परिचय:
* लगभग 20 लाख साल पहले जब मानव आया, तो प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में थे।
* जनसंख्या बढ़ने के साथ, मानव ने भोजन और रहने की जगह के लिए संसाधनों का अत्यधिक उपयोग करना शुरू कर दिया।
* इस पाठ में, हम जानेंगे कि मानव की गतिविधियों से पर्यावरण कैसे खराब हो रहा है और संसाधन खत्म हो रहे हैं।
अवक्रमण की अवधारणा:
* पर्यावरण अवक्रमण का मतलब है कि मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।
* इसके कारण जैव विविधता का नुकसान, भूमि का प्रदूषण, और वायु-जल स्रोतों का दूषित होना शामिल है।
* यह मानव जाति के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा है।
3.2 प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का अवक्रमण
* प्रकृति में एक संतुलन होता है, लेकिन मानव की गतिविधियाँ इस संतुलन को बिगाड़ रही हैं।
मानव गतिविधियों से अवक्रमण:
* वनोन्मूलन: खेती और घर बनाने के लिए पेड़ों की कटाई। इससे पेड़ों के उगने की दर से ज्यादा तेजी से वे काटे जा रहे हैं।
* जलवायु परिवर्तन: पेड़ों की कटाई से वर्षा कम होती है और मिट्टी का कटाव (मृदा अपरदन) बढ़ता है।
* वन्यजीवों का विनाश: जंगल कटने से वन्यजीवों का घर छिन जाता है, जिससे वे विलुप्त हो रहे हैं।
* जीवाश्म ईंधन का उपयोग: कोयला, गैस और पेट्रोलियम जैसे अनवीकरणीय संसाधनों का तेजी से उपयोग किया जा रहा है, जिससे वे खत्म होने की कगार पर हैं।
प्रदूषण के रूप में अवक्रमण:
* वायु प्रदूषण: कोयला, लकड़ी और पेट्रोल के जलने से हानिकारक गैसें (SO₂, NO₂, CO) हवा में मिलती हैं, जो मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती हैं।
* जल प्रदूषण: कारखानों और खेतों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट नदियों और अन्य जल स्रोतों को दूषित करते हैं।
* मृदा प्रदूषण: घरों और कारखानों से निकलने वाले कचरे के कारण मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है।
3.3 जनसंख्या वृद्धि का पर्यावरण पर प्रभाव
जनसंख्या वृद्धि के कारण:
* बेहतर कृषि तकनीकें: अधिक भोजन उत्पादन से लोगों को पर्याप्त भोजन मिला।
* चिकित्सा में प्रगति: बीमारियों और महामारियों से होने वाली मौतें कम हुईं।
* औसत आयु में वृद्धि: आधुनिक चिकित्सा से लोगों की औसत आयु बढ़ गई।
जनसंख्या वृद्धि से पर्यावरण पर प्रभाव:
* भूमि का उपयोग: बढ़ती जनसंख्या के लिए भोजन और रहने की जगह की जरूरत पड़ी, जिससे जंगल और चारागाह कृषि योग्य भूमि में बदल दिए गए। मैंग्रोव वन भी काटे गए।
* जल की कमी: पानी का अत्यधिक उपयोग होने से भूजल स्तर (water table) गिर रहा है।
* मानव बस्तियाँ: घर बनाने के लिए बड़ी मात्रा में चट्टानों का खनन और जल का उपयोग हुआ।
* परिवहन: बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए परिवहन के साधन बढ़े, जिससे जीवाश्म ईंधन का उपयोग और वायु प्रदूषण भी बढ़ा।
* उद्योग: उद्योगों को चलाने के लिए कच्चे माल और ईंधन की जरूरत पड़ी, जिससे संसाधनों का दोहन और प्रदूषण बढ़ा।
* झुग्गी-झोपड़ियाँ: घनी आबादी वाले क्षेत्रों में झुग्गियाँ बनने लगीं, जहाँ मूलभूत सुविधाओं की कमी होती है।
* प्रदूषण: नदियों और जल स्रोतों में औद्योगिक और घरेलू कचरा डालने से प्रदूषण बढ़ा।
