कक्षा 12वीं पर्यावरण पार्ट 7 पाठ के प्रश्न और

. अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions) (कुल 10)

  1. कृषिक पारितंत्रों की दो प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?
    • ​ये अत्यधिक सरल पारितंत्र हैं जिनमें एकल फसलन होता है।
    • ​ये अत्यधिक अस्थायी होते हैं और स्वपोषणीय नहीं होते।
  2. मानव रूपांतरित पारितंत्र प्राकृतिक पारितंत्रों से किस प्रकार भिन्न होते हैं?
    • ​मानव रूपांतरित पारितंत्र प्राकृतिक ऊर्जा पर निर्भर नहीं होते, बल्कि जीवाश्म ईंधन या बिजली जैसी बाहरी ऊर्जा पर निर्भर होते हैं।
  3. बढ़ती जनसंख्या के कारण प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन का क्या परिणाम होता है?
    • ​आवश्यकता से अधिक उपयोग और नई या रूपांतरित प्रजातियों के समावेश से प्राकृतिक पारितंत्रों की उत्पादकता कम हो जाती है।
  4. औद्योगिकीकरण से उत्पन्न होने वाले किन्हीं दो गैसीय प्रदूषकों के नाम लिखिए।
    • ​कार्बन के ऑक्साइड
    • ​नाइट्रोजन के ऑक्साइड और सल्फर के ऑक्साइड।
  5. एक्वाकल्चर में रैन्चिंग (Ranching) विधि क्या है?
    • ​इसके अंतर्गत मछलियों को तटीय लैगूनों में पिंजरों के अंदर कुछ वर्षों के लिए रखा जाता है, और फिर उन्हें जल निकायों में छोड़ दिया जाता है; वयस्क मछलियों को वापस लैगून में अंडे देने के लिए आने पर पकड़ लिया जाता है (जैसे सॉल्मन)।
  6. बाँधों के निर्माण से पारिस्थितिक संतुलन पर पड़ने वाले दो हानिकारक प्रभाव बताइए।
    • ​निचले बाढ़ के इलाकों में पोषकों के पुनर्भरण में कमी आती है।
    • ​कुछ मत्स्य प्रजातियों के प्रवास और अंडे देने में बाधा पड़ती है।
  7. नगरीय पारितंत्रों में जल का अत्यधिक अभाव क्यों होता है?
    • ​अत्यधिक जनसंख्या घनत्व के कारण पृथ्वी के 75% संसाधनों का उपभोग होता है, जिससे जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
  8. ग्रामीण पारितंत्रों की दो विशेषताएं क्या हैं?
    • ​यहाँ लोग प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर होते हैं तथा स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हैं।
    • ​ग्रामीण क्षेत्र अधिकतर वायु और ध्वनि प्रदूषण से मुक्त रहते हैं।
  9. मृदा अपरदन के दो मुख्य कारण बताइए जो मानवीय गतिविधियों से संबंधित हैं।
    • वनोन्मूलन (Deforestation)।
    • अतिचारण (Overgrazing) और सघन कृषि (Intensive farming)।
  10. विदेशी प्रजातियों के प्रवेशन से देसी प्रजातियाँ किस प्रकार प्रभावित होती हैं?
    • ​नई विदेशी प्रजातियों या आनुवंशिक रूप से रूपांतरित प्रजातियों के समावेश से देशी प्रजातियों की समष्टि (जनसंख्या) कम हो जाती है।

​3. लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions) (कुल 5)

