कक्षा 12वीं पर्यावरण पाठ 11 पर्यावरण और स्वास्थ्य पर आधारित प्रश्नोत्तर


​अति लघु उत्तरात्मक प्रश्नोत्तर (10 प्रश्न)

  1. स्वास्थ्य को परिभाषित कीजिए।
    • ​स्वास्थ्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की एक अवस्था है, न कि केवल रोग या दुर्बलता का अभाव।
  2. व्यवहारिक प्रभाव (Behavioural Effects) के कारण पैदा होने वाली किन्हीं दो स्वास्थ्य समस्याओं के उदाहरण दीजिए।
    • ​मद्यव्यसनिता और धूम्रपान के कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याएँ।
  3. शहरी क्षेत्रों में अनियोजित और अव्यवस्थित विकास (haphazard development) से पर्यावरण पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
    • ​इससे प्रदूषण और अवक्रमण (Degradation) बढ़ता है, जैसे उचित नालियों के अभाव में गंदे पानी का जमाव।
  4. जल-जनित रोगों के संचरण (Transmission) के दो मुख्य तरीके बताइए।
    • ​रोगजनक जीव जल/भोजन द्वारा संचारित होते हैं, और रासायनिक प्रदूषकों द्वारा।
  5. टाइफाइड रोग के दो प्रमुख लक्षण बताइए।
    • ​तेज बुखार, पेट में दर्द और सिरदर्द (विशेषकर शाम को अधिक)।
  6. वायु प्रदूषण के कारण होने वाले किन्हीं दो सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
    • ​आँखों में जलन और सूजन, और सिरदर्द।
  7. कार्सिनोजन (Carcinogen) किसे कहते हैं?
    • ​कैंसर उत्पन्न करने वाले एजेंटों को कार्सिनोजन कहते हैं (जैसे तम्बाकू का धुआँ, UV विकिरण)।
  8. अस्थमा (Asthma) को परिभाषित कीजिए।
    • ​यह श्वसन नलिकाओं की एक क्रॉनिक (दीर्घकालीन) बीमारी है, जिसमें वायु का प्रवाह बाधित होता है (वायु मार्ग सूज जाते हैं)।
  9. पारा (Mercury) विषाक्तता का एक प्रमुख कारण और एक लक्षण बताइए।
    • कारण: मिनामाता खाड़ी की मछलियाँ खाना (जलीय जीवों में पारद का जमाव)। लक्षण: चिड़चिड़ापन, स्मरणशक्ति की कमी, मसूड़ों में सूजन।
  10. उच्च स्तर के शोर (Noise Pollution) के संपर्क से श्रवण संबंधी कौन सी दो समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
    • ​श्रवण थकान (Hearing Fatigue) और बहरापन/बाधित श्रवण (Deafness).

​लघु उत्तरात्मक प्रश्नोत्तर (5 प्रश्न)

