1.भारत में बेरोजगारी और निर्धनता आर्थिक विकास में मुख्य क्या रही हैं?
बाधाएं
2.श्रम शक्ति से क्या अभिप्राय है?
वे व्यक्ति जो कार्य कर रहे हैं या कार्य की तलाश में हैं या उपलब्ध हैं
3.जनसंख्या का वह घटक जो श्रम शक्ति का भाग नहीं है, क्या कहलाता है?
गैर-श्रम शक्ति
4.बेरोजगारी किस प्रकार की बेरोजगारी है?
अनैच्छिक बेरोजगारी
5.ऐच्छिक बेरोजगारी से क्या अभिप्राय है?
एक व्यक्ति अपने स्वयं के चुनाव के कारण बेरोजगार है
6.चक्रीय बेरोजगारी कब होती है?
जब अर्थव्यवस्था को कम श्रम शक्ति की आवश्यकता होती है
7.चक्रीय बेरोजगारी किस समय में होती है?
अवसाद अथवा मंदी में
8.मौसमी बेरोजगारी आमतौर से किन उद्योगों में पाई जाती है?
कृषि, पर्यटक, होटल, भोजन का प्रबंध करने जैसे उद्योगों में
9.संरचनात्मक बेरोजगारी किस कारण उत्पन्न होती है?
मांग के स्वरूप में दीर्घकालीन परिवर्तन के कारण
10.संघर्षात्मक बेरोजगारी कब होती है?
जब कोई व्यक्ति एक रोजगार को छोड़कर दूसरे रोजगार की तलाश में होता है
11.संघर्षात्मक तथा संरचनात्मक बेरोजगारी के योग को क्या कहते हैं?
बेरोजगारी की प्राकृतिक दर
12.प्रच्छन्न बेरोजगारी को परिभाषित करने वाली सीमांत उत्पादकता क्या होती है?
शून्य
13.बेरोजगारी की दर की गणना का सूत्र क्या है?
बेरोजगार श्रमिक/कुल श्रम शक्ति \times 100
14.भारत में रोजगार व बेरोजगारी पर सबसे अधिक विस्तृत और विश्वसनीय आंकड़े कौन संकलित करता है?
राष्ट्रीय निदर्श सर्वेक्षण संगठन (NSSO)
15.सामान्य प्रमुख अवस्था बेरोजगारी (UPS) किन लोगों के लिए अधिक उपयुक्त माप है?
जो नियमित रोजगार की तलाश में होते हैं (शिक्षित व कुशल व्यक्ति)
16.सामान्य प्रमुख अवस्था बेरोजगारी को और किस नाम से जाना जाता है?
खुली बेरोजगारी
17.वर्तमान साप्ताहिक अवस्था (CWS) बेरोजगारी का माप किस प्रकार की अवधि की बेरोजगारी को दर्शाता है?
अल्पकालीन अवधि की
18.टी.एस. पपोला के अनुसार, कृषि और विनिर्माण क्षेत्रकों में उत्पादन वृद्धि किस प्रकार की रही है?
तकनीक गहन अधिक तथा श्रम गहन कम
19.श्रम शक्ति में वृद्धि लाने वाले दो महत्त्वपूर्ण कारक कौन से हैं?
जनसंख्या में तीव्र वृद्धि तथा सामाजिक कारक (स्त्रियों की शिक्षा)
20.शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी मुख्य रूप से किसके कारण हुई है?
ग्रामीण जनसंख्या का शहरी क्षेत्रों को प्रवासन
21.वर्तमान शिक्षा प्रणाली का दोष क्या है?
सैद्धांतिक पक्ष पर अधिक आधारित और व्यावहारिक उपयोगिता सीमित
22.निर्धनता को सामान्य रूप से किस स्थिति के रूप में परिभाषित किया जाता है?
जिसमें लोग अपनी मौलिक आवश्यकताओं को भी संतुष्ट करने में असमर्थ होते हैं
23.पहले (1979 में) ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा किस कैलोरी के भोजन पर आधारित थी?
2400 कैलोरी
24.सुरेश तेंदुलकर कमेटी ने निर्धनता रेखा को किस पर व्यय के आधार पर परिभाषित किया?
भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, परिवहन पर व्यय
25.2009-10 के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय के लिए निर्धनता रेखा कितनी निर्धारित की गई?
673 रु.
26.निर्धनता के दुष्चक्र का विचार किस अर्थशास्त्री द्वारा दिया गया है?
रैगनर नर्सकी
27.नीची जाति के लोगों में ऊंची जाति के लोगों का वर्चस्व पहले की किस समस्या का कारण रहा है?
