3-अ. युग-युगीन भारतीय समाज
भारतीय सामाजिक संरचना बहुत प्राचीन है और इसने व्यक्ति के विकास तथा समाज की समृद्धि में मदद की है।
* परिवार का महत्व:
* मानव जीवन जन्म से मृत्यु तक परिवार में ही चलता है।
* परिवार बच्चों के लिए पहली पाठशाला है, जहाँ वे त्याग और सेवा सीखते हैं।
* परिवार ही सामाजिक संरचना को मजबूत बनाता है और समाज व राष्ट्र को आगे बढ़ाता है।
* सामाजिक संरचना को समझना क्यों ज़रूरी है:
* यह समाज में आपसी संबंध स्पष्ट करती है।
* हमें भारतीय सामाजिक संगठन की व्यापकता, विविधता और जटिलता को समझने में मदद मिलती है।
* हमारा समाज में प्रचलित सामाजिक संस्थाओं और समय के साथ आए बदलावों को जान सकते हैं।
वर्ण व्यवस्था
* यह सामाजिक जीवन का मूल आधार रही है।
* 'वर्ण' और 'व्यवस्था' दो शब्दों से मिलकर बना है।
* वर्णश्रम धर्म: वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था को मिलाकर 'वर्णश्रम धर्म' कहते हैं।
* उत्पत्ति के सिद्धांत:
* दैवीय सिद्धांत: ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के अनुसार, विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए।
* कर्म-विभाजन का सिद्धांत: भगवद्गीता में बताया गया है कि वर्णों का विभाजन उनके अंतिम गुणों और वृत्तियों (कर्मों) के आधार पर हुआ।
* बदलाव: शुरुआत में यह गुण और कर्म पर आधारित थी, पर समय के साथ जन्म पर आधारित हो गई और जाति व्यवस्था में बदल गई। पहले एक ही परिवार में अलग-अलग वर्ण के लोग भी हो सकते थे।
जाति-प्रथा
* यह हिंदू सामाजिक संगठन का एक विशिष्ट रूप है जो अनेक जटिलताओं के बावजूद टिका रहा।
* 'जाति' शब्द: संस्कृत के 'जन' धातु से आया है, जिसका अर्थ है 'जन्म लेना'।
* जाति और वर्ण में अंतर: जाति हमेशा जन्म पर आधारित रही है, जबकि वर्ण बाद में जन्म पर आधारित हुआ।
* विकास के कारण: जातिगत, व्यावसायिक, सांप्रदायिक और स्थानीय आधार।
* जाति प्रथा के कार्य (हटन के अनुसार):
* व्यक्तिगत जीवन: व्यक्ति को जन्म से ही सामाजिक स्थिति और गतिविधियाँ प्रदान करना।
* जाति समुदाय: एक समुदाय के रूप में पहचान देना जहाँ व्यक्ति अपनी ज़रूरतें पूरी करता है।
* समाज और राज्य: समाज व राज्य के विकास में मदद करना।
* वर्तमान स्थिति: जातिगत व्यवसाय के कारण ऊँच-नीच की भावना आई। आज जाति का व्यवसाय से सीधा संबंध नहीं है।
आश्रम व्यवस्था
* भारतीय सामाजिक संगठन के दो मूल आधार हैं: वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था।
* उद्देश्य: हर व्यक्ति को समाज के लिए उपयोगी बनाना और जीवन को सुसंस्कृत, संगठित व व्यवस्थित करना।
* 'आश्रम' शब्द: संस्कृत के 'श्रम' धातु से आया है, जिसका अर्थ है जीवन में मेहनत से काम करना।
* चार आश्रम: मानव जीवन को कर्म के अनुसार चार भागों में बांटा गया है:
* ब्रह्मचर्य आश्रम (जन्म से 25 वर्ष):
* उद्देश्य: वेदों का ज्ञान प्राप्त करना और गुरुकुल में शिक्षा लेना।
* 'ब्रह्म' का अर्थ वेद या महान, 'चर्य' का अर्थ विचरण करना।
* गृहस्थ आश्रम (25 से 50 वर्ष):
* उद्देश्य: विवाह कर सामाजिक, धार्मिक, नैतिक और आर्थिक कर्तव्यों का पालन करना।
* देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से मुक्ति।
* पंच महायज्ञ (ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ) करना।
* यह आश्रम अन्य तीनों आश्रमों का भरण-पोषण करता था।
* वानप्रस्थ आश्रम (50 से 75 वर्ष):
