्र ईसा: जीवन और दर्शन' किस विधा में लिखी गई है?
    • उत्तर: जीवनी विधा में।
  23. प्रश्न: 'मानस पुत्र ईसा: जीवन और दर्शन' के लिए डॉ. रघुवंश को कौन-सा पुरस्कार मिला?
    • उत्तर: सन् 1985 का श्री भगवानदास पुरस्कार।
  24. प्रश्न: बिड़ला ट्रस्ट द्वारा डॉ. रघुवंश को दिया गया सर्वोच्च सम्मान कौन-सा है?
    • उत्तर: 'शंकर पुरस्कार'।
  25. प्रश्न: डॉ. रघुवंश को उत्तर प्रदेश शासन का प्रतिष्ठित 'भारत भारती पुरस्कार' कब मिला?
    • उत्तर: 1994 में।
  26. प्रश्न: संस्मरण की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
    • उत्तर: परिचित एवं प्रभावपूर्ण व्यक्ति के चरित्र का स्पष्टीकरण, आत्मीयता, तटस्थ दृष्टि और रोचक शैली।
  27. प्रश्न: लेखक की भाषा-शैली कैसी है?
    • उत्तर: सरल, शुद्ध साहित्यिक भाषा, भावात्मक, वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक शैली का संयोजन।
  28. प्रश्न: डॉ. रघुवंश किस पद से अवकाश प्राप्त कर उच्च शिक्षा संस्थान, शिमला में प्रतिष्ठित रहे?
    • उत्तर: सर्वोच्च पद से।
  29. प्रश्न: डॉ. रघुवंश को किस कारण 'कर्मयोगी' कहा गया है?
    • उत्तर: शारीरिक बाधा के बावजूद मन का कर्म में निरंतर रत रहना।
  30. प्रश्न: संस्मरण में किसका तत्व नहीं होता?
    • उत्तर: कल्पना का।

​💡 अति लघुतात्मक प्रश्नोत्तर (20 प्रश्न)

  1. प्रश्न: लेखक ने डॉ. रघुवंश को देखकर दंग क्यों रह गए?
    • उत्तर: क्योंकि उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति पैर की उँगलियों में कलम फँसाकर निरंतर तेज़ी से लेखन-कार्य कर रहा है, जबकि वह दोनों हाथों से लाचार थे।
  2. प्रश्न: डॉ. रघुवंश ने अपनी अक्षमता को मात देने के लिए कौन-सी पद्धति विकसित की थी?
    • उत्तर: उन्होंने अपनी सूझबूझ से पैर की उँगलियों से लिखने की पद्धति विकसित कर ली थी, जिससे उन्होंने सारी परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं और लेखन-कार्य जारी रखा।
  3. प्रश्न: 'मन' और 'मस्तिष्क' में मुख्य अंतर क्या है जैसा कि वैज्ञानिकों ने संगोष्ठी में माना?
    • उत्तर: मस्तिष्क सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र है जो कल्पना, विचारणा आदि अभिक्रियाओं का संपादन करता है, जबकि मन इन अभिक्रियाओं के समुच्चय का नाम है, यह मस्तिष्क नहीं है।
  4. प्रश्न: डॉ. रघुवंश अर्थ की शुचिता का ज्वलंत उदाहरण कैसे थे?
    • उत्तर: वह रिक्शा में बैठने से पहले ही चालक की देय राशि निकालकर रख लेते थे, जिससे साथ ले जाने वाले व्यक्ति अपने पास से रुपये न दे दें, यह उनकी आर्थिक मामलों में पवित्रता दर्शाती है।
  5. प्रश्न: संकल्प-शक्ति को सोपेनहावर और विलियम जेम्स ने क्या संज्ञा दी है?
    • उत्तर: सोपेनहावर ने इसे 'जीने का संकल्प शक्ति' तथा विलियम जेम्स ने 'श्रद्धा का संकल्प' बताया है।
  6. प्रश्न: डॉ. रघुवंश के व्यक्तित्व में समाहित कोई चार गुण लिखिए।
    • उत्तर: जिजीविषा, संकल्प शक्ति, कार्यक्षमता, अर्थ की शुचिता, आत्मबल, कर्त्तव्यनिष्ठा, सौम्यता।
  7. प्रश्न: 'हिंदी साहित्य कोश' के निर्माण में डॉ. रघुवंश का क्या योगदान रहा?
