उद्देश्य
* मातृभूमि के प्रति त्याग व बलिदान की भावना जाग्रत करना।
* सामाजिक विषमताओं को दूर कर स्वस्थ समाज की रचना में योगदान प्रदान करना।
* प्रत्येक प्राणी व प्रकृति के कल्याण हेतु कार्य करना।
प्रेरक व्यक्तित्व
1. परशुराम
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| युग | त्रेता युग |
| जन्म | वैशाख शुक्ला तृतीया (अक्षय तृतीया) को रेणुका के गर्भ से। |
| पिता | महर्षि जमदग्नि |
| वंश | भृगुवंश |
| अवतार | भगवान विष्णु के छठे आवेशावतार। |
| अन्य नाम | रामभद्र (पितामह द्वारा), जामदग्नेय, भार्गव। |
| शिक्षा | प्रारम्भिक शिक्षा माता रेणुका से। महर्षि विश्वामित्र और महर्षि ऋचीक से आगे की शिक्षा। |
| दिव्य अस्त्र | महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य धनुष। |
| परशु की प्राप्ति | भगवान शिव की कठोर तपस्या से विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया, जिसके बाद परशुराम कहलाए। |
| योगदान | वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार। शस्त्र धारण कर यह सिद्ध किया कि मनुष्य का वर्ण जन्म से नहीं, कर्म से निर्धारित होता है। |
| शिष्य | आचार्य द्रोण, पितामह भीष्म, अंगराज कर्ण। |
| संघर्ष | कैलाश पर गणेश से संघर्ष, जिसमें गणेश का एक दाँत टूटा, इसलिए एकदन्त कहलाए। |
| नारी सम्मान | भीष्म के विरुद्ध काशीराज की पुत्री अम्बा के सम्मान के लिए युद्ध किया। पुरुषों के लिए एक पत्नी व्रत का नियम बनाया। |
| अन्य कार्य | हैहयवंशीय शासक कार्तवीर्यार्जुन (सहस्रबाह) से युद्ध कर ऋषि जमदग्नि की कामधेनु गाय को वापस लाए और उसका वध किया। |
| दान | हैहयवंशीय राजाओं को परास्त कर अश्वमेध यज्ञ किया और सम्पूर्ण पृथ्वी दान में दे दी। |
| वर्तमान स्थिति | चिरंजीवी माने जाते हैं और महेन्द्र पर्वत पर विद्यमान हैं। |
2. बापा रावल
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कालखण्ड | अरबों के आक्रमणों का काल। |
| बचपन | एकलिंगजी के पास नागदा गाँव में व्यतीत हुआ। बचपन में गायें चराते थे। |
| गुरु | हारीत राशि (शैवमत के पाशुपत सम्प्रदाय के संन्यासी)। |
| वरदान | हारीत राशि ने उन्हें मेवाड़ का राज्य दिया तथा मेवाड़ हमेशा उनके वंशजों के अधिकार में रहने का वरदान दिया। रावल के नाम से सम्बोधित किए जाने का वरदान दिया। |
| कार्य | हारीत राशि की मृत्यु के बाद सेना एकत्रित की और चित्तौड़ पर अधिकार किया। |
| अरबों पर विजय | सिंध के शासक दाहिर, जैसलमेर के देवराज भाटी, प्रतिहार शासक नागर और हाडौती के धवल के साथ मिलकर संयुक्त सेना बनाई। मुहम्मद बिन कासिम को परास्त कर सिंध को मुक्त कराया। ईरान, इराक व खुरासान तक विजय प्राप्त की। |
| धार्मिक कार्य | बलपूर्वक इस्लाम ग्रहण करने वाले लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाए। |
| महत्व | अरब आक्रान्ताओं को प्रथम बार इतना शक्तिशाली प्रतिरोध बापा रावल के कारण मिला। |
| अंतिम समय | जीवन के अंतिम समय में सन्यास मार्ग का अनुसरण किया। नागदा के निकट समाधिस्थल निर्मित है। |
3. पृथ्वीराज चौहान तृतीय
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| शासनकाल | 12वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध। (राज्याभिषेक 11 वर्ष की आयु में)। |
