* स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ़ बीमारी न होना नहीं है, बल्कि यह शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह ठीक होने की स्थिति है (विश्व स्वास्थ्य संगठन - WHO के अनुसार)।
* एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक ऊर्जावान, उत्साही और काम में कुशल होता है, जिससे उसकी उत्पादकता बढ़ती है।
अच्छे स्वास्थ्य के लक्षण
* शारीरिक स्वास्थ्य: ऊर्जावान और सतर्क महसूस करना, उम्र और लंबाई के हिसाब से सही वज़न, चमकदार आँखें और साफ़ त्वचा, अच्छी नींद और पाचन।
* मानसिक स्वास्थ्य: अपनी भावनाओं पर नियंत्रण, जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता, आत्मविश्वास और दूसरों के प्रति सहयोग की भावना।
* सामाजिक स्वास्थ्य: जीवन के प्रति सकारात्मक नज़रिया, दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार, दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना और स्वस्थ रिश्ते बनाए रखना।
व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक
* संतुलित आहार: सही अनुपात में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज और रेशे वाला भोजन।
* व्यक्तिगत स्वच्छता: नियमित रूप से नहाना, साफ़ कपड़े पहनना, दाँत साफ़ करना, हाथ धोना आदि। यह बीमारियों को दूर रखता है।
* घरेलू स्वच्छता: घर को साफ़-सुथरा रखना ताकि धूल, मक्खियाँ और कीटाणु न पनपें। कचरे का सही निपटान।
* भोजन स्वच्छता: खाने-पीने की चीज़ों को साफ़ रखना, फल और सब्ज़ियों को धोकर इस्तेमाल करना, पका हुआ भोजन ढककर रखना।
* व्यायाम: नियमित शारीरिक गतिविधियाँ और व्यायाम शरीर को स्वस्थ रखते हैं।
* नियमित नींद और आराम: शरीर और दिमाग को तरोताज़ा करने के लिए पर्याप्त नींद लेना ज़रूरी है।
* बुरी आदतों से बचें: धूम्रपान, शराब, तंबाकू और गुटखा आदि का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
सामुदायिक स्वास्थ्य
* यह पूरे समाज के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का प्रयास है, जिसमें बीमारियों के इलाज की बजाय रोकथाम पर ज़ोर दिया जाता है।
* सरकारी गतिविधियाँ:
* गाँवों और शहरों में साफ़-सफ़ाई बनाए रखना।
* सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना और कचरे का निपटान करना।
* अस्पतालों और डिस्पेंसरियों की स्थापना।
* विभिन्न स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाना (जैसे राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम, पल्स पोलियो कार्यक्रम)।
* बच्चों के लिए स्कूल में 'मिड डे मील' की व्यवस्था करना।
* हमारा योगदान:
* अपने घर और आस-पड़ोस को साफ़ रखें।
* कचरे को सही जगह पर डालें (जैव-अवक्रमणीय और गैर-जैव-अवक्रमणीय कचरे को अलग-अलग करना)।
* पानी, बिजली जैसी सुविधाओं का सही इस्तेमाल और रखरखाव करें।
रोग प्रतिरक्षा (Immunity) और टीकाकरण
* रोग प्रतिरक्षा: शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता। यह दो प्रकार की होती है:
* प्राकृतिक प्रतिरक्षा: जन्म से ही मौजूद होती है (जैसे त्वचा कीटाणुओं को रोकती है)।
* उपार्जित प्रतिरक्षा: जीवनकाल में विकसित होती है, जो टीकाकरण से मिलती है।
* टीकाकरण: टीके शरीर में निष्क्रिय या कमज़ोर कीटाणुओं को डालकर प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करते हैं, ताकि भविष्य में होने वाले संक्रमण से बचा जा सके।
* सरकार गर्भवती महिलाओं, शिशुओं और बच्चों के लिए कई टीकाकरण कार्यक्रम चलाती है (जैसे BCG, पोलियो, DPT)। समय पर टीके लगवाना बच्चों को कई गंभीर बीमारियों से बचाता है।
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