    • उत्तर: वह संपादक मंडल में थे, परियोजना का संयोजकत्व किया, और कोश के लिए लेखन-कार्य भी किया।
  8. प्रश्न: डॉ. रघुवंश की समझौतावादी प्रवृत्ति नहीं थी, यह किस बात से सिद्ध होता है?
    • उत्तर: उन्होंने अपनी योग्यता और क्षमता के बलबूते पर निरंतर अग्रसर होकर सर्वोच्च पद से अवकाश प्राप्त किया, और अपनी अक्षमता के कारण किसी प्रकार का समझौता नहीं किया।
  9. प्रश्न: 'नए राष्ट्र और वर्तमान की चुनौती' आलेख का मुख्य सार क्या है?
    • उत्तर: इसका सार है कि एशिया और अफ्रीका के विकसित होने के लिए उन्हें दूसरे देशों की रेखा का अनुकरण करने के बजाय अपनी स्वतंत्र रेखा खींचनी होगी, यानी बौद्धिक मुक्ति और मौलिक सर्जनशीलता अपनानी होगी।
  10. प्रश्न: डॉ. रघुवंश की कृति 'मानस पुत्र ईसा: जीवन और दर्शन' का प्रतिपाद्य क्या है?
    • उत्तर: इसमें ईसा की दया, करुणा और क्षमा को भारतीय ज्ञान-परंपरा से जोड़कर व्याख्या करने का प्रयास किया गया है, ताकि हिंसा और प्रतिशोध के अंधकार से घिरे विश्व को शांति की ओर उन्मुख किया जा सके।
  11. प्रश्न: संस्मरण को कभी-कभी 'रेखाचित्र' विधा के समीप क्यों माना जाता है?
    • उत्तर: क्योंकि संस्मरण में चित्रात्मक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है, जो किसी व्यक्ति के शब्दचित्रात्मक वर्णन की ओर इशारा करती है।
  12. प्रश्न: संस्मरण लेखन में किन दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक है?
    • उत्तर: घटनाओं में सच्चाई (कल्पना का तत्व नहीं होता) और विशिष्ट व्यक्ति के चरित्र का स्पष्टीकरण
  13. प्रश्न: डॉ. रघुवंश की किस बात पर चयन समिति और विश्वविद्यालय की कार्यसमिति में बहस हुई थी?
    • उत्तर: जब उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापन के अतिरिक्त कोई कार्य न स्वीकारने का संकल्प व्यक्त किया, क्योंकि वह खड़िया नहीं पकड़ सकते थे।
  14. प्रश्न: 'आत्मीयता तथा तटस्थ दृष्टि' से संस्मरण में क्या तात्पर्य है?
    • उत्तर: आत्मीयता से तात्पर्य है लेखक का परिचित व्यक्ति के प्रति अपनापन और निजता, जबकि तटस्थ दृष्टि से तात्पर्य है उस विशिष्ट व्यक्ति का निष्पक्ष विश्लेषण करना।
  15. प्रश्न: डॉ. रघुवंश को 'कर्मयोगी' क्यों कहा गया है?
    • उत्तर: क्योंकि शारीरिक दृष्टि से अप्रत्याशित बाधा होते हुए भी उनका मन कर्म में निरंतर रत रहा और उन्होंने नव-नव प्रकाश विकीर्ण किया।
  16. प्रश्न: डॉ. रघुवंश के व्यक्तित्व का सौम्य रूप कब झलकता था?
    • उत्तर: जब उनकी वृत्ति ही प्रसन्नता का रूप ले लेती थी और उनका चेहरा तेज से दमकता था।
  17. प्रश्न: डॉ. रघुवंश ने अपनी अक्षमता को किसके बल पर विजय में बदला?
    • उत्तर: मन की मजबूती और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर।
  18. प्रश्न: डॉ. रघुवंश के संपादन कार्य के अंतर्गत किन दो पत्रिकाओं का उल्लेख है?
    • उत्तर: भारतीय हिंदी परिषद् के मुख्यपत्र 'अनुशीलन' और त्रैमासिक पत्रिका 'क ख ग'
  19. प्रश्न: संस्मरण की भाषा-शैली की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
    • उत्तर: सरल, रोचक, भावात्मक, प्रवाहमान, तथा साहित्यिक-तत्सम शब्दों का प्रभावी प्रयोग।
  20. प्रश्न: पाठ में उद्धृत महाकवि प्रसाद की पंक्तियाँ किस बात पर बल देती हैं?