| माता | कर्पूरी देवी (संरक्षिका के रूप में शासन चलाया)। |
| राज्य विस्तार | कन्नौज से लेकर जहाजपुर (मेवाड़ सीमा) तक। |
| शासन बागडोर | 16 वर्ष की आयु में सम्पूर्ण बागडोर संभाली। |
| दिग्विजय नीति | 1. स्वजनों/पड़ोसियों का विरोध समाप्त (चचेरा भाई नागार्जुन, भण्डानक)। 2. पड़ोसी शासकों को पराजित करना (महोबा के चन्देल, चालुक्य, कन्नौज के गहड़वाल)। 3. तुर्कों से संघर्ष। |
| प्रमुख संघर्ष | 1186 ई. से 1191 ई. के मध्य मुहम्मद गौरी से कई बार संघर्ष, जिसमें पृथ्वीराज विजयी हुए (विभिन्न ग्रंथों में 7 से 23 बार विजय का उल्लेख)। |
| तराईन का प्रथम युद्ध | 1191 ई.। मुहम्मद गौरी बुरी तरह पराजित हुआ और घायल होकर भाग गया। (पृथ्वीराज ने भागती सेना का पीछा नहीं किया)। |
| तराईन का द्वितीय युद्ध | 1192 ई.। गौरी ने छल से काम लिया और पृथ्वीराज की सेना के नित्य कर्म में व्यस्त होने पर आक्रमण किया। पृथ्वीराज पराजित हुए, दिल्ली और अजमेर पर तुर्कों का अधिकार हो गया। |
| पराजय का कारण | दूरदर्शिता का अभाव। पड़ोसी राज्यों को मित्र बनाने के बजाय शत्रु बना लिया और गौरी को तराईन के प्रथम युद्ध में जीवित छोड़ दिया। |
| व्यक्तित्व | वीर, कुशल योद्धा, साहित्यप्रेमी। दरबारी कवि: विद्यापति वागीश्वर, जयानक, जनार्दन। |
4. महाराणा सांगा (संग्राम सिंह)
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| शासनकाल | 1509 ई. में मेवाड़ के महाराणा बने। |
| महत्व | महाराणा कुम्भा के पश्चात मेवाड़ के सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण शासक। |
| कूटनीति | अपनी शक्ति के आधार पर आसपास के राजपूत शासकों को सहायता एवं मित्र बनाकर संगठित किया। |
| समकालीन मुस्लिम शक्तियाँ | दिल्ली में सिकंदर लोदी, गुजरात में महमूद शाह बेगड़ा, मालवा में नासीरुद्दीन का शासन था। |
| विजय अभियान | 1512 ई. में ईडर शासक को पराजित किया। मालवा के सुल्तान मेहमूद खिलजी को परास्त कर कैद किया और बाद में क्षमा कर दिया (एक शाहजादे को बंधक रख)। |
| दिल्ली से संघर्ष | लोदी वंश के साथ संघर्ष। |
| खातौली का युद्ध | 1517 ई.। इब्राहिम लोदी की पराजय हुई। |
| धौलपुर का युद्ध | 1518 ई.। पुनः इब्राहिम लोदी की सेना को परास्त किया। |
| बाबर से संघर्ष | 1526 ई. में पानीपत के युद्ध में बाबर ने लोदी की अफगान सत्ता समाप्त कर मुगल साम्राज्य स्थापित किया। राणा सांगा ही एकमात्र चुनौती थे। |
| बयाना का युद्ध | 1527 ई.। राजपूतों ने मुगल सेना को बुरी तरह पराजित किया। |
| खानवा का युद्ध | 17 मार्च 1527 ई.। बाबर ने सेना संगठित कर चुनौती दी। राजपूत सेना को प्रारम्भिक विजय मिली, लेकिन अंततः राणा सांगा पराजित हुए। |
| मृत्यु | 1528 ई. में। |
| योगदान | राजपूत शक्ति को संगठित करने का प्रयास किया और अपने शौर्य से स्वदेश की रक्षा का महत्व स्थापित किया। |
5. राव मालदेव
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| पिता | राव गांगा। |
| राज्याभिषेक | 1532 ई.। |
| राज्य स्थिति | राज्याभिषेक के समय केवल सोजत और जोधपुर परगने थे। |
| साम्राज्य विस्तार | महत्वाकांक्षी शासक। उसके नेतृत्व में जोधपुर का साम्राज्य दिल्ली की सीमाओं तक विस्तृत हुआ। तत्कालीन राजनीतिक अस्थिरता (बाबर की मृत्यु, राणा सांगा की मृत्यु) का फायदा मिला। |