  1. मानव रूपांतरित पारितंत्रों की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
    • ​मानव रूपांतरित पारितंत्र अत्यधिक सरल होते हैं तथा इनमें प्रजातीय विविधता बहुत कम होती है।
    • ​इनमें खाद्य शृंखलाएँ सरल और लघु होती हैं।
    • ​ये अपनी उत्तरजीविता के लिए मानवीय सहायता (जैसे उर्वरक, सिंचाई, जीवाश्म ईंधन) पर निर्भर करते हैं।
    • ​ये रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, मृदा अपरदन से प्रभावित होते हैं, और अत्यधिक अस्थायी होते हैं।
  2. कृषि पारितंत्रों के निर्माण के प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
    • जैव विविधता का नुकसान: एकल कृषि (Monoculture) के कारण प्राकृतिक जैव विविधता नष्ट हो जाती है।
    • पर्यावरण प्रदूषण: फसलों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर पीड़कनाशी और रसायनों का उपयोग पर्यावरण को दूषित करता है।
    • जल स्तर का गिरना: कृत्रिम सिंचाई के कारण कई क्षेत्रों में भूमिगत जल स्तर नीचे चला जाता है।
    • जल प्रदूषण: उर्वरक तथा पीड़कनाशी घुले हुए जल के बहकर नदियों, झीलों को प्रदूषित करने से जल निकायों का प्रदूषण होता है।
  3. नगरीय पारितंत्रों से होने वाले मुख्य दुष्प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
    • संसाधनों का अत्यधिक उपभोग और कचरा: नगरीय पारितंत्र पृथ्वी के 75% संसाधनों का उपभोग करते हैं और 75% कचरा उत्पन्न करते हैं।
    • प्रदूषण: मोटर गाड़ियों और उद्योगों की बढ़ती संख्या के कारण वायु और ध्वनि प्रदूषण अत्यधिक होता है।
    • आधारभूत सुविधाओं का अभाव: अत्यधिक जनसंख्या घनत्व के कारण झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों को साफ पीने का पानी, अपशिष्ट निपटान, और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी सुविधाओं का अभाव होता है।
    • सामाजिक समस्याएँ: यहाँ अत्यधिक अपराधिक दर, अशांति और बेरोजगारी भी होती है।
  4. औद्योगीकरण और पर्यावरणीय अवक्रमण (Degradation) में क्या संबंध है?
    • ​औद्योगीकरण पर्यावरण अपक्रमण का एक मुख्य कारण है। यह वस्तुओं के उत्पादन, धातु निष्कर्षण और रसायनों के संश्लेषण से संबंधित है।
    • वायु प्रदूषण: सभी उद्योग अपशिष्ट गैसें (जैसे \text{CO}_x, \text{NO}_x, \text{SO}_x) और कणिकीय प्रदूषकों (जैसे फ्लाई ऐश, कालिख) को वायुमंडल में उत्सर्जित करते हैं।
    • विषैली गैसें: दुर्घटनाओं में मिथाइल आइसोसाइनेट जैसी विषैली गैसों का रिसाव जानलेवा हो सकता है।
    • द्वितीयक प्रदूषक: जटिल अभिक्रियाओं से स्मॉग और अम्लीय वर्षा जैसे द्वितीयक प्रदूषक उत्पन्न होते हैं, जो जीवों और स्मारकों के लिए हानिकारक हैं।
  5. एक्वाकल्चर के दो गुण और दो अवगुणों की सूची बनाइए।
    • गुण:
      1. पारिस्थितिकीय दक्षता उच्च होती है (कम अनाज में अधिक सजीव भार)।
      2. थोड़े पानी में अधिक उत्पादन होता है।
    • अवगुण:
      1. जल की प्राकृतिक जैव विविधता नष्ट हो जाती है, क्योंकि व्यापारिक मत्स्य प्रजातियों का एकल संवर्धन किया जाता है।
      2. ​अत्यधिक मत्स्य अपशिष्ट पैदा होते हैं जो जल निकायों को दूषित कर देते हैं।

​4. निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions) (कुल 5)

