कक्षा दसवीं सामाजिक अध्याय 3: प्राचीन भारत और विश्व - संक्षिप्त नोट्सपरिचय


 * बृहत्तर भारत: यह उन सभी क्षेत्रों को कहा जाता है जहाँ प्राचीन भारतीयों ने अपनी राजनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक उपस्थिति स्थापित की।
 * प्राचीन काल में भारत की सीमाएं आज से कहीं अधिक विस्तृत थीं।
 * भारतीयों ने साहसिक यात्राएं कर दूर-दराज के देशों में व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र स्थापित किए।
 * उद्देश्य: इन नोट्स का लक्ष्य आपको प्राचीन भारत की विस्तृत सीमाओं, संस्कृति के प्रसार के कारणों, प्रमुख केंद्रों और विज्ञान-कला के विकास के बारे में जानकारी देना है।
3.1 बृहत्तर भारत
 * बृहत्तर भारत की सीमाएँ: इसे दो मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है:
   * मध्य एशिया: इसमें तिब्बत, चीन और मध्य एशियाई क्षेत्र जैसे खोतान, कुचा और तुर्फान शामिल हैं।
   * हिन्द-चीन और पूर्वी द्वीप समूह: इसमें कंबुज (कंबोडिया), चम्पा (वियतनाम), बर्मा (म्यांमार), मलाया (मलेशिया), स्याम (थाईलैंड) और सुमात्रा, जावा, बोर्नियो, बाली (इंडोनेशिया) जैसे द्वीप शामिल हैं।
 * भारतीय संस्कृति के प्रसार के कारण:
   * आर्थिक कारण: विदेशों में भारतीय सामान की बहुत माँग थी। व्यापार के कारण भारतीय व्यापारी इन देशों में जाकर बस गए।
   * धार्मिक कारण: सम्राट अशोक और कनिष्क जैसे शासकों ने धर्म प्रचार के लिए बड़ी संख्या में भिक्षुओं को विदेशों में भेजा।
   * राजनीतिक कारण: कुछ भारतीय शासकों ने विदेशों पर आक्रमण करके वहाँ अपने उपनिवेश स्थापित किए।
3.2 विश्व में भारतीय संस्कृति का प्रसार
 * मध्य एशिया:
   * खोतान, तुर्फान (अग्निदेश) और कुचा (कुची) भारतीय संस्कृति के प्रमुख केंद्र थे।
   * खोतान एक बड़ा व्यापारिक और बौद्ध केंद्र था।
   * कुचा के राजाओं के नाम भारतीय होते थे (जैसे सुवर्णपुष्प)। यहाँ संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी।
 * तिब्बत:
   * सातवीं शताब्दी में तिब्बत के राजा सोंग्सन गम्पो के समय बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ।
   * भारतीय विद्वानों ने बौद्ध ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया।
 * चीन:
   * चीन के साथ भारत का संबंध प्राचीन काल से था।
   * फाह्यान, ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे चीनी यात्री भारत आए और बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया।
 * कंबुज (कंबोडिया):
   * इसे चीनी साहित्य में फूनान कहा जाता था। इसकी स्थापना कौण्डिन्य नामक भारतीय ने की थी।
   * राजा सूर्यवर्मा द्वितीय ने प्रसिद्ध अंगकोरवाट मंदिर का निर्माण करवाया।
   * राजा जयवर्मन सप्तम ने अंगकोर थॉम का निर्माण करवाया। 
 * चम्पा (वियतनाम):
   * यहाँ कई हिन्दू राजवंशों ने शासन किया।
   * यहाँ वर्ण व्यवस्था, सती प्रथा और हिन्दू पंचांग प्रचलित थे।
   * संस्कृत राजभाषा थी।
 * बर्मा (म्यांमार):
   * यहाँ पहली शताब्दी से ही भारतीय संस्कृति का प्रभाव था।
