कक्षा दसवीं भारतीय संस्कृति और विरासत अध्याय 4: धर्म और दर्शन पाठ के नोट्स


युगयुगीन भारतीय धर्म और दर्शन
भारत की सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है, जो धर्म पर आधारित है। धर्म मानव का स्वाभाविक गुण है और यह प्रेम, क्षमा, धैर्य आदि उच्च भावनाओं का विकास करता है। भारत में धर्म और दर्शन का संबंध बहुत गहरा है, और दोनों ने प्राचीन काल से ही लोगों को प्रभावित किया है।
 * धर्म की परिभाषा:
   * धर्म एक व्यापक शब्द है जो किसी जाति या समाज के इतिहास, संस्कृति, आचार-विचार, रीति-रिवाज और जीवन प्रणाली का निर्देशन करता है।
   * डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार, धर्म ही जीवन की शक्ति है।
   * 'धर्म' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'धारण करना'। इसका तात्पर्य उस नियम से है जिसने संसार को धारण कर रखा है।
 * दर्शन और आत्मा:
   * भारतीय आध्यात्मिकता और दर्शन की जड़ें प्राचीन परंपराओं में गहरी हैं।
   * दर्शन का जन्म जीवन के रहस्य और अस्तित्व की खोज से हुआ।
   * ऋषियों ने इंद्रियों से परे जाकर योग जैसी तकनीकें विकसित कीं।
   * दार्शनिकों का मानना है कि मनुष्य केवल शरीर या मन नहीं, बल्कि एक अमर, शाश्वत और पवित्र चेतना है, जिसे उन्होंने आत्मा कहा। यही ज्ञान और शक्ति का स्रोत है।
   * दर्शन सत्य को दिखलाता है (सिद्धांत), और धर्म जीवन की सही दृष्टि (अभ्यास) देता है। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं।
सैंधव-सरस्वती धर्म
सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोगों की गहरी धार्मिक मान्यताएँ थीं, जिनकी जानकारी उनकी कला शैलियों, मुद्राओं, बर्तनों और कब्रों से मिलती है।
 * प्रमुख पूज्य:
   * तीन मुख वाले योगी (पशुपति शिव): पुरातात्विक खोजों से पता चला है कि वे एक तीन मुख वाले योगी की पूजा करते थे, जो योग मुद्रा में बैठा है और जिसके बराबर में हाथी, चीता, गैंडा और भैंसा हैं। संभवतः वे शिव को योगीश्वर के रूप में पूजते थे।
   * मातृदेवी/प्रकृति देवी: खुदाई में बहुत सी नारी मूर्तियाँ मिली हैं, जो मातृदेवी या प्रकृति देवी की हो सकती हैं। ये जननी रूप में भी दर्शाई गई हैं, और लोग तेल व धूप जलाकर इनकी आराधना करते थे।
 * प्रकृति पूजा:
   * मुद्राओं पर वृक्षों (पीपल, तुलसी, नीम, खजूर, बबूल) और पशुओं (हिरण, हाथी, बाघ, भैंस, बकरी, गैंडा, ऊँट, घड़ियाल, गिलहरी, तोता, मुर्गा, मोर) के चित्र मिले हैं, जिससे वृक्ष और पशु पूजा का अनुमान लगाया जाता है। बैलों को प्रमुखता दी जाती थी।
 * अग्नि और जल पूजा: खुदाई में यज्ञ भूमि मिली है, जिससे अग्नि पूजा का अनुमान है। पवित्र स्नान के लिए कुंड और तालाब बने होते थे, और सैंधव लोग इन्हें जल देवता का मानते थे।
 * प्रतीक पूजा: सींग, स्तम्भ, स्वास्तिक जैसे प्रतीकों की पूजा भी प्रचलित थी। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए योग साधना पर बल दिया जाता था।
वैदिक धर्म
 * वेद: 'विद्' धातु से बना है, जिसका अर्थ ज्ञान है। चार वेद हैं:
   * ऋग्वेद: सबसे प्राचीन, विविध देवताओं की स्तुति।
   * यजुर्वेद: यज्ञों का वर्णन।
