अध्याय 1: शस्य विज्ञान, मृदा एवं बीज (Agronomy, Soil and Seed) - अभ्यास प्रश्न

वन लाइनर प्रश्न (30)

  1. एग्रोनोमी किस भाषा के शब्दों से बना हैग्रीक
  2. शस्य विज्ञान का मूल अर्थ क्या हैभूमि प्रबंधन
  3. शस्य विज्ञान को किन रूपों में जाना जाता हैकला, विज्ञान व व्यवसाय
  4. भारत में जनसंख्या का एक बड़ा भाग सीधे किससे जुड़ा हैकृषि व्यवसाय
  5. मृदा उर्वरता को प्रभावित करने वाला एक प्राकृतिक कारक बताएं। पैतृक पदार्थ / स्थलाकृति / मृदा आयु / जलवायु / मृदा प्रोफाइल की गहराई / मृदा की भौतिक दशा / मृदा अपरदन / मृदा में उपस्थित पोषक तत्वों की मात्रा
  6. मृदा उत्पादकता को प्रभावित करने वाले कारक क्या हैंमृदा उर्वरता, मृदा की स्थिति, मृदा की भौतिक दशा
  7. कौनसा वृक्ष रेगिस्तानी क्षेत्रों में वायु क्षरण रोकने में सहायक हैखेजड़ी
  8. आधार बीज का स्रोत कौन सा बीज होता हैप्रजनक बीज
  9. प्रमाणित बीज पर किस रंग का टैग लगा रहता हैनीले रंग का
  10. न्यूक्लियस सीड की शुद्धता कितने प्रतिशत होती हैशत-प्रतिशत (100%)
  11. प्रजनक बीज पर किस रंग का टैग लगा रहता हैसुनहरे पीले रंग का
  12. आधार बीज की आनुवंशिक शुद्धता कितने प्रतिशत तक होती है98 प्रतिशत तक
  13. किसान फसल उत्पादन के लिए कौन सा बीज खरीदता हैप्रमाणित बीज
  14. फसल की किन्हीं दो किस्मों के मध्य निश्चित दूरी क्या कहलाती हैपृथक्करण दूरी
  15. जौ, गेहूँ, जई व धान के लिए आधार बीज उत्पादन हेतु पृथक्करण दूरी कितनी है3 मीटर
  16. संकर मक्का के बीज उत्पादन हेतु पृथक्करण दूरी कितनी है600 मीटर
  17. सोयाबीन व मूंगफली के बीज उत्पादन हेतु पृथक्करण दूरी कितनी है3 मीटर
  18. खेत से अन्य किस्मों के पौधों व भिन्न पौधों को उखाड़कर बाहर फेंकने की क्रिया क्या कहलाती हैरोगिंग (Rouging)
  19. गहाई के बाद बीज को मशीनों द्वारा साफ करने की क्रिया क्या कहलाती हैविधायन (Processing)
  20. अनाज के बीजों में भंडारण के समय नमी कितने प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए12 प्रतिशत
  21. बीज की वह अवस्था जब इसकी सक्रिय वृद्धि कुछ काल के लिए निलंबित हो जाती है, क्या कहलाती हैसुषुप्तावस्था
  22. वह सुषुप्तावस्था जो बीज कवच की कठोरता या भ्रूण के अल्प विकास से होती हैप्राथमिक सुषुप्तावस्था
  23. बलकृत सुषुप्तावस्था का मुख्य कारण क्या हैबीजों का मृदा में अधिक गहराई में चले जाना
  24. मिट्टी के कणों का अपने स्थान से हटने की क्रिया को क्या कहते हैंमृदा क्षरण
  25. मृदा को क्षरण से बचाने की क्रिया क्या कहलाती हैमृदा संरक्षण
  26. मृदा क्षरण कितने प्रकार का होता हैदो (प्राकृतिक व त्वरित)
  27. जल द्वारा मृदा क्षरण की प्रारंभिक अवस्था कौन सी हैबौछार क्षरण (Splash erosion)
  28. वायु द्वारा मृदा परिवहन का वह प्रकार जिसमें कण 0.1 से 0.5 मिमी व्यास के होते हैंउच्छलन (Saltation)
  29. उत्तम बीज का वास्तविक उपयोगिता मान कितने प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिए75 प्रतिशत
  30. बीज प्रमाणीकरण का कार्य भारत में कौन सी संस्था करती हैराष्ट्रीय बीज निगम (NSC)

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न (30)

