राजस्थानी चित्रकला शैली: विस्तृत नोट्स

 

1. परिचय

  • अवधि व विस्तार: 16वीं शताब्दी के मध्य से 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक विकसित।

  • मुख्य रूप से राजस्थान और वर्तमान मध्य प्रदेश के शाही राज्यों एवं ठिकानों में फैली (जैसे मेवाड़, बूँदी, कोटा, जयपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जोधपुर, मालवा, सिरोही)।

  • नामकरण: कलाविद् आनंद कुमारस्वामी ने 1916 में इसे 'राजपूत चित्रकला' नाम दिया, क्योंकि अधिकांश शासक राजपूत थे।

    • उद्देश्य: इसे मुगल चित्रकला शैली से अलग दिखाना।

    • शामिल शैलियाँ: मालवा शैली (मध्य भारत), पहाड़ी शैली (उत्तर-पश्चिम हिमालय)।

    • कुमारस्वामी के अनुसार: यह स्वदेशी परंपरा का द्योतक है जो मुगलों के आगमन से पूर्व से चली आ रही थी।

  • वर्तमान नामकरण: 'राजपूत शैली' शब्द का प्रयोग अब समाप्त हो गया है। इसके स्थान पर 'राजस्थानी शैली' और 'पहाड़ी शैली' शब्दों का प्रयोग होता है।

  • पहचान के अंतर:

    • भौगोलिक दूरी कम होने पर भी उत्पत्ति, विकास व शैली में भिन्नता।

    • अंतर के तत्व: सशक्त रेखांकन, रंगों की वरीयता (चमकदार/सौम्य), संयोजन तत्व (वास्तु, मानवाकृतियाँ, प्रकृति, अंकन तकनीक, प्रकृतिवाद, वर्णन विधि)।

2. चित्रण तकनीक

  • आधार: सामान्यतया वसली पर चित्र बनते थे।

    • वसली निर्माण: कागज़ के पतले पन्नों को गोंद से चिपकाकर आवश्यक मोटाई की वसली तैयार की जाती थी।

  • रेखांकन: तैयार वसली पर काले या भूरे रंग से किया जाता था।

  • रंग: मुख्य रूप से प्रकृति से प्राप्त खनिज पदार्थोंबहुमूल्य धातुओं (सोना, चाँदी) से बनाए जाते थे, जिन्हें चिपकाने के लिए गोंद में मिलाया जाता था।

  • ब्रुश: ऊँट या गिलहरी के बालों का प्रयोग ब्रुश बनाने के लिए किया जाता था।

  • अंतिम प्रक्रिया (घुटाई): चित्रण कार्य पूर्ण होने पर अगेट पत्थर से चित्र को रगड़ा (घुटाई) जाता था, जिससे सतह समतल, चमकदार व ओजपूर्ण हो जाती थी।

  • सामूहिक कार्य:

    • एक कुशल दक्ष कलाकार नेतृत्व करता था और आरंभिक रेखांकन करता था।

    • शिष्य एवं दक्ष कलाकार: रंग भरने, छवि चित्रण, वास्तु, भू-दृश्य, पशु-पक्षी बनाने का कार्य करते थे।

    • प्रधान कलाकार: चित्र को अंतिम रूप देता था।

    • सुलेखक: निर्धारित स्थान पर संबंधित श्लोक या पद लिखता था।

3. चित्रकला के विषय (एक समीक्षा)