  1. गाँवों और नगरों/कस्बों की स्वच्छता और निवास स्थानों की समस्याओं में मुख्य अंतर क्या हैं?
    • गाँवों की समस्याएँ: मुख्य समस्या शुद्ध पेयजल की उपलब्धता और मल के अनुचित विसर्जन के कारण स्वच्छता का अभाव है। घर भी अक्सर उचित रूप से हवादार नहीं होते।
    • नगर/कस्बों की समस्याएँ: मुख्य रूप से नालियों की समुचित व्यवस्था का अभाव, जिससे गंदे पानी के गड्ढे बन जाते हैं। सड़कों पर जानवरों का मल और परिवहन साधनों से होने वाला वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या है।
  2. जल-जनित रोगों के संचरण में वाहक (Vector) की भूमिका स्पष्ट कीजिए और एक उदाहरण दीजिए।
    • ​वाहक (Vector) रोगजनक का संचरण एक जीव से दूसरे जीव या मानव तक करते हैं। मच्छर जैसे वाहक, जो अपना जीवन चक्र जल में बिताते हैं, रोगजनक को अपने साथ ले जाते हैं और काटने पर उसे मानव शरीर में पहुँचाते हैं।
    • उदाहरण: मादा एनोफिलिस मच्छर मलेरिया रोग के प्लास्मोडियम परजीवी को फैलाता है।
  3. कृषि, उद्योग और खनन क्षेत्रों से जुड़े प्रमुख वायु प्रदूषकों की सूची बनाइए।
    • कृषि: मेथेन गैस (धान के खेत से), कीटनाशक (वाष्प बनकर), धुआँ (पशुओं का मल, फसल का अवशेष जलाने से)।
    • उद्योग: धुआँ और राख (कोयले जैसे ईंधन से), कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, और अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें।
    • खनन: हवा में तैरने वाले कणीय पदार्थ (मुख्य प्रदूषक), आयरन ऑक्साइड, एस्बेस्टस डस्ट, और अल्फा/गामा विकिरण (यूरेनियम की खानों से)।
  4. कैंसरजन्य (Carcinogenic) पर्यावरणीय पदार्थों के उदाहरण दीजिए और उनके नियंत्रण की विधियाँ संक्षेप में बताइए।
    • उदाहरण: तम्बाकू का धुआँ/सेवन, पराबैंगनी (UV) विकिरण, आयोनाइजिंग विकिरण (एक्स-रे), कीटनाशक (2,4-D, टॉक्साफिन), औद्योगिक रसायन (एस्बेस्टस, निकिल, विनायल क्लोराइड)।
    • नियंत्रण विधियाँ:
      • तम्बाकू: धूम्रपान और तम्बाकू का सेवन छोड़ना।
      • UV विकिरण: तेज धूप में अनावृत न होना (10 बजे से 3 बजे तक), सुरक्षात्मक कपड़े और धूप के चश्मे का प्रयोग।
      • कीटनाशक: जैविक खेती और एकीकृत कीट नियंत्रण (IPM) को अपनाना।
      • रसायन/विकिरण: औद्योगिक कार्यस्थलों पर सुरक्षात्मक गियर का प्रयोग, आयोनाइजिंग विकिरण के सम्पर्क को कम से कम करना।
  5. व्यवसाय संबंधी स्वास्थ्य बाधाएँ (Occupational Health Hazards) क्या हैं? 'कृष्ण फुफ्फुस रोग' (Black Lung Disease) पर संक्षेप में टिप्पणी कीजिए।
    • व्यवसाय संबंधी स्वास्थ्य बाधाएँ: ये वे स्वास्थ्य समस्याएँ हैं जो किसी व्यक्ति के कार्य स्थल या व्यवसाय से जुड़ी होती हैं। इनमें चोटें, श्वसन रोग, कैंसर, श्रवण विकार आदि शामिल हैं।
    • कृष्ण फुफ्फुस रोग (Black Lung Disease): यह कोयले की खानों में काम करने वाले खनिकों में होने वाला एक दीर्घकालीन रोग है। कोयले की धूल के लंबे समय तक फेफड़ों में जमाव के कारण फेफड़ों का रंग स्वस्थ गुलाबी से काला हो जाता है। इससे साँस लेने की क्षमता घटती जाती है और यह हार्ट फेल का कारण भी बन सकता है। इसकी रोकथाम का एकमात्र उपाय कोयले की धूल के संपर्क से बचना है।

​निबंधात्मक प्रश्नोत्तर (5 प्रश्न)