   * सामवेद: मंत्रों का संकलन।
   * अथर्ववेद: भूत-प्रेत, जादू-टोने के मंत्र।
 * देवता: ऋग्वेद में 33 कोटि (प्रकार) देवी-देवताओं का उल्लेख है, जिन्हें तीन वर्गों में बांटा गया है:
   * आकाश के देवता: द्यौस, वरुण, मित्र, सूर्य, सविता, उषा, अदिति, अश्विन।
   * अन्तरिक्ष के देवता: इंद्र, मरुत, वात।
   * पृथ्वी के देवता: पृथ्वी, अग्नि, सोम, बृहस्पति, सरस्वती।
 * उत्तर वैदिक काल: ऋग्वेद के बाद का युग। इसमें बहुदेववाद (शिव, विष्णु, ब्रह्मा, पार्वती, दुर्गा, गणेश की प्रधानता), यज्ञवाद और मंत्र शक्ति का विकास हुआ।
वैष्णव और शैव धर्म
 * वैष्णव धर्म:
   * विष्णु को समस्त विश्व का रक्षक माना गया है।
   * सूर्य का नाम भी विष्णु है (निरुक्त के अनुसार)।
   * 'एकांतिक' धर्म के रूप में उदय हुआ, जो हरि में एकाग्र भाव की भक्ति पर आधारित था।
   * पूजा पद्धति 'सात्वत विधि' कहलाती थी, जिसके प्रधान अंग भक्ति, आत्मसमर्पण और अहिंसा थे।
   * वासुदेव-कृष्ण ने इसका प्रचार किया, इसलिए इसे 'वासुदेव धर्म' भी कहा जाने लगा।
   * बाद में 'भागवत धर्म' के रूप में प्रचलित हुआ।
 * शैव धर्म:
   * उत्पत्ति अति प्राचीन है। सिंधु सभ्यता, ऋग्वेद और उत्तर वैदिक काल में शिव की आराधना होती रही थी।
   * शिव की परिकल्पना में संस्कृति के विकास के कई आयाम समाए हुए हैं।
   * अनेक संप्रदाय बने: पाशुपत शैव धर्म, कापालिक, कालमुख, वीर शैव आदि।
   * शैव सिद्धान्त सम्प्रदाय का प्रचार मुख्य रूप से दक्षिण के तमिल प्रदेशों में हुआ।
वैदिक दर्शन (षड्दर्शन)
वैदिक दर्शन में छह दार्शनिक संप्रदायों का उद्भव हुआ, जिन्हें षड्दर्शन कहते हैं। ये सभी आस्तिक दर्शन कहलाते हैं क्योंकि ये वेदों के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं।
 * सांख्य दर्शन:
   * प्रवर्तक: कपिल मुनि (सांख्य सूत्र)।
   * मान्यता: सृष्टि और परम सत्ता पुरुष और प्रकृति से बनी है। ये दोनों परस्पर स्वतंत्र और निरपेक्ष हैं। सभी वस्तुओं में परिवर्तन होते हैं।
 * योग दर्शन:
   * मूल ग्रंथ: पतंजलि का योगसूत्र।
   * अर्थ: 'मेल', अर्थात दो मूल तत्वों का मेल।
   * उद्देश्य: मानसिक क्रियाओं की शुद्धि, नियंत्रण और परिवर्तन के माध्यम से पुरुष को प्रकृति से स्वतंत्र करना।
   * अष्टांग योग: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। ईश्वर को गुरु और शिक्षक बताया गया है।
 * न्याय दर्शन:
   * रचयिता: गौतम ऋषि।
   * मान्यता: ईश्वर सृष्टि का रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है।
   * केंद्र बिंदु: तर्कपूर्ण रीति पर आधारित, सही व यथार्थ ज्ञान को महत्व।
 * वैशेषिक दर्शन:
   * मूल ग्रंथ: कणाद द्वारा लिखित।
   * मान्यता: सृष्टि की रचना आजीवक सिद्धांत पर आधारित। यथार्थ तथा वस्तुनिष्ठ पर बल।
   * संसार की वस्तुएँ पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) से बनी हैं। पदार्थ के छह वर्ग: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय।
 * मीमांसा दर्शन:
   * मूल ग्रंथ: जैमिनि द्वारा रचित सूत्र।
   * मान्यता: धर्म, कर्म के फल का आधार है। वेद के कर्मकाण्डीय यज्ञों पर बल देता है।