* उद्देश्य: गृहस्थ जीवन के बाद सब कुछ त्याग कर वन की ओर जाना।
* एकांत में रहकर आध्यात्मिक उत्कर्ष और मोक्ष की साधना करना।
* संन्यास आश्रम (75 से 100 वर्ष):
* उद्देश्य: समस्त मोह-माया का त्याग कर संन्यासी बन जाना और मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करना।
* मन और वाणी पर नियंत्रण, वस्तुओं का संग्रह वर्जित।
पुरुषार्थ
* परिभाषा: जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक सुखों के संतुलन के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों को पुरुषार्थ कहते हैं।
* चतुर्वर्ग: इन्हें 'चतुर्वर्ग' भी कहा जाता है।
* महत्व: पुरुषार्थ से व्यक्ति और समाज दोनों का सर्वांगीण विकास होता है।
* चार पुरुषार्थ के उद्देश्य:
* धर्म: सही रास्ता दिखाना, नैतिक सिद्धांतों और न्याय को समझना।
* अर्थ (धन): भौतिक व आध्यात्मिक जीवन के लिए ज़रूरी, धर्मानुसार धन कमाना।
* काम: जीवन की सुखद अनुभूति और संतानोत्पत्ति, पर धर्म की सीमा में रहकर।
* मोक्ष: आध्यात्मिक जीवन का अंतिम और उच्चतम आदर्श, जीवन से मुक्ति प्राप्त करना।
प्राचीन भारत की परम्पराएँ एवं रीति-रिवाज
भारत में कई प्राचीन परम्पराएँ और रीति-रिवाज हैं, जिनका अक्सर वैज्ञानिक महत्व भी होता है:
* व्रत/उपवास: पाचन तंत्र को ठीक रखता है और शरीर से हानिकारक तत्व निकालता है।
* पैर छूना: बड़ों का सम्मान और आशीर्वाद प्राप्त करने का तरीका।
* तिलक लगाना: एकाग्रता बढ़ाता है, माथे पर रक्त संचार व ऊर्जा बढ़ती है।
* हाथ जोड़कर नमस्कार: सम्मान का प्रतीक। हाथों की उंगलियों के सिरे मिलने से एक्यूप्रेशर होता है, जिससे स्मरण शक्ति बढ़ती है।
* एक गोत्र में विवाह: समान गोत्र में विवाह से आनुवांशिक बीमारियों की संभावना बढ़ सकती है।
* जमीन पर बैठकर भोजन: पालथी लगाकर (सुखासन) बैठने से पाचन क्रिया अच्छी रहती है।
* सूर्य को जल चढ़ाना: सूर्योदय की किरणें शरीर के लिए औषधि का काम करती हैं।
* तुलसी के पौधे की पूजा: तुलसी वातावरण को शुद्ध करती है, मच्छर भगाती है और औषधीय गुणों से भरपूर है।
3-ब. राजस्थान का समाज
राजस्थान की समाज व्यवस्था बहुत पुरानी है, जिसकी जानकारी हमें शिलालेखों और ताम्रपत्रों से मिलती है।
* समाज की संरचना:
* राजस्थान के समाज की संरचना वैदिक परम्परा पर आधारित है।
* पहले जातियों की संख्या कम थी, बाद में उपजातियों में विभाजन से संख्या बढ़ गई।
* प्रमुख जातियाँ (प्राचीन संदर्भ में):
* ब्राह्मण: पुष्करणा, श्रीमाली प्रमुख। शिक्षा और राजकीय सेवा से जुड़े थे। इस्लाम के आगमन के बाद कई शाखाओं में बँट गए (जैसे पुरोहित, द्विवेदी)। कुछ व्यापार भी करते थे।
* राजपूत: राजस्थान में विशेष महत्व। शासक वर्ग से थे। सूर्यवंशी और चंद्रवंशी दो मुख्य शाखाएं। 36 प्रकार के राजकुल थे (जैसे परमार, चौहान)। मुख्य दायित्व - वंश का गौरव बढ़ाना, देश और हिंदू धर्म की रक्षा करना।
* वैश्य: व्यवसायी थे। व्यापार, वाणिज्य और साहूकारी मुख्य कार्य थे। धनी होने के कारण समाज में सम्मानित थे। किसानों को ऋण देते थे और चुंगी/राजस्व वसूली का ठेका भी लेते थे।
* कायस्थ: चित्रगुप्त के वंशज माने जाते थे। राजकीय और जागीरी सेवा इनका मुख्य व्यवसाय था। कानून, राजस्व, वित्त और बहीखातों में कुशल होने के कारण राजाओं के सलाहकार थे।