| विजय क्षेत्र | 1539 ई. में भाद्राजूण और रायपुर पर अधिकार। बाद में जालौर, मेड़ता, अजमेर, सांभर, लालसोट, चाकसू, बदनौर, कोठडी, बीसलपुर, मदारिया, नाडौल और जहाजपुर (मेवाड़ के क्षेत्र) पर भी अधिकार। |
| हुमायूं के प्रति नीति | दिल्ली में अफगान सत्ता (शेरशाह) की स्थापना से भयभीत होकर हुमायूं को सहयोग की नीति अपनाई। |
| शेरशाह से संघर्ष | शेरशाह (80000 सैनिक) ने मालदेव (गिरी) व शेरशाह (सामेल) के बीच एक माह तक बिना लड़े डेरा डाला। |
| गिरी-सामेल का युद्ध | 4 जनवरी 1544 ई.। शेरशाह ने कुटिलता से काम लिया और मालदेव तथा उसके वीर सरदार जेता व कूम्पा में फूट डालने का प्रयास किया। मालदेव यह कपट न समझकर बिना युद्ध किए जोधपुर लौट आए। |
| जेता और कूम्पा का बलिदान | जेता और कूम्पा ने 1200 सैनिकों के साथ वीरता से लोहा लिया। शेरशाह बड़ी मुश्किल से युद्ध जीत सका और कहा था कि: "मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।" |
| महत्व | मारवाड़ के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान। छोटे राज्य को 50 परगनों तक पहुँचाया। |
| दोष | दूरदर्शिता का अभाव। अपने वीर सरदारों पर अविश्वास करके अपनी विजय को पराजय में बदल दिया। |
6. वीर दुर्गादास राठौड़
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 1638 ई.। |
| पिता | आसकरण (जसवन्त सिंह के मंत्री और दनेरा के जागीरदार)। |
| प्रारम्भिक जीवन | खेतीबाड़ी की। निर्भीकता और सत्यवादिता से महाराजा जसवन्त सिंह प्रभावित हुए और उन्हें अपनी सेवा में ले लिया। |
| जसवन्त सिंह की मृत्यु | 1678 ई. में जमरूद में। रानी गर्भवती थीं। |
| औरंगजेब की नीयत | जसवन्त सिंह के पुत्र अजीत सिंह को मुगल दरबार में रखकर जोधपुर को खालसा (सीधा नियंत्रण) करना चाहता था। |
| संघर्ष | रानी ने पुत्र अजीत सिंह को जन्म दिया। औरंगजेब ने राजकुमार को दिल्ली बुला लिया। दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब की नीयत पर संदेह होने के कारण कूटनीति द्वारा प्रत्युत्तर दिया। |
| अजीत सिंह को सुरक्षित पहुँचाना | अपनी योजनानुसार कुछ सरदारों को अपनी जागीरों में भेजा, कुछ को दिल्ली के पास रखा। 23 जुलाई को राजकुमार और परिजनों को सुरक्षित मारवाड़ पहुँचाया। |
| विद्रोह | शाहजादा अकबर ने विद्रोह किया तो दुर्गादास ने उसे बादशाह बनाने का प्रयत्न किया और बाद में उसे मराठा राज्य में भेज दिया। |
| प्रभाव | दुर्गादास ने मुगलों के विरुद्ध 'राठौड़- सिसोदिया परिसंघ' का निर्माण किया। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद जोधपुर पर राठौड़ों का अधिकार हो गया। |
| उपेक्षा | अजीत सिंह को दुर्गादास का प्रभाव खटकने लगा और उसने विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। दुर्गादास ने उपेक्षित होकर मारवाड़ छोड़ा और मेवाड़ आ गए। |
| धार्मिक सहिष्णुता | शाहजादा अकबर के पुत्र बुलन्द अख्तर व पुत्री सफियतुन्निसा को संरक्षण दिया, उन्हें शिक्षा-दीक्षा दी और सम्मानपूर्वक अकबर को सौंपा। |
| मृत्यु | 1718 ई. में मेवाड़ में क्षिप्रा नदी के तट पर। |
| महत्व | अपनी वीरता, रणचातुर्य और देशभक्ति से इतिहास में अमर हो गए। |
7. महाराजा सूरजमल