   * वेद शाश्वत हैं और इसमें सम्पूर्ण ज्ञान समाहित है। यहाँ धर्म का अर्थ मोक्ष है।
 * वेदान्त दर्शन:
   * प्रवर्तक: शंकराचार्य (अद्वैत वेदान्त)।
   * 'वेदांत' का अर्थ वेदों का अंतिम भाग (उपनिषद) का दर्शन।
   * अद्वैतवाद: 'द्वैत को नकारना' अर्थात एक परम सत्ता में विश्वास। ब्रह्म सत्य है, जगत असत्य है। ब्रह्म और आत्मा में कोई अंतर नहीं है। ब्रह्म अपरिवर्तनशील और अंतिम ज्ञान है।
   * वेदांत एक दर्शन और एक धर्म दोनों है, जो सत्य का प्रतिपादन करता है। यह विवेक द्वारा संचालित गतिविधियों पर बल देता है।
जैन दर्शन
 * ईश्वर की मान्यता नहीं: जैन दर्शन ईश्वर को सृष्टि का कारण नहीं मानता। विश्व अनादिकाल से विद्यमान और शाश्वत है।
 * तीर्थंकर: जैन परम्परा के अनुसार 24 तीर्थंकर हुए, जिन्होंने जैन दर्शन का विकास किया।
   * महावीर स्वामी: 24वें तीर्थंकर, जिनका जन्म 599 ई.पू. में हुआ। 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर 83 दिन की घोर तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त किया।
 * संसार की रचना: महावीर स्वामी के अनुसार संसार 6 द्रव्यों (जीव, पुद्गल-भौतिक तत्व, धर्म, अधर्म, आकाश, काल) से निर्मित है।
 * आत्मा की सर्वव्यापकता: आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी असीम नहीं है, और जीव-जंतु, पेड़-पौधे में भी आत्मा है।
 * ज्ञान के स्रोत: प्रत्यक्ष, अनुमान तथा तीर्थंकरों के उपदेश।
 * स्यादवाद (अनेकांतवाद): ज्ञान विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है (है, नहीं है, है और नहीं है, कहा नहीं जा सकता आदि)। यह ज्ञान की सापेक्षता को दर्शाता है।
 * लक्ष्य: निर्वाण (मोक्ष)। यह कर्मफल का नाश और आत्मा से भौतिक तत्व को हटाने से संभव है।
बौद्ध दर्शन
 * संस्थापक: गौतम बुद्ध (बचपन का नाम सिद्धार्थ)। जन्म 563 ई.पू. नेपाल की तराई में लुम्बिनी गाँव में। 29 वर्ष की आयु में गृहत्याग कर बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए।
 * त्रिपिटक: बुद्ध की मृत्यु के बाद उपाली द्वारा संकलित:
   * विनयपिटक: नियम।
   * सुत्तपिटक: उपदेश।
   * अभिधम्म पिटक: बौद्ध दर्शन।
 * चार आर्य सत्य (मूलाधार):
   * दुःख: संसार में दुःख है।
   * दुःख समुदय: दुःख का कारण है (तृष्णा)।
   * दुःख निरोध: दुःख का निवारण संभव है।
   * अष्टांगिक मार्ग: दुःख निरोध का उपाय।
 * अष्टांगिक मार्ग (दुःखों से मुक्ति पाने के लिए): सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् चरित्र, सम्यक् आजीविका, सम्यक् प्रयत्न, सम्यक् विचार, सम्यक् ज्ञान।
 * प्रतीत्य समुत्पाद: दुःख का कारण जन्म है, और जन्म का कारण अज्ञान रूपी कर्मफल उत्पन्न करने वाला चक्र है। यह "इसके होने से यह उत्पन्न होता है" सिद्धांत पर आधारित 12 क्रमों का चक्र है (जैसे अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम-रूप)।
 * नैतिक जीवन: बौद्ध धर्म सदाचार और नैतिक जीवन पर बल देता है। दस शीलों का अनुशीलन नैतिक जीवन का आधार है: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, व्यभिचार न करना, नशा न करना, असमय भोजन न करना, सुखप्रद बिस्तर का त्याग, धन संचय न करना, स्त्रियों का संसर्ग न करना, नृत्य-गान का त्याग।
