भाषा विचारों को प्रकट करने का माध्यम है, जबकि साहित्य मानव की भावना, विचार और दर्शन का दर्पण है। किसी संस्कृति की समृद्धि को जानने के लिए उसकी भाषा और साहित्य को समझना आवश्यक है। लिपि के आविष्कार से भाषा को लिखित रूप मिला, जिससे संस्कृति, जीवन-शैली, समाज और तत्कालीन राजव्यवस्था की विशेषताओं को संरक्षित किया जा सका। इस अध्याय में विभिन्न भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य का अध्ययन किया गया है।
भारतीय भाषाएँ और संस्कृत
* संस्कृत:
* भारत की प्राचीनतम शास्त्रीय भाषा और सभी भाषाओं की जननी।
* देश की एकता का दृढ़ सूत्र।
* वेद, उपनिषद, पुराण एवं धर्म-सूत्र इसी में रचे गए।
* इसका साहित्य विशाल है, जिसकी शुरुआत ऋग्वेद से मानी जाती है।
* पाणिनि ने व्याकरण ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' में संस्कृत और इसके शब्द-निर्माण का विश्लेषण किया।
* क्षेत्र और सीमा की बाधाओं को लांघकर पूरे भारत में इसका विस्तार रहा है।
वेद
* भारत के प्राचीनतम धर्मग्रंथ, संस्कृत में रचे गए और इन्हें अपौरुषेय (मानव निर्मित नहीं) माना जाता है।
* 'वेद' का अर्थ ज्ञान होता है। हिंदू संस्कृति में इन्हें शाश्वत और ईश्वरप्रदत्त माना गया है।
* चार वेद: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
* प्रत्येक वेद के अपने ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद हैं।
* ऋग्वेद:
* सबसे प्राचीन वेद।
* 10 मंडल और 1028 सूक्त।
* अधिकांश ऋचाओं में ईश्वर से प्रार्थना की गई है और ये जीवन मूल्यों को बताते हैं।
* यजुर्वेद:
* 'यजु' का अर्थ यज्ञ।
* यज्ञों के नियमों और विधि-विधानों का संकलन।
* गद्य एवं पद्य दोनों में रचा गया है।
* दो भाग: कृष्ण यजुर्वेद एवं शुक्ल यजुर्वेद।
* उस समय की सामाजिक तथा धार्मिक स्थिति को दर्शाता है।
* सामवेद:
* 'साम' का शाब्दिक अर्थ गान या गीत।
* यज्ञों के अवसर पर गाए जाने वाले मंत्रों का संग्रह।
* भारतीय संगीत के विकास का मूल ग्रंथ।
* अथर्ववेद:
* ब्रह्मवेद के रूप में भी जाना जाता है।
* रोगों के उपचार और मानव जीवन को सुखी बनाने के अनुष्ठानों का उल्लेख।
* वेदांग: वेदों को समझने के लिए रचे गए छह वेदांग: शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष।
* ब्राह्मण ग्रंथ: वैदिक मंत्रों की व्याख्या, विधि-विधानों और यज्ञ विधान का उल्लेख।
* आरण्यक: दार्शनिक विषयों, आत्मा, जन्म-मृत्यु और मृत्युपरांत जीवन का उल्लेख। वन में अध्ययन किए जाने के कारण इन्हें आरण्यक कहा गया।
उपनिषद
* शाब्दिक अर्थ: 'गुरु के निकट बैठना'। ज्ञान प्राप्ति हेतु शिष्य गुरु के समीप बैठते थे।
* प्रमुख उपनिषद: ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, ऐतरेय, छान्दोग्य, वृहदारण्यक आदि।
* ये हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण अंग हैं।