* चारण: वीरों की ख्याति का गुणगान करते थे और युद्ध में सैनिकों को प्रोत्साहित करते थे। राजाओं का इतिहास लिखने और वंशावली बनाने में माहिर थे।
* कृषिकर्मी जातियाँ: कुरदीवारी, अहीर, धाकड़ आदि। अहीर और गुर्जर पशुपालन व दूध-घी के व्यवसाय से जुड़े थे।
* मुसलमान: अजमेर, मध्य और पूर्वी राजस्थान में अधिक। वाणिज्य, व्यापार, चिकित्सा और कृषि कार्य करते थे।
* जनजातियाँ: भील, मीणा और गरासिया प्रमुख थे। मीणा राजाओं की सेना में अनियमित सैनिक थे और जयपुर राजघराने में सुरक्षा का काम करते थे। भील भी सैनिक के रूप में कार्य करते थे।
* अन्य जातियाँ: खाती, लुहार, नाई, कुम्हार, दर्जी, सुनार आदि भी प्रचलित थीं।
परिवार
* परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला है।
* राजस्थान में परिवार संस्था उत्तर पाषाण काल में स्थापित हो गई थी।
* संयुक्त परिवार: पशुपालन और कृषि के कारण श्रम का महत्व बढ़ा, जिससे संयुक्त परिवार की अवधारणा मजबूत हुई।
* श्रीमती कार्वे के अनुसार संयुक्त परिवार: एक ही घर में रहने वाले, एक साथ भोजन करने वाले, सामान्य संपत्ति रखने वाले, सामान्य पूजा में भाग लेने वाले और रक्त संबंध से बंधे व्यक्तियों का समूह।
* प्रकार: राजस्थान में मुख्य रूप से एकाकी परिवार और संयुक्त परिवार पाए जाते थे।
* मुखिया: परिवार पितृसत्तात्मक थे, मुखिया वयोवृद्ध व्यक्ति होता था।
* संगठन के आधार: परिवार को संगठित रखने के लिए पंच महायज्ञ, तीन ऋण, चार पुरुषार्थ और सोलह संस्कार महत्वपूर्ण थे।
* सोलह संस्कार: जीवन को पवित्र बनाने के लिए 16 अनुष्ठान बताए गए हैं (जैसे गर्भाधान, नामकरण, विवाह, अंत्येष्टि)। वर्तमान में कुछ ही प्रमुख संस्कार माने जाते हैं।
विवाह
* संस्कार व्यवस्था में विवाह का बहुत महत्व है, यह वंश की पवित्रता बनाए रखता है।
* यह गृहस्थ जीवन में प्रवेश का माध्यम था।
* विवाह के प्रकार (आठ): ब्रह्म, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस, और पैशाच। पहले चार को श्रेष्ठ माना जाता था।
* स्वयंवर प्रथा भी प्रचलित थी।
* दहेज: प्राचीन काल में दहेज सामाजिक बुराई नहीं थी, बल्कि श्रद्धानुसार कन्यादान होता था, पर बाद में यह एक अभिशाप बन गया।
रहन-सहन एवं खान-पान
* राजस्थान का रहन-सहन जलवायु, व्यवसाय और सामाजिक वर्ग से प्रभावित था।
* भोजन: प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वस्तुओं (कंद, मूल, मांस) पर आधारित था। बाद में गेहूँ, जौ, चावल, खीर, मोदक, दाल, छाछ, घेवर, फैनी आदि का उपयोग बढ़ा। शिकार भी किया जाता था।
परिधान (पोशाक)
* राजस्थानी वेशभूषा का सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक है।
* पुरुष परिधान:
* कालीबंगा और आहड़ से सूती वस्त्रों के प्रयोग के प्रमाण।
* साधारण लोग: धोती और ऊपरी वस्त्र।
* वनवासी: कम वस्त्र, ठंड से बचने के लिए पशुओं के चमड़े का प्रयोग।
* सर्दियों में अंगरखी पहनना।
* व्यवसाय के अनुसार परिधानों में भेद (जैसे शिकारी, किसान, ब्राह्मण, व्यापारी, सैनिक)।
* मुगलों के आने के बाद बदलाव आया।
* पगड़ी: राजस्थान में सम्मान का प्रतीक, बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती थी।
* स्त्री परिधान:
* कालीबंगा और आहड़ की महिलाएँ: साधारण वेशभूषा, अधोभाग ढकने के लिए छोटी साड़ी।
* बाद में: साड़ी को करधनी से बांधना, सिर ढकना, छाती को कपड़े से ढकना।
* मध्यकाल में: लहंगा (घाघरा), साड़ी, ओढ़नी, कंचुकी/चोली प्रचलित हुए।