  1. पर्यावरणीय प्रदूषण मानव स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के लिए गंभीर खतरा कैसे उत्पन्न करता है? ग्रामीण, शहरी और स्लम क्षेत्रों के संदर्भ में विस्तार से समझाइए।
    • भूमिका: मानव की गतिविधियाँ भूमि, वायु और जल को प्रदूषित करती हैं, जिससे मनुष्यों और अन्य जीवों के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा होता है। विकासशील देशों में यह समस्या अधिक कठिन है।
    • ग्रामीण क्षेत्र: मुख्य खतरा दूषित पेयजल (मल विसर्जन के अनुचित प्रबंधन से) और वायु की गुणवत्ता का अभाव है। घरों में उचित हवादार न होने और ईंधन जलाने से धुआँ जमा होता है, जिससे शिशु मृत्युदर और जल-जनित रोग बढ़ते हैं।
    • शहरी और कस्बाई क्षेत्र: मुख्य समस्या अनियोजित विकास और अपर्याप्त आधारभूत सुविधाओं की है। नालियों के अनुचित प्रबंधन से गंदा पानी जमा होता है, और वाहन/उद्योगों से होने वाला वायु प्रदूषण (कणीय पदार्थ, \text{SO}_x, \text{NO}_x) स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। इससे श्वसन और हृदय संबंधी रोग बढ़ते हैं।
    • झोपड़-पट्टियाँ (Slums): यह सबसे गंभीर स्थिति है। यहाँ अनियोजित ढंग से झोपड़ियाँ होती हैं, जहाँ शुद्ध हवा, पानी और स्वच्छता का पूर्ण अभाव होता है। पेचिश और पेट की बीमारियाँ (दूषित जल से) और श्वसन संबंधी रोग (लकड़ी के चूल्हे से) आम और जानलेवा हैं।
    • निष्कर्ष: पर्यावरणीय अवक्रमण सीधे तौर पर जीवन की आयु घटाता है और स्वास्थ्य संकट पैदा करके सामाजिक कल्याण को बाधित करता है।
  2. जल-जनित रोगों के विभिन्न प्रकारों का वर्गीकरण कीजिए और तालिका की सहायता से किन्हीं तीन प्रकार के रोगों के फैलने के ढंग और लक्षणों का वर्णन कीजिए।
    • वर्गीकरण: जल-जनित रोगों को मुख्य रूप से जीवाणु सम्बन्धी (Bacterial), वाइरल (Viral), परजीवी सम्बन्धी (Parasitic) और वाहक द्वारा फैलने वाले (Vector-borne) रोगों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
    • तालिका और वर्णन (विस्तार के लिए पाठ की तालिका 11.1 का उपयोग करें): | रोग का प्रकार | रोग (उदाहरण) | रोगजनक | फैलने का ढंग | लक्षण | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | जीवाणु जन्य | टाइफाइड | साल्मोनेला टाइफी | संदूषित भोजन, जल, दूध, मक्खियाँ | तेज बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द | | वाइरल | संक्रामक हैपिटाइटिस | हैपिटाइटिस विषाणु | मल से संदूषित जल और खाद्य पदार्थ | ज्वर, भूख की कमी, पीलिया | | वाहक जनित | मलेरिया | प्लास्मोडियम | मादा एनोफिलिस मच्छर (जल में चक्र) | कंपकपाहट, ठंड लगना, तेज बुखार (106°F तक) |
    • संचरण के तरीके: ये रोग सीधे शारीरिक संपर्क से, संक्रमित वस्तुओं से, दूषित जल आपूर्ति से (जैसे हैजा), और रासायनिक प्रदूषकों के जल में मिलने से फैलते हैं। अनुपचारित सीवेज नदियों और जलधाराओं को प्रदूषित करता है, जिससे ये रोग फैलते हैं।
  3. तम्बाकू, पराबैंगनी (UV) विकिरण और कीटनाशकों से कैंसर कैसे उत्पन्न होता है? इनके संपर्क में आने से बचने के लिए क्या सुरक्षात्मक उपाय अपनाए जा सकते हैं?
    • कैंसरजनन: कैंसर कोशिकाओं के अनियंत्रित विभाजन और वृद्धि के कारण होता है, जिससे दुर्दम्य (Malignant) ट्यूमर बनते हैं। कैंसर उत्पन्न करने वाले एजेंटों को कार्सिनोजन कहते हैं।
      • तम्बाकू: यह लगभग 85% फेफड़ों के कैंसर का कारण है। धूम्रपान (Active/Passive) और तम्बाकू चबाना मुख, पेट, यकृत, अग्न्याशय के कैंसर की संभावना बढ़ाता है।
      • पराबैंगनी (UV) विकिरण: यह सूर्य से आता है और त्वचा की क्षति (Skin Damage) करता है, जिससे त्वचा का कैंसर (Melanoma) हो सकता है। ओजोन परत के क्षरण से खतरा बढ़ गया है।
      • कीटनाशक: शाकनाशकों (जैसे 2,4-D) के अत्यधिक प्रयोग से लिम्फैटिक कैंसर (NHL) हो सकता है। टॉक्साफिन और \text{DDT} जैसे कीटनाशक लिम्फेटिक कैंसर से जुड़े हैं।