निर्धनता
28.एमजीएनआरईजीए योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में कितने दिन का वेतन रोजगार गारंटी से प्राप्त करना है?
कम-से-कम 100 दिन का
29.किस राज्य में प्रति व्यक्ति आय सबसे कम (गरीब) है (2010-11 के आंकड़ों के अनुसार)?
बिहार
30.अंग्रेजों ने अपने उद्योग मुख्य रूप से किन दो राज्यों में केंद्रित रखे थे?
पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र
1
श्रम शक्ति (Labour Force) में कौन से दो प्रकार के व्यक्ति सम्मिलित होते हैं?
श्रम शक्ति में रोजगार युक्त व्यक्ति (जो कार्य कर रहे हैं) तथा बेरोजगार व्यक्ति (जो कार्य की तलाश में हैं या उपलब्ध हैं) दोनों सम्मिलित होते हैं।
2
ऐच्छिक बेरोजगारी और अनैच्छिक बेरोजगारी में मुख्य अंतर क्या है?
ऐच्छिक बेरोजगारी में व्यक्ति प्रचलित मजदूरी की दर पर कार्य नहीं करना चाहता है, जबकि अनैच्छिक बेरोजगारी में व्यक्ति कार्य करने के लिए इच्छुक तथा योग्य होते हुए भी कार्य उपलब्ध न होने के कारण बेरोजगार होता है।
3
संरचनात्मक बेरोजगारी किस प्रकार उत्पन्न होती है?
यह तब उत्पन्न होती है, जब किसी व्यक्ति की योग्यता उसके कार्य की आवश्यकता के लिए पर्याप्त नहीं होती है। यह मांग के स्वरूप में दीर्घकालीन परिवर्तन के कारण होती है तथा व्यक्ति नई प्रौद्योगिकी को सीखने में असमर्थ रहता है।
4
प्रच्छन्न बेरोजगारी का क्या अर्थ है?
प्रच्छन्न बेरोजगारी वह है जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे। यह उस समय होती है, जबकि कोई व्यक्ति उत्पादन में कोई योगदान नहीं देता, जबकि प्रत्यक्ष रूप से कार्य करता हुआ दिखाई देता है, यानी उसकी सीमांत उत्पादकता शून्य होती है।
5
अल्प बेरोजगारी (Underemployment) से आप क्या समझते हैं?
यह वह स्थिति है, जिसमें कोई व्यक्ति किसी आर्थिक गतिविधि में संलग्न तो है, परंतु वह रोजगार उसे उसकी योग्यता और प्रयास के अनुसार पूर्ण रोजगार नहीं दे पाता, जैसे मुआवजे, कार्य के घंटे, या कौशल के स्तर के अनुरूप कार्य न मिलना।
6
राष्ट्रीय निदर्श सर्वेक्षण संगठन (NSSO) बेरोजगारी के कौन से चार विभिन्न माप उपलब्ध कराता है?
NSSO बेरोजगारी के चार माप: सामान्य प्रमुख अवस्था (UPS), सामान्य प्रमुख तथा सहायक अवस्था (UPSS), वर्तमान साप्ताहिक अवस्था (CWS) और वर्तमान दैनिक अवस्था (CDS) उपलब्ध कराता है।
7
वर्तमान दैनिक अवस्था (CDS) बेरोजगारी का माप क्या दर्शाता है?
वर्तमान दैनिक अवस्था का माप उन व्यक्तियों की संख्या से है, जिन्हें सर्वेक्षण सप्ताह में एक दिन या किसी दिन भी रोजगार नहीं मिलता। यह खुली और आंशिक बेरोजगारी दोनों को दर्शाता है।
8
भारत में बेरोजगारी के लिए 'धीमी आर्थिक संवृद्धि' कैसे जिम्मेदार है?
आयोजन काल में संवृद्धि दर का झुकाव लक्ष्य दर से काफी कम था, इसलिए पर्याप्त रोजगार सृजित नहीं हुए। हाल के वर्षों में संवृद्धि दर बढ़ने पर भी, तकनीक गहन उत्पादन के कारण रोजगार संवृद्धि में गिरावट आई है।
9
ग्रामीण-शहरी प्रवासन शहरी बेरोजगारी को कैसे बढ़ाता है?