    • उत्तर: मन द्वारा किसी निश्चित मत को बना लेने पर, जिसे बुद्धि बल से प्रमाण द्वारा पुष्ट किया जाता है।

​🔍 लघुतात्मक प्रश्नोत्तर (10 प्रश्न)

  1. प्रश्न: 'जिजीविषा की विजय' शीर्षक की सार्थकता पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
    • उत्तर: 'जिजीविषा' का अर्थ है जीवन की लालसा। डॉ. रघुवंश जन्म से दोनों हाथों से अक्षम थे, परंतु उनके मन में समाहित 'जीवन लालसा' और दृढ़ संकल्प-शक्ति ने उनकी शारीरिक अक्षमता को उनके मार्ग में बाधक नहीं बनने दिया। उन्होंने पैरों से लिखना सीखा, उच्च शिक्षा प्राप्त की, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने, 'हिंदी साहित्य कोश' का संयोजकत्व किया और उच्च सम्मान प्राप्त किए। उनकी यह असाधारण सफलता सिद्ध करती है कि यह उनकी अदम्य जिजीविषा की ही विजय थी, जिसने उन्हें मूर्धन्य स्थान पर प्रतिष्ठित किया।
  2. प्रश्न: डॉ. रघुवंश के व्यक्तित्व की विशेषताएँ उनके कार्यों में किस प्रकार परिलक्षित होती हैं?
    • उत्तर: डॉ. रघुवंश के व्यक्तित्व में आत्मविश्वास, आत्मबल, योजकता और कर्त्तव्यनिष्ठा जैसे गुण समाहित थे। ये उनकी कार्यपद्धति में स्पष्ट दिखाई देते थे। उदाहरण के लिए, वे इतने सक्षम लेखकों के होते हुए भी अकेले ही पैर से भारतीय हिंदी परिषद् की पूरी कार्यवाही की रिपोर्टिंग करते थे, जो उनकी कार्यक्षमता और तत्परता को दर्शाती है। 'हिंदी साहित्य कोश' का संयोजकत्व और सफल प्रकाशन उनकी योजकता और समर्पण को सिद्ध करता है।
  3. प्रश्न: लेखक ने डॉ. रघुवंश की 'अर्थ की शुचिता' को कैसे स्पष्ट किया है?
    • उत्तर: लेखक ने बताया है कि डॉ. रघुवंश बाह्य और आंतरिक रूप से ही नहीं, बल्कि अर्थ-संबंधी मामलों में भी स्वच्छ थे। इसका ज्वलंत उदाहरण यह है कि जब वह रिक्शा में बैठते थे, तो चालक की देय राशि पहले ही निकालकर रख लेते थे। ऐसा वह इसलिए करते थे ताकि उनको साथ ले जाने वाले व्यक्ति अपने पास से रुपये न दे दें। यह व्यवहार उनकी आत्म-सम्मान की भावना और किसी का एहसान न लेने की पवित्र प्रवृत्ति को उजागर करता है।
  4. प्रश्न: संस्मरण-विधा के स्वरूप और उसकी मुख्य विशेषताओं को संक्षेप में समझाइए।
    • उत्तर: संस्मरण हिंदी गद्य साहित्य की एक नवीन, रोचक विधा है, जो स्मृति पर आधारित होती है। इसमें लेखक किसी परिचित एवं प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व और उससे जुड़ी विशिष्ट घटनाओं को सत्यता के साथ घटनाक्रम में बाँधकर प्रस्तुत करता है।
    • मुख्य विशेषताएँ:
      • आत्मीयता: लेखक का अपने व्यक्तित्व के प्रति अपनापन।
      • सत्यता: घटनाओं में कल्पना का तत्व नहीं होता, बल्कि सच्चाई होती है।
      • तटस्थ दृष्टि: लेखक अपने निजी दृष्टिकोण के बावजूद व्यक्तित्व का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करता है।
      • रोचक शैली: अभिव्यक्ति में स्वाभाविकता, सरलता व प्रवाहमानता।
  5. प्रश्न: डॉ. रघुवंश के विचारक रूप पर प्रकाश डालिए।
    • उत्तर: डॉ. रघुवंश का विचारक रूप उनकी त्रैमासिक पत्रिका 'क ख ग' के संयोजन और संपादन से मुखर हुआ। उनके आलेख 'नए राष्ट्र और वर्तमान की चुनौती' में उनका मौलिक और विद्रोही चिंतन दिखाई देता है। इसमें उन्होंने एशिया और अफ्रीका के देशों को यूरोप की बौद्धिक पराधीनता से मुक्त होकर अपनी निजी प्रतिभा का अन्वेषण करने और अपनी स्वतंत्र विकास-रेखा खींचने पर बल दिया। इसके अलावा, 'मानस पुत्र ईसा: जीवन और दर्शन' कृति में ईसा के जीवन और दर्शन की भारतीय ज्ञान-परंपरा से व्याख्या करके भी उन्होंने अपने प्रखर विचारक रूप का परिचय दिया।
  6. प्रश्न: डॉ. रघुवंश के संघर्ष और सफलता के पीछे उनकी किस शक्ति का योगदान रहा?