शस्य विज्ञान को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: विज्ञान की वह शाखा जिसमें फसल उत्पादन व मृदा प्रबंधन के सिद्धांतों तथा क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, शस्य विज्ञान कहलाती है।
शस्य विज्ञान की आवश्यकता किन क्षेत्रों में है?
उत्तर: शस्य विज्ञान की आवश्यकता कृषि उत्पादन, नियोजन (रोजगार), व्यवसाय और उद्योग क्षेत्रों में है।
मृदा उत्पादकता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: फसल उत्पादन की अनुकूल परिस्थितियों में किसी मृदा की फसल पैदा करने की क्षमता को मृदा उत्पादकता कहते हैं। इसे साधारणतया रुपयों में या प्रति हेक्टेयर उपज के रूप में मापा जाता है।
मृदा क्षरण की परिभाषा लिखिए।
उत्तर: भौतिक रूप से मिट्टी के कणों का अपने स्थान से हटने एवं अन्यत्र स्थानांतरित होने की क्रिया को मृदा क्षरण कहते हैं।
मृदा क्षरण को रोकने के लिए राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में उगाए जाने वाले तीन वृक्षों के नाम लिखिए।
उत्तर: खेजड़ी, शीशम, रोहिड़ा।
स्थलाकृति का जल क्षरण से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर: ढालू भूमि पर जल क्षरण ज्यादा होता है, क्योंकि पानी के बहने की गति तेज होती है, जिससे उसकी मिट्टी काटने व बहाने की शक्ति बढ़ जाती है। ढाल की लम्बाई भी क्षरण की मात्रा को प्रभावित करती है।
बीज की परिभाषा लिखिए।
उत्तर: दाना, फल, पत्ती, जड़ अथवा तने का वह भाग जो अपने समान रूप के स्वस्थ पौधे को जन्म देता है, बीज कहलाता है। तकनीकी दृष्टि से पुष्प के परिपक्व बीजांड को ही बीज कहते हैं जिसमें सूक्ष्म भ्रूण व भ्रूणपोष सुरक्षात्मक आवरण से ढका रहता है।
पृथक्करण दूरी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: आनुवंशिक शुद्धता को बनाए रखने के लिए फसल की किन्हीं दो किस्मों के मध्य एक निश्चित दूरी बनाए रखना आवश्यक है। यह दूरी पृथक्करण दूरी (Isolation distance) कहलाती है।
बलकृत सुषुप्तावस्था क्या होती है?
उत्तर: इस प्रकार की सुषुप्तावस्था बीजों के मृदा में अधिक गहराई में चले जाने के कारण होती है, जहाँ प्रतिकूल तापक्रम, प्रकाश का पूर्ण अभाव, कार्बन-डाईऑक्साइड की अधिकता व मृदा के अधिक भार के कारण बीज अंकुरित नहीं हो पाते।
मृदा उर्वरता को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो कृत्रिम कारकों के नाम बताएं।
उत्तर: जलाक्रांति, फसल प्रणाली, मृदा पी.एच., मृदा सूक्ष्म जीव, मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा, मृदा जुताई की विधि व समय।
जल द्वारा मृदा क्षरण के किन्हीं दो प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर: बौछार क्षरण, परत क्षरण, रिल क्षरण, अवनालिका क्षरण।
वायु द्वारा मृदा क्षरण को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो प्राकृतिक कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर: जलवायु, मृदा के भौतिक गुण (कणाकार, घनत्व, कार्बनिक पदार्थ, नमी), वनस्पति, स्थलाकृति।
बीज सुषुप्तावस्था को भंग करने की किन्हीं दो विधियों के नाम लिखिए।
उत्तर: प्रकाश से उपचार, ताप से उपचार, पश्य परिपक्वन, क्षय चिह्न, रसायनों से उपचार।
उत्तम बीज में नमी की मात्रा का क्या महत्व हैउत्तर:
उत्तम बीजों में निर्धारित मात्रा से अधिक नमी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अधिक आर्द्रता से कवक/कीट प्रकोप होता है, जिससे अंकुरण क्षमता व बीज ओज घटता है।
रोगिंग (Rouging) किसे कहते हैं?
उत्तर: बीज उत्पादन कार्यक्रम के खेत में समय-समय पर निरीक्षण कर अन्य किस्मों के पौधों, असमान पौधों, रोगग्रस्त पौधों एवं खरपतवारों को उखाड़कर खेत से बाहर फेंकने की क्रिया को रोगिंग कहते हैं।
बीज ओज (Seed vigour) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: बीज ओज से तात्पर्य बीज की उम्र, आकृतिक तथा क्रियात्मक स्वस्थता से है जिसमें तीव्रता से समान अंकुरण व पौधों का विकास होता है।
मृदा संरक्षण की दो जैविक विधियों के नाम बताएं।
उत्तर: सस्य संबंधी विधियाँ (जैसे समोच्च खेती, फसल चक्र), घास संबंधी उपाय, वृक्षारोपण।
मृदा संरक्षण की दो यांत्रिक विधियों के नाम बताएं।
उत्तर: क्यारी या थाला बनाना, अधो भूमि की गहरी जुताई, कन्टूर टैरेस बनाना, कन्टूर खाई बनाना।
प्रजनक बीज का टैग किस रंग का होता है?
उत्तर: सुनहरे पीले रंग का।
आधार बीज का टैग किस रंग का होता है?
उत्तर: सफेद रंग का।
मृदा की भौतिक दशा कैसे उर्वरता को प्रभावित करती है?
उत्तर: मृदा की अच्छी भौतिक दशा (जल धारण क्षमता, वायु व जल संचार) जीवाणुओं की क्रियाशीलता व जीवांश पदार्थों के सड़न को बढ़ाती है, जिससे जड़ों का विकास अच्छा होता है और उर्वरता बढ़ती है।
अपरिपक्व बीज बोने से क्या हानियाँ होती हैं?
उत्तर: अपरिपक्व बीजों में अंकुरण कम होता है, पौधे छोटे व कमजोर रह जाते हैं, और प्रतिकूल दशाओं, खरपतवार, कीट तथा रोगों से संघर्ष करने की क्षमता कम होती है।
बीज उत्पादन में गहाई के दौरान किन दो बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: खलिहान व गहाई मशीन को अच्छी तरह साफ करना, थ्रेसर का आर.पी.एम. निश्चित करना ताकि बीज टूटे नहीं, बीज हेतु नई बोरियाँ काम में लेना।
मृदा उर्वरता और मृदा उत्पादकता में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: मृदा उर्वरता मिट्टी की पोषक तत्व प्रदान करने की क्षमता है, जबकि मृदा उत्पादकता उस उर्वरता से वास्तविक उपज पैदा करने की क्षमता है (जिसे रुपयों या उपज में मापा जाता है)। उत्पादक मृदा हमेशा उर्वर होती है, लेकिन उर्वर मृदा हमेशा उत्पादक नहीं हो सकती।
हरित क्रांति में शस्य विज्ञान की क्या भूमिका रही?
उत्तर: हरित क्रांति के सूत्रपात के बाद नई किस्मों तथा नवीन सिंचाई, उर्वरक व पौध संरक्षण प्रबंधन के युग में शस्य विज्ञान की महती भूमिका रही, जिसने फसल उपज व गुणवत्ता में वृद्धि की।
वायु क्षरण नियंत्रण के तीन सिद्धांत क्या हैं?
उत्तर: वायु के वेग को कम करना, मृदा कण समूह का आकार बढ़ाना, तथा मृदा सतह को नम रखना।
बीज प्रमाणीकरण संस्था की देख-रेख में कौन से बीज का उत्पादन होता है?
उत्तर: आधार बीज और प्रमाणित बीज।
दलहनी फसलें मृदा उर्वरता को कैसे बढ़ाती हैं?
उत्तर: दलहनी फसलें फसल चक्र में शामिल होने पर मृदा में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके मृदा उर्वरता को बढ़ाती हैं।
बीज की आनुवंशिक शुद्धता का क्या महत्व है?
उत्तर: उत्तम बीज का मुख्य लक्षण उसकी आनुवंशिक शुद्धता है, जो यह सुनिश्चित करती है कि बीज अपनी किस्म के अनुरूप आकार-प्रकार, रंग-रूप एवं वजन के सभी लक्षण दर्शाता है और वांछित फसल का उत्पादन करता है।
उर्वरक कम्पनियों में शस्य विज्ञान के स्नातकों के लिए क्या अवसर हैं?
उत्तर: उर्वरक कम्पनियों (जैसे इफको, कृभको) में शस्य विज्ञानी या कृषि सलाहकार के रूप में रोजगार के अवसर।