भक्ति आंदोलन
मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव। यह एक मौन क्रांति थी, जो समाज में भगवान की भक्ति का प्रचार-प्रसार करती थी।
 * आरंभ: दक्षिण भारत में आलवारों और नायनारों से हुआ, जो बाद में उत्तर भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में फैल गया।
 * प्रमुख विचारक: शंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम आदि।
 * भक्ति आंदोलन के कारण:
   * समन्वय की प्रेरणा।
   * ब्राह्मणवाद का बौद्धिक सिद्धांत।
   * मुस्लिम आक्रमण।
   * वर्ण व्यवस्था की कठोरता।
   * ईसाई धर्म और इस्लाम का प्रभाव।
   * दिल्ली सल्तनत द्वारा धर्म राज्य का विचार।
   * सूफी संतों का योगदान।
   * हिन्दू धर्म सुधारकों का योगदान।
 * प्रमुख संत:
   * रामानुजाचार्य: भक्ति आंदोलन के जन्मदाता। शंकराचार्य के अद्वैतवाद में संशोधन कर विशिष्टाद्वैतवाद की स्थापना की। सगुण भक्ति धारा के प्रवर्तक थे।
   * निम्बार्काचार्य: कृष्ण भक्ति का प्रचार किया। द्वैतवाद और अद्वैतवाद दोनों को मानते थे (द्वैताद्वैतवाद)। सलेमाबाद (अजमेर) में प्रधान पीठ।
   * मध्वाचार्य: विष्णु उपासक। वेदान्त के निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर विष्णु की प्रतिष्ठा की। द्वैतवाद में विश्वास रखते थे।
   * रामानन्द: भक्तिमार्ग को लोकप्रिय बनाया। श्रीराम को जननायक बनाने का श्रेय। निर्गुण व सगुण दोनों भक्तिधारा के समर्थक। 'रामावत सम्प्रदाय' की स्थापना की। जाति, वर्ग, लिंग भेद से रहित समानता पर आधारित भक्ति व्यवस्था का सूत्रपात किया।
   * वल्लभाचार्य: कृष्ण भक्ति के आचार्य। पुष्टिमार्ग की स्थापना की। श्री कृष्ण को परब्रह्म माना। इनके प्रिय शिष्य सूरदास थे। इनका मत शुद्धाद्वैतवाद कहलाता है।
   * चैतन्य महाप्रभु: बंगाल के ब्राह्मण परिवार में जन्मे। कृष्ण भक्ति का कीर्तन द्वारा प्रचार किया।
   * नामदेव: महाराष्ट्र के भावुक संत। इनकी रचनाएँ मराठी और हिंदी दोनों में मिलती हैं। कबीर के निर्गुणी विचारों और गुरुनानक की भावपूर्ण रचनाओं से प्रभावित थे। गुरुग्रंथ साहिब में इनके 61 पद संग्रहित हैं।
   * कबीर: रामानन्द के समकालीन महान् संत। जुलाहा दम्पत्ति नीरू-नीमा द्वारा पाले गए। भक्ति साधना में वेद, शास्त्र, ज्ञान, तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा की आवश्यकता नहीं मानी। दृष्टिकोण समन्वयवादी था।
   * गुरु नानक: सिक्खों के प्रथम गुरु। एकेश्वरवादी और अवतारवाद के विरोधी। समाज में व्याप्त कुप्रथाओं के घोर विरोधी थे। उनके विचारों को 'शब्द' तथा 'गुरु ग्रंथ साहिब' में शामिल किया गया।
   * मीरा बाई: कृष्ण को समर्पित भक्ति। कृष्ण को आजीवन अपना पति माना। उनके गीतों में कृष्ण के प्रति अपार प्रेम व्यक्त हुआ है।
सूफी आंदोलन
इस्लाम का उदय: इस्लाम धर्म की स्थापना पैगंबर मुहम्मद साहब द्वारा की गई, जो कुरान की व्याख्या पर आधारित है।
 * प्रमुख संप्रदाय: सुन्नी और शिया।
   * सुन्नी: मुहम्मद के कार्यों का अनुसरण करते हैं।
