अध्याय 1 - शस्य विज्ञान, मृदा एवं बीज (Agronomy, Soil and Seed)

1. शस्य विज्ञान (Agronomy)

  • परिभाषा:

    • विज्ञान की वह शाखा जिसमें फसल उत्पादन और मृदा प्रबंधन के सिद्धांतों व क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।

    • उत्पत्ति: ग्रीक भाषा के शब्द 'एग्रोनोमस' (AGRONOMOS) से, जो 'एग्रोस' (भूमि) + 'नोमोस' (प्रबंधन) से बना है।

    • मुख्य बिंदु: भूमि प्रबंधन के साथ-साथ आधुनिक व श्रेष्ठ विधियों से फसल उत्पादन का संयोजन।

  • महत्व व कार्य क्षेत्र:

    • कला, विज्ञान व व्यवसाय का मिश्रण।

    • कृषि का आधार, विशेषकर भारत में जहाँ बड़ी जनसंख्या कृषि से जुड़ी है।

    • खेत में उगाई जाने वाली सभी फसलों के उत्पादन का विज्ञान।

    • अध्ययन क्षेत्र: जल, वायु, भूमि, पौधों के वातावरण को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन।

    • प्रदान की जाने वाली जानकारी: भूमि प्रबंधन, बीज, खाद-उर्वरक, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण, पौध संरक्षण आदि।

    • लक्ष्य: फसलों की उत्पादकता बढ़ाना, खाद्यान्न, पशुचारा व वस्त्रों की आपूर्ति सुनिश्चित करना।

    • गतिशील विषय: हरित क्रांति (60 के दशक) के बाद नई किस्मों, सिंचाई, उर्वरक व पौध संरक्षण प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका। जलवायु परिवर्तन व मृदा स्वास्थ्य के संदर्भ में इसका योगदान अहम।

    • समाधान प्रदान करता है: कर्षण, उन्नत बीज, खाद व उर्वरक, सिंचाई, खरपतवार प्रबंधन, फसल संरक्षण, कटाई, गहाई, भंडारण व प्रक्रमण जैसे जटिल विषयों का।

    • परिणाम: खाद्य सुरक्षा, आय का टिकाऊ स्रोत, उद्योगों को कच्चे माल की आपूर्ति, रोजगार के अवसर में वृद्धि।

  • शस्य विज्ञान की आवश्यकता निम्न क्षेत्रों में है:

    1. कृषि उत्पादन में:

      • फसलोत्पादन कृषि का सबसे महत्वपूर्ण अंग।

      • खाद्यान्न उत्पादन, उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा का सूचक।

      • शस्य क्रियाओं का महत्वपूर्ण योगदान: खेत की तैयारी, उन्नत किस्मों का चुनाव, बुवाई, पोषक तत्व प्रबंधन, खरपतवार प्रबंधन, सिंचाई, पौध संरक्षण, कटाई, गहाई व भंडारण।

      • उचित शस्य प्रबंधन ही फसलोत्पादन का आधार।

      • क्षेत्रवार/जलवायु के अनुसार 'उन्नत कृषि विधियाँ' (Improved package of practices) तैयार करना।

      • बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप खाद्यान्न उत्पादन द्वारा खाद्य सुरक्षा।

      • किसानों के उद्देश्य: अविकसित देशों में जीवन निर्वाह; विकासशील देशों में कुछ मुनाफा, कुछ जीवन निर्वाह।

    2. नियोजन में (रोजगार के अवसर):

      • कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित मानव संसाधन के लिए रोजगार।

      • कृषि में शिक्षण, अनुसंधान, प्रसार कार्य।

      • बैंक में कृषि सलाहकार / कृषि अधिकारी।

      • उर्वरक कंपनियाँ (इफको, कृभको)।

      • नींदानाशी रसायन कंपनियाँ।

      • पौध वृद्धि हार्मोन/रसायन कंपनियाँ।

    3. व्यवसाय में:

      • कृषि स्नातक के लिए कृषि जनित व्यवसाय में सफलता।

      • व्यवसाय के उदाहरण: एग्रो इंडस्ट्रीज, खाद-बीज-कृषि दवा-यंत्रों का व्यापार, कृषि पैदावार का लेनदेन।

    4. उद्योग में:

      • उद्योग जगत का पूरक (कृषि उत्पादन से कच्चे माल की आपूर्ति)।

      • विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति:

        • डेयरी उद्योग: चारे की फसलें।

        • गुड़, शक्कर उद्योग: गन्ना, चुकंदर।

        • वस्त्र उद्योग: कपास।

        • बीड़ी, सिगरेट उद्योग: तम्बाकू।

        • दवा उद्योग: औषधीय पौधे।

        • मसाला उद्योग: जीरा, धनिया, हल्दी, मिर्च, अजवायन।

      • फसल उत्पादन में प्रयोग होने वाले साधनों के लिए नए उद्योग:

        • खाद-उर्वरक उद्योग।

        • बीज उत्पादन उद्योग।

        • पौध संरक्षण रसायन उद्योग।

        • पौध वृद्धि कारक रसायन उद्योग।

        • नींदानाशी रसायन उद्योग।

        • सिंचाई के साधन/यंत्र निर्माण उद्योग।

        • कृषि में प्रयोग होने वाले यंत्र, औजार आदि के उद्योग।

2. मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता (Soil Fertility and Productivity)

  • मृदा उर्वरता (Soil Fertility):

    • परिभाषा: पादप वृद्धि के लिए अनुकूल दशाओं में मृदा द्वारा आवश्यक पोषक तत्वों को प्राप्य रूप, उचित मात्रा तथा उपयुक्त संतुलन में प्रदान करने की क्षमता।

    • उपजाऊ भूमि के लिए आवश्यक: पोषक तत्वों के साथ-साथ भूमि की भौतिक दशा, जल व वायु का अनुपात, जीवाणुओं की क्रियाशीलता, उपयुक्त तापक्रम।

    • महत्वपूर्ण तथ्य: सामान्यतः उपजाऊ मृदाएँ उत्पादक होनी चाहिए, लेकिन हमेशा नहीं। प्रतिकूल मौसम (ओले, पाला, तूफान) या बीमारियाँ फसल को नष्ट कर सकती हैं, जिससे उपजाऊ भूमि भी उत्पादक नहीं रहेगी।

  • मृदा उर्वरता को प्रभावित करने वाले कारक:

    • अ) प्राकृतिक कारक:

      1. पैतृक पदार्थ: मृदा निर्माण को प्रभावित करता है।

      2. स्थलाकृति (Topography): पहाड़ी व ऊँचे-नीचे स्थानों की मृदा उर्वरता मैदानी/समतल भूमि की अपेक्षा कम होती है (अपक्षालन व मृदा क्षरण के कारण)। निचले भागों की मृदाएँ अधिक उपजाऊ होती हैं।

      3. मृदा आयु: पुरानी मृदाओं में अपक्षय, लगातार फसल उगाने, क्षरण व अपक्षालन के कारण उर्वरता कम होती है।

      4. जलवायु:

        • अधिक वर्षा: अपक्षालन से घुलनशील पोषक तत्व निचले संस्तरों में चले जाते हैं।

        • कम वर्षा: भूमि के क्षारीय होने का भय।

        • अधिक तापक्रम: कार्बनिक पदार्थ का शीघ्र विघटन।

        • तेज व शुष्क वायु: मृदा क्षरण।

      5. मृदा प्रोफाइल की गहराई: गहरी मृदाएँ अधिक उपजाऊ होती हैं (जड़ों का बेहतर विकास, जल व पोषक तत्वों का अधिक अवशोषण)।

      6. मृदा की भौतिक दशा:

        • अच्छी भौतिक दशा: बेहतर जल धारण क्षमता, जीवाणुओं की क्रियाशीलता, जीवांश पदार्थों का सड़ना, जड़ों का विकास।

        • बलुई मृदा (बड़े रंध्राकाश): पोषक तत्वों का शीघ्र अपक्षालन, कम उर्वरता।

        • सिल्ट व क्ले मृदा (बारीक कण): अधिक उर्वरता।

      7. मृदा अपरदन: मृदा कटाव से मिट्टी के साथ आवश्यक पोषक तत्व बह जाते हैं।

      8. मृदा में उपस्थित पोषक तत्वों की मात्रा: जिस मृदा में अन्तर्निहित तत्वों की मात्रा अधिक, उसकी उर्वरता अधिक।

    • ब) कृत्रिम कारक:

      1. जलाक्रान्ति (Water logging): अत्यधिक जल भराव से वायु की कमी, विनाइट्रीकरण, भौतिक दशा खराब, पोषक तत्वों का अपक्षालन, उर्वरता में कमी।

      2. फसल प्रणाली (Cropping system):

        • एक ही फसल बार-बार: मृदा में तत्वों की कमी, उर्वरता घटती है।

        • सघन खेती: शीघ्र गिरावट।

        • वैज्ञानिक फसल चक्र (दलहनी फसलें): मृदा उर्वरता बनी रहती है व बढ़ती है।

      3. मृदा पी.एच. (Soil pH):

        • अधिक अम्लीय मृदा: कैल्शियम/मैग्नीशियम कम; लोहा, एल्यूमिनियम, मैगनीज, तांबा की अधिकता (हानिकारक)।

        • क्षारीय मृदा: कैल्शियम/मैग्नीशियम अधिक; लोहा, मैंगनीज, तांबे की प्राप्यता कम।

        • दोनों ही स्थितियों में उर्वरता कम।

      4. मृदा सूक्ष्म जीव (Soil micro-organisms): (शैवाल, कवक, एक्टीनोमाइसिटीज, जीवाणु)

        • नाइट्रोजन स्थिरीकरण (राइजोबियम)।

        • जटिल कार्बनिक पदार्थों का विच्छेदन, ह्यूमस निर्माण।

        • जितने अधिक क्रियाशील, उतनी अधिक भूमि उपजाऊ।

      5. मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा: कार्बनिक पदार्थ सड़ने पर पोषक तत्व प्रदान करते हैं। अधिक मात्रा = अधिक उर्वरा शक्ति। (चिकनी मृदा बलुई की अपेक्षा अधिक उपजाऊ)।