लघूत्तरात्मक प्रश्न (20)

कृषि में शस्य विज्ञान की क्या भूमिका है?
उत्तर: कृषि में शस्य विज्ञान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह खेत में उगाई जाने वाली सभी प्रकार की फसलों के उत्पादन का विज्ञान है। यह जल, वायु, भूमि और पौधे के वातावरण को प्रभावित करने वाले सभी कारकों का क्रमबद्ध अध्ययन एवं अनुसंधान करता है। शस्य विज्ञान द्वारा भूमि प्रबंधन, बीज, खाद-उर्वरक, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण, पौध संरक्षण आदि की फसल उत्पादन हेतु जानकारी मिलती है। यह फसलोत्पादन को सरलता व सुगमता से संपादित कर अधिक से अधिक उपज लेने में सहायक है, जिससे खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित होती है और किसानों की आय में वृद्धि होती है।

 

शस्य विज्ञान कला, विज्ञान व व्यवसाय का संयोजन क्यों कहलाता है?
उत्तर: शस्य विज्ञान को कला, विज्ञान व व्यवसाय का संयोजन इसलिए कहा जाता है क्योंकि:

विज्ञान: यह फसल उत्पादन व मृदा प्रबंधन के सिद्धांतों, तथ्यों और क्रमबद्ध अध्ययन पर आधारित है। इसमें जल, वायु, भूमि और पौधे के वातावरण को प्रभावित करने वाले कारकों का वैज्ञानिक विश्लेषण शामिल है।