ग्रामीण क्षेत्र कृषि में जीविकोपार्जन देने में असमर्थ रहे हैं, इसलिए बड़े पैमाने पर प्रवासन हो रहा है। शहर भी नए श्रमिकों को काफी अतिरिक्त रोजगार देने में असफल रहते हैं, जिससे वे बेरोजगारों की फौज में वृद्धि करते हैं।
10
भारत में 'अनुपयुक्त तकनीक' का प्रयोग बेरोजगारी को कैसे बढ़ाता है?
भारत में श्रम की अधिकता होने पर भी, पूँजी गहन तकनीक को अपनाया जा रहा है, क्योंकि श्रम के नियम कठोर हैं और श्रमिकों में अशांति के कारण संस्थानों द्वारा श्रम बचाओ तकनीकी के प्रयोग को प्रोत्साहन दिया जाता है।
11
दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली बेरोजगारी को कैसे बढ़ाती है?
वर्तमान शिक्षा प्रणाली सैद्धांतिक पक्ष पर अधिक आधारित है और कौशल/तकनीकी योग्यता पर बल नहीं देती। इससे कौशल की आवश्यकता तथा उपलब्धता में असंतुलन उत्पन्न हो गया है, जिसके कारण शिक्षित लोगों में बेरोजगारी बढ़ गई है।
12
तेंदुलकर कमेटी (2009) ने निर्धनता रेखा को परिभाषित करने के लिए कौन-सा आधार इस्तेमाल किया?
तेंदुलकर कमेटी ने निर्धनता रेखा को भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, परिवहन पर व्यय के आधार पर परिभाषित किया, जो पहले केवल कैलोरी व्यय पर आधारित थी।
13
2004-05 से 2009-10 की अवधि में भारत में निर्धनता अनुपात में कितनी कमी आई?
इस अवधि में भारत में निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत 37.2 प्रतिशत से घटकर 29.8 प्रतिशत हो गया, जो कि 1.5% की दर प्रतिवर्ष कम हुई है।
14
'गरीबी का दुष्चक्र' क्या है?
यह विचार रैगनर नर्सकी द्वारा दिया गया है, जिसमें बचत का नीचा स्तर निवेश की सीमा को घटाता है और निवेश का नीचा स्तर कम आय पैदा करता है। इस प्रकार, निर्धनता का चक्र अनिश्चित काल तक चलता रहता है।
15
आय और परिसंपत्तियों के वितरण में असमानता निर्धनता का कारण कैसे बनती है?
असमानता का अर्थ है कि आर्थिक संवृद्धि के लाभों का केन्द्रीयकरण हो गया है और निम्न आय वर्ग के उपभोग में सुधार नहीं हो पाया। परिणामस्वरूप, वह विकास के लाभ से वंचित रहा है और निर्धनता में बना रहा है।
16
कीमत वृद्धि (Inflation) निर्धनता को कैसे बढ़ाती है?
बढ़ती हुई कीमतों से मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है और मुद्रा आय का वास्तविक मूल्य घट जाता है। इससे निम्न आय वर्ग के लोगों को विवश होकर अपना उपभोग कम करना पड़ता है और वे निर्धनता रेखा से नीचे चले जाते हैं।
17
MGNREGA योजना के दो उद्देश्य लिखिए।
पहला उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की आजीविका सुरक्षा में वृद्धि करना है, जिसके तहत 100 दिन का वेतन रोजगार गारंटी से दिया जाता है। दूसरा उद्देश्य धारणीय विकास को प्रोत्साहन देना, जैसे सूखा, वनों का काटना और भूमि के कटाव के कारणों को दूर करना है।
18
ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता के मुख्य सामाजिक कारण क्या हैं?
निर्धनता के सामाजिक कारणों में शिक्षा का निम्न स्तर, जाति प्रथा की दृढ़ता, और ग्रामीण लोगों द्वारा सामाजिक प्रथाओं (जैसे शादी, मृत्यु भोज) पर अधिक व्यय कर ऋण लेना शामिल है।
19
भारत में प्रदेशीय विषमता (Regional Inequality) के किन्हीं दो उदाहरणों का उल्लेख कीजिए।
भारत के विभिन्न राज्यों में प्रति व्यक्ति आय में भारी अंतर है, जैसे बिहार (सबसे गरीब, लगभग ₹12,000 प्रति व्यक्ति आय) और गोवा (सबसे धनी, लगभग ₹1,00,000 प्रति व्यक्ति आय)।
20
ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता का मुख्य कारण 'कृषि में नीची उत्पादकता' क्यों है?