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 13 फरवरी 1707 ई.। |
| पिता | बदनसिंह (डीग को राजधानी बनाया)। |
| शासनकाल | 1756 ई. में भरतपुर के शासक बने। |
| उपाधि | जाटों का प्लेटो (कुशल प्रशासक व कूटनीतिज्ञ होने के कारण)। |
| निर्माण कार्य | 1733 ई. में फतहगढ़ी पर विजय। 1743 ई. में भरतपुर नगर की नींव रखी। |
| राजनीतिक सफलता | जयपुर महाराजा जयसिंह की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के विषय पर कूटनीति और सैन्य शक्ति से ज्येष्ठ पुत्र ईश्वरी सिंह को विजय दिलवाई (1748 ई.)। |
| साम्राज्य विस्तार | डीग, भरतपुर के अतिरिक्त मथुरा, आगरा, धौलपुर, मेरठ, हाथरस, अलीगढ़ तक विस्तृत। |
| सैन्य शक्ति | विशाल सेना, 25000 सैनिक, 300 तोपों का विशाल तोपखाना। |
| संघर्ष | मराठों से संघर्ष (कुम्हेर किले को घेरने पर)। |
| धार्मिक प्रतिरोध | अहमदशाह अब्दाली द्वारा ब्रज के तीर्थस्थलों को नष्ट करने के उद्देश्य से किए गए आक्रमण का प्रतिरोध किया और ब्रज की रक्षा की। |
| साहित्य प्रेमी | कवि सूदन उनके राजकवि थे, जिन्होंने सुजान चरित्र लिखा। |
| मृत्यु | 25 दिसम्बर 1763 ई. को वीरगति को प्राप्त हुए। |
8. भामाशाह
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 20 अप्रैल 1547 ई. को मेवात के एक जैन परिवार में। |
| सेवा | महाराणा सांगा और उदयसिंह के समय मेवाड़ में अपनी सेवाएँ दीं। |
| पद | महाराणा प्रताप के सलाहकार। |
| दान | जब महाराणा प्रताप मुगलों से संघर्ष कर रहे थे और राजकोष रिक्त हो गया था, तब भामाशाह ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति महाराणा प्रताप को सौंप दी। |
| विशेषता | यह धन इतना था कि 25000 सैनिकों का बारह वर्ष तक खर्च चल सकता था। |
| महत्व | मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। |
| मृत्यु | 52 वर्ष की उम्र में। |
9. झलकारी बाई
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| काल | 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना। |
| जन्म | 22 नवम्बर 1830 ई. को झांसी के नजदीक भोजला ग्राम में एक कोली परिवार में। |
| विवाह | पूरन सिंह (झांसी की सेना के तोपखाने के देखभालकर्ता)। |
| कार्य | रानी लक्ष्मीबाई की महिला सेना दुर्गा दल में सम्मिलित हुईं और रानी की सलाहकार बनीं। |
| योगदान | कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से मिलती थी। जब अंग्रेज फौज ने झांसी को घेर लिया, तो उन्होंने रानी की पोशाक पहन कर स्वयं को रानी घोषित कर अंग्रेजों से युद्ध किया। |
| शौर्य | इस बलिदान से रानी लक्ष्मीबाई को सुरक्षित किले से बाहर भेज दिया गया। उनके पति पूरन सिंह भी किले की रक्षा करते हुए शहीद हो गए। |
| महत्व | उनकी वीरता की प्रशंसा तत्कालीन ब्रिटिश सेनापति जनरल ह्यूरोज ने भी की थी। |
समाज सुधारक
| समाज सुधारक | तथ्य/योगदान |
|---|---|
| दादू दयाल | जन्म: 1601 वि.स. (अहमदाबाद)। कर्म स्थली: राजस्थान में सांभर के पास नरेना। उपदेश: हिन्दू-मुस्लिम दोनों धर्मों के अंधविश्वासों और पाखंडों का खंडन किया। पंथ: दादू पंथी (52 प्रमुख शिष्य '52 थम्भे' कहलाए)। शिक्षाएँ: दादू वाणी में संग्रहीत। निधन: 1660 वि.स. ज्येष्ठ कृष्णा अष्टमी। |
