कक्षा 12वीं हिंदी पाठ 3 बिहार और पद्माकर पाठ की सप्रसंग व्याख्या


बिहारी के दोहों की व्याख्या
दोहा 1: "कब को टेरत दीन रट, होत न स्याम सहाय। तुमहूँ लागी जगत गुरु, जगन्नाथ जगवाय।।"
 * संदर्भ: यह दोहा भक्त कवि बिहारी द्वारा रचित है। इसमें कवि ने भगवान श्रीकृष्ण से अपनी भक्ति और सहायता की पुकार की है।
 * प्रसंग: भक्त अपनी दीनता और असहायता व्यक्त करते हुए भगवान से सहायता की गुहार लगा रहा है। वह बार-बार पुकार रहा है, लेकिन जब उसे कोई उत्तर नहीं मिलता, तो वह व्यंग्यात्मक रूप से कहता है कि हे प्रभु! आपको भी संसार की हवा लग गई है।
 * व्याख्या: भक्त कहता है कि "मैं कब से दीनतापूर्वक आपको पुकार रहा हूँ, लेकिन हे श्याम! आप मेरी सहायता नहीं कर रहे हैं।" फिर वह व्यंग्य करते हुए कहता है कि "लगता है कि हे जगत के गुरु, आपको भी इस संसार की हवा लग गई है, जिसने आपको जगाकर अपने जैसा बना लिया है।" यहाँ 'जगत' और 'जग' शब्द का प्रयोग दो अलग-अलग अर्थों में किया गया है: एक संसार के लिए और दूसरा 'जगना' क्रिया के लिए।
 * भाव सौंदर्य: इस दोहे में भक्त की निराशा, बेचैनी और भगवान के प्रति व्यंग्य का भाव प्रकट होता है। यह दर्शाता है कि भक्त और भगवान के बीच का संबंध कितना आत्मीय और गहरा है कि भक्त व्यंग्य करने से भी नहीं हिचकता।
 * शिल्प सौंदर्य:
   * भाषा: ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग।
   * अलंकार: श्लेष अलंकार (जगत और जग), यमक अलंकार (जगन्नाथ और जगवाय), और अनुप्रास अलंकार (जब 'क', 'त', 'र' आदि की आवृत्ति हुई है)।
   * छंद: दोहा छंद।
दोहा 2: "कनक कनक तैं सौगुनी, मादकता अधिकाय। वा खाएँ बौरात है, या पाएँ बौराय।।"
 * संदर्भ: यह दोहा भी बिहारी द्वारा रचित है।
 * प्रसंग: इसमें कवि ने 'कनक' शब्द के दो अलग-अलग अर्थों के माध्यम से सोने (धन) की मादकता को धतूरे की मादकता से अधिक बताया है।
 * व्याख्या: कवि कहते हैं कि "एक कनक (धतूरा) की तुलना में दूसरे कनक (सोने) में सौ गुना अधिक मादकता होती है।" धतूरा खाने से व्यक्ति पागल हो जाता है, लेकिन धन या सोना पाने से ही व्यक्ति पागल हो जाता है। अर्थात, धतूरे का नशा खाने के बाद होता है, जबकि सोने का नशा मिलते ही हो जाता है।
 * भाव सौंदर्य: इस दोहे में कवि ने धन के नशे की भयावहता और उसकी मादकता को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से दर्शाया है। यह धन के प्रति मानवीय लालच और उसके नकारात्मक प्रभाव को उजागर करता है।
 * शिल्प सौंदर्य:
   * भाषा: ब्रजभाषा का प्रयोग।
   * अलंकार: यमक अलंकार (कनक शब्द का दो बार प्रयोग, दोनों बार अलग अर्थ)।
   * छंद: दोहा छंद।
दोहा 3: "बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करें, भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाय।।"
 * संदर्भ: यह दोहा श्रृंगार रस में है, जो राधा और कृष्ण के बीच के प्रेम को दर्शाता है।
 * प्रसंग: गोपियाँ कृष्ण से बातें करने के लोभ में उनकी बाँसुरी छिपा देती हैं।
 * व्याख्या: गोपियों ने कृष्ण से बात करने के आनंद (बतरस) के लालच में उनकी बाँसुरी छिपा दी है। जब कृष्ण उनसे बाँसुरी के बारे में पूछते हैं, तो वे सौगंध खाकर कहती हैं कि उन्हें नहीं पता, लेकिन साथ ही वे अपनी भौंहों से हँसती हैं। जब कृष्ण उनसे बाँसुरी देने के लिए कहते हैं, तो वे साफ इनकार कर देती हैं।