सूत्र ग्रंथ
* वैदिक यज्ञों की व्यवस्था और गृहस्थाश्रम के लिए उपयोगी विधान सूत्रों में वर्णित हैं।
* तीन प्रकार:
* श्रौतसूत्र: यज्ञ संबंधी नियम।
* गृहसूत्र: गृहस्थाश्रम से संबंधित धार्मिक अनुष्ठान और कर्तव्य।
* धर्मसूत्र: धार्मिक एवं सामाजिक कर्तव्यों का उल्लेख।
स्मृति-ग्रंथ (धर्म शास्त्र)
* धर्म सूत्रों से विकसित हुए। इन्हें धर्म शास्त्र भी कहा जाता है।
* प्राचीन भारतीय सभ्यता पर प्रकाश डालते हैं।
* प्रमुख: मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति आदि।
रामायण एवं महाभारत
* रामायण:
* महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित।
* आदिकाव्य और वाल्मीकि आदिकवि माने जाते हैं।
* एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत करती है और अनुकरणीय आदर्शों की प्रतिष्ठा करती है।
* महाभारत:
* महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित।
* मूलतः संस्कृत में। पहले 'जय' और फिर 'भारत' कहा जाता था। अंतिम संकलन (1000 श्लोक) को महाभारत कहा गया।
* मूलरूप से कौरव-पांडवों के बीच संघर्ष की कथा, लेकिन जीवन के सभी पहलुओं को छूती है।
* भगवद्गीता: महाभारत का एक भाग, जिसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक योद्धा और राजा के रूप में कर्तव्यों का भान कराया।
पुराण
* महाकाव्यों के पश्चात् महत्वपूर्ण ग्रंथ।
* संख्या: 18।
* प्रसिद्ध पुराण: ब्रह्म, भागवत्, पद्म, विष्णु, वायु, अग्नि, मत्स्य, गरुड़, शिव पुराण आदि।
* नीति-कथाओं के माध्यम से धार्मिक और आध्यात्मिक संदेश देते हैं।
बौद्ध एवं जैन साहित्य
* बौद्ध साहित्य:
* पालि भाषा में रचित।
* 'त्रिपिटक' (तीन टोकरियाँ) महत्वपूर्ण ग्रंथ:
* विनयपिटक: दैनिक जीवन से संबंधित व्यवहार।
* सुत्तपिटक: बौद्ध धर्म के सिद्धांत व उपदेश।
* अभिधम्मपिटक: दार्शनिक सिद्धांत।
* जातक कथाएँ: भगवान बुद्ध के पूर्वजन्मों की घटनाओं का विवरण।
* जैन साहित्य:
* प्राकृत भाषा में लिखा गया।
* 'आगम' कहा जाता है।
* इसके अंतर्गत अंग, उपांग, मूलसूत्र, अनुयोग सूत्र और नंदी सूत्र की गणना की जाती है।
* महत्वपूर्ण जैन विद्वान: हरिभद्र सूरि, सिद्धर्षि।
अन्य प्राचीन ग्रंथ और लेखक
* कौटिल्य (चाणक्य): 'अर्थशास्त्र' (मौर्यकाल का महत्वपूर्ण ग्रंथ, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का वर्णन)।
* गुप्तकाल और हर्षकालीन रचनाएँ:
* कालिदास: 'मेघदूत', 'ऋतुसंहार', 'कुमारसंभव', 'रघुवंश' (महाकाव्य); 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्', 'विक्रमोर्वशीयम्', 'मालविकाग्निमित्रम्' (नाटक)।
* विशाखदत्त: 'मुद्राराक्षस', 'देवीचंद्रगुप्त' (नाटक)।
* शूद्रक: 'मृच्छकटिकम्' (नाटक)।
* चिकित्सा-शास्त्र:
* चरक: चिकित्सा-शास्त्र ग्रंथ।
* सुश्रुत: शल्य चिकित्सा संबंधी ग्रंथ।
* माधव: औषधिविज्ञान ग्रंथ।