कृषि में नीची उत्पादकता का मुख्य कारण खेतों का छोटे-छोटे और बिखरे हुए होना, पूंजी का अभाव, कृषि की परंपरागत विधियों का प्रयोग और अशिक्षा आदि है, जिससे किसानों की आय कम होती है।
3. लघुत्रात्मक प्रश्न (10 प्रश्न)
ये प्रश्न संक्षिप्त पैराग्राफ या 3-4 वाक्यों में उत्तर की मांग करते हैं।
प्रश्न: अनैच्छिक बेरोजगारी को आगे किन भागों में विभाजित किया जा सकता है? प्रत्येक का एक-एक वाक्य में अर्थ स्पष्ट कीजिए। उत्तर: अनैच्छिक बेरोजगारी को चक्रीय, मौसमी, संरचनात्मक, संघर्षात्मक तथा प्रच्छन्न बेरोजगारी में विभाजित किया जा सकता है। चक्रीय बेरोजगारी मंदी या अवसाद के कारण समग्र मांग में कमी से होती है। मौसमी बेरोजगारी वर्ष के एक विशेष समय में होती है, जैसे कृषि में। संरचनात्मक बेरोजगारी नई प्रौद्योगिकी या मांग के दीर्घकालीन परिवर्तन के कारण योग्यता में कमी से होती है। संघर्षात्मक बेरोजगारी एक रोजगार छोड़कर दूसरे की तलाश के अंतरिम समय में होती है। प्रच्छन्न बेरोजगारी में व्यक्ति कार्यरत दिखता है, लेकिन उत्पादन में कोई योगदान नहीं देता (सीमांत उत्पादकता शून्य)।
प्रश्न: भारत में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में होने वाले प्रवासन को बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण क्यों माना जाता है? उत्तर: ग्रामीण क्षेत्र, कृषि तथा संबद्ध कार्यकलापों में जीविकोपार्जन देने में असमर्थ रहे हैं, जिसके कारण लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर बड़े पैमानों पर पलायन कर रहे हैं। शहरों में आर्थिक विकास नए आने वाले श्रमिकों को पर्याप्त अतिरिक्त रोजगार देने में असफल रहा है। इस प्रकार, केवल कुछ ही लोग उत्पादन गतिविधियों में लग पाते हैं और शेष बेरोजगारों की फौज में वृद्धि करते हैं, जिससे शहरी बेरोजगारी की समस्या बढ़ जाती है।
प्रश्न: भारत में श्रम शक्ति में वृद्धि लाने वाले दो महत्त्वपूर्ण कारक कौन से हैं और वे बेरोजगारी को कैसे प्रभावित करते हैं? उत्तर: श्रम शक्ति में वृद्धि लाने वाले दो महत्त्वपूर्ण कारक हैं: जनसंख्या में तीव्र वृद्धि और सामाजिक कारक। बढ़ती जनसंख्या श्रम की पूर्ति में वृद्धि का कारण हुई है, और रोजगार अवसरों में वृद्धि न होने के कारण बेरोजगारी की समस्या बढ़ी है। स्त्रियों की शिक्षा ने उन्हें श्रम बाजार में पुरुषों के साथ प्रतियोगिता करने के लिए प्रेरित किया है। अर्थव्यवस्था इन चुनौतियों का सामना करने में असफल रही है, जिसका शुद्ध परिणाम स्थाई बेरोजगारी में लगातार वृद्धि है।
प्रश्न: भारत में 'अनुपयुक्त तकनीक' का प्रयोग बेरोजगारी को कैसे बढ़ाता है? उत्तर: भारत में श्रम की अधिकता होने पर भी, उत्पादक श्रम के स्थान पर पूँजी का अधिक प्रयोग कर रहे हैं, जिससे बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। इसका एक कारण यह है कि श्रम के नियम कठोर हैं, जिससे श्रमिकों को आसानी से काम पर लगाना तथा हटाना कठिन है। इसके अतिरिक्त, श्रमिकों में अशांति तथा काम करने के उचित आचरण में कमी से श्रम की कार्य कुशलता में कमी आई है, जिससे संस्थानों द्वारा श्रम बचाओ तकनीकी के प्रयोग को प्रोत्साहन दिया जाता है।
प्रश्न: निर्धनता रेखा की अवधारणा को ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए जैसा कि तेंदुलकर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर योजना आयोग ने अनुमान लगाया था। उत्तर: निर्धनता रेखा परिवार की आय को परिभाषित करती है, जिससे कम आय वाले परिवारों को निर्धन माना जाता है। योजना आयोग ने तेंदुलकर कमेटी की सिफारिशों के अनुसार 2009-10 के लिए निर्धनता रेखा का अनुमान लगाया। इसके अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय 673 रु. तथा शहरी क्षेत्रों में 860 रु. प्रति माह निर्धारित किया गया। कोई व्यक्ति जो इन सीमाओं से कम व्यय करता है, उसे निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाला परिभाषित किया जाता है।