 * भाव सौंदर्य: इस दोहे में गोपियों और कृष्ण के बीच का बालसुलभ प्रेम, शरारत और स्नेह बहुत ही सुंदर ढंग से चित्रित हुआ है। यह उनकी चंचलता और आपसी प्रेम को दर्शाता है।
 * शिल्प सौंदर्य:
   * भाषा: ब्रजभाषा, जो श्रृंगार रस के लिए उपयुक्त है।
   * अलंकार: अनुप्रास अलंकार (लालच लाल की), क्रिया-सौंदर्य (सौंह करें, भौंहनु हँसै)।
   * छंद: दोहा छंद।
दोहा 4: "कहलाने एकत बसत, अहि, मयूर, मृग, बाघ। जगत तपोवन सौ कियौ, दीरघ-दाघ, निदाघ।।"
 * संदर्भ: यह दोहा ग्रीष्म ऋतु की भीषणता का वर्णन करता है।
 * प्रसंग: कवि ने भीषण गर्मी के कारण प्रकृति में आए बदलाव को दर्शाया है।
 * व्याख्या: कवि कहते हैं कि "भीषण गर्मी के कारण संसार एक तपोवन जैसा हो गया है।" तपोवन में जैसे सभी प्राणी शत्रुता भूलकर एक साथ रहते हैं, वैसे ही इस भीषण गर्मी में भी सांप (अहि), मोर, हिरण और बाघ अपनी शत्रुता भूलकर एक ही स्थान पर इकट्ठे रह रहे हैं।
 * भाव सौंदर्य: इस दोहे में कवि ने गर्मी के प्रभाव का मानवीकरण किया है। भीषण गर्मी के कारण सभी जीवों को मजबूर होकर एक साथ रहने का चित्रण कर उन्होंने प्राकृतिक आपदा की शक्ति को दर्शाया है।
 * शिल्प सौंदर्य:
   * भाषा: ब्रजभाषा।
   * अलंकार: उपमा अलंकार (जगत तपोवन सौ कियौ)।
   * छंद: दोहा छंद।
पद्माकर के कवित्त की व्याख्या
कवित्त: "एकै संग धाए नंदलाल औ गुलाल दोऊ...।"
 * संदर्भ: यह कवित्त रीति-काल के प्रसिद्ध कवि पद्माकर द्वारा रचित है। यह होली के पर्व का वर्णन करता है।
 * प्रसंग: एक नायिका अपनी सखी से होली के अवसर पर हुए अपने अनुभव का वर्णन कर रही है, जब नंदलाल (श्रीकृष्ण) और गुलाल दोनों एक साथ उस पर पड़े।
 * व्याख्या: नायिका अपनी सखी से कहती है कि "जैसे ही नंदलाल और गुलाल दोनों एक साथ उस पर आए, उनकी आँखें आनंद से भर गईं और वह गुलाल धुल नहीं रहा है।" वह कहती है कि "हे पद्माकर! मैं तुम्हारी कसम खाकर कहती हूँ, इसे धो-धोकर थक गई हूँ, लेकिन अब मुझे कोई उपाय समझ नहीं आ रहा है।" वह अपनी परेशानी व्यक्त करते हुए कहती है कि "क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, कौन सुनेगा? कोई तो ऐसा रास्ता बताओ, जिससे मेरा यह दर्द न बढ़े।" अंत में वह अपनी सखी से कहती है कि "हे मेरी बहन! इन आँखों से गुलाल तो साफ हो गया है, लेकिन मेरे मन से अहीर (श्रीकृष्ण) अभी भी नहीं निकल पा रहे हैं।"
 * भाव सौंदर्य: इस कवित्त में श्रृंगार और भक्ति रस का अद्भुत मिश्रण है। नायिका की विरह वेदना और होली के आनंद का भाव एक साथ प्रकट होता है। 'कड़ि‌यो अबीर, पै अहीर तो कदै नहीं' पंक्ति में होली के रंगों के माध्यम से कृष्ण के प्रेम का स्थायी प्रभाव दिखाया गया है।
 * शिल्प सौंदर्य:
   * भाषा: ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग।
   * अलंकार: अनुप्रास अलंकार (कहा जाऊं, कासे कहूं, कौन सुने), रूपकातिशयोक्ति (अबीर और अहीर का सामंजस्य)।
   * छंद: कवित्त छंद।

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