    • सुरक्षात्मक उपाय:
      • तम्बाकू: धूम्रपान/सेवन पूर्णतः छोड़ना।
      • UV विकिरण: दिन की तेज धूप (10 बजे से 3 बजे तक) में सीधे संपर्क से बचें। सुरक्षात्मक कपड़े, चौड़े किनारे वाले हैट और \text{UV} सोखने वाला धूप का चश्मा पहनें।
      • कीटनाशक: कीटनाशकों का प्रयोग प्रतिबंधित करना। जैविक खेती और जैविक कीट नियंत्रण की विधियों को अपनाना। औद्योगिक रसायनों के संपर्क में आने पर सुरक्षात्मक उपकरण पहनना।
  4. भारी धातु (Heavy Metal) विषाक्तता क्या है? लैंड (सीसा) और पारा (मरकरी) की विषाक्तता के स्रोतों, स्वास्थ्य प्रभावों और रोकथाम के उपायों का वर्णन कीजिए।
    • भारी धातु विषाक्तता: यह तब होती है जब भारी धातुएँ (जैसे लैंड, पारा, आर्सेनिक, कैडमियम) वातावरण में (उद्योगों, कचरे, जीवाश्म ईंधन जलाने से) फैलकर खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाती हैं। ये जैविक निम्नीकरण से नष्ट नहीं होते और जीवों पर विषाक्त प्रभाव डालते हैं।
    • लैंड (सीसा):
      • स्रोत: गाड़ियों का धुआँ (पेट्रोल में \text{TEL} मिलाने से), औद्योगिक प्रक्रियाएँ, बैटरी की छीलन, खाने-पीने की वस्तुएँ।
      • स्वास्थ्य प्रभाव: व्यवहारिक रोग, स्नायु तंत्र की क्षति, छोटे बच्चों में विकास संबंधी समस्याएँ, फेफड़ों और गुर्दे का कैंसर।
      • रोकथाम: लैंड-मुक्त पेट्रोल का उपयोग, औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण, बैटरी कचरे का उचित निपटान।
    • पारा (मरकरी):
      • स्रोत: जलीय जीव (मछलियाँ) जिनमें पारा \text{Methylmercury} के रूप में जमा होता है, उद्योगों से उत्सर्जन।
      • स्वास्थ्य प्रभाव: कोशिकाएँ मर जाती हैं, अंगों का क्रियाकलाप बाधित होता है, चिड़चिड़ापन, स्मरणशक्ति की कमी, मसूड़ों में सूजन (लम्बे समय तक संपर्क)।
      • रोकथाम: पारे को वातावरण में निष्कासित न किया जाए, पारे के स्थान पर अन्य धातुओं का प्रयोग (जैसे पारा मुक्त थर्मामीटर)।
  5. व्यवसाय संबंधी स्वास्थ्य बाधाओं के रूप में शारीरिक कार्य भार और शोर (ध्वनि प्रदूषण) के खतरों का विश्लेषण कीजिए। शोर से होने वाले शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों को विस्तार से समझाइए।
    • शारीरिक कार्य भार (Physical Workload):
      • खतरे: खनिक, निर्माण मजदूर, किसान आदि श्रमिकों को बार-बार एक सा कार्य करने और मांसपेशियों पर अत्यधिक भार पड़ने से चोटें और मांसपेशी-कंकाल विकार (\text{Musculoskeletal} disorders) हो जाते हैं। असुरक्षित मशीनें, असुरक्षित ढाँचा कार्य स्थल की मुख्य बाधाएँ हैं, जिससे अल्पकालिक या दीर्घकालिक अक्षमता आ सकती है।
    • शोर (ध्वनि प्रदूषण):
      • खतरे: 80 \text{ से } 90 \text{ dB} (डेसीबल) से ऊपर का शोर तनाव बढ़ाता है और कानों के लिए हानिकारक होता है। खदानों और निर्माण स्थलों पर उच्च स्तर का शोर होता है।
      • मनोवैज्ञानिक प्रभाव: चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी, असहिष्णुता, संवेगात्मक समस्याएँ।
      • श्रवण संबंधी प्रभाव:
        • श्रवण थकान: 85 \text{ से } 90 \text{ dB} से अधिक शोर में होती है।
        • बहरापन/बाधित श्रवण: 90 \text{ dB} से ऊपर का शोर बार-बार सहने पर स्थाई हो सकता है।
        • संचार में बाधा: उच्च शोर में बात सुनाने के लिए जोर से चिल्लाना पड़ता है, जिससे आवाज के विकार उत्पन्न होते हैं।
      • अन्य शारीरिक परिवर्तन: रक्तचाप बढ़ना, श्वास की गति और पसीना बढ़ना, सिरदर्द, चक्कर आना, रात्रि में दृष्टि कमजोर होना।
    • रोकथाम: श्रमिकों को शोरगुल वाले वातावरण में कान के सुरक्षात्मक उपकरण (Ear protection) देना और शोर को स्रोत पर ही कम करने के उपाय करना।

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