| संत जसनाथ | जन्म: 1540 वि.स. (बीकानेर के कतरियासर)। शिक्षाएँ: निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना पर बल। मूर्तिपूजा, जातिप्रथा एवं रूढ़ियों का विरोध। पंथ: जसनाथी सम्प्रदाय (36 नियम)। इस सम्प्रदाय के लोग रात्रि जागरण में अग्नि नृत्य करते हैं। |
| आचार्य भिक्षु (भीखणजी) | जन्म: 1726 ई. (मारवाड़ का कष्टालिया)। विरोध: शिथिलता तथा धर्म विरुद्ध आचरण के विरुद्ध धार्मिक क्रांति का सूत्रपात। पंथ: तेरह पंथ धर्म संघ (1760 ई. में केलवा में स्थापना)। सिद्धान्त: पाँच महाव्रत, तीन गुप्तियाँ, पाँच समितियाँ। योगदान: जैन धर्म के सिद्धांतों को जनभाषा में पहुँचाया। |
| जांभोजी | जन्म: 1451 ई. (नागौर के पीपासर)। चिंता: समाज में व्याप्त साम्प्रदायिक विद्वेष एवं कुरीतियों से चिन्तित। पंथ: विश्नोई पंथ (29 नियम)। शिक्षाएँ: जीव हत्या नहीं करना, मांस का सेवन नहीं करना। प्रकृति संरक्षण पर बल (खेजड़े के वृक्ष को चिह्न बनाया)। ग्रंथ: जंभ सागर (सबद/जम्भ गीता)। स्थान: मुकाम तालवा (विश्नोई सम्प्रदाय का प्रमुख स्थान)। |
| रामचरणजी | जन्म: 1720 ई. (टोंक)। गुरु: कृपारामजी। पंथ: रामस्नेही सम्प्रदाय की शाहपुरा पीठ के संस्थापक। शिक्षाएँ: मूर्ति पूजा, आडम्बर एवं जातिगत भेदभाव का विरोध किया। साहित्य: रामचरण की वाणी। |
| संत पीपा | जन्म: 1417 वि.स. (गागरोन)। शासन: गागरोन के शासक थे। दिल्ली के फिरोज तुगलक से संघर्ष कर विजय प्राप्त की। वैराग्य: युद्ध और राजकार्य से विमुख होकर वैराग्य धारण किया। गुरु: रामानन्द (12 प्रमुख शिष्यों में से एक)। शिक्षाएँ: ईश्वर निराकार है, गुरू के महत्व पर बल दिया। |
| मीराबाई | जन्म: नागौर जिले के कुड़की। भक्ति: कृष्ण भक्ति की सगुण धारा की प्रमुख संत। विवाह: महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज से। विरोध: विक्रमादित्य द्वारा प्रताड़ित की गईं, लेकिन धैर्य से सामना किया। यात्रा: राजकुल की मर्यादा त्याग कर मेड़ता, वृन्दावन और अंत में द्वारका आईं। निधन: 1556 ई. में द्वारकाधीश मंदिर में सदेह मूर्ति में विलीन हो गईं। भक्तिशास्त्र: प्रेम का शास्त्र (माधुर्य, विरह, समर्पण)। |
| पन्नाधाय | संघर्ष: महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में राजनैतिक अस्थिरता के समय। बलिदान: दासी पुत्र बनवीर ने 15 वर्षीय उदयसिंह की हत्या का षड्यंत्र किया। पन्नाधाय ने उदयसिंह को सुरक्षित बाहर भेजकर, अपने पुत्र चंदन को उदयसिंह के पलंग पर सुला दिया। बनवीर ने चंदन की हत्या कर दी। महत्व: अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ के राजवंश को बचाया। |
| मावजी | जन्म: 1714 ई. (साबला गांव)। क्षेत्र: राजस्थान का वागड़ प्रदेश। शिक्षाएँ: सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास (कन्या के विवाह पर राशि नहीं लेना, चोरी नहीं करना)। सामाजिक समानता और कन्या सम्मान पर बल दिया। धाम: सोम-माही के संगम पर बेणेश्वर धाम (आदिवासियों का प्रयाग/महाकुम्भ)। भक्ति: कृष्ण के अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। |