कला: फसलों को सफलतापूर्वक उगाने, भूमि का सही प्रबंधन करने और प्राकृतिक संसाधनों का कुशलता से उपयोग करने में अनुभव, कौशल और व्यक्तिगत निर्णय (जो कलात्मक दृष्टिकोण का हिस्सा है) की आवश्यकता होती है।

व्यवसाय: कृषि स्वयं एक व्यवसाय है, और शस्य विज्ञान इसमें प्रमुख भूमिका निभाता है। यह फसलों की उत्पादकता बढ़ाकर, गुणवत्ता में सुधार करके और प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन करके किसानों के लिए आय का एक सफल स्रोत बनाता है, जिससे यह एक व्यवहार्य व्यवसाय बन जाता है।

मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता में अन्तर लिखिए।
उत्तर:

मृदा उर्वरता (Soil Fertility): यह मृदा की वह आंतरिक क्षमता है जिसके द्वारा वह पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को सही रूप, पर्याप्त मात्रा और उचित संतुलन में प्रदान कर सकती है। यह मृदा के रासायनिक गुणों से अधिक संबंधित है। एक मृदा उर्वर हो सकती है भले ही उस पर फसल न उगी हो।

मृदा उत्पादकता (Soil Productivity): यह मृदा की वह क्षमता है जिसके द्वारा वह अनुकूल परिस्थितियों में वास्तव में फसल पैदा करती है। इसे प्रति हेक्टेयर उपज (जैसे किलोग्राम/हेक्टेयर) या आर्थिक मूल्य (जैसे रुपये/हेक्टेयर) में मापा जाता है। एक मृदा उत्पादक होने के लिए उर्वर होना आवश्यक है, लेकिन उर्वर मृदा हमेशा उत्पादक नहीं हो सकती (जैसे यदि प्रतिकूल मौसम या कीट-रोग फसल को नष्ट कर दें)।

वायु द्वारा क्षरण की प्रक्रिया को समझाइए।
उत्तर: वायु द्वारा क्षरण तब होता है जब तेज हवा या आँधी से मृदा के कण एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होते हैं। यह विशेष रूप से शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में होता है जहाँ वनस्पति कम होती है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन प्रकार से होती है:

उच्छलन (Saltation): इसमें 0.1 से 0.5 मिमी व्यास वाले मृदा कण हवा के सीधे दबाव से ऊपर उछलते हैं और थोड़ी दूरी तय कर नीचे गिर जाते हैं। यह कुल मृदा क्षरण भार का 50-75% होता है।

निलम्बन (Suspension): इसमें 0.1 मिमी या उससे कम व्यास वाले बहुत छोटे कण हवा के साथ उड़कर वातावरण में लटके रहते हैं और हवा की गति के साथ हजारों किलोमीटर दूर तक स्थानांतरित हो सकते हैं।

सतह-सर्पण (Surface Creep): इसमें 0.5 मिमी से अधिक व्यास वाले बड़े कण जो हवा की गति से ऊपर नहीं उठ पाते, भूमि की सतह पर रेंगते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं।

मृदा संरक्षण में पलवार (Mulching) का क्या महत्त्व है?
उत्तर: मृदा संरक्षण में पलवार (Mulching) का अत्यधिक महत्व है। खेत को घास, पौधों के डंठलों, पुआल या अन्य जैविक पदार्थों से ढकने की प्रक्रिया को पलवार कहते हैं। इसके महत्व निम्नलिखित हैं:

यह वर्षा की बूँदों के सीधे प्रहार को कम करता है, जिससे मृदा कणों का बिखरना (बौछार क्षरण) रुकता है।

यह मृदा की सतह पर पानी के बहाव के वेग को कम करता है, जिससे परत क्षरण और रिल क्षरण नियंत्रित होता है।

यह मृदा में नमी को बनाए रखने में मदद करता है, जिससे वाष्पीकरण कम होता है।

जैविक पलवार मृदा में जीवांश पदार्थ जोड़ती है, जिससे मृदा संरचना में सुधार होता है और उसकी जल धारण क्षमता बढ़ती है।

यह खरपतवारों के अंकुरण और वृद्धि को भी दबाता है।

बीजोत्पादन के लिए बीज का चयन करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: बीजोत्पादन के लिए बीज का चयन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

बीज का प्रकार: केवल प्रजनक, आधार या प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें।

स्रोत: बीज को मान्यता प्राप्त बीज उत्पादक संस्थानों, विश्वविद्यालयों या अन्य मान्यता प्राप्त संस्थानों से ही खरीदें।

शुद्धता: सुनिश्चित करें कि बीज में अन्य बीजों या किस्मों का मिश्रण न हो।

किस्म की उपयुक्तता: बीज की किस्म कृषि जलवायु खंड में सिफारिश की गई हो और उपयुक्त पैदावार देती हो।