* अंतरिक्ष विज्ञान और ज्योतिष:
* वराहमिहिर: 'वृहत्संहिता'।
* आर्यभट्ट: 'आर्यभट्टीयम'।
* लगधाचार्य: 'वेदांग ज्योतिष'।
* अन्य:
* सोमदेव: 'कथासरित्सागर'।
* कल्हण: 'राजतरंगिणी' (कश्मीर के इतिहास का विस्तृत विवरण)।
* जयदेव: 'गीतगोविंद' (संस्कृत साहित्य की सर्वोत्तम रचना)।
दक्षिण भारतीय साहित्य (तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम)
* तमिल साहित्य:
* सबसे प्राचीन द्रविड़ भाषा।
* संगम साहित्य: ईसा काल की आरंभिक चार शताब्दियों में रचा गया, विद्वानों की साहित्यिक सभाओं ('संगम') में संकलित।
* तिरुवल्लूवर: 'कुराल'।
* आठ संग्रहों में संकलित, जिन्हें 'एट्टूतोकोई' कहा जाता है।
* अन्य रचनाएँ: 'तोलक्कापियम' (व्याकरण एवं काव्य), 'सिलप्पदिकारम' एवं 'मणिमेकलई' (महाकाव्य)।
* छठी से बारहवीं सदी ईस्वी तक नयनार और आलवारों ने भक्ति आंदोलन चलाया और साहित्य रचा।
* 'कंब रामायणम्' और 'पेरिया पुराणम्' भी महान ग्रंथ हैं।
* तेलुगु साहित्य:
* विजयनगर शासन को स्वर्ण युग कहा जाता है।
* बुक्का प्रथम के राजकवि नावा सोमनाथ: 'उत्तरहरिवंशम्'।
* कृष्णदेवराय: 'अमुक्तमाल्यद'।
* अल्लसनी पेड्डना: 'मनुचरितम्' (इन्हें आंध्र कविता का पितामह कहा जाता है)।
* धूर्जती: 'कलाहस्तिस्वर महात्म्यम्' और 'कलाहस्तिस्वर शतकम्'।
* पिंगली सूराण: 'राघवपांडवियम्' और 'कलापुरानोदयम'।
* तेनाली रामकृष्ण: चुटकुले, 'पांडुरंग महात्म्यम्'।
* रामराजभूषण: 'वासुचरितम्'।
* कन्नड़ साहित्य:
* विजयनगर के शासकों ने संरक्षण दिया।
* अनेक जैन विद्वानों ने योगदान दिया (जैसे माधव का 'धर्मनाथ पुराण', उदित विलास का 'धर्मपरीक्षे')।
* रत्नत्रय (कन्नड़ कविता के जनक):
* पम्पा: 'आदिपुराण' और 'विक्रमार्जुन विजय'।
* पोन्ना: 'शांतिपुराण' एवं 'पुराण'।
* रन्ना: (राष्ट्रकूट राजा कृष्ण III के दरबार में)।
* अन्य: हरिश्वर का 'हरिश्चंद्र काव्य', सदभट्ट का 'जगन्नाथ विजय', मल्लिकार्जुन की 'सूक्तिसुधार्णव', केसीराजा की 'कन्नड़ भाषा की मानक कृतियाँ'।
* मलयालम साहित्य:
* उद्भव 11वीं शताब्दी में।
* प्रमुख साहित्यकार: राम पण्णिकर और रामानुजन एजुथाचन।
* महत्वपूर्ण कृतियाँ: 'उन्णुनीति संदेशम्' और 'कोकसंदेशम्'।
उत्तर भारतीय भाषाओं का विकास
* उर्दू को छोड़कर वर्तमान उत्तर भारतीय भाषाओं की सभी लिपियों का उद्गम प्राचीन ब्राह्मी लिपि है।
* हिंदी भाषा की बोलियाँ: ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मागधी, राजस्थानी और खड़ी बोली।
* सूरदास और बिहारी: ब्रज भाषा।
* तुलसीदास: 'रामचरितमानस' में अवधी।
* विद्यापति: मैथिली भाषा।
* आज की हिंदी खड़ी बोली है।
मुगल काल में साहित्य सृजन
* अकबर के समय:
* अबुल फजल: 'अकबरनामा' एवं 'आईन-ए-अकबरी'।
* 'पद्मावत', 'रामचरित मानस', 'सूरसागर' आदि ग्रंथों की रचना।
* अकबर ने संस्कृत में लिखे महाभारत का फारसी में अनुवाद करवाया।