  1. मानव रूपांतरित पारितंत्र क्या हैं? उदाहरणों के साथ उनकी विशेषताओं और प्राकृतिक पर्यावरण पर उनके पड़ने वाले समग्र प्रभावों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
    • परिचय: मानव रूपांतरित पारितंत्र ऐसे मानव निर्मित पारितंत्र हैं जो अपनी उत्तरजीविता के लिए प्राकृतिक ऊर्जा के बजाय जीवाश्म ईंधन या बिजली जैसे बाहरी निवेश पर निर्भर होते हैं। मनुष्य ने अपनी बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए प्राकृतिक पारितंत्रों को रूपांतरित किया है।
    • उदाहरण: कृषि पारितंत्र (Agro-ecosystem), वृक्षारोपण (Plantation forest), नगरीय पारितंत्र (Urban ecosystem), औद्योगिक क्षेत्र (Industrial areas), और एक्वाकल्चर।
    • विशेषताएँ: ये अत्यधिक सरल, प्रजातीय विविधता में बहुत कम, सरल खाद्य शृंखलाओं वाले, मानवीय सहायता (उर्वरक, सिंचाई, जीवाश्म ईंधन) पर निर्भर, रोगों के प्रति संवेदनशील और अत्यधिक अस्थायी होते हैं।
    • समग्र प्रभाव:
      • जैव विविधता का क्षय: इनमें एकल कृषि के कारण प्राकृतिक जैव विविधता और आनुवंशिक विविधता नष्ट हो जाती है।
      • संसाधनों का अत्यधिक दोहन: बढ़ती जनसंख्या के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है।
      • प्रदूषण: नगरीय और औद्योगिक क्षेत्र मोटर गाड़ियों और उद्योगों से वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करते हैं।
      • मृदा और जल का अवक्रमण: सघन कृषि, अत्यधिक सिंचाई और वनोन्मूलन के कारण मृदा की उर्वरता नष्ट होती है और जलस्तर गिरता है।
    • निष्कर्ष: ये पारितंत्र मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, पर पर्यावरण पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, इसलिए इनके उपयोगों को कम करने और पुनर्उपयोग (Recycling) की विधियों को अपनाना आवश्यक है।
  2. भारत में बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिकीकरण का पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
    • जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव:
      • प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन: भोजन, जल और आवास की बढ़ती जरूरतों के लिए संसाधनों का अत्यधिक उपयोग, जिससे उत्पादकता कम हो जाती है। उदाहरण: अत्यधिक मत्स्यन (Overfishing) से मछली की जनसंख्या कम होना।
      • रोग और महामारियाँ: भीड़-भाड़ के कारण एड्स, हेपेटाइटिस, तपेदिक, बर्ड फ्लू और स्वाइन फ्लू जैसी महामारियों के फैलने की घटनाओं में वृद्धि।
      • पर्यावास का विनाश: कृषि और आवास के लिए प्राकृतिक पारितंत्रों को रूपांतरित करने से भूमि उपयोग और पर्यावास का विनाश होता है।
    • औद्योगिकीकरण के प्रभाव:
      • प्रदूषण: सभी उद्योग गैसीय (CO, NO, SO के ऑक्साइड) और कणिकीय प्रदूषकों (धूल, फ्लाई ऐश) का उत्सर्जन करते हैं।
      • औद्योगिक दुर्घटनाएँ: भोपाल गैस त्रासदी (MIC रिसाव) जैसी दुर्घटनाओं से बड़े पैमाने पर जनहानि और स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं।
      • द्वितीयक प्रदूषक: अम्लीय वर्षा और स्मॉग जैसे द्वितीयक प्रदूषकों का निर्माण, जो जीवों, भवनों और स्मारकों के लिए हानिकारक हैं।
    • दोनों का संयुक्त प्रभाव: जीवाश्म ईंधनों के अधिक उपयोग से भूमंडलीय ऊष्मण होता है, जिससे \text{CO}_2 का स्तर बढ़ता है और ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढ़ता है, जो तटीय शहरों के लिए खतरा है।
  3. वृक्षारोपण (Plantation forest) क्या है? इसके उद्देश्यों (आर्थिक महत्व) और विशेषताओं की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
    • परिचय: वृक्षारोपण एक मानव निर्मित पारितंत्र है, जिसमें आर्थिक दृष्टि से उपयोगी पौधों की विशेष प्रजातियों को खाली भूमि, सड़क के किनारे या पंचायत भूमि पर तेजी से उगाया जाता है।
    • विशेषताएँ:
      • ​इनमें प्रायः एकल कृषि संवर्धन होता है (जैसे ऑयल पाम, रबर वृक्षारोपण)।
      • ​इन वनों में लगभग एक ही आयु के वृक्ष होते हैं।