बीजोपचार: बीज जनित रोगों से बचाव हेतु बीज को फफूंदनाशी, कीटनाशी और शाकाणु संवर्ध से अवश्य उपचारित करें।

दस्तावेज: बीज के खाली कट्टे, टैग, लेबल और बिल जैसे दस्तावेज सुरक्षित रखें ताकि प्रमाणीकरण संस्था द्वारा मांगे जाने पर प्रस्तुत किए जा सकें।

बीज के विभिन्न प्रकारों का संक्षेप में वर्णन कीजिये।
उत्तर: उत्तम बीज प्रयोगशाला से किसानों तक पहुँचने तक चार मुख्य श्रेणियों से गुजरता है:

मूल केन्द्रक बीज (Nucleus Seed): यह किसी उन्नत किस्म के बीजों की प्रारंभिक, अत्यंत सीमित मात्रा होती है, जो पादप प्रजनक के पास होती है। यह शत-प्रतिशत आनुवंशिक और भौतिक रूप से शुद्ध होता है।

प्रजनक बीज (Breeder Seed): यह न्यूक्लियस सीड के गुणन से प्राप्त होता है। यह भी शत-प्रतिशत शुद्ध होता है और पादप प्रजनक की देख-रेख में कृषि अनुसंधान केंद्रों पर उत्पन्न किया जाता है। इसकी थैली पर सुनहरे पीले रंग का टैग लगा होता है और यह आधार बीज का स्रोत है।

आधार बीज (Foundation Seed): यह प्रजनक बीज से उत्पादित होता है। इसका उत्पादन बीज प्रमाणीकरण संस्था की देख-रेख में किया जाता है और इसकी आनुवंशिक शुद्धता 98% तक होती है। इसकी थैली पर सफेद रंग का टैग लगा होता है और यह प्रमाणित बीज का स्रोत है।

प्रमाणित बीज (Certified Seed): यह आधार बीज से उत्पन्न किया जाता है। इसका उत्पादन भी प्रमाणीकरण संस्था की देख-रेख में होता है और यह प्रमाणित होता है कि इसकी शुद्धता, अंकुरण प्रतिशत और नमी मात्रा मानकों के अनुरूप है। इसकी थैली पर नीले रंग का टैग लगा होता है और यह सीधे किसानों को फसल उत्पादन के लिए बेचा जाता है।


निबंधात्मक प्रश्न (10)

मृदा उर्वरता से क्या अभिप्राय है? इसको प्रभावित करने वाले कारकों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर: मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता (Soil Fertility and Productivity)

मृदा उर्वरता (Soil Fertility):

परिभाषा: पादप वृद्धि के लिए अनुकूल दशाओं में मृदा द्वारा आवश्यक पोषक तत्वों को प्राप्य रूप, उचित मात्रा तथा उपयुक्त संतुलन में प्रदान करने की क्षमता।

उपजाऊ भूमि के लिए आवश्यक: पोषक तत्वों के साथ-साथ भूमि की भौतिक दशा, जल व वायु का अनुपात, जीवाणुओं की क्रियाशीलता, उपयुक्त तापक्रम।

महत्वपूर्ण तथ्य: सामान्यतः उपजाऊ मृदाएँ उत्पादक होनी चाहिए, लेकिन हमेशा नहीं। प्रतिकूल मौसम (ओले, पाला, तूफान) या बीमारियाँ फसल को नष्ट कर सकती हैं, जिससे उपजाऊ भूमि भी उत्पादक नहीं रहेगी।

मृदा उर्वरता को प्रभावित करने वाले कारक:

अ) प्राकृतिक कारक:

पैतृक पदार्थ: मृदा निर्माण को प्रभावित करता है।

स्थलाकृति (Topography): पहाड़ी व ऊँचे-नीचे स्थानों की मृदा उर्वरता मैदानी/समतल भूमि की अपेक्षा कम होती है (अपक्षालन व मृदा क्षरण के कारण)। निचले भागों की मृदाएँ अधिक उपजाऊ होती हैं।

मृदा आयु: पुरानी मृदाओं में अपक्षय, लगातार फसल उगाने, क्षरण व अपक्षालन के कारण उर्वरता कम होती है।

जलवायु:

अधिक वर्षा: अपक्षालन से घुलनशील पोषक तत्व निचले संस्तरों में चले जाते हैं।

कम वर्षा: भूमि के क्षारीय होने का भय।

अधिक तापक्रम: कार्बनिक पदार्थ का शीघ्र विघटन।

तेज व शुष्क वायु: मृदा क्षरण।

मृदा प्रोफाइल की गहराई: गहरी मृदाएँ अधिक उपजाऊ होती हैं (जड़ों का बेहतर विकास, जल व पोषक तत्वों का अधिक अवशोषण)।

मृदा की भौतिक दशा:

अच्छी भौतिक दशा: बेहतर जल धारण क्षमता, जीवाणुओं की क्रियाशीलता, जीवांश पदार्थों का सड़ना, जड़ों का विकास।

बलुई मृदा (बड़े रंध्राकाश): पोषक तत्वों का शीघ्र अपक्षालन, कम उर्वरता।

सिल्ट व क्ले मृदा (बारीक कण): अधिक उर्वरता।

मृदा अपरदन: मृदा कटाव से मिट्टी के साथ आवश्यक पोषक तत्व बह जाते हैं।

मृदा में उपस्थित पोषक तत्वों की मात्रा: जिस मृदा में अन्तर्निहित तत्वों की मात्रा अधिक, उसकी उर्वरता अधिक।

ब) कृत्रिम कारक:

जलाक्रान्ति (Water logging): अत्यधिक जल भराव से वायु की कमी, विनाइट्रीकरण, भौतिक दशा खराब, पोषक तत्वों का अपक्षालन, उर्वरता में कमी।

फसल प्रणाली (Cropping system):

एक ही फसल बार-बार: मृदा में तत्वों की कमी, उर्वरता घटती है।

सघन खेती: शीघ्र गिरावट।

वैज्ञानिक फसल चक्र (दलहनी फसलें): मृदा उर्वरता बनी रहती है व बढ़ती है।

मृदा पी.एच. (Soil pH):

अधिक अम्लीय मृदा: कैल्शियम/मैग्नीशियम कम; लोहा, एल्यूमिनियम, मैगनीज, तांबा की अधिकता (हानिकारक)।

क्षारीय मृदा: कैल्शियम/मैग्नीशियम अधिक; लोहा, मैंगनीज, तांबे की प्राप्यता कम।

दोनों ही स्थितियों में उर्वरता कम।

मृदा सूक्ष्म जीव (Soil micro-organisms): (शैवाल, कवक, एक्टीनोमाइसिटीज, जीवाणु)

नाइट्रोजन स्थिरीकरण (राइजोबियम)।

जटिल कार्बनिक पदार्थों का विच्छेदन, ह्यूमस निर्माण।

जितने अधिक क्रियाशील, उतनी अधिक भूमि उपजाऊ।

मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा: कार्बनिक पदार्थ सड़ने पर पोषक तत्व प्रदान करते हैं। अधिक मात्रा = अधिक उर्वरा शक्ति। (चिकनी मृदा बलुई की अपेक्षा अधिक उपजाऊ)।

मृदा जुताई की विधि व समय:

ढालू खेतों में जुताई ढाल के लम्बवत् करने से मृदा कटाव कम।

उचित जुताई से पोषक तत्वों की आपूर्ति व मृदा उर्वरा शक्ति बनी रहती है।


वायवीय क्षरण का राजस्थान में क्या महत्त्व है? वायु द्वारा क्षरण को रोकने की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिये।
उत्तर: वायवीय क्षरण का राजस्थान में महत्त्व: राजस्थान का उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र एक बड़ा मरुस्थल है जहाँ वर्षा बहुत कम होती है और प्राकृतिक वनस्पति का अभाव है। मार्च से जून तक चलने वाली तेज हवाएँ इस क्षेत्र में गंभीर वायवीय क्षरण का कारण बनती हैं। अनियंत्रित पशु चराई और गलत कृषि पद्धतियाँ इस समस्या को और बढ़ाती हैं। इस क्षरण के कारण लाखों टन उपजाऊ मिट्टी उड़कर अन्यत्र चली जाती है, जिससे मृदा उर्वरता का भारी ह्रास होता है और कृषि उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह क्षेत्र की पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती है।

वायु द्वारा क्षरण को रोकने की विभिन्न विधियाँ: वायु क्षरण को नियंत्रित करने के लिए मुख्यतः तीन सिद्धांतों पर कार्य किया जाता है - वायु के वेग को कम करना, मृदा कण समूह का आकार बढ़ाना, और मृदा सतह को नम रखना। इन सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए निम्न विधियाँ अपनाई जाती हैं:

कृषि क्रियाएँ:

जीवांश खादों का प्रयोग: मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाकर कणों को बांधने में मदद करता है, जिससे वे उड़ने से बचते हैं।

हरी खाद का प्रयोग: हरी खाद वाली फसलें मृदा उर्वरता बढ़ाती हैं, कणों को बांधती हैं और नमी संचित रखती हैं।

पलवार (Mulching): मृदा सतह को फसल अवशेषों या अन्य सामग्री से ढकने से वाष्पीकरण कम होता है और कणों का उड़ना रुकता है।

भू-परिष्करण: उचित जुताई से मृदा की नमी बनी रहती है और सतह पर ढेलेदार संरचना बनती है जो कणों को उड़ने से रोकती है।

फसल चक्र: दाल वाली फसलों और घासों को फसल चक्र में शामिल करने से मृदा संरक्षित रहती है और क्षरण कम होता है।