    • उत्तर: डॉ. रघुवंश के संघर्ष और सफलता के पीछे उनकी मन की सुदृढ़ता और अदम्य संकल्प-शक्ति का योगदान रहा। शारीरिक अक्षमता के बावजूद उन्होंने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि यह लाचारी उनके जीवन के किसी कार्य में बाधक नहीं होगी। उनकी यही संकल्प-शक्ति एक चेतना के गुण के रूप में प्रकट हुई, जिसमें दृढ़ता, इच्छा, विचार और चिंतन विद्यमान थे। इसी शक्ति ने उनके जीवन में नया प्राण फूँका, जिसके बल पर वह निरंतर कर्मरत रहे और सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे।
  7. प्रश्न: लेखक ने डॉ. रघुवंश को 'कर्मयोगी' क्यों कहा है?
    • उत्तर: लेखक ने डॉ. रघुवंश को 'कर्मयोगी' इसलिए कहा है क्योंकि वे शारीरिक दृष्टि से अक्षम होने के बावजूद भी किसी से कम नहीं थे। अप्रत्याशित बाधा होते हुए भी उनका मन कर्म में निरंतर रत रहा। उनका जीवन-मंत्र था कि किसी भी परियोजना का विकास कर, उसको ऊँचाई तक ले जाना और उसके लिए अपने को न्योछावर कर देना। उनका पूरा जीवन कर्त्तव्यनिष्ठा, आत्मविश्वास और आत्मबल जैसे गुणों से भरा था, जिससे वे निरंतर सक्रिय रहकर नव-नव प्रकाश विकीर्ण करते रहे, ठीक वैसे ही जैसे एक कर्मयोगी करता है।
  8. प्रश्न: संस्मरण की भाषा-शैली पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
    • उत्तर: 'जिजीविषा की विजय' संस्मरण की भाषा-शैली सरल, रोचक, प्रवाहमान और आत्मीयतापूर्ण है। इसमें भावात्मक, वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक शैली का सुंदर संयोजन है। लेखक ने सहज-सरल भाषा का प्रयोग किया है, लेकिन जहाँ विषय गंभीर हुआ है (जैसे 'मन' की व्याख्या), वहाँ शुद्ध साहित्यिक भाषा और तत्सम शब्दावली (जैसे- चिति, संज्ञान, समुच्चय, नववल्कल, सर्जनात्मक चैतन्य) का प्रयोग किया है। इससे भाषा में गंभीरता और बोधगम्यता दोनों बनी रहती हैं।
  9. प्रश्न: पाठ में दिव्यांगों के प्रति किस प्रकार के दृष्टिकोण की आवश्यकता को प्रतिपादित किया गया है?
    • उत्तर: पाठ डॉ. रघुवंश के उदाहरण से यह प्रतिपादित करता है कि दिव्यांगों को दया या सहानुभूति के स्थान पर अपनत्व, सम्मान और सहयोग की आवश्यकता है। डॉ. रघुवंश ने अपनी दृढ़ता से यह सिद्ध किया कि शारीरिक अक्षमता जीवन की गतिशीलता में बाधक नहीं हो सकती। लेखक इस बात पर बल देता है कि हमें दिव्यांगों के अधिकारों और सुविधाओं के प्रति जागरूक रहना चाहिए, न कि केवल दया भाव दिखाना चाहिए, क्योंकि उनमें भी विशेष प्रकार का हुनर निहित होता है।
  10. प्रश्न: डॉ. रघुवंश की विद्रोही और जुझारू प्रकृति कैसे प्रकट होती है?