   * राजा अनिरुद्ध ने बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
   * आनंद मंदिर यहाँ की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
 * मलाया (मलेशिया):
   * भारत से इंडोनेशिया और हिन्द-चीन जाने वाले लोग इस मार्ग से गुजरते थे।
   * यहां प्राचीन मंदिरों के खंडहर और संस्कृत अभिलेख मिले हैं।
 * स्याम (थाईलैंड):
   * यहां थाई जाति के आने से पहले भारतीयों का प्रभुत्व था।
   * यहां के कई स्थान और शब्द भारतीय नामों पर आधारित हैं।
 * सुमात्रा (श्रीविजय):
   * चौथी शताब्दी में यहाँ श्रीविजय राज्य की स्थापना हुई, जो सातवीं सदी में उन्नत हुआ।
   * चीनी यात्री इत्सिंग ने यहाँ रहकर संस्कृत सीखी।
 * जावा (यवद्वीप):
   * यहाँ कई हिन्दू राज्य थे।
   * प्रसिद्ध बोरोबुदुर का बौद्ध स्तूप यहीं स्थित है। 
 * बोर्नियो:
   * यहाँ के अधिकांश निवासी ब्राह्मण थे।
   * शिव, गणेश और बुद्ध की मूर्तियाँ मिली हैं।
 * बाली द्वीप:
   * यह एकमात्र ऐसा उपनिवेश है जहाँ आज भी हिन्दू धर्म और संस्कृति बची हुई है।
3.3 वृहत्तर भारत में व्यापार, उद्योग एवं वाणिज्य
 * भारत का विदेशों से व्यापार जल और स्थल दोनों मार्गों से होता था।
 * प्रमुख निर्यात: सूती, रेशमी कपड़े, मसाले, हाथी दाँत, नील, बहुमूल्य पत्थर आदि।
 * प्रमुख आयात: सोना, चाँदी, मीठी शराब, अंजीर आदि।
 * उद्योग:
   * वस्त्र उद्योग: बनारस का रेशम, मदुरा का सूती और बंगाल का मलमल विश्व प्रसिद्ध था।
   * धातु उद्योग: सोने, चांदी, और अन्य धातुओं से बर्तन, आभूषण और हथियार बनाए जाते थे।
   * जहाज निर्माण: 500 लोगों की क्षमता वाले जहाज बनाए जाते थे।
 * वाणिज्य:
   * शुरुआत में वस्तु विनिमय होता था, बाद में सिक्कों का प्रचलन हुआ।
   * सोने के सिक्के को 'निष्क', चाँदी को 'धरण', और तांबे को 'माषक' या 'काकणी' कहते थे।
   * शिल्पियों और व्यवसायियों के संघ को 'श्रेणी' या 'निगम' कहते थे।
3.4 प्राचीन भारत की कला
 * स्थापत्य कला:
   * स्तंभ: सम्राट अशोक द्वारा निर्मित एकाश्मक स्तंभ (एक ही पत्थर से बने)। सारनाथ का सिंह शीर्ष सबसे प्रसिद्ध है। 
   * स्तूप: बुद्ध या बौद्ध भिक्षुओं की अस्थियों को रखने के लिए बनाए गए गुम्बद के आकार के स्मारक। सांची का स्तूप प्रसिद्ध है।
   * भवन (राजप्रसाद): सम्राट अशोक ने पाटलिपुत्र में विशाल महल बनवाया। चीनी यात्री फाह्यान ने इसे देवताओं द्वारा निर्मित बताया।
   * गुफागृह: कठोर चट्टानों को काटकर गुफाएं बनाई गईं, जैसे बराबर और नागार्जुनी की पहाड़ियों में।
 * मूर्तिकला:
   * मूर्तियाँ मुख्यतः धार्मिक विषयों पर आधारित थीं (देवी-देवता, बुद्ध, तीर्थंकर)।
   * मथुरा, सारनाथ और पाटलिपुत्र इसके प्रमुख केंद्र थे।
 * चित्रकला:
   * अजंता (महाराष्ट्र): यहाँ के चित्र बौद्ध धर्म पर आधारित हैं, जिनमें जातक कथाओं का अंकन है। 
   * एलोरा (महाराष्ट्र): बौद्ध, हिन्दू और जैन धर्म से संबंधित चित्र मिलते हैं।
   * बाघ (मध्य प्रदेश): यहाँ के चित्र धार्मिक न होकर लौकिक जीवन से संबंधित हैं।