प्रश्न: संस्थागत साख (Institutional Credit) तक पहुंच का अभाव निर्धनता को कैसे बढ़ाता है? उत्तर: बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थाएं निर्धन लोगों को ऋण देने में पक्षपात करती हैं, क्योंकि उन्हें ऋण भुगतान न होने का डर होता है, साथ ही जमानत और दस्तावेज जैसे नियम रुकावट डालते हैं। संस्थागत ऋण पहुंच से बाहर होने के कारण, निर्धन लोगों को भू-स्वामी तथा अन्य अनियमित स्रोतों से बहुत ऊंची ब्याज की दर पर ऋण लेने के लिए विवश होना पड़ता है। इससे वे ऋण के जाल में फंस जाते हैं और ऋणग्रस्तता के कारण उनकी निर्धनता और अधिक बढ़ जाती है, जिससे वे पीढ़ियों तक निर्धनता रेखा से नीचे रहते हैं।
प्रश्न: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) के मुख्य प्रावधान क्या हैं? उत्तर: MGNREGA का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की आजीविका सुरक्षा में वृद्धि करना है। इसके तहत प्रत्येक परिवार का कोई वयस्क सदस्य, जो अकुशल कार्य करना चाहता है, एक वर्ष में कम-से-कम 100 दिन का वेतन रोजगार गारंटी से प्राप्त कर सकता है, जिसमें एक-तिहाई भाग स्त्रियों का होगा। यह योजना कार्य के माध्यम से प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को दृढ़ करती है और दीर्घकालीन निर्धनता के कारणों को दूर कर धारणीय विकास को प्रोत्साहन देती है।
प्रश्न: ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता के मुख्य सामाजिक कारण क्या हैं? उत्तर: ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता के मुख्य सामाजिक कारणों में शामिल हैं: शिक्षा का निम्न स्तर, क्योंकि निर्धन लोगों के पास मानव पूँजी निवेश के लिए निधि नहीं होती, जिससे उनकी आय सीमित होती है। जाति प्रथा, जिसके कारण नीची जाति के लोग बहुत-सी आर्थिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सके और निर्धन रहे। सामाजिक प्रथाएं, जैसे शादी, मृत्यु भोज आदि पर ग्रामीण लोग अपनी कमाई का अधिक प्रतिशत व्यय करते हैं और इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऋण लेते हैं, परिणामस्वरूप वे ऋण तथा निर्धनता में रहते हैं।
प्रश्न: भारत में प्रदेशीय विषमताओं में वृद्धि के लिए 'ऐतिहासिक कारक' कैसे जिम्मेदार रहे हैं? उत्तर: भारत में ऐतिहासिक क्षेत्रीय असंतुलन अंग्रेजी शासन काल से प्रारंभ हुआ। अंग्रेज उद्योगपति अपनी आर्थिक गतिविधियां मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र जैसे महानगरों (कोलकाता, मुंबई, चेन्नई) में केंद्रित रखते थे। उन्होंने अपने समस्त उद्योग इन नगरों में तथा उनके आस-पास केंद्रित किए और शेष देश को पिछड़ा रहने के लिए तिरस्कृत कर दिया। इस औपनिवेशिक नीति के कारण ही इन क्षेत्रों के बीच विकास का बड़ा अंतर पैदा हुआ।
प्रश्न: भारत में प्रदेशीय विषमताओं में वृद्धि के लिए 'सार्वजनिक निवेश में गिरावट' कैसे उत्तरदायी है? उत्तर: नई आर्थिक नीति में सरकार ने आर्थिक गतिविधियों में अपनी भूमिका सीमित की और निजी क्षेत्र को अधिक स्थान दिया गया, जिससे सार्वजनिक निवेश में लगातार गिरावट आई है। सार्वजनिक क्षेत्र का निर्धन राज्यों की संवृद्धि में मुख्य योगदान रहा है, विशेषकर सिंचाई, बिजली तथा सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं में बहुत अधिक निवेश के माध्यम से। सार्वजनिक निवेश में इस गिरावट का निर्धन राज्यों की विकास प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिससे गरीब और धनी क्षेत्रों के बीच विषमता और बढ़ी है।