    • उत्तर: डॉ. रघुवंश प्रारंभ से ही विद्रोही और जुझारू प्रकृति के थे। उनकी यह प्रकृति लोहिया जी की विचारधारा से प्रभावित थी। उनके द्वारा संपादित पत्रिका 'क ख ग' और उसमें प्रकाशित उनके आलेख 'नए राष्ट्र और वर्तमान की चुनौती' में यह विद्रोही भाव स्पष्ट दिखता है। इस आलेख में उन्होंने विकास के लिए दूसरे देशों का अनुकरण करने की भ्रामक पद्धति का विरोध किया और हर राष्ट्र के लिए अपनी स्वतंत्र रेखा खींचने (मौलिक चिंतन) पर बल दिया, जो उनकी स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध जुझारू प्रकृति को दर्शाता है।

​📜 निबंधात्मक प्रश्नोत्तर (5 प्रश्न)

  1. प्रश्न: डॉ. रघुवंश का जीवन-दर्शन और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों का विस्तार से वर्णन 'जिजीविषा की विजय' पाठ के आधार पर कीजिए।
    • उत्तर:
      • परिचय और जिजीविषा: डॉ. रघुवंश का जीवन-दर्शन उनकी अदम्य जिजीविषा पर आधारित था। दोनों हाथों से अक्षम होने के बावजूद, उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उनकी जीवन की लालसा (जिजीविषा) ने ही उन्हें एक सुप्रसिद्ध विद्वान और आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित किया।
      • संकल्प और कर्मठता: उनके व्यक्तित्व का मूल आधार दृढ़ संकल्प-शक्ति थी। उन्होंने पैरों से लिखने की अनूठी पद्धति विकसित की और सारी परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। वह 'कर्मयोगी' थे, जो शारीरिक बाधा को अनदेखा कर निरंतर कर्म में रत रहे। भारतीय हिंदी परिषद् के अधिवेशन में अकेले रिपोर्टिंग करना, 'हिंदी साहित्य कोश' का संयोजकत्व करना उनकी असाधारण कार्यक्षमता, योजकता और कर्त्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।
      • नैतिकता और शुचिता: वह अर्थ की शुचिता के ज्वलंत उदाहरण थे, रिक्शा चालक को पैसे पहले ही निकालकर देना उनकी पवित्रता, आत्म-सम्मान और निश्छलता को प्रकट करता है।
      • विद्रोही विचारक: उनका विचारक रूप त्रैमासिक पत्रिका 'क ख ग' और आलेख 'नए राष्ट्र और वर्तमान की चुनौती' में मुखर हुआ। उन्होंने बौद्धिक मुक्ति और मौलिक सर्जनशीलता की आवश्यकता पर बल देकर अपनी जुझारू और विद्रोही प्रकृति का परिचय दिया।
      • निष्कर्ष: उनका सौम्य, तेजस्वी और कर्मठ व्यक्तित्व उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो जीवन की विपरीत परिस्थितियों से निराश होकर निष्क्रिय बन जाते हैं। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि मन की मजबूती ही व्यक्ति की सच्ची प्रतिष्ठा है
  2. प्रश्न: संस्मरण विधा के तत्व कौन-कौन से हैं? 'जिजीविषा की विजय' संस्मरण इन तत्वों पर किस प्रकार खरा उतरता है? विस्तार से समीक्षा कीजिए।
    • उत्तर:
      • संस्मरण के मुख्य तत्व: संस्मरण गद्य साहित्य की वह विधा है, जिसमें स्मृति, सत्यता, व्यक्तित्व, आत्मीयता, तटस्थ दृष्टि और रोचक शैली जैसे तत्व प्रमुख होते हैं।
      • तत्वों पर पाठ की समीक्षा:
        • स्मृति और सत्यता: यह पाठ लेखक कैलाश चंद्र भाटिया के डॉ. रघुवंश से जुड़ी स्मृतियों पर आधारित है। 1954 के जयपुर अधिवेशन और 1963 के अलीगढ़ अधिवेशन की घटनाओं का उल्लेख सच्चाई पर आधारित है, इसमें कल्पना का तत्व नहीं है।