* शाहजहाँ के काल:
* अब्दुल हमीद लाहौरी: 'बादशाहनामा'।
* उर्दू साहित्य: मुगल शासकों के अंतिम दिनों में विकास आरम्भ हुआ, जिसमें मिर्जा गालिब का महत्वपूर्ण योगदान रहा। फारसी भी न्यायिक कार्य की भाषा थी।
रीति काल और आधुनिक हिंदी
* रीति काल (मध्यकाल):
* क्षेत्रीय भाषाओं का विकास हुआ।
* चंदबरदाई: 'पृथ्वीराज रासो' (हिंदी साहित्य का महाकाव्य, पृथ्वीराज चौहान की जीवन-गाथा)।
* भक्ति आंदोलन में काव्य का रूप भक्तिमय हो गया (कबीर, सूरदास के कृष्णभक्ति के पद, रहीम और भूषण)।
* बिहारी: 'सतसई' (प्रेम और श्रृंगार का सुंदर वर्णन)।
* आधुनिक हिंदी:
* 18वीं सदी के अंत में विकास।
* राजा लक्ष्मण सिंह: 'शाकुंतलम' का हिंदी में अनुवाद।
* 19वीं सदी के आरंभ में हिंदी गद्य का विकास।
* भारतेंदु हरिश्चंद्र: हिंदी के आरंभिक गद्यकारों में से एक।
* बंकिमचंद्र चटर्जी: 'आनंद मठ' (बांग्ला उपन्यास, जिससे 'वंदेमातरम्' लिया गया)।
* प्रमुख साहित्यकार: जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह 'दिनकर', हरिवंशराय बच्चन।
बांग्ला, असमिया, उड़िया एवं पंजाबी साहित्य
* बांग्ला साहित्य:
* हिंदी के बाद सबसे समृद्ध साहित्य।
* श्रीरामपुर मिशन प्रेस (1800 ई.) और फोर्ट विलियम कॉलेज (1800 ई.) की स्थापना।
* विलियम केरे: बांग्ला का व्याकरण और अंग्रेजी-बांग्ला शब्दकोश।
* राजा राममोहनराय: अंग्रेजी के साथ बांग्ला में भी लिखा।
* रवींद्रनाथ टैगोर: 1913 में 'गीतांजलि' के लिए नोबेल पुरस्कार।
* असमिया साहित्य:
* आरंभिक असमिया साहित्य में बरोजी प्रमुख थे।
* शंकरदेव: वैष्णव संप्रदाय के कवि।
* लक्ष्मीकांत बेजबरुआ और पद्मनाभ गोसाई बरुआ का योगदान।
* ओड़िया साहित्य:
* फकीरमोहन सेनापति और राधानाथ रे उल्लेखनीय।
* उपेन्द्र भंजा: ओड़िया साहित्य में नए युग के जन्मदाता।
* सरलदास: ओड़िया भाषा में साहित्यिक काव्य की प्रथम कृति।
* पंजाबी साहित्य:
* प्रमुख लिपि: गुरुमुखी।
* गुरु नानक: पंजाबी के प्रथम कवि।
* गुरु गोविंद सिंह: फारसी और संस्कृत सीखी, पंजाबी में दो सवैयों की रचना।
* प्रेम कहानियाँ: हीर राँझा, सस्सी-पुन्नु, सोहनी महिवाल।
* बुल्लेशाह: सूफी संत, अनेक गीत लिखे ('कैफी')।
* वीर सिंह: 'राणा सूरतसिंह' (महाकाव्य)।
गुजराती, सिंधी, मराठी, कश्मीरी एवं अंग्रेजी साहित्य
* गुजराती साहित्य:
* नरसी मेहता: कृष्ण की प्रशंसा में भक्ति काव्य से मराठी को लोकप्रिय बनाया।
* चंद बर्दई: गुजराती साहित्य को नई ऊँचाई दी।
* गोवर्धन राम: 'सरस्वती चंद्र' (उपन्यास)।
* डॉ. के. एम. मुंशी: 'पृथ्वीवल्लभ' (उपन्यासकार, नाटककार, इतिहासकार)।
* सिंधी साहित्य:
* सिंध सूफियों का महत्वपूर्ण केंद्र था।
* मिर्जा कलिच बेग और दीवान कौरामल ने साहित्य सृजन में प्रमुख कार्य किया।
* मराठी साहित्य:
* संत ज्ञानेश्वर: 13वीं शताब्दी में मराठी कविता और गद्य की रचना की, भगवद्गीता पर दीर्घ टीका लिखी।