      • ​ये रोगजनकों और पीड़कों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।
      • ​इनमें प्रजातीय विविधता बहुत कम होती है।
      • ​इन्हें निरंतर मानवीय देखभाल और प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
    • आर्थिक महत्व (उद्देश्य):
      • उत्पाद प्राप्ति: फल, तेल, रबर, कॉफी, इमारती लकड़ी, ईंधन के लिए लकड़ी और कागज उद्योग के लिए पल्प प्राप्त करना।
      • पर्यावरणीय लाभ: वातपातन या वातरोधन (Windbreak) के लिए किया जाता है।
      • मृदा संरक्षण: मृदा के अपरदन को रोकने और मृदा की उर्वरता में वृद्धि करने के लिए किया जाता है।
      • रोजगार: कामकाज के अवसर और आय प्राप्त करने के लिए भी किया जाता है।
  4. बाँधों के निर्माण के लाभ और हानियों का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए, बताइए कि यह पारिस्थितिक संतुलन को कैसे प्रभावित करता है।
    • बाँधों के लाभ:
      • जल विद्युत उत्पादन: बहते हुए पानी से बिजली बनाई जाती है, जिससे \text{CO}_2 का उत्सर्जन कम होता है।
      • बाढ़ नियंत्रण: नदी अथवा ज्वारीय जल को संचित करके बाढ़ पर नियंत्रण होता है।
      • जल आपूर्ति: सिंचाई, उद्योगों और नगरीय क्षेत्रों के लिए पानी की आपूर्ति की जाती है।
      • मनोरंजन: तैराकी और नौकायन जैसी मनोरंजनात्मक गतिविधियों के लिए उपयोग में लाए जाते हैं।
    • बाँधों की हानियाँ:
      • जैव विविधता का नुकसान: वन और कृषि भूमि का बहुत बड़ा भाग स्थायी रूप से जलमग्न हो जाता है, जिससे पर्यावास नष्ट होता है।
      • सामाजिक विस्थापन: यहाँ रहने वाले लोगों की बहुत बड़ी आबादी को विस्थापित करना पड़ता है।
      • पारिस्थितिक बाधा: कुछ मत्स्य प्रजातियों के प्रवास और अंडे देने में बाधा पड़ती है।
      • भूवैज्ञानिक खतरा: ऊँचे बाँध, विशेषकर संभावित क्षेत्रों में भूकम्प के खतरे को और बढ़ा देते हैं।
      • जल प्रदूषण में वृद्धि: पानी के कम बहाव के कारण जल प्रदूषण में वृद्धि हो जाती है।
    • पारिस्थितिक संतुलन पर प्रभाव: बाँध नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करते हैं, जिससे जल की भौतिक-रासायनिक गुणवत्ता में परिवर्तन होता है और निचले इलाकों में पोषकों का पुनर्भरण कम हो जाता है, जिससे जलीय और स्थलीय दोनों तरह के पारिस्थितिक संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  5. मानवीय प्रभावों को कम करने के लिए पारितंत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने की विधियों का विस्तृत उल्लेख कीजिए।
    • ​मानवीय गतिविधियों के कारण प्राकृतिक पारितंत्रों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाया जा सकता है:
    • आवश्यकताओं को कम करना:
      • ​हमें अपनी आदतों में परिवर्तन लाना चाहिए, अपनी आवश्यकताओं को घटाना चाहिए।
      • ​अपने संसाधनों, विशेषकर खाद्य, ईंधन और जल को संरक्षित और पुनर्चक्रित करना चाहिए।
    • औद्योगिक क्रांति (या औद्योगिक पारिस्थितिकी):
      • पुनः अभिकल्पन: औद्योगिक प्रक्रियाओं के साथ-साथ प्राकृतिक प्रक्रियाओं के पैटर्न के पुनः अभिकल्पन द्वारा अधिक पोषणीय बनाना।
      • अपशिष्ट का पुर्नउपयोग: अधिकतर औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों का पुर्नउपयोग (Recycling) किया जाना चाहिए।
      • नेटवर्किंग (Web of Resource Exchange): विभिन्न उद्योगों की एक जटिल संसाधन विनिमय वेब में नेटवर्किंग करना, जिसमें एक उद्योग का अपशिष्ट दूसरे उद्योग द्वारा कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाए।
    • सतत प्रथाएँ: कृषि और मत्स्यन जैसी गतिविधियों में अत्यधिक उत्पाद प्राप्त करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करना चाहिए, ताकि पारितंत्र में संतुलन बना रहे
    • पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता: लोगों को जनसंख्या वृद्धि, प्रदूषण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में शिक्षित 

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