   * शिया: मुहम्मद साहब के दामाद अली को वास्तविक उत्तराधिकारी मानते हैं।
 * खलीफा: मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी खलीफा कहलाए (अबू बक्र, उमर, उस्मान, अली)।
सूफी संप्रदाय: मुसलमानों के पीर व औलियाओं का संप्रदाय। संसार के सभी सुखों को त्याग कर एकाग्र चित्त से अल्लाह की इबादत में लीन हो जाना।
 * उत्पत्ति:
   * ग्रीक शब्द 'सोफिया' (ज्ञान) से।
   * मदीना में मुहम्मद साहब की मस्जिद के बाहर 'सूफा' (चबूतरे) पर आध्यात्मिक शरण लेने वाले।
   * 'सूफ' (ऊन-कंबल) ओढ़कर प्रचार करने वाले।
 * भारत में सूफी मत:
   * 11वीं और 12वीं शताब्दी में आगमन।
   * अल हुजवादी (दाता गंज बख्श) प्रमुख सूफी थे।
   * मुख्य केंद्र: मुल्तान और पंजाब, बाद में कश्मीर, बिहार, बंगाल, दक्षिण में फैले।
   * जगह-जगह खानकाहों की स्थापना हुई।
 * प्रमुख सूफी संप्रदाय (सिलसिले):
   * भारत में अनेक सूफी संप्रदाय हैं, जिनमें चिश्तिया, सुहरवर्दिया, कादिरिया, नक्शबंदिया प्रमुख हैं।
   * चिश्ती सिलसिला: भारत में स्थापना का श्रेय ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को।
     * जन्म 1141 ई. में ईरान के सिस्तान में। अजमेर को स्थायी ठिकाना बनाया (मृत्यु 1236 ई.)।
     * मोहम्मद गौरी ने 'सुल्तान-उल-हिन्द' की उपाधि दी।
     * यह स्थान धार्मिक समन्वय का केंद्र बन गया।
     * प्रमुख शिष्य: शेख हमीबुद्दीन (नागौर) और कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (दिल्ली)।
     * अन्य उल्लेखनीय संत: सलीम चिश्ती (फतेहपुर सीकरी में अकबर के पुत्र सलीम के जन्म से जुड़े)।
     * फरीउद्दीन मसूद शकरगंज: (1175-1265 ई.) बलबन के समकालीन, बाबा फरीद नाम से प्रसिद्ध। कुतुबुद्दीन के शिष्य।
     * शेख निजामुद्दीन औलिया: (1236-1325 ई.) बाबा फरीद के शिष्य। दिल्ली में 60 वर्षों तक सात सुल्तानों का शासन देखा।
राजस्थान में धर्म और दर्शन
राजस्थान का जनजीवन धार्मिक एवं दार्शनिक मान्यताओं और आस्थाओं से रचा-बसा है, जो इसके अतीत के सांस्कृतिक इतिहास और वीर पूजा की भावनाओं से जन्मी है।
 * धार्मिक परंपराएँ: वेदकालीन यज्ञ, त्याग, सोलह संस्कार, चार आश्रम और पुरुषार्थी मान्यताओं पर आधारित।
 * अवतारवाद: दस अवतारों की मान्यता में रामलीला, रासलीला और कृष्ण के प्रति श्रद्धा ने योगदान दिया।
 * निर्गुण भक्ति: निर्गुण भक्ति की ज्ञान शाखा के प्रसार से संत संप्रदाय विकसित हुए।
 * विभिन्न धर्मों का प्रभाव: पड़ोसी क्षेत्रों की धार्मिक परम्पराओं और आंदोलनों का प्रभाव पड़ा, जिससे अनेकों दर्शन और धर्मों ने राजस्थान की धरती पर अपनी छाप छोड़ी।
राजस्थान में विभिन्न संप्रदाय
सनातन परंपरा विविध धार्मिक मान्यताओं से युक्त एक इंद्रधनुषी सांस्कृतिक धारा है। लोक धर्म से तात्पर्य उन धर्मों और दर्शनों से है जो इस भूमि में पैदा हुए और विकसित हुए।
 * वैष्णव पंथ:
   * रामानंदी सम्प्रदाय: रामानुज संप्रदाय की एक गद्दी जयपुर में गलता जी में है। रामानुज के शिष्य रामानन्द के अनुयायी राम की भक्ति और रामलीलाओं में विश्वास करते हैं।