भूमि को पडती न छोड़ना: भूमि को खाली छोड़ने से वायु क्षरण बढ़ता है, अतः फसल अवशेष या कवर फसलें उगाना चाहिए।

पशुओं की चराई पर नियंत्रण: अत्यधिक चराई से वनस्पति समाप्त होती है, जिससे भूमि नग्न हो जाती है और क्षरण बढ़ता है। चराई पर नियंत्रण आवश्यक है।

वायुरोधी वृक्ष पट्टियाँ (Shelterbelts/Windbreaks):

हवा की गति को धीमा करने के लिए जिस दिशा से हवाएँ आती हैं, उनके समकोण विपरीत दिशा में वृक्षों, झाड़ियों तथा घासों की सुनियोजित पट्टियाँ लगाई जाती हैं।

ये पट्टियाँ वायु के वेग को काफी कम कर देती हैं और सतह से नमी के वाष्पीकरण को भी रोकती हैं।

प्रभावी पट्टी पिरामिड आकार की होती है, जिसमें हवा आने की दिशा में छोटे वृक्ष (जैसे बबूल), बीच में थोड़े बड़े और हवा जाने वाली दिशा में सबसे बड़े वृक्ष (जैसे शीशम, नीम) लगाए जाते हैं।

यह मिट्टी के कणों के परिवहन को कम करके मृदा संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

मिट्टी के टीलों को आच्छादित रखना:

रेगिस्तानी क्षेत्रों में मिट्टी के टीलों (Sand Dunes) को स्थिर रखने के लिए उन पर क्षेत्रीय झाड़ियाँ (जैसे खींप, झड़बेरी, फोग, बुई) लगाई जाती हैं।

ये झाड़ियाँ पलवार का काम करती हैं और मिट्टी के उड़ने में बाधा डालती हैं, जिससे टीले एक ही जगह स्थिर रहते हैं।

अन्य रेगिस्तानी पादप: खेजड़ी (Prosopis cineraria), शीशम (Dalbergia sissoo), रोहिड़ा (Tecomella undulata), विलायती बबूल (Prosopis juliflora), इजराइली बबूल (Acacia tortalis), सेवन घास (Lasiurus sindicus), अंजन घास (Cenchrus ciliaris) जैसे पौधे भी वायु क्षरण को रोकने में सहायक होते हैं।

मृदा संरक्षण की परिभाषा लिखिये। जलीय क्षरण के परिपेक्ष्य में सस्य सम्बन्धी विधियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: मृदा संरक्षण की परिभाषा: मृदा को विभिन्न क्षरण शक्तियों (जैसे जल और वायु) द्वारा बहने तथा कटने से बचाने की क्रिया को मृदा संरक्षण कहते हैं। इसका उद्देश्य मृदा की उर्वरता, उत्पादकता और पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखना है।

जलीय क्षरण के परिपेक्ष्य में सस्य सम्बन्धी विधियाँ (Agronomic Methods): ये वे जैविक विधियाँ हैं जो फसल उत्पादन और प्रबंधन के माध्यम से जल द्वारा होने वाले मृदा क्षरण को नियंत्रित करती हैं।

समोच्च खेती (Contour Farming): यह एक महत्वपूर्ण विधि है जहाँ समस्त कृषि कार्य (जैसे जुताई, बुवाई) ढाल के विपरीत, समान ऊँचाई वाली रेखाओं (कन्टूर) पर किए जाते हैं। इससे वर्षा का पानी रुक-रुक कर आगे बढ़ता है, जिससे उसे मृदा द्वारा सोखने का अधिक समय मिलता है और पानी का बहाव कम होता है। परिणामतः, मृदा क्षरण रुकता है।

भू-परिष्करण (Tillage): सही भू-परिष्करण विधियों और औजारों के अपनाने से मृदा की संरचना में सुधार होता है। बारानी क्षेत्रों में गहरी जुताई करने से खरपतवार नष्ट होते हैं और मृदा में पानी का अवशोषण बढ़ता है, जिससे भू-क्षरण कम होता है। कम या शून्य जुताई भी मृदा की सतह पर फसल अवशेष छोड़कर क्षरण को कम करती है।

पलवार (Mulching): खेत को घास, पुआल या पौधों के डंठलों से ढकने से पलवार बनती है। यह वर्षा की बूँदों के सीधे मृदा पर प्रहार को कम करती है, जिससे कणों का बिखराव रुकता है। साथ ही, यह मृदा की सतह पर पानी के बहाव के वेग को कम करती है और नमी संरक्षण में भी मदद करती है, जिससे क्षरण नियंत्रित होता है।

फसल चक्र (Crop Rotation): मृदा संरक्षण के लिए ऐसे फसल चक्र अपनाए जाते हैं जिनमें अधिकाधिक समय तक भूमि को घास एवं दलहनी फसलों के मिश्रण से आच्छादित रखा जाए। उपयुक्त फसल चक्र अपनाने से भूमि पर वनस्पति आवरण बना रहता है, जो क्षरण को कम करता है, जल का अच्छा संरक्षण होता है और मिट्टी का उपजाऊपन भी सुधरता है।

पट्टियों में फसल बोना (Strip Cropping): इस प्रणाली में फसलें ढाल के विपरीत समानांतर पट्टियों में बोई जाती हैं। इसमें भू-क्षरण अवरोधी फसलें (जैसे घास या घनी उगने वाली फसलें) और निराई-गुड़ाई चाहने वाली फसलें एकान्तर पट्टियों में उगाई जाती हैं। जब ऊपर से पानी बहकर आता है, तो घनी फसल वाली पट्टियाँ मिट्टी और पानी को रोक लेती हैं, जिससे क्षरण नहीं हो पाता है।

उत्तम बीज के गुण एवं विशेषताओं का वर्णन कीजिये।
उत्तर: उत्तम बीज के गुण (Characteristics of good quality seed):

वह किस्म जो स्थानीय किस्म के मुकाबले 10-15% अधिक उपज देती हो, विभिन्न जलवायु व मिट्टी के प्रति अनुकूल हो, तथा निश्चित समय पर परिपक्व होती हो।

आनुवंशिक शुद्धता (Genetic purity):

मुख्य लक्षण।

किस्म के अनुरूप आकार-प्रकार, रंग-रूप, वजन के लक्षण।

आकार व रंग में एक समान व चमकीले।

भौतिक शुद्धता (Physical purity):

अन्य फसलों, किस्मों, खरपतवार के बीजों की मिलावट नहीं।

कंकर-पत्थर, मिट्टी, कूड़ा-कचरा, फसल अवशेष, भूसा आदि से मुक्त।

मिलावट से वांछित पौधों की संख्या घटती है, खरपतवार प्रतिस्पर्धा करते हैं, उपज व गुणवत्ता घटती है।

बीज ओज (Seed vigour):

बीज की उम्र, आकृतिक व क्रियात्मक स्वस्थता।

तीव्रता से समान अंकुरण व पौधों का विकास।

पर्याप्त ओज = तेज गति से पौधे की बढ़वार।

कम ओज = धीमी बढ़वार, उपज व गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव।

पुराने बीजों का ओज घटता जाता है।

उच्च अंकुरण क्षमता (High germinability):

खेती में उगे पौधों की संख्या व उपज से सीधा संबंध।

बीज की मात्रा अंकुरण प्रतिशत पर तय होती है।

अंकुरण प्रतिशत = (अंकुरित बीजों की संख्या / बोये गए बीजों की संख्या) × 100

न्यूनतम अंकुरण क्षमता (उदाहरण):

गेहूँ, जौ, चना: 85%

धान, ज्वार, तिल, बरसीम, रिजका: 80%

बाजरा, मूंग, मोठ, उड़द, अरहर, चंवला: 75%

मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, ग्वार: 70%

कपास: 65%

नमी की मात्रा (Moisture content):

निर्धारित मात्रा से अधिक नहीं होनी चाहिए।

अधिक आर्द्रता: कवक/कीट प्रकोप, अंकुरण क्षमता कम, बीज ओज पर विपरीत प्रभाव।

अनाज के बीजों में भंडारण के समय नमी 12% से अधिक नहीं होनी चाहिए।

रोगमुक्तता (Free from diseases):

निरोग, रोगाणु व कीट व्याधि प्रकोप रहित।

रोगग्रस्त/कीटग्रस्त बीज की अंकुरण क्षमता कम।

कई रोगों के विषाणु/जीवाणु बीजों के साथ लगे होते हैं।

परिपक्वता (Maturity):

पूर्णरूप से परिपक्व, साफ, सुडौल आकार का।

परिपक्व बीज: चमकीला, साफ, भरा हुआ।

अपरिपक्व बीज: सिकुड़े, छोटे, बदरंग, कम अंकुरण, कमजोर पौधे, प्रतिकूल दशाओं से संघर्ष की क्षमता कम।

वास्तविक उपयोगिता मान (Real value):

उत्तम बीज का वास्तविक उपयोगिता मान 75% से कम नहीं होना चाहिए।

वास्तविक उपयोगिता मान = (अंकुरण प्रतिशत × शुद्धता प्रतिशत) / 100

बीज की जीवन क्षमता (Seed longevity):

जीवित भ्रूण होना चाहिए जिसमें अंकुरण क्षमता हो।

भ्रूण क्षतिग्रस्त होने पर जीवन क्षमता नष्ट।

बीज के कट जाने, गल जाने, रोग या भंडारण दोषों से प्रभावित होने पर जीवन क्षमता प्रभावित होती है। बुवाई से पहले ज्ञात करना लाभदायक।

 

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