* परिधानों में अलंकरण, छपाई और कसीदाकारी होती थी।
* विभिन्न प्रकार के कपड़े (जमादानी, टसर, छींट, मलमल) और मौसमी परिधान भी प्रचलित थे।
आभूषण
* प्राचीन काल से ही स्त्रियाँ आभूषण पहनने की शौकीन थीं।
* शुरुआत में: मिट्टी और चमकीले पत्थरों की मणियाँ, हाथों में चूड़ियाँ, कड़े, पैरों में खड़वे और हार।
* बाद में: सोना, चाँदी, मोती और रत्नों के आभूषण लोकप्रिय हुए।
* साधारण वर्ग: काँसे, पीतल, तांबा, कौड़ी, सीप, मूंगे और हाथीदांत के गहने पहनते थे।
* प्रचलित आभूषण: हाँसली, बाजूबंद, कर्ण कुंडल, करधनी, अंगूठी, मेखला, केयूर आदि।
* नामों में बदलाव: सिर के जेवर को बोर, शीशफूल, रखड़ी, टीका कहने लगे।
* पुरुषों में आभूषण: पुरुष भी कान, हाथ, उंगली, गले और पैरों में आभूषण पहनते थे।
* महत्व: आभूषण आर्थिक स्तर और वर्ग/जाति को भी दर्शाते थे।
सामंतवाद प्रथा (राजपूत शासनकाल)
* राजस्थान में सामंतवाद प्रथा राजपूत राज्यों की स्थापना के साथ ही शुरू हो गई थी।
* स्थापना का कारण: राजपूत राजाओं को अपने राज्यों की व्यवस्था, सुरक्षा और बाहरी आक्रमणों से बचाव के लिए सगे-संबंधियों और विश्वासपात्र सैनिक अधिकारियों की मदद की ज़रूरत थी।
* जागीरें प्रदान करना: राजा अपने परिजनों और सेनानायकों को जागीरें देकर उन्हें अपना सामंत बनाते थे।
* कुल पर निर्भरता: राजपूत शासकों का कार्यभार कुल (परिवार/वंश) पर निर्भर रहता था। सामंत स्वयं को राजा का बंधु और सगोत्री मानते थे।
* सामंतों की भूमिका:
* राज्य को कुल की संपत्ति मानते थे।
* राज्य की सुरक्षा, समृद्धि और प्रगति में योगदान देते थे।
* राजा उनसे सलाह लेते थे।
* अन्य कुलों के राजपूतों को भी अस्थायी रूप से जागीरें दी जाती थीं।
* उत्तराधिकार: राजा की मृत्यु के बाद बड़े पुत्र को उत्तराधिकारी बनाया जाता था, पर इसमें सामंतों की राय ज़रूर ली जाती थी।
* सामंतों द्वारा प्रदत्त सेवाएँ और शुल्क:
* सैनिक सेवाएँ:
* युद्धकालीन सेवा: युद्ध के समय सैनिकों सहित राजा की मदद करना।
* शांतिकालीन सेवा: सामान्य कार्यों के लिए सैनिक और सवार देना।
* रेख कर: एक प्रकार का सैनिक कर या गाँव की अनुमानित वार्षिक आय का माप।
* उत्तराधिकार कर: जागीर के नए उत्तराधिकारी से लिया जाता था (जैसे हुकमनामा, पेशकशी)।
* अनियमित कर: राज्याभिषेक, राजा/बड़े पुत्र के विवाह, तीर्थयात्रा के समय भेंट/उपहार।
* अन्य कर्त्तव्य: दरबार में उपस्थिति, विशिष्ट त्योहारों पर उपस्थिति, राजपरिवार की महिलाओं की यात्रा व्यवस्था, संतानों के विवाह की सूचना राजा को देना।
* सामंतों को विशेष अधिकार:
* सिरोपाव: राजा द्वारा विवाह, युवराज के जन्म पर सामंतों को दिया जाने वाला सम्मान।
* लवाजमा: श्रेणी के अनुसार नक्कारा, निशान, चंवर, सोने-चाँदी की छड़ी।
* सिक्के ढालने और न्यायिक क्षेत्र में अधिकार।
* सामंतों की श्रेणियां: मेवाड़ में 'सोलह', 'बत्तीस' और 'गोल' सरदार; जयपुर में 'बारह कोठड़ी', 'ताजीमी', 'खासबॉकी'; कोटा में 'देशवी' और 'हजूरथी'; मारवाड़ में 'राजवी', 'सरदार', 'मुत्सद्दी' और 'गनायत' आदि।
* अन्य सामंत:
* ग्रासिये जागीरदार: सैनिक सेवा के बदले भूमि की उपज ('ग्रास') का उपभोग करते थे।
* भोमिया: राज्य की रक्षा हेतु बलिदान देते थे (बड़े भोमिये जागीरदार थे, छोटे डाक पहुँचाने व खजाने की सुरक्षा करते थे)।
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