4. निबंधात्मक प्रश्न (5 प्रश्न)
ये प्रश्न व्यापक और विस्तृत उत्तर की मांग करते हैं।
प्रश्न: भारत में बेरोजगारी के मुख्य कारणों का विस्तार से मूल्यांकन कीजिए। उत्तर: भारत में बेरोजगारी की समस्या के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
धीमी आर्थिक संवृद्धि: नियोजन काल में संवृद्धि दर लक्ष्य से कम रही, जिससे पर्याप्त रोजगार सृजित नहीं हुए। हाल के वर्षों में, उत्पादन वृद्धि तकनीक गहन अधिक तथा श्रम गहन कम रही है, जिसके कारण आर्थिक संवृद्धि में वृद्धि होते हुए भी रोजगार संवृद्धि में गिरावट आई है। इसके अतिरिक्त, कृषि पर अधिक निर्भरता तथा गैर-कृषि गतिविधियों की धीमी संवृद्धि रोजगार सृजन को सीमित करती है।
श्रम शक्ति में तीव्र वृद्धि: जनसंख्या में तीव्र वृद्धि तथा स्वतंत्रता के पश्चात् स्त्रियों की शिक्षा के कारण श्रम शक्ति में वृद्धि हुई है। अर्थव्यवस्था बढ़ती हुई श्रम शक्ति के अनुसार रोजगार अवसरों में वृद्धि करने में असफल रही है, जिससे स्थाई बेरोजगारी में लगातार वृद्धि हुई है।
ग्रामीण-शहरी प्रवासन: ग्रामीण क्षेत्र कृषि तथा संबद्ध कार्यकलापों में जीविकोपार्जन देने में असमर्थ रहे हैं, इसलिए बड़े पैमाने पर प्रवासन शहरी क्षेत्रों की ओर हो रहा है। शहरों में आर्थिक विकास नए आने वाले श्रमिकों को पर्याप्त अतिरिक्त रोजगार देने में असफल रहा है, जिससे शहरों में बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि होती है।
अनुपयुक्त तकनीक: भारत में श्रम की अधिकता होने पर भी, पूँजी गहन तकनीक को अपनाया जा रहा है। इसका कारण कठोर श्रम नियम (आसानी से काम पर लगाने तथा हटाने की नीति का कठिन होना) है। इसके अतिरिक्त, श्रमिकों में अशांति और कार्य कुशलता में कमी के कारण भी संस्थान श्रम बचाओं तकनीकी के प्रयोग को प्रोत्साहन देते हैं, जिससे बेरोजगारी बढ़ती है।
दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली: वर्तमान शिक्षा प्रणाली सैद्धांतिक पक्ष पर अधिक आधारित है और कौशल तथा तकनीकी योग्यता पर बल नहीं देती। इससे कौशल की आवश्यकता तथा उपलब्धता में असंतुलन उत्पन्न हो गया है, जिसके कारण विशेष रूप से युवक और शिक्षित लोगों में बेरोजगारी बढ़ गई है, जबकि तकनीकी और विशिष्ट योग्यता प्राप्त व्यक्तियों की कमी जारी है।
ारी है।
प्रश्न: भारत में निर्धनता के लिए उत्तरदायी विभिन्न आर्थिक और गैर-आर्थिक (सामाजिक) कारकों का विस्तार से विश्लेषण कीजिए। उत्तर: भारत में निर्धनता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
आर्थिक कारक:
गरीबी का दुष्चक्र: बचत का नीचा स्तर निवेश की सीमा को घटाता है, और निवेश का नीचा स्तर कम आय पैदा करता है, जिससे निर्धनता का चक्र अनिश्चित काल तक चलता रहता है।
आय और परिसंपत्तियों के वितरण में असमानता: आर्थिक असमानताएं भारत में निर्धनता का प्रमुख कारण हैं। संवृद्धि के लाभों का केन्द्रीयकरण हुआ है और निम्न आय वर्ग विकास के लाभ से वंचित रहा है।
संस्थागत साख तक पहुंच का अभाव: बैंकों द्वारा निर्धनों को ऋण देने में पक्षपात, जमानत के नियम आदि के कारण गरीब लोग ऊंची ब्याज दर पर अनियमित स्रोतों से ऋण लेने के लिए विवश होते हैं, जिससे वे ऋण के जाल में फंस जाते हैं और उनकी निर्धनता बढ़ती है।
कीमत वृद्धि: बढ़ती हुई कीमतों से मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो गई है, जिससे निम्न आय वर्ग के लोगों को विवश होकर अपना उपभोग कम करना पड़ता है और वे निर्धनता रेखा से नीचे चले जाते हैं।
तीव्र जनसंख्या वृद्धि: जनसंख्या में वृद्धि से उपभोग बढ़ता है तथा राष्ट्रीय बचत कम होती है, जिससे पूंजी निर्माण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और राष्ट्रीय आय में वृद्धि सीमित हो जाती है।