* नामदेव, गोरा सेना, जनाबाई: मराठी में गीत गाए।
* एकनाथ: रामायण और भागवत पुराण पर टीकाएँ लिखीं।
* तुकाराम: श्रेष्ठ भक्त कवि।
* शिवाजी के गुरु रामदास: रचनाकार।
* बाल गंगाधर तिलक: 'केसरी' (मराठी पत्र)।
* एच.जी. सालगांवकर: प्रेरक काव्य रचना के लिए जाने जाते हैं।
* कश्मीरी साहित्य:
* लालदेवी: 14वीं सदी की श्रेष्ठ कवयित्री।
* अन्य: हब्बा खातून, जिंदाकौल, नंद ऋषि, अवार मोहिउद्दीन, गुलाम मोहम्मद, दीनानाथ नदीम।
* डोगरा शासक कश्मीरी की अपेक्षा डोगरी भाषा को अधिक अहमियत देते थे।
* अंग्रेजी साहित्य (भारत में):
* अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम बनने के बाद भारतीयों ने 19वीं शताब्दी के बाद अंग्रेजी में लिखना आरंभ किया।
* प्रमुख लेखक: मधुसूदन दत्ता, तारादत्ता, सरोजिनी नायडू।
राजस्थान में भाषा और साहित्य की प्रगति
* भाषाएँ: प्राचीन काल में संस्कृत एवं प्राकृत भाषाओं का प्रचलन, बाद में अपभ्रंश, राजस्थानी, हिंदी, फारसी आदि में भी कृतियाँ रची गईं।
* सरकारी अभिलेखों और सिक्कों में संस्कृत और स्थानीय भाषा का प्रयोग होता था।
* इन ग्रंथों में राजस्थान की तत्कालीन धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी मिलती है।
राजस्थानी भाषा एवं प्रमुख बोलियाँ
* सामूहिक नाम: 'राजस्थानी'।
* प्रमुख बोलियाँ:
* मारवाड़ी: जोधपुर, पाली, बीकानेर, नागौर, सिरोही, जैसलमेर।
* मेवाड़ी: उदयपुर, राजसमन्द, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा। (कुंभा की 'कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति' में मेवाड़ी का प्रयोग)।
* वागड़ी: डूंगरपुर और बांसवाड़ा।
* ढूंढाड़ी: जयपुर, टोंक, अजमेर, किशनगढ़। (दादू पंथ का साहित्य इसी में लिखा है)।
* मेवाती: भरतपुर, धौलपुर, करौली के पूर्वी भाग और अलवर।
* हाड़ौती: कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां।
* मालवी: प्रतापगढ़ के कुछ क्षेत्रों में।
राजस्थान का ऐतिहासिक साहित्य
* संस्कृत, राजस्थानी, हिंदी, फारसी आदि भाषाओं में रचा गया।
* संस्कृत साहित्य:
* नयनचंद्र सूरि: 'हम्मीर महाकाव्य' (रणथंभौर के चौहान वंश और अलाउद्दीन के आक्रमण का वर्णन)।
* जयानक: 'पृथ्वीराज विजय' (अजमेर और चौहानों का इतिहास)।
* मंडन: 'राजवल्लभ' (महाराणा कुंभा के समय वास्तु-संबंधी जानकारी)।
* भट्ट सदाशिव: 'राजविनोद' (बीकानेर के महाराजा कल्याणमल के समय की सैनिक, सामाजिक, आर्थिक जानकारी)।
* पं. जीवाधर: 'अमरसार' (महाराणा प्रताप और अमरसिंह की जानकारी)।
* रणछोड़ भट्ट: 'अमरकाव्य वंशावली'।
* चारण साहित्य:
* चारण जाति के साहित्यकारों द्वारा रचित।
* वीर एवं श्रृंगार रस की प्रधानता।
* गीत, दोहा, सोरठा आदि रूपों में उपलब्ध।
* प्रबंध काव्य: 'वेलि क्रिसन रुकमणी री', 'पृथ्वीराज रासो'।