   * वल्लभाचार्य सम्प्रदाय (पुष्टिमार्ग): राजस्थान में कृष्ण भक्ति परंपरा पुरानी है। वल्लभाचार्य के आराध्य श्रीनाथ जी का स्थान सिहाड़ (नाथद्वारा) में स्थापित है। इस संप्रदाय में बालभाव की उपासना पर विशेष बल दिया जाता है। मुख्य पीठें कोटा (मधुरेश जी), नाथद्वारा (श्रीनाथ जी), कांकरोली (द्वारिकाधीश जी), गोकुल (गोकुलचंद्र जी) आदि में हैं।
   * निम्बार्क संप्रदाय: आचार्य निम्बार्क का प्रमुख संप्रदाय, जिसकी प्रमुख पीठ अजमेर के पास सलेमाबाद में है। इसमें राधा को कृष्ण की प्रेमिका मानकर युगल स्वरूप की पूजा की जाती है।
   * गौड़ीय सम्प्रदाय: चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित। अकबर के काल में इसका प्रसार बढ़ा। जयपुर के राजा मानसिंह प्रथम ने राधा गोविंद देव मंदिर बनवाया, और सवाई जयसिंह ने इसे राजमहलों में स्थापित किया।
 * निर्गुण संप्रदाय: निर्गुण भक्ति या ज्ञान मार्ग की बेल राजस्थान की मिट्टी से ही उपजी।
   * विश्नोई संप्रदाय: जांभोजी द्वारा स्थापित (जन्म नागौर के पास पीपासर, वि.सं. 1508)। 29 उपदेशों के कारण 'विश्नोई' कहलाए। सत्य, सदाचार, निर्गुण निराकार की भक्ति, जीव रक्षा और जाति-पाति के भेद की अमान्यता पर बल। यह संप्रदाय वृक्ष व जीव की रक्षा के लिए प्राणों तक को न्यौछावर करने के लिए प्रसिद्ध है।
   * दादू सम्प्रदाय: दादू जी ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश दिया। मूर्तिपूजा, भेदभाव, आडंबर का विरोध तथा ज्ञान मार्ग व गुरु की महत्ता पर बल दिया। प्रमुख पीठ सांभर के पास नरेना ग्राम में है।
   * जसनाथी संप्रदाय: नाथ पंथ से प्रभावित, जसनाथ जी द्वारा स्थापित (जाट वंश में जन्मे)। 36 नियमों की आचार संहिता है। अनुयायी गले में काली धागा बांधते हैं और भूगर्भ समाधि लेते हैं।
   * रामस्नेही संप्रदाय: चार प्रमुख शाखाएँ हैं: सिंहथल (हरिरामदास जी), खेड़ापा (रामदास जी), रैण (दरियाव जी), शाहपुरा (रामचरण जी)। वैराग्य, सद्गुरु से दीक्षा, शुद्ध आचार व साधना द्वारा मुक्ति प्राप्ति मुख्य लक्ष्य है।
 * अन्य लोक धर्म: लालदासी संप्रदाय, परनामी संप्रदाय, निरंजनी संप्रदाय, आर्य समाज आदि।
राजस्थान के लोक देवता
मानव आदिकाल से चमत्कारपूर्ण कार्यों के लिए महापुरुषों को लोक देवता के रूप में पूजता रहा है। ये हाड़-मांस के मानव होते हुए भी समाज को प्रेरणा देते हैं।
 * गोगा जी:
   * राजपूतों के चौहान वंश के। जन्म 15वीं शताब्दी में ददरेवा गाँव में (जिसे पहले शीशमेड़ी कहते थे)।
   * समाधि गोगामेड़ी गाँव (नोहर से 10 किमी दूर) में। भाद्रपद की नवमी को मेला भरता है।
   * सांपों के देवता के रूप में पूजे जाते हैं, क्योंकि उन्होंने सांपों से किसी किसान की मदद की थी।
   * मान्यता राजस्थान के अलावा हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश में भी फैली है।
   * खेजड़ी के पेड़ और उनकी छड़ी की पूजा होती है। हिन्दू और मुसलमान दोनों पूजते हैं।
 * तेजाजी:
   * 12वीं शताब्दी के ऐतिहासिक पुरुष, सांपों के देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
   * मारवाड़ व अजमेर संभाग में लोकप्रिय। जाटों के आराध्य देव।
   * परम गौरक्षक, गायों के मुक्तिदाता, काला और बाला के देवता तथा कृषि कार्यों के उपकारक।