| गोविन्द गुरु | क्षेत्र: भील जनजाति (बांसवाड़ा, डूंगरपुर)। कार्य: भील जनजाति में सामाजिक चेतना और उत्थान। शिक्षाएँ: अंधविश्वास, मांस, मदिरा आदि का सेवन न करने की शिक्षा। संस्था: सम्प सभा (सम्म का अर्थ: प्रेम)। प्रथम अधिवेशन: 1903 ई. में गुजरात स्थित मानगढ़ की पहाड़ी पर। दमन: 1913 ई. में मानगढ़ की पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना द्वारा गोलीबारी। लगभग 1500 भील शहीद हुए। |
| कालीबाई | क्षेत्र: भील वीरांगना, डूंगरपुर जिला (रास्तापाल ग्राम)। संघर्ष: डूंगरपुर रियासत के महारावल शिक्षा प्रसार नहीं चाहते थे। नानाभाई खांट और शिक्षक सेंगाभाई ने विद्यालय चलाया। बलिदान: पुलिस द्वारा सेंगाभाई को ट्रक से बाँधकर घसीटने पर, 13 वर्षीय बालिका कालीबाई ने हँसिये से रस्सी काट दी। पुलिस की गोली से घायल हुईं और उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। महत्व: आदिवासियों में शिक्षा का प्रसार करने में शहादत दी। |
लोक देवता (पंच पीर)
| लोक देवता | तथ्य/योगदान |
|---|---|
| गोगाजी | जन्म: ददरेवा (चूरू)। उपाधि: पंचपीरों में से एक। संघर्ष: संपत्ति विवाद में मौसेरे भाई अर्जन-सर्जन से। दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह से युद्ध किया। महत्व: गोरक्षक। समाधि: गोगामेड़ी में जीवित समाधि ली। पूजा: खेजड़ी के नीचे, सर्पदंशित व्यक्ति की रक्षा के लिए। मेला: भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी को। |
| वीर तेजाजी | जन्म: खरनाल (नागौर), 1130 वि.स.। संघर्ष: गायों को छुड़ाने के लिए लुटेरों से संघर्ष। बलिदान: गायों की रक्षा और वचन पालन हेतु प्राण त्याग दिए। पूजा: गोरक्षक और वचन पालन के लिए पूजे जाते हैं। अश्वारोही के रूप में साँप द्वारा डसते हुए दिखाया जाता है। |
| बाबा रामदेव | जन्म: 1405 ई. (पोकरण, जैसलमेर)। कार्य: पोकरण छोड़कर रुणेचा (रामदेवरा) नामक नया गाँव बसाया। योगदान: जाति व्यवस्था एवं आडम्बरों का विरोध किया। दलितों को सम्मान दिया (डाली बाई को बहन बनाया)। सांप्रदायिक सौहार्द (हिन्दू-मुस्लिम दोनों पूजते हैं)। मेला: भाद्रपद शुक्ला द्वितीया से दशमी तक। |
| देवनारायणजी | जन्म: माण्डलजी के बगड़ावत चौहान वंश में। संघर्ष: भिनाय के ठाकुर से गायों की रक्षा और पिता की हत्या का बदला लिया। उपाधि: गुर्जरों के इष्टदेव। विष्णु के अवतार माने जाते हैं। महत्व: गोरक्षक। इनके पास पाँच विशिष्ट गायें थीं। मंदिर: आसीन्द (भीलवाड़ा)। |
| पाबूजी | जन्म: 1239 ई. (मारवाड़)। संघर्ष: अपनी बहन के विवाह के दौरान जिंदराव खींची द्वारा गायों को घेरने पर। बलिदान: गोरक्षा हेतु 1276 ई. में शहीद हो गए। उपाधि: राजस्थान में ऊँटों के देवता। पुजा: थोरी जाति के प्रमुख अनुयायी। यशोगान: पाबूजी की फड़ में वर्णित। |
| हड़बूजी | जन्म: मुण्डल गाँव (नागौर)। गुरु: रामदेवजी की प्रेरणा से साधु बने। योगदान: राव जोधा को मण्डोर पर अधिकार करने में सहयोग व आशीर्वाद दिया। महत्व: भविष्य दृष्टा, योगी और योद्धा। अतिथि देवो भव का पालन किया। मूर्तिपूजा तथा जातिगत भेदभाव का विरोध किया। मंदिर: बैंगटी गाँव (जोधपुर) - इनकी गाड़ी प्रतीकस्वरूप पूजी जाती है। |
| मेहाजी मांगलिया | उपाधि: पंचपीरों में से एक। संघर्ष: भाई ऊदा से वैर। राव चूंडा के समकालीन। कार्य: ऊदा से बदला लिया। जनसेवक, तीन तालाब खुदवाए। महत्व: आने वाली विपत्ति को पहले से भांपने वाले दूरदृष्टा। |
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