* गीत-कृतियाँ: हरदास, लाखो, बारहठ, चौहथ।
* प्रसिद्ध रचनाएँ: 'माकरा दूहा', 'ठाकुरजी रा दूहा', 'गंगाजी रा दूहा', 'राजिया रा सोरठा', 'गजसिंह रा झूलणा'।
* संत साहित्य:
* राजस्थानी साहित्य को समृद्ध बनाया और जनमानस को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
* संतों ने अपने विचारों को वाणी और भजनों द्वारा प्रचारित किया।
* प्रमुख संत: दादू, मीरां, जसनाथ, सुंदरदास, जांभोजी, पीपा।
* मीराबाई के भजन राजस्थानी भाषा में विशिष्ट स्थान रखते हैं।
* दादू ने निर्गुण ब्रह्म की चर्चा की। प्रमुख शिष्यों में रज्जब।
* रामस्नेही संप्रदाय में रामचरणजी, हरिरामजी, दरियावजी आदि कवि हुए।
* जैन साहित्य:
* जैन मत के विचारों के अतिरिक्त अन्य विषयों का भी समावेश।
* गद्य एवं पद्य दोनों में मिलता है।
* आचार्य हरिभद्र सूरि: 'धूर्ताख्यान' (चित्तौड़ में जन्मे)।
* उद्योतन सूरि: 'कुवलयमाला'।
* सिद्धर्षि: 'प्रपंचकथा'।
* राजस्थानी साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियाँ:
* कवि पद्मनाभ: 'कान्हड़दे प्रबंध' (अलाउद्दीन खिलजी के जालौर आक्रमण, कान्हड़दे और अलाउद्दीन के संघर्ष का वर्णन)।
* बीठू सूजा: 'राव जैतसी रो छंद' (कामरान के भटनेर किले पर आक्रमण का वर्णन)।
* सूर्यमल मिश्रण: 'वंश भास्कर' (बूंदी के इतिहास और राजस्थान पर हुए विभिन्न आक्रमणों का वर्णन)।
* करणीदान: 'सूरज प्रकाश' (जोधपुर के अभयसिंह के दरबारी कवि, मुगलों से संबंधों पर प्रकाश)।
* वीरभाण: 'राज रूपक'।
* पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल): 'वेलि क्रिसन रुकमणी री' (अकबर के काल में रचित भक्ति रस प्रधान ग्रंथ, तत्कालीन रहन-सहन, रीति-रिवाज, वेशभूषा का चित्रण)।
* केशवदास: 'गुण रूपक' (जोधपुर के गजसिंह के समय)।
* ख्यातें एवं वात:
* ख्यात साहित्य: ख्याति अर्थात् प्रसिद्धि का साहित्य।
* वात साहित्य: लोकप्रिय बातों का साहित्य।
* मुहणोत नैणसी: 'नैणसी री ख्यात' (मालवा, उदयपुर, प्रतापगढ़, जोधपुर आदि राज्यों का इतिहास)।
* मुहणोत नैणसी: 'मारवाड़ रा परगना री विगत' (मारवाड़ के शहरों, आबादी, रहन-सहन, आर्थिक व्यवस्था पर प्रकाश)।
* बांकीदास: 'बांकीदास री ख्यात'।
* दयालदास सिवायच: 'बीकानर रेत ख्यात' (बीकानेर के इतिहास पर प्रकाश)।
* फारसी साहित्य (राजस्थान के संदर्भ में):
* मध्ययुगीन घटनाओं की जानकारी का महत्वपूर्ण स्रोत।
* हजरत अमीर खुसरो: 'तारीख-ए-अलाई', 'खजाइनुल फुतूह' (अलाउद्दीन खिलजी की नीतियों और रणथंभौर विजय की जानकारी)।
* बाबर: 'बाबरनामा' (तुर्की भाषा में लिखित आत्मकथा, खानवा के युद्ध और राणा सांगा से संबंधों का वर्णन)।
* गुलबदन बेगम: 'हुमायूँनामा' (मारवाड़ और मेवाड़ के शासकों के मुगलों से संबंधों की जानकारी)।
* अबुल फजल: 'अकबरनामा' तथा 'आईन-ए-अकबरी'
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