ाती है।
गैर-आर्थिक (सामाजिक) कारक:
शिक्षा: निर्धनता शिक्षा के स्तर से घनिष्ट रूप से संबंधित है। निर्धन लोग मानव पूंजी निवेश के लिए निधि का अभाव रखते हैं, जिससे उनकी आय सीमित होती है।
जाति प्रथा: नीची जाति के लोगों में ऊंची जाति के लोगों का वर्चस्व पहले की निर्धनता का कारण रही है, जिसके कारण वे बहुत-सी आर्थिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सके।
सामाजिक प्रथाएं: ग्रामीण लोग प्रायः अपनी कमाई का अधिक प्रतिशत सामाजिक प्रथाओं (जैसे शादी, मृत्यु भोज) पर व्यय करते हैं और इसके लिए ऋण लेते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे ऋण तथा निर्धनता में रहते हैं।
में रहते हैं।
प्रश्न: भारत में निर्धनता उन्मूलन तथा रोजगार सृजन के लिए सरकार द्वारा लागू किए गए मुख्य कार्यक्रमों की विशेषताओं और उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। उत्तर: सरकार द्वारा निर्धनता उन्मूलन तथा रोजगार सृजन के लिए लागू किए गए मुख्य कार्यक्रम निम्नलिखित हैं:
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA):
उद्देश्य: ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की आजीविका सुरक्षा में वृद्धि करना और धारणीय विकास को प्रोत्साहन देना।
विशेषताएँ: प्रत्येक परिवार का कोई वयस्क सदस्य, जो अकुशल कार्य करना चाहता है, एक वर्ष में कम-से-कम 100 दिन का वेतन रोजगार गारंटी से प्राप्त कर सकता है। इसमें एक-तिहाई भाग स्त्रियों का होगा। इसका उद्देश्य सूखा, वनों का काटना और भूमि के कटाव जैसे दीर्घकालीन निर्धनता के कारणों को दूर करना है।
।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) / स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SJGSY):
उद्देश्य: सहायता दिए गए ग्रामीण निर्धन परिवारों को (स्व-रोजगारियों/बैंक ऋण तथा सरकारी आर्थिक सहायता के मिले-जुले माध्यम से आय सृजन की परिसंपत्तियां उपलब्ध कराकर) निर्धनता रेखा से ऊपर उठाना।
विशेषताएँ: इसकी स्थापना अप्रैल, 1999 में हुई। ग्रामीण निर्धनों को स्वयं सहायता वर्गों में व्यवस्थित किया जाता है, और उनकी क्षमता का निर्माण प्रशिक्षण और कौशल विकास के माध्यम से किया जाता है।
।
स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना (SJSRY):
उद्देश्य: शहरी बेरोजगार या अल्प रोजगार व्यक्तियों को स्व-रोजगार, साहसिक कार्य स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन देकर अथवा वेतन रोजगार के अवसर प्रदान करके लाभप्रद रोजगार उपलब्ध कराना।
विशेषताएँ: यह योजना 1 दिसंबर, 1997 में लागू की गई थी। यह शहरी क्षेत्रों की गरीबी और बेरोजगारी की समस्या को हल करने पर ध्यान केंद्रित करती है।
करती है।
प्रश्न: भारत में प्रदेशीय विषमता (Regional Inequality) की मात्रा और कारणों का विस्तार से मूल्यांकन कीजिए। उत्तर: प्रदेशीय विषमता की मात्रा: भारत में आर्थिक संवृद्धि के बावजूद, देश के विभिन्न प्रांतों में सामाजिक-आर्थिक विकास के स्तर में बहुत अधिक विषमता पाई जाती है। रहन-सहन के स्तर में भारी अंतर है, जिसे प्रति व्यक्ति आय से मापा जाता है। उदाहरण के लिए, विभिन्न राज्यों में प्रति व्यक्ति आय में अंतर है, जैसे बिहार में ₹12,000 प्रति व्यक्ति आय और गोवा में ₹1,00,000 प्रति व्यक्ति आय है। पिछले दशक में, गोवा, चंडीगढ़, दिल्ली तथा पांडुचेरी जैसे धनी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू राज्य उत्पाद में दूसरे क्षेत्रों से काफी तीव्र गति से वृद्धि हुई है, जबकि बिहार सबसे गरीब रहा है। प्रदेशीय विषमताओं में वृद्धि के कारण:
ऐतिहासिक कारक: अंग्रेजी शासन काल में ऐतिहासिक क्षेत्रीय असंतुलन प्रारंभ हुआ। अंग्रेजों ने अपनी आर्थिक गतिविधियां मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र (महानगरों) में केंद्रित रखीं, और शेष देश को पिछड़ा रहने के लिए तिरस्कृत कर दिया।
भौगोलिक कारक: भारत का बड़ा भू-भाग पहाड़ियों, नदियों तथा घने जंगलों से घिरा है, जो संसाधनों की गतिशीलता को कठिन बनाता है और योजनाओं की लागत को बढ़ाता है। प्रतिकूल जलवायु, बाढ़ आदि भी देश के विभिन्न क्षेत्रों के धीमे आर्थिक विकास के लिए उत्तरदायी रहे हैं, जिससे कृषि की उत्पादकता कम होती है।
आधारिक संरचना का अभाव: जिन राज्यों में आधारिक संरचना (शक्ति के साधन, जल, सड़कें, हवाई अड्डे) अच्छी तरह विकसित हैं, वे बड़ी निवेश योजनाओं को आकर्षित करते हैं और उनमें संवृद्धि की दर ऊंची होती है। मौलिक आधारिक संरचना के अभाव वाले गरीब राज्य निजी निवेश को आकर्षित करने में असफल रहते हैं, जिससे आय के वितरण में असमानता में वृद्धि होती है।
सार्वजनिक निवेश में गिरावट: नई आर्थिक नीति में सरकार ने आर्थिक गतिविधियों में अपनी भूमिका सीमित की, जिससे सार्वजनिक निवेश में लगातार गिरावट आई है। सार्वजनिक क्षेत्र का सिंचाई, बिजली तथा सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं में निवेश गरीब राज्यों की संवृद्धि में मुख्य योगदान रहा है। इसमें गिरावट का बहुत से क्षेत्रों के विकास प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
ड़ा है।
प्रश्न: चक्रीय, संरचनात्मक और प्रच्छन्न बेरोजगारी को उनके कारणों सहित विस्तार से समझाते हुए, यह बताइए कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कौन-सी बेरोजगारी अधिक पाई जाती है? उत्तर:
चक्रीय बेरोजगारी (Cyclical Unemployment): यह तब होती है जब अर्थव्यवस्था को कम श्रम शक्ति की आवश्यकता होती है। यह वस्तुओं और सेवाओं की समग्र मांग में संपूर्ण देश में कमी (अवसाद अथवा मंदी) के कारण उत्पन्न होती है, जिससे रोजगार कम हो जाता है। इसे चक्रीय बेरोजगारी कहते हैं, क्योंकि यह व्यापक चक्रों के कारण होती है, जैसे 2008 की वैश्विक मंदी में बहुत से श्रमिकों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा।
संरचनात्मक बेरोजगारी (Structural Unemployment): यह तब होती है जबकि किसी व्यक्ति की योग्यता उसके कार्य की आवश्यकता के लिए पर्याप्त नहीं होती। यह मांग के स्वरूप में दीर्घकालीन परिवर्तन तथा अर्थव्यवस्था की मौलिक संरचना को परिवर्तित करने के कारण उत्पन्न होती है। व्यक्ति नई प्रौद्योगिकी को सीखने में असमर्थ रहता है, और इसलिए स्थायी रूप से बेरोजगार हो जाता है, जैसे कंप्यूटर का प्रयोग शुरू होने पर पुराने कौशल वाले श्रमिकों को रोजगार नहीं मिला।
प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment): यह वह बेरोजगारी है जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे। यह उस समय होती है, जबकि कोई व्यक्ति उत्पादन में कोई योगदान नहीं देता, जबकि प्रत्यक्ष रूप से कार्य करता हुआ दिखाई देता है। इसका अर्थ है कि ऐसे व्यक्ति की सीमांत उत्पादकता शून्य होती है।
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्रमुख बेरोजगारी: प्रच्छन्न बेरोजगारी विशेष रूप से भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था (कृषि) में अधिक पाई जाती है। यहाँ कृषक के पारिवारिक सदस्य भूमि पर कार्य करने में संलग्न तो होते हैं, किंतु दिए हुए उत्पादन के स्तर में कोई योगदान नहीं देते। इसके अलावा, मौसमी बेरोजगारी भी कृषि क्षेत्र में प्रमुख रूप से पाई जाती है, क्योंकि कृषि कार्य वर्ष में एक विशेष समय या मौसम में ही उपलब्ध होत
हैं।
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