        • परिचित एवं प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व: डॉ. रघुवंश का व्यक्तित्व हाथों से अक्षम होते हुए भी असाधारण रूप से सक्रिय था। उनके जीवन की लालसा, संकल्प शक्ति और अर्थ की शुचिता का वर्णन उनके प्रभावपूर्ण चरित्र को स्पष्ट करता है।
        • आत्मीयता और तटस्थ दृष्टि: लेखक डॉ. रघुवंश से अत्यंत प्रभावित और आत्मीयता का भाव रखता है। साथ ही, उनकी लेखन शैली में तटस्थ दृष्टि भी है। वह न केवल रघुवंश जी की क्षमता की प्रशंसा करता है, बल्कि उनके साहित्यिक और वैचारिक कार्यों (हिंदी साहित्य कोश, क ख ग, मानस पुत्र ईसा) का भी वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करता है।
        • शैली: संस्मरण की भाषा सरल, भावात्मक और प्रवाहमान है, जिसमें वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक शैली का समन्वय है, जो पाठक की रुचि को अंत तक बनाए रखता है।
      • निष्कर्ष: 'जिजीविषा की विजय' उपर्युक्त सभी तत्वों को सफलतापूर्वक समेटता है, जिससे यह एक जीवंत, रोचक और सशक्त संस्मरणात्मक अभिव्यक्ति बन पाया है।
  3. प्रश्न: डॉ. रघुवंश के शैक्षणिक, साहित्यिक एवं वैचारिक योगदान को रेखांकित कीजिए।
    • उत्तर:
      • शैक्षणिक योगदान:
        • ​उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और 'हिंदी साहित्य के भक्तिकाल और रीतिकाल में प्रकृति और काव्य' विषय पर डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की।
        • ​वह उसी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने, जहाँ उन्होंने अपनी योग्यता और दृढ़ता से सबको चकित कर दिया।
        • ​वह भारतीय हिंदी परिषद् के मंत्री रहे और उसके क्रियाकलापों में सक्रिय रूप से जुड़े रहे।
      • साहित्यिक योगदान:
        • ​उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण कृतियाँ लिखीं, जैसे- हरिघाटी (यात्रा संस्मरण), मानस पुत्र ईसा (जीवनी), नाट्यकला, साहित्य का नया परिप्रेक्ष्य
        • ​डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के निर्देशन में 'हिंदी साहित्य कोश' के निर्माण में उन्होंने संयोजकत्व और लेखन-कार्य करके महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
        • ​उन्होंने भारतीय हिंदी परिषद् के मुख्यपत्र 'अनुशीलन' का अनेक वर्षों तक संपादन किया।
      • वैचारिक योगदान:
        • ​उनका विचारक रूप त्रैमासिक पत्रिका 'क ख ग' से मुखर हुआ।
        • ​उनके आलेख 'नए राष्ट्र और वर्तमान की चुनौती' में मौलिक चिंतन, बौद्धिक मुक्ति और स्वतंत्र विकास की रेखा खींचने का आह्वान किया गया, जो आज भी सामयिक है।
        • ​उनकी कृति 'मानस पुत्र ईसा: जीवन और दर्शन' में ईसा की दया और करुणा को भारतीय ज्ञान-परंपरा से जोड़कर, समकालीन हिंसा के माहौल के सामने एक नैतिक दृष्टि प्रस्तुत की गई।
      • निष्कर्ष: डॉ. रघुवंश ने अपनी अक्षमता को मात देते हुए हिंदी साहित्य, शिक्षा और विचार के क्षेत्र में मूर्धन्य स्थान प्राप्त किया और अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों (शंकर पुरस्कार, भारत भारती पुरस्कार) से सम्मानित हुए।
  4. प्रश्न: 'संकल्प ही तो चेतना का वह गुण है' – इस कथन के आलोक में डॉ. रघुवंश के जीवन में संकल्प-शक्ति के महत्व को विश्लेषित कीजिए।
    • उत्तर:
      • संकल्प की परिभाषा: संकल्प चेतना का वह गुण है जिसमें मन की दृढ़ता, इच्छा, विचार और चिंतन विद्यमान रहते हैं। यह मनुष्य के जीवन को सुनिश्चित गतिशीलता और सशक्तता प्रदान करने वाला मूल तत्त्व है, जिसे मनीषियों ने 'सर्वसंकल्पमूलम्' स्वीकार किया है।
      • डॉ. रघुवंश के जीवन में महत्व:
        • अक्षमता पर विजय: डॉ. रघुवंश का पूरा जीवन ही उनकी संकल्प-शक्ति का उदाहरण है। शारीरिक अक्षमता के बावजूद, उन्होंने मन की गहराई में यह दृढ़ संकल्प किया कि उन्हें सफल होना है। इसी संकल्प ने उन्हें पैरों से लिखने की पद्धति विकसित करने की प्रेरणा दी।
        • उच्च पद की प्राप्ति: केवल मन की मजबूती से ही वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और कालांतर में सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने अपनी योग्यता के बलबूते पर ही आगे बढ़ने का संकल्प लिया, समझौतावादी प्रवृत्ति नहीं अपनाई।
        • रचनात्मकता का स्रोत: उनके द्वारा की गई सर्जना (हिंदी साहित्य कोश, मानस पुत्र ईसा आदि) का मूल भी यही संकल्प-शक्ति थी, क्योंकि सर्जनात्मक चैतन्य ही संकल्प है
        • कर्म में निरंतरता: उनकी संकल्प शक्ति ही उन्हें निरंतर लेखन कार्य, संपादन कार्य और सेवा कार्य में रमती रही। यही कारण है कि उन्हें कर्मयोगी कहा गया।
      • निष्कर्ष: डॉ. रघुवंश का जीवन प्रमाणित करता है कि शारीरिक सीमाएँ गौण हैं; दृढ़ संकल्प ही वह आंतरिक शक्ति है जो व्यक्ति को अप्रत्याशित बाधाओं के बावजूद सफलता के शिखर तक ले जाती है और जीवन को अर्थ प्रदान करती है।
  5. प्रश्न: संस्मरण की भाषा-शैली 'जिजीविषा की विजय' को कितना प्रभावपूर्ण बनाती है? पाठ के आधार पर उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
    • उत्तर:
      • रोचकता और प्रवाहमानता: संस्मरण की शैली अत्यंत रोचक और प्रवाहमान है। लेखक ने घटनाओं को इस क्रम में प्रस्तुत किया है कि पाठक की रुचि बनी रहती है, जैसे जयपुर अधिवेशन में पहली भेंट का वर्णन।
      • भावात्मकता: लेखक का डॉ. रघुवंश के प्रति आत्मीयता और श्रद्धा का भाव पूरी भाषा में व्याप्त है। उदाहरण: "मैं यह देखकर चकित रह गया कि इतने विशाल समुदाय में इतने सक्षम लेखकों के होते हुए भी पूरी कार्यवाही की निरंतर रिपोर्टिंग डॉ. रघुवंश ही बड़ी तेजी से अपने पैर से ही कर रहे थे।"
      • शुद्ध साहित्यिक और व्याख्यात्मकता: जहाँ विषय की गंभीरता आई है, वहाँ शैली व्याख्यात्मक हो गई है। 'मन क्या है' विषय पर हुई अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के आधार पर 'मन' की व्याख्या के लिए शुद्ध साहित्यिक-तत्सम शब्दावली (जैसे- चिति, संज्ञान, नववल्कल, सर्पिल) का प्रयोग किया गया है, जो संस्मरण को गंभीरता और प्रामाणिकता प्रदान करता है।
      • वर्णनात्मकता: डॉ. रघुवंश के लेखन-कार्य का वर्णन या उनकी अर्थ की शुचिता का विवरण देने में शैली वर्णनात्मक हो जाती है, जिससे उनका चरित्र पाठकों के मानस पटल पर स्पष्ट उभरता है।
      • निष्कर्ष: सरल, शुद्ध साहित्यिक भाषा और भावात्मक, वर्णनात्मक व व्याख्यात्मक शैलियों के सफल संयोजन से यह संस्मरण अत्यंत प्रभावपूर्ण बन पाया है। यह न केवल डॉ. रघुवंश के व्यक्तित्व को उजागर करता है, बल्कि एक उच्च कोटि के साहित्यिक गद्य का उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।

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