      6. मृदा जुताई की विधि व समय:

        • ढालू खेतों में जुताई ढाल के लम्बवत् करने से मृदा कटाव कम।

        • उचित जुताई से पोषक तत्वों की आपूर्ति व मृदा उर्वरा शक्ति बनी रहती है।

3. मृदा क्षरण एवं संरक्षण (Soil Erosion and Conservation)

  • मृदा क्षरण (Soil Erosion):

    • परिभाषा: भौतिक रूप से मिट्टी के कणों का अपने स्थान से हटना। मृदा का पृथक्करण तथा परिवहन।

    • परिवहन कारक: मुख्यतः जल, लेकिन हवा भी।

  • मृदा संरक्षण (Soil Conservation):

    • परिभाषा: मृदा को विभिन्न क्षरण शक्तियों द्वारा बहने तथा कटने से बचाने की क्रिया।

  • मृदा क्षरण के प्रकार:

    1. प्राकृतिक क्षरण (Natural erosion):

      • वनस्पति से ढकी मृदा का हवा व जल द्वारा लगातार, धीरे-धीरे क्षरण।

      • मृदा निर्माण व विनाश में साम्य।

      • विशेष हानि नहीं, मनुष्य द्वारा रोका नहीं जा सकता।

    2. त्वरित क्षरण (Accelerated erosion):

      • वनस्पतिविहीन भूमि में पानी व हवा से मृदा कणों के अलग होने की गति मृदा निर्माण से अधिक।

      • पशुओं की चराई, खोदने या जोतने से वनस्पति समाप्त होने पर होता है।

  • मृदा क्षरण की शक्तियाँ:

    1. जल

    2. वायु

  • 1. जल द्वारा क्षरण (Water Erosion):

    • वर्षा की बूँदों से मृदा कणों का बिखरना और गंदले पानी के रूप में बहना।

    • प्रकार:

      • अ) बौछार क्षरण (Splash erosion): प्रारंभिक अवस्था; वर्षा की बूँदों से मृदा कणों का छिन्न-भिन्न होना; जल प्रवेश क्षमता कम होना।

      • ब) परत क्षरण (Sheet erosion): बूँदों द्वारा कणों के बिखरने के बाद वर्षा जल द्वारा ऊपरी पतली उपजाऊ तह का समान रूप से बह जाना; आँखों से अदृश्य लेकिन बहुत हानिकारक।

      • स) रिल क्षरण (Rill erosion): ढाल की ओर पानी बहने से खेत में छोटी-छोटी नालियाँ बनना; जुताई से समाप्त हो जाती हैं; नर्म व जोते गए खेतों में अधिक।

      • द) अवनालिका क्षरण (Gully erosion): रिल-क्षरण की बढ़ी हुई अवस्था; नालियों का चौड़ा व गहरा होना, अधो मृदा का कटना; जुताई से समाप्त नहीं होतीं; कृषि कार्य कठिन।

  • जलीय क्षरण को प्रभावित करने वाले कारक:

    1. जलवायु: वर्षा की गहनता, अवधि, आवृत्ति (अधिक मात्रा व गहनता = अधिक क्षरण); अधिक तापक्रम (मूल पदार्थों का अपक्षय)।

    2. स्थलाकृति: ढालू भूमि (पानी की तेज गति, अधिक कटाव); ढाल की लंबाई।

    3. मृदा गुण: बलुई मृदा (कणों का बिखराव ज्यादा, कम जल सोखना); मटियार भूमि (कण दृढ़ता से चिपके, अधिक कार्बनिक पदार्थ, कम कटाव); ऊसर भूमि (पानी में शीघ्र घुलना)।

    4. वनस्पति का प्रभाव: पेड़ व घास की जड़ें मृदा कणों को बांधती हैं, पत्तियाँ वर्षा की बूँदों का प्रहार रोकती हैं, जल सोखने में मदद; अधिक वनस्पति = कम क्षरण।

    5. मानवीय कारक: खेती का गलत ढंग (ढाल की दिशा में कृषि, नदी किनारे तक खेती, खाद बिना एक ही फसल)।

  • जलीय क्षरण को रोकने की विधियाँ (मृदा संरक्षण विधियाँ):

    1. मृदा संरक्षण की जैविक विधियाँ (Biological methods):

      • अ) सस्य सम्बन्धी विधियाँ (Agronomic methods):

        1. समोच्च खेती (Contour farming): ढाल के विपरीत समान ऊँचाई पर कृषि कार्य व बुवाई; वर्षा जल को रोककर सोखने में मदद, क्षरण कम।

        2. भू-परिष्करण (Tillage): सही विधियों व औजारों से मृदा संरचना सुधार; बारानी क्षेत्रों में गहरी जुताई (खरपतवार नष्ट, पानी का अधिक अवशोषण)।

        3. पलवार (Mulching): खेत को घास/पौधों के डंठलों से ढकना; वर्षा बूँदों का सीधा प्रहार कम, पानी के बहाव का वेग कम, मृदा संरचना में सुधार।

        4. फसल चक्र (Crop rotation): अधिकाधिक समय तक घास व दलहनी फसलों के मिश्रण से भूमि को आच्छादित रखना; क्षरण कम, जल संरक्षण, मृदा उर्वरता में सुधार।

        5. पट्टियों में फसल बोना (Sowing of crops in strips): ढाल के विपरीत समानांतर पट्टियों में भू-क्षरण अवरोधी (घनी) व निराई-गुड़ाई चाहने वाली फसलों को एकांतर में उगाना; मिट्टी व पानी का रुकना।

      • ब) घास सम्बन्धी उपाय (Grass related measures):

        • क्षेत्रीय फसलों के मध्य घास की पट्टियाँ बोना।

        • ले फार्मिंग (Lay farming): फसल चक्र में घास को शामिल करना; मृदा व जल संरक्षण।

        • ज्यादा क्षरण समस्या पर कुछ समय तक केवल घासें उगाना (ब्लू पैनिक, नेपियर, दूब, अंजन)।

      • स) वृक्षारोपण (Tree plantation):

        • वृक्ष वर्षा की बूँदों का सीधा प्रहार रोकते हैं, पानी के बहाव को कम करते हैं।

        • पत्तियाँ मल्च का काम करती हैं, जीवांश प्रदान करती हैं, मृदा भौतिक दशा सुधारती हैं।

    2. मृदा संरक्षण की यांत्रिक विधियाँ (Mechanical methods):

      • अ) क्यारी या थाला बनाना: बेसिन लिस्टर से कन्टूर के समानांतर थालों का निर्माण; जल बहाव गति कम, जल संरक्षण।

      • ब) अधो भूमि की गहरी जुताई: सब सोइलर से कठोर परत तोड़ना; जल शोषित व जल धारण क्षमता बढ़ाना।

      • स) कन्टूर टैरेस बनाना: ढालू भूमि पर खेत को चबूतरे की भांति बनाना; बहाव रोकना, जल शोषण बढ़ाना, अतिरिक्त जल निकालना, ढालू भूमि को खेती योग्य बनाना, मृदा क्षरण नियंत्रित करना।

      • द) कन्टूर खाई बनाना: 60 सेमी चौड़ी, 30 सेमी गहरी खाइयाँ खोदकर पेड़ों की रोपाई करना।

  • 2. वायु द्वारा क्षरण (Wind Erosion):

    • परिभाषा: तेज हवा या आँधी से मृदा कणों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचना।

    • प्रभावित क्षेत्र: शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क क्षेत्र जहाँ वनस्पति कम होती है (जैसे राजस्थान का उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र)।

    • समस्या के कारण: कम वर्षा, प्राकृतिक वनस्पति का अभाव, अनियंत्रित पशु चराई, गलत कृषि तरीके।

    • परिणाम: उपजाऊ मिट्टी का उड़ना, मृदा उर्वरता का ह्रास।

    • मृदा परिवहन के प्रकार:

      • अ) उच्छलन (Saltation): 0.1-0.5 मिमी व्यास वाले कणों का ऊपर उछलना और थोड़े चलकर गिरना; कुल क्षरण का 50-75% भार।

      • ब) निलम्बन (Suspension): 0.1 मिमी से कम व्यास वाले छोटे कणों का हवा के साथ उड़कर हजारों किमी दूर तक जाना।

      • स) सतह-सर्पण (Surface creep): 0.5 मिमी से अधिक व्यास वाले कणों का भूमि सतह पर रेंगकर स्थानान्तरित होना।

  • वायु द्वारा मृदा क्षरण को प्रभावित करने वाले कारक:

    1. जलवायु: शुष्क जलवायु (कम वर्षा, अधिक ताप, तेज वायु गति = अधिक क्षरण); आर्द्र एवं शीतोष्ण जलवायु में कम।

    2. मृदा:

      • क्ले मृदा: जीवांश अधिक, चिकनी सतह, कम क्षरण।

      • बलुई मृदा: खुरदरी सतह, कण अलग, अधिक क्षरण।

    3. वनस्पति: वनस्पति आच्छादित मृदाओं में कम क्षरण; वनस्पतिविहीन मृदाओं में अधिक।

    4. स्थलाकृति: ढालू भूमियों में समतल की अपेक्षा अधिक क्षरण।

  • वायवीय क्षरण नियंत्रण के सिद्धान्त:

    1. वायु के वेग को कम करना।

    2. मृदा कण समूह का आकार बढ़ाना।

    3. मृदा सतह को नम रखना।

  • वायवीय क्षरण रोकने की विधियाँ:

    1. कृषि क्रियाएँ:

      • जीवांश खादों का प्रयोग।

      • हरी खाद वाली फसलों का प्रयोग (उर्वरता बढ़ाना, कणों को बांधना, नमी संचित रखना)।

      • मृदा सतह पर पलवार (Mulch) का प्रयोग।

      • भू-परिष्करण (Tillage) द्वारा मृदा वाष्पीकरण कम करके नमी बनाए रखना।

      • फसल चक्र में दाल वाली फसलें व घासों को शामिल करना (मृदा संरक्षी फसलें)।

      • भूमि को पडती (खाली) नहीं छोड़ना।

      • पशुओं की चराई बंद करना।

    2. वायुरोधी वृक्ष पट्टियाँ:

      • वायु की गति मंद करने के लिए हवा आने की दिशा के समकोण विपरीत दिशा में वृक्षों, झाड़ियों व घासों की सुनियोजित पट्टियाँ लगाना।

      • क्षरण कम करती हैं, वाष्पीकरण रोकती हैं।

      • सबसे अच्छी पट्टी पिरामिड आकार की: छोटे वृक्ष (हवा आने की दिशा में) → थोड़े बड़े → सबसे बड़े (हवा जाने वाली दिशा में)।

      • प्रमुख वृक्ष: बबूल, नीम, शीशम, जामुन, इमली, बेर, अमलताश।

    3. मिट्टी के टीलों को आच्छादित रखना:

      • मिट्टी के टीलों पर क्षेत्रीय झाड़ियाँ लगाना (पलवार का काम, मिट्टी उड़ने में बाधा, टीलों को स्थिर रखना)।

      • उदाहरण: खींप, झड़बेरी, फोग, बुई।

    4. अन्य: रेगिस्तानी क्षेत्र में उगने वाले पेड़, झाड़ियाँ, घासें (जैसे खेजड़ी, शीशम, रोहिड़ा, सेवन घास, अंजन घास) भी सहायक हैं।

4. बीज (Seed)

  • महत्व:

    • फसल उत्पादन में सर्वोपरि स्थान।

    • सफलता गुणवत्ता युक्त बीजों पर निर्भर।

    • सिंचाई, खाद, शाकनाशी, कवकनाशी, कीटनाशी आदि की सफलता भी बीज की गुणवत्ता व ओज क्षमता पर आधारित।

    • भारत में केवल 12% उन्नत बीज उपलब्ध, वितरण बढ़ाने की आवश्यकता।

  • बीज की परिभाषा:

    • सामान्य: दाना, फल, पत्ती, जड़ या तने का वह भाग जो अपने समान स्वस्थ पौधे को जन्म देता है।

    • तकनीकी: पुष्प का परिपक्व बीजांड, जिसमें सूक्ष्म भ्रूण व भ्रूणपोष सुरक्षात्मक आवरण से ढका रहता है।

    • संक्षेप में: जीवित भ्रूण वाला दाना जो बुवाई के काम आता है।

  • उत्तम बीज के गुण (Characteristics of good quality seed):

    • वह किस्म जो स्थानीय किस्म के मुकाबले 10-15% अधिक उपज देती हो, विभिन्न जलवायु व मिट्टी के प्रति अनुकूल हो, तथा निश्चित समय पर परिपक्व होती हो।

    1. आनुवंशिक शुद्धता (Genetic purity):

      • मुख्य लक्षण।

      • किस्म के अनुरूप आकार-प्रकार, रंग-रूप, वजन के लक्षण।

      • आकार व रंग में एक समान व चमकीले।

    2. भौतिक शुद्धता (Physical purity):

      • अन्य फसलों, किस्मों, खरपतवार के बीजों की मिलावट नहीं।

      • कंकर-पत्थर, मिट्टी, कूड़ा-कचरा, फसल अवशेष, भूसा आदि से मुक्त।

      • मिलावट से वांछित पौधों की संख्या घटती है, खरपतवार प्रतिस्पर्धा करते हैं, उपज व गुणवत्ता घटती है।

    3. बीज ओज (Seed vigour):

      • बीज की उम्र, आकृतिक व क्रियात्मक स्वस्थता।

      • तीव्रता से समान अंकुरण व पौधों का विकास।

      • पर्याप्त ओज = तेज गति से पौधे की बढ़वार।

      • कम ओज = धीमी बढ़वार, उपज व गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव।

      • पुराने बीजों का ओज घटता जाता है।

    4. उच्च अंकुरण क्षमता (High germinability):

      • खेती में उगे पौधों की संख्या व उपज से सीधा संबंध।

      • बीज की मात्रा अंकुरण प्रतिशत पर तय होती है।

      • अंकुरण प्रतिशत = (अंकुरित बीजों की संख्या / बोये गए बीजों की संख्या) × 100

      • न्यूनतम अंकुरण क्षमता (उदाहरण):

        • गेहूँ, जौ, चना: 85%

        • धान, ज्वार, तिल, बरसीम, रिजका: 80%

        • बाजरा, मूंग, मोठ, उड़द, अरहर, चंवला: 75%

        • मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, ग्वार: 70%

        • कपास: 65%

    5. नमी की मात्रा (Moisture content):

      • निर्धारित मात्रा से अधिक नहीं होनी चाहिए।

      • अधिक आर्द्रता: कवक/कीट प्रकोप, अंकुरण क्षमता कम, बीज ओज पर विपरीत प्रभाव।

      • अनाज के बीजों में भंडारण के समय नमी 12% से अधिक नहीं होनी चाहिए।

    6. रोगमुक्तता (Free from diseases):

      • निरोग, रोगाणु व कीट व्याधि प्रकोप रहित।

      • रोगग्रस्त/कीटग्रस्त बीज की अंकुरण क्षमता कम।

      • कई रोगों के विषाणु/जीवाणु बीजों के साथ लगे होते हैं।

    7. परिपक्वता (Maturity):

      • पूर्णरूप से परिपक्व, साफ, सुडौल आकार का।

      • परिपक्व बीज: चमकीला, साफ, भरा हुआ।

      • अपरिपक्व बीज: सिकुड़े, छोटे, बदरंग, कम अंकुरण, कमजोर पौधे, प्रतिकूल दशाओं से संघर्ष की क्षमता कम।

    8. वास्तविक उपयोगिता मान (Real value):

      • उत्तम बीज का वास्तविक उपयोगिता मान 75% से कम नहीं होना चाहिए।

      • वास्तविक उपयोगिता मान = (अंकुरण प्रतिशत × शुद्धता प्रतिशत) / 100

    9. बीज की जीवन क्षमता (Seed longevity):

      • जीवित भ्रूण होना चाहिए जिसमें अंकुरण क्षमता हो।

      • भ्रूण क्षतिग्रस्त होने पर जीवन क्षमता नष्ट।

      • बीज के कट जाने, गल जाने, रोग या भंडारण दोषों से प्रभावित होने पर जीवन क्षमता प्रभावित होती है। बुवाई से पहले ज्ञात करना लाभदायक।

3. बीजोत्पादन (Seed Production)

  • परिचय: वैज्ञानिकों द्वारा विकसित उन्नत किस्मों के बीजों की प्रारंभिक मात्रा सीमित होती है। अतः, निर्धारित मापदंडों का पालन करते हुए इन बीजों का गुणन आवश्यक है ताकि किसानों को समय पर उन्नत बीज उपलब्ध हो सकें।

  • उत्पादन स्थल: राजकीय फार्म, विश्वविद्यालय के कृषि फार्म, प्रगतिशील कृषकों के खेत (प्रमाणित बीज उत्पादन कार्यक्रम के तहत)।

  • बीज की श्रेणियाँ (उत्पादन प्रक्रिया): उत्तम बीज प्रयोगशाला से किसानों तक चार श्रेणियों में पहुँचता है:

    1. मूल केन्द्रक बीज या न्यूक्लियस सीड (Nucleus Seed):

      • किसी उन्नत किस्म के बीजों की प्रारंभिक मात्रा।

      • शत-प्रतिशत शुद्ध।

      • पादप प्रजनक की देख-रेख में उत्पादित।

    2. प्रजनक बीज या ब्रीडर सीड (Breeder Seed):

      • न्यूक्लियस सीड के गुणन से प्राप्त बीज।

      • आनुवंशिक एवं भौतिक दृष्टि से शत-प्रतिशत शुद्ध।

      • पादप प्रजनक की देख-रेख में कृषि अनुसंधान केन्द्रों पर उत्पन्न।

      • टैग: सुनहरे पीले रंग का।

      • स्रोत: आधार बीज का स्रोत।

    3. आधार बीज (Foundation Seed):

      • प्रजनक बीज से उत्पादित बीज।

      • बीज प्रमाणीकरण संस्था की देख-रेख में उत्पादन।

      • आनुवंशिक शुद्धता: 98 प्रतिशत तक।

      • टैग: सफेद रंग का।

      • स्रोत: प्रमाणित बीज का स्रोत।

    4. प्रमाणित बीज (Certified Seed):

      • आधार बीज से उत्पादित बीज।

      • प्रमाणीकरण संस्था की देख-रेख में उत्पादन।

      • प्रमाणित होता है कि आनुवंशिक व भौतिक शुद्धता, अंकुरण प्रतिशत, आर्द्रता मात्रा आदि प्रमाणीकरण मानकों के अनुरूप हैं।

      • टैग: नीले रंग का।

      • उपयोग: किसानों को फसल उत्पादन के लिए बेचा जाता है।

  • उत्तम बीज उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीकें:

    • यह एक ऐसी वैज्ञानिक विधि है जो आनुवंशिक शुद्धता, उच्च अंकुरण क्षमता, रोग रहित व अधिक पैदावार की क्षमता वाले बीजों का उत्पादन करती है।

    • मापदंडों का पालन: प्रमाणीकरण प्रक्रिया के मापदंडों (पृथक्करण दूरी, न्यूनतम बीज मापदंड) का पालन आवश्यक।

    • कृषक को ध्यान रखने योग्य बातें:

      1. बीज का चुनाव:

        • प्रजनक/आधार/प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें।

        • अन्य बीजों का मिश्रण न हो।

        • मान्यता प्राप्त बीज उत्पादक संस्थानों या विश्वविद्यालयों से ही खरीदें।

        • बीज की किस्म कृषि जलवायु खंड में अनुशंसित हो।

        • बीज जनित रोगों से बचाव हेतु फफूंदनाशी, कीटनाशी व शाकाणु संवर्ध से उपचारित करें।

        • खाली कट्टे, टैग, लेबल, बिल सुरक्षित रखें।

      2. पृथक्करण दूरी व खेत का चयन (Isolation Distance and Field Selection):

        • पृथक्करण दूरी: आनुवंशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए फसल की दो किस्मों के मध्य निश्चित दूरी। इसका अर्थ है कि बीज उत्पादन कार्यक्रम वाली फसल के चारों ओर एक निर्धारित दूरी तक दूसरे खेतों में वह फसल नहीं होनी चाहिए।

        • आवश्यकता: कुछ फसलों में परपरागण होता है, जिससे आनुवंशिक शुद्धता प्रभावित हो सकती है।

        • सारणी (उदाहरण): | फसल | पृथक्करण दूरी (मीटर) | | :------------------- | :----------------------- | | जौ, गेहूँ, जई व धान | 3 | | मक्का की संकुल किस्में | 400 | | संकर मक्का | 600 | | ज्वार | 200 | | चना | 10 | | सोयाबीन, मूंगफली | 3 |

        • खेत का चयन: पिछले मौसम में उसी फसल को न उगाया गया हो (स्वैच्छिक उगे पौधों से मुक्त होना चाहिए)।

      3. उन्नत सस्य क्रियाएँ:

        • बुवाई पूर्व सीड ड्रिल को अच्छी तरह साफ करें।

        • सिफारिशानुसार संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें।

        • फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करें।

        • उचित समय पर निराई-गुड़ाई करें (खरपतवार के बीजों का मिश्रण रोकने हेतु)।

        • रोगिंग (Rouging): खेत का नियमित निरीक्षण कर अन्य किस्मों के पौधे, असमान पौधे, रोगग्रस्त पौधे व खरपतवारों को उखाड़कर बाहर फेंकना। यह बीजों की गुणवत्ता व आनुवंशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

        • आवश्यकतानुसार पौध संरक्षण उपाय करें।

        • फसल की उचित समय पर कटाई (बीज के पूर्ण पकने पर)।

      4. गहाई (Threshing):

        • खलिहान को अच्छी प्रकार साफ करें।

        • गहाई मशीन को साफ कर सुनिश्चित करें कि अन्य बीजों का मिश्रण न हो।

        • थ्रेसर का आर.पी.एम. निश्चित करें ताकि बीज टूटे नहीं।

        • बीज हेतु नई बोरियों का प्रयोग करें या पुरानी बोरियों को अच्छी तरह साफ करें।

        • बीज को बोरों में भरने से पूर्व निर्धारित नमी तक सुखा लें।

      5. विधायन एवं भण्डारण (Processing and Storage):

        • विधायन (Processing): गहाई के बाद बीज को विधायन केन्द्रों पर भेजा जाता है, जहाँ इसे सुखाकर मशीनों द्वारा साफ व वर्गीकृत किया जाता है। आवश्यक बीजोपचार के पश्चात् उपयुक्त आकार के कट्टों व थैलियों में भरकर प्रपत्र के साथ सील कर दिया जाता है।

          • वर्गीकरण: एक ही आकार व वजन के पुष्ट बीजों का चयन कर छोटे, कटे व हल्के बीजों को अलग करना।

          • सफाई: भौतिक अशुद्धियों और अवांछित/आपत्तिजनक खरपतवार के बीजों को अलग करना।

        • भंडारण: बीजों को उचित नमी पर बोरों में भरकर गोदाम में रखें। भंडारण उपरांत गोदाम को धूमीकरण कर बंद कर दें। नियमित निरीक्षण करें।

    • प्रमाणीकरण: उत्तम प्रमाणित बीज उत्पादन एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके लिए प्रमाणीकरण संस्था की देख-रेख आवश्यक है। भारत में यह कार्य राष्ट्रीय बीज निगम (NSC) तथा राजस्थान में राजस्थान राज्य बीज निगम (RSSC) द्वारा किया जाता है।

4. बीज की सुषुप्तावस्था (Seed Dormancy)

  • परिभाषा: बीज की वह अवस्था जब इसकी सक्रिय वृद्धि कुछ काल के लिए निलंबित हो जाती है। पूर्णतः परिपक्व बीज अन्य सभी परिस्थितियाँ सामान्य होने पर भी अंकुरित नहीं हो पाता।

  • कारण: बीज की स्वयं की संरचनात्मक, रासायनिक या कार्यिकीय विशिष्टताएँ।

  • सुषुप्तावस्था के प्रकार (उत्पत्तिनुसार):

    1. प्राथमिक सुषुप्तावस्था (Primary Dormancy):

      • प्राकृतिक सुषुप्तावस्था, बीज की कार्यिकीय विशेषताओं से संबंधित।

      • फसल पकने पर कुछ बीज परिपक्व हो जाते हैं लेकिन अंकुरित नहीं होते।

      • शुष्क भंडारण से दूर की जा सकती है।

      • कारण: बीज कवच की कठोरता, भ्रूण का अल्प विकास, प्रकाश आवश्यकता, रासायनिक कारण।

    2. द्वितीयक सुषुप्तावस्था (Secondary Dormancy):

      • प्रेरित सुषुप्तावस्था (Induced dormancy)।

      • सामान्य परिस्थितियों के अभाव में बीज अंकुरित नहीं हो पाता, अतः असामान्य परिस्थितियों के कारण सुषुप्तावस्था प्राप्त कर लेता है।

    3. बलकृत सुषुप्तावस्था (Imposed/Enforced Dormancy):

      • बीजों के मृदा में अधिक गहराई में चले जाने के कारण होती है।

      • मुख्य कारण: प्रतिकूल तापक्रम, प्रकाश का पूर्ण अभाव, कार्बन-डाईऑक्साइड की अधिकता, मृदा का अधिक भार।

      • जैसे ही बीज मृदा के ऊपर आते हैं, अंकुरण योग्य हो जाते हैं।

      • अधिकांशतः खरपतवार के बीजों में उत्पन्न होती है।

      • अन्य कारण: बीज कवच का नमी/गैसों के प्रति अपारगम्य होना, पूर्ण भ्रूण विकास से पूर्व कठोर कवच निर्माण।

      • रासायनिक नियंत्रण: कई पादप अंतःस्राव (हार्मोन जैसे जिब्बरलिंस, साइटोकाइनिंस, इथालीन), अंकुरण निरोधी और अन्य जैव रसायन बीज के आवरण, भ्रूण या भ्रूणपोष में उपस्थित होकर सुषुप्तावस्था को नियंत्रित करते हैं।

  • बीज सुषुप्तावस्था को भंग करने की विधियाँ (कृत्रिम उपचार):

    • विधि व समय सुषुप्तावस्था के कारण व प्रकार पर निर्भर करता है।

    1. प्रकाश से उपचार (Light treatment):

    2. ताप से उपचार:

      • तापीय एकांतरण (Alternating temperature)

      • शीतन (Chilling)

      • उच्च ताप (High temperature)

    3. पश्य परिपक्वन (Post-maturation): भंडारण द्वारा।

    4. क्षय चिह्न (Scarification):

      • भौतिक (Physical) - जैसे खरोंचना।

      • रासायनिक (Chemical) - रसायनों का उपयोग।

    5. रसायनों से उपचार:

      • वृद्धि नियामक (जिब्बरलिंस, साइटोकाइनिंस, इथालीन)।

      • पादप उत्पाद।

      • श्वसन निरोधक ऑक्सीकारक।

      • नाइट्रोजन/सल्फर युक्त यौगिक।


महत्वपूर्ण बिन्दु (सारांश):

  1. शस्य विज्ञान: विज्ञान की वह शाखा जिसमें फसल उत्पादन व मृदा प्रबंधन के सिद्धांत व क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।

  2. शस्य विज्ञान का कार्य: कर्षण, उन्नत बीज, खाद व उर्वरक, सिंचाई व खरपतवार प्रबंधन, पौध संरक्षण, कटाई, गहाई, भंडारण व प्रक्रमण का समाधान।

  3. मृदा उर्वरता: प्राकृतिक कारक एवं कृत्रिम कारक प्रभावित करते हैं।

  4. मृदा उत्पादकता: फसल उत्पादन की अनुकूल परिस्थितियों में किसी मृदा की फसल पैदा करने की क्षमता, जिसे सामान्यतया रुपयों में या प्रति हेक्टेयर उपज के रूप में मापते हैं।

  5. उर्वरता व उत्पादकता संबंध: उत्पादक मृदा निश्चित रूप से उर्वर होती है, परंतु उर्वर मृदा सदैव उत्पादक नहीं हो सकती।

  6. मृदा क्षरण: भूमि के कणों का अपने स्थान से हटना एवं अन्यत्र स्थानांतरित होना। दो प्रकार: प्राकृतिक क्षरण व त्वरित क्षरण।

  7. मृदा संरक्षण: मृदा को विभिन्न क्षरण शक्तियों द्वारा कटने एवं स्थानांतरित होने से बचाने के उपाय।

  8. बीज के प्रकार: चार प्रकार: मूल केन्द्रक बीज, प्रजनक बीज, आधार बीज एवं प्रमाणित बीज। प्रयोगशाला से किसानों तक इन चार चरणों में पहुँचता है।

  9. पृथक्करण दूरी: बीजोत्पादन में आनुवंशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए फसल की दो किस्मों के मध्य एक निश्चित दूरी, जो भिन्न-भिन्न फसलों के लिए अलग-अलग होती है।

  10. सुषुप्तावस्था: बीज की वह अवस्था जब इसकी सक्रिय वृद्धि कुछ काल के लिए निलंबित हो जाती है, जिससे बीज का अंकुरण नहीं हो पाता है। ये प्राकृतिक, द्वितीयक अथवा बलकृत होती है।