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1. परिचय एवं आवश्यकता
- अर्थ: स्थानीय स्तर का शासन, जो केंद्रीय/राज्य नियंत्रण में रहकर स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने और समस्याओं को हल करने का दायित्व रखता है।
- उद्देश्य: विकास कार्यों में स्थानीय व्यक्तियों की सहभागिता बढ़ाना।
- महत्व: देश की शासन व्यवस्था में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का सशक्त माध्यम।
- संवैधानिक दर्जा: 73वें (ग्रामीण) और 74वें (शहरी) संविधान संशोधन द्वारा दिया गया (लागू: 1993)।
- सफलता की शर्त: जनता में उच्च नैतिक चरित्र, ईमानदारी, सार्वजनिक कर्तव्यों के प्रति उत्तरदायित्व और योग्यता के आधार पर मतदान।
2. स्थानीय स्वशासन व्यवस्था: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
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प्राचीन काल:
- भारत में स्थानीय स्वशासन की पुरानी परंपरा।
- वैदिक काल: 'सभा' और 'समिति' नामक संस्थाएँ।
- महाभारत काल: ग्राम (सबसे छोटी इकाई) का प्रबन्ध ग्रामीक करता था।
- सिंधु घाटी सभ्यता: नगरों में स्थानीय शासन का प्रमाण (सड़कें, नालियाँ)।
- कौटिल्य (अर्थशास्त्र): राज्य को ग्राम समूहों में बाँटा (ग्राम, संग्रहण, खार्वटिक, द्रोणमुख, स्थानीय); नगरीय संस्थाओं को पुर कहा।
- चोल शासन (दक्षिण भारत): स्थानीय स्वशासन का उत्तम उदाहरण (नाडु परिषदे)।
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आधुनिक राजस्थान में विकास:
- 1953: राजस्थान पंचायत अधिनियम लागू हुआ (1 जनवरी 1954 से)।
- बलवंत राय मेहता समिति (1959): की अनुशंसा पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई।
- शुभारंभ: 2 अक्टूबर 1959 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले से किया।
- नगरीय क्षेत्र: राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 1959।
- सुधार समितियाँ (प्रमुख): हरीशचंद्र माथुर, सादिक अली, गिरधारी लाल व्यास, शिवचरण माथुर आयोग आदि।
- वर्तमान अधिनियम: राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009।
3. ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज व्यवस्था)
यह त्रि-स्तरीय संरचना है: ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, और जिला परिषद।
3.1. ग्राम सभा
- परिचय: ग्राम पंचायत की विधायिका होती है।
- सदस्यता: ग्राम पंचायत के क्षेत्र के समस्त वयस्क नागरिक (मतदाता सूची में पंजीकृत)।
- बैठकें: वर्ष में कम से कम दो बैठकें आवश्यक हैं (पहली - वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही, दूसरी - अंतिम तिमाही)।
3.2. ग्राम पंचायत
- गठन: निर्धारित गाँव/गाँवों के समूह से।
- संरचना: एक सरपंच (अध्यक्ष) और प्रत्येक वार्ड से एक वार्ड पंच (सदस्य) होते हैं।
- चुनाव: जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन (आयु 21 वर्ष)।
- आरक्षण: SC/ST/OBC और महिलाओं के लिए 50% (वर्गवार) स्थान आरक्षित।
- कार्यकाल: 5 वर्ष।
- बैठक: 15 दिन में एक बार आवश्यक।
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कार्य:
- साधारण: वार्षिक बजट/योजना तैयार करना, लोक संपत्ति से अतिक्रमण हटाना।
- प्रशासनिक: जन्म-मृत्यु-विवाह का पंजीकरण, जनगणना, सर्वेक्षण।
- अन्य: कृषि विस्तार, पशुपालन, लघु सिंचाई, शिक्षा, गरीबी उन्मूलन, महिला एवं बाल विकास, हाट-बाज़ार आदि।
- स्थायी समितियाँ: प्रशासनिक, वित्त एवं कराधान, उत्पादन कार्यक्रम, शिक्षा, सामाजिक न्याय आदि।
3.3. पंचायत समिति
- परिचय: त्रि-स्तरीय संरचना का मध्यवर्ती सोपान।
- गठन: राज्य सरकार द्वारा जिले के भीतर एक खंड के रूप में अधिसूचित क्षेत्र।
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सदस्य:
- प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्य।
- विधानसभा सदस्य (MLA)।
- क्षेत्र की सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच।
- पदाधिकारी: निर्वाचित सदस्य अपने में से प्रधान (अध्यक्ष) और उप-प्रधान का चुनाव करते हैं।
- कार्यकाल: 5 वर्ष।
- कार्य: ग्राम पंचायतों की वार्षिक योजनाओं को समेकित करना, कृषि, मृदा संरक्षण, लघु सिंचाई, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास आदि।
3.4. जिला परिषद
- परिचय: पंचायती राज व्यवस्था की सर्वोच्च इकाई (प्रत्येक जिले में एक)।
- भूमिका: ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में पर्यवेक्षक की भूमिका निभाना। ग्राम पंचायतों/समितियों और राज्य सरकार के बीच कड़ी का काम।
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सदस्य:
- प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्य।
- लोकसभा/विधानसभा/राज्यसभा सदस्य।
- क्षेत्र की समस्त पंचायत समितियों के प्रधान।
- पदाधिकारी: निर्वाचित सदस्य अपने में से जिला प्रमुख (अध्यक्ष) और उप-जिला प्रमुख का चुनाव करते हैं।
- बैठक: प्रत्येक तीन माह में कम से कम एक बैठक।
- कार्य: जिले के आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ बनाना, समन्वय, कृषि मेलों का आयोजन, लघु सिंचाई, ग्रामीण विद्युतीकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम आदि।
4. नगरीय स्थानीय स्वशासन
74वें संविधान संशोधन (1993) द्वारा संवैधानिक दर्जा प्राप्त। राजस्थान में नगर निगम, नगर परिषद, और नगरपालिका की व्यवस्था।
4.1. नगर निगम
- गठन: 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले बड़े शहरी क्षेत्रों में (सर्वोच्च शहरी निकाय)।
- पदाधिकारी: महापौर (अध्यक्ष/नगर का प्रथम नागरिक) और उप-महापौर।
- सदस्य: वार्डों से प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्य (पार्षद)।
- आयुक्त/मुख्य कार्यकारी अधिकारी: राज्य सरकार द्वारा नियुक्त, निगम की नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए उत्तरदायी।
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कार्य:
- अनिवार्य: शुद्ध जल, सार्वजनिक मार्गों/शौचालयों का निर्माण, सफाई, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, प्राथमिक शिक्षा।
- ऐच्छिक: सार्वजनिक पुस्तकालय, मेले/प्रदर्शनियाँ, गरीबों की सहायता।
- विशेष: अकाल, महामारी, बाढ़, अग्निशमन।
- आय के स्रोत: सम्पत्ति कर, पशु कर, व्यवसाय कर, मनोरंजन कर, राज्य सरकार से अनुदान।
4.2. नगर परिषद
- गठन: 1 लाख से अधिक पर 5 लाख से कम जनसंख्या वाले नगरीय क्षेत्र।
- पदाधिकारी: सभापति (अध्यक्ष) और उप-सभापति।
- सदस्य: वार्डों से प्रत्यक्ष निर्वाचित पार्षद।
- कार्य: लगभग वही कार्य जो नगर निगम के हैं (संविधान की 12वीं अनुसूची में सूचीबद्ध)।
4.3. नगरपालिका
- गठन: 1 लाख से कम जनसंख्या वाले छोटे नगरीय क्षेत्र (नगरपालिका बोर्ड)।
- पदाधिकारी: अध्यक्ष और उपाध्यक्ष।
- कार्य: नगर निगम की तरह अनिवार्य, ऐच्छिक और विशेष कार्य।
4.4. छावनी बोर्ड (Cantonment Board)
- परिचय: सैनिकों के निवास स्थान वाले क्षेत्रों की स्थानीय समस्याओं के लिए स्थापित।
- प्रशासन: भारत के रक्षा मंत्रालय से प्रशासित।
- राजस्थान: नसीराबाद (अजमेर) में एकमात्र छावनी बोर्ड।
- कार्य: नगरपालिका के समान (सफाई, बिजली, पानी, स्वास्थ्य)।
5. संवैधानिक बदलाव और महिला सशक्तिकरण
- 73वां/74वां संशोधन: संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा और एकरूपता प्रदान की।
- महिला सशक्तिकरण: दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण (राजस्थान में) सुनिश्चित किया गया, जिससे उनकी राजनीतिक सहभागिता बढ़ी है।
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