 * संगीत कला:
   * समुद्रगुप्त के सिक्के पर उसे वीणा बजाते हुए दिखाया गया है, जो उनके संगीत प्रेम को दर्शाता है।
   * गायन, वादन और नृत्य के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई थी।
3.5 प्राचीन भारत में शिक्षा
 * गुरुकुल व्यवस्था: विद्यार्थी गुरु के पास रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे।
 * विश्वविद्यालय:
   * तक्षशिला: गांधार में स्थित, यह विश्व का प्राचीनतम विश्वविद्यालय था।
   * नालंदा: बिहार में स्थित, यह बौद्ध शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय केंद्र था।
   * विक्रमशिला: पाल वंश के शासक धर्मपाल द्वारा स्थापित, यह भी बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।
3.6 प्राचीन भारत का साहित्य
 * संस्कृत साहित्य:
   * कालिदास: 'अभिज्ञानशाकुंतलम्', 'कुमारसंभवम्', 'रघुवंशम्' और 'मेघदूतम्' जैसे महाकाव्य और नाटक लिखे।
   * अन्य लेखक: भारवि, माघ, भास, विशाखदत्त ('मुद्राराक्षस') और कौटिल्य ('अर्थशास्त्र')।
 * बौद्ध साहित्य:
   * मुख्यतः पालि और संस्कृत में लिखा गया।
   * त्रिपिटक: बौद्ध धर्म का प्रमुख ग्रंथ। इसके तीन भाग हैं- विनयपिटक, सुत्तपिटक, अभिधम्मपिटक।
   * अश्वघोष: 'बुद्धचरित' और 'सौंदरानंद' की रचना की।
 * जैन साहित्य:
   * मुख्यतः प्राकृत भाषा में लिखा गया।
   * आगम साहित्य: जैन धर्म का मूल ग्रंथ।
   * हेमचंद्र सूरी: 'परिशिष्ट पर्वन्' लिखा, जिसमें चंद्रगुप्त मौर्य का जीवन चरित्र है।
3.7 विज्ञान
 * धातु विज्ञान: दिल्ली का महरौली लौह स्तंभ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जो सैकड़ों वर्षों से बिना जंग लगे खड़ा है। 
 * नागार्जुन: शून्यवाद और सापेक्षतावाद के प्रवर्तक थे।
3.8 गणित
 * आर्यभट्ट:
   * इनकी प्रमुख कृति 'आर्यभट्टीयम्' है।
   * शून्य और दशमलव पद्धति का आविष्कार किया।
   * पाई (π) का मान चार दशमलव स्थानों तक ज्ञात किया।
 * भास्कराचार्य:
   * 'लीलावती' और 'सिद्धान्त शिरोमणि' जैसे ग्रंथ लिखे।
   * उन्होंने बताया कि किसी संख्या को शून्य से भाग देने पर भागफल अनंत होता है।
 * बोधायन: पाइथागोरस प्रमेय का प्रतिपादन 'चित्ति-प्रमेय' के रूप में किया था।
3.9 ज्योतिष एवं खगोल
 * आर्यभट्ट: उन्होंने बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य-चंद्र ग्रहण पृथ्वी व चंद्रमा की छाया के कारण होते हैं।
 * वराहमिहिर: 'पञ्च सिद्धांतिका' नामक ग्रंथ लिखा।
 * ब्रह्मगुप्त: 'ब्रह्म सिद्धांत' की रचना की, जिसमें गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत दिया।
3.10 आयुर्वेद
 * आयुर्वेद भारत की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धति है।
 * चरक: 'चरक संहिता' की रचना की।
 * सुश्रुत: विश्व के प्रथम शल्य चिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं।
 * धन्वंतरि: इन्हें आयुर्वेद का जनक कहा जाता है।
 * नागार्जुन: रस चिकित्सा प्रणाली की शुरुआत की।


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