3.4 वनोन्मूलन और उसके परिणाम
* वनोन्मूलन: पेड़ों की कटाई।
वनोन्मूलन के कारण:
* विकास परियोजनाएं: घर, सड़क, उद्योग, स्कूल और अस्पताल बनाने के लिए।
* लकड़ी की जरूरत: इमारती लकड़ी (फर्नीचर के लिए) और जलाने वाली लकड़ी के लिए।
* चारागाह: जानवरों के चरने के लिए जंगलों को घास के मैदानों में बदलना।
* स्थानांतरित कृषि: फसल उगाने के लिए जंगलों को जलाकर जमीन साफ करना।
वनोन्मूलन के परिणाम:
* मृदा अपरदन (Soil Erosion): पेड़ों की जड़ें मिट्टी को रोकती हैं, पेड़ों के कटने से मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत बह जाती है।
* भूस्खलन (Landslides): पहाड़ी क्षेत्रों में पेड़ कटने से मिट्टी कमजोर हो जाती है, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
* गाद का जमाव (Silting): बारिश के पानी के साथ मिट्टी बहकर नदियों और झीलों में जमा हो जाती है।
* वन्यजीवों की क्षति: जंगल कटने से वन्यजीवों का घर नष्ट हो जाता है, जिससे वे विलुप्त हो रहे हैं।
* जलवायु में बदलाव: पेड़ वातावरण में नमी बनाए रखते हैं, उनके कटने से वर्षा में कमी आती है।
* CO₂ सिंक में कमी: पेड़ हवा से कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं। जंगल कम होने से हवा में CO₂ की मात्रा बढ़ती है।
* प्रदूषण: लकड़ी के कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट जल प्रदूषण करते हैं।
3.5 खनन द्वारा पर्यावरण का अवक्रमण
* वनस्पति की क्षति: खनन के लिए पेड़ों और मिट्टी को नष्ट कर दिया जाता है, जिससे उस क्षेत्र के पेड़-पौधे और जीव-जंतु खत्म हो जाते हैं।
* खनिजों की कमी: खनिज अनवीकरणीय संसाधन हैं, और अत्यधिक खनन के कारण ये भंडार खत्म हो रहे हैं।
* मलवे के ढेर: खनन के दौरान बड़ी मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ (मलवा) निकलता है, जो जमीन पर जमा होकर मिट्टी के कटाव का कारण बनता है और भूमि को अनुपयोगी बना देता है।
* भूमि का अवतलन (Land subsidence): भूमिगत खनन से जमीन धंसने लगती है, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
3.6 और 3.7 औद्योगीकरण और आधुनिक कृषि का प्रभाव
* औद्योगिकीकरण का प्रभाव:
* उद्योगों को चलाने के लिए जीवाश्म ईंधन और पानी की जरूरत होती है।
* उद्योगों से निकलने वाला धुआँ और अपशिष्ट वायु और जल प्रदूषण फैलाते हैं।
* औद्योगिकीकरण ने रोजगार तो पैदा किए, लेकिन साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाया।
* आधुनिक कृषि का प्रभाव:
* रासायनिक उर्वरक: खेतों से बहकर जल स्रोतों में जाते हैं, जिससे जल प्रदूषण होता है।
* रासायनिक कीटनाशक: ये न केवल फसलों को नष्ट करने वाले कीटों को मारते हैं, बल्कि उपयोगी कीटों को भी खत्म कर देते हैं। ये खाद्य श्रृंखला में जमा होकर जहरीले स्तर तक पहुँच जाते हैं (जैव आवर्धन)।
* एकल-फसली खेती: पारंपरिक बहु-फसली खेती को एकल-फसली खेती ने बदल दिया, जिससे मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है।
3.8 शहरीकरण और पर्यावरण
* शहरीकरण के कारण:
* लोग बेहतर रोजगार और सुविधाओं के लिए गाँवों से शहरों में आ रहे हैं।
* इससे शहरों की जनसंख्या बढ़ रही है।
* शहरीकरण का प्रभाव:
* उपजाऊ भूमि का नुकसान: घर, सड़क और उद्योगों के लिए खेती की जमीन का उपयोग।
* जल की कमी: बढ़ती जनसंख्या के लिए पानी की मांग बहुत बढ़ गई है।
* प्रदूषण: उद्योगों, वाहनों और कचरे से वायु, जल और मृदा प्रदूषण बढ़ा है।
* झुग्गी-झोपड़ियाँ: आवासों की कमी के कारण झुग्गियाँ बन रही हैं, जहाँ अस्वच्छ परिस्थितियाँ होती हैं।
3.9 पर्यावरणीय अवरोध
स्थानीय अवरोध:
* सिंचित मृदा का खारापन: अत्यधिक सिंचाई से जमीन में नमक जमा हो जाता है, जिससे भूमि बंजर हो जाती है।
* सुपोषण (Eutrophication): जल स्रोतों में पोषक तत्व बढ़ने से शैवाल की वृद्धि होती है, जो पानी में ऑक्सीजन खत्म कर देते हैं, जिससे जलीय जीव मर जाते हैं।
* मिनामाटा रोग: पारा (mercury) युक्त औद्योगिक अपशिष्ट जल में मिलने से खाद्य श्रृंखला के जरिए इंसानों तक पहुँचता है, जिससे यह रोग होता है।
* वन्यजीवों का विलुप्त होना: शिकार और आवास के विनाश से चीते, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे जानवर विलुप्त हो रहे हैं।
क्षेत्रीय अवरोध:
* बाढ़: भारी बारिश से नदियों का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ आती है, जिससे जान-माल का नुकसान होता है।
* सूखा: वर्षा की कमी के कारण सूखा पड़ता है, जिससे खेती, उद्योग और जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
* अम्ल वर्षा: उद्योगों और वाहनों से निकलने वाले SO₂ और NO₂ गैसें पानी में घुलकर अम्ल बनाती हैं। यह बारिश, जलीय जीवों, पौधों और ऐतिहासिक इमारतों को नुकसान पहुँचाती है।
* तेल रिसाव: जहाजों से तेल का रिसाव होने पर समुद्र की सतह पर तेल की परत बन जाती है, जिससे जलीय जीवों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और वे मर जाते हैं।
वैश्विक अवरोध:
* जैव विविधता की क्षति: वनों के कटने से पौधों और जानवरों की कई प्रजातियाँ हमेशा के लिए खत्म हो रही हैं।
* भूमंडलीय तापन (Global Warming): जीवाश्म ईंधन के जलने से हवा में CO₂ बढ़ रही है, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इससे बर्फ पिघल रही है और समुद्र का स्तर बढ़ रहा है।
* ओजोन परत का अपक्षीर्णन (Ozone Layer Depletion): क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) जैसे रसायन ओजोन परत को नुकसान पहुँचाते हैं। यह परत हमें सूरज की हानिकारक UV किरणों से बचाती है। इसके कमजोर होने से त्वचा कैंसर जैसे रोग बढ़ते हैं।
3.10 पर्यावरणीय अवक्रमण - उत्तरजीविता के लिए खतरा
* मानव ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मदद से आरामदायक जीवन तो बना लिया, लेकिन जनसंख्या बढ़ने से उसकी लालच भी बढ़ गई।
* इस लालच ने पर्यावरण का इतना विनाश किया है कि अब मानव का अपना अस्तित्व ही खतरे में है।
* स्वास्थ्य पर प्रभाव: प्रदूषित हवा, पानी और भोजन से लोगों को अस्थमा, फेफड़ों के रोग और कैंसर जैसी बीमारियाँ हो रही हैं।
* मानसिक स्वास्थ्य: बढ़ती जनसंख्या और बेरोजगारी के कारण तनाव बढ़ रहा है, जिससे अल्सर, मधुमेह और मानसिक बीमारियाँ हो रही हैं।
* निष्कर्ष: पर्यावरण का तेजी से हो रहा विनाश मानव के स्वास्थ्य और कुशल जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
0 Comments