   * लाछा गूजरी की गायों को मेवों से छुड़वाते हुए प्राण त्याग दिए थे।
   * याद में ब्यावर के तेजा चौक में भाद्रपद सुदी दशमी (तेजा दशमी) को मेला भरता है।
 * पाबू जी:
   * 14वीं शताब्दी में राठौड़ जाति में जन्म, फलौदी गाँव (कोलू मंड) में।
   * ऊँटों के देवता, रक्षक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। इनका चिह्न भाला है।
   * देवल बाई चारणी की गायों को छुड़ाते समय वीर गति को प्राप्त हुए।
   * जीवन चरित्र पर ग्रंथ 'पाबू प्रकाश' आसिया मोड जी ने लिखा। मेला प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को कोलू मंड (जोधपुर) में भरता है।
 * रामदेव जी:
   * गुरु बालीनाथ जी। जन्म पोकरण कस्बे के निवासी अजमाल नामक तेंवर राजपूत घर में।
   * विष्णु का अवतार माने जाते हैं। लोकदेवता और कवि, जिन्होंने 'चौबीस वाणियाँ' नामक रचना की।
   * साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक।
   * मेला जैसलमेर जिले के रामदेवरा (रुणेचा) में भाद्रपद शुक्ला द्वितीया से एकादशी तक भरता है। कामड़ जाति की महिलाएँ तेरहताली नृत्य करती हैं।
 * देवनारायण जी:
   * जन्म गोठां दड़ावतां (आसींद, भीलवाड़ा) में लगभग 1243 ई. में। बचपन का नाम उदयसिंह था।
   * आयुर्वेद के ज्ञाता और गुर्जर समाज के देवता हैं।
   * अन्य धाम: देवधाम जोधपुरिया (टोंक), देवमाली (अजमेर), देव डूंगरी (चित्तौड़गढ़)।
   * मेला भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को भरता है।
 * अन्य लोकप्रिय देवता: हड़बू जी, मेहाजी मांगलिया, वीर कल्लाजी, मल्लीनाथ जी, तल्लीनाथ जी और इलोजी आदि।
राजस्थान की लोक देवियाँ
राजस्थान में लोक देवताओं के साथ-साथ लोक देवियों का भी प्रमुख स्थान है। अधिकांश देवियाँ किसी न किसी समाज की कुलदेवियाँ भी हैं।
 * करणीमाता:
   * चूहों की देवी के नाम से मशहूर। मंदिर देशनोक (बीकानेर) में।
   * बचपन का नाम 'रिदबाई'। राव राजा जैतसिंह ने मंदिर की स्थापना की।
   * मेला प्रतिवर्ष चैत्र व आश्विन नवरात्रों में भरता है।
 * कैला देवी:
   * मंदिर करौली जिले में। करौली के यदुवंश की कुलदेवी।
   * मेला प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल अष्टमी को भरता है, जहाँ लांगुरिया नृत्य व गीत गाया जाता है।
 * जीणमाता:
   * चौहानों की कुलदेवी और शेखावटी क्षेत्र की लोकदेवी।
   * मधुमक्खियों की देवी के नाम से भी जाना जाता है।
   * मंदिर हर्ष की पहाड़ी (रेवासा-सीकर) पर पृथ्वीराज चौहान प्रथम के समय हट्टड़ द्वारा बनवाया गया। प्रतिवर्ष चैत्र व आश्विन के नवरात्रों में मेला लगता है।
 * अन्य प्रमुख देवियाँ: आमजा माता (बिलाड़ा-जोधपुर), शाकम्भरी माता (उदयपुरवाटी-झुंझुनूं), त्रिपुर सुंदरी (तलवाड़ा-बाँसवाड़ा), आशापुरा माता (सोनगरा चौहानों की कुलदेवी), जिलाड़ी माता (बहरोड़), नारायणी माता (बरवा डूंगरी), तनोट माता (थार की वैष्णों देवी/सेना की देवी), आवड़ माता, स्वांगिया माता, चौथमाता, ब्रह्माणी माता और दधिमति माता।
 * लोक संत महिलाएँ: रानाबाई, मीराबाई, कर्माबाई, भूरीबाई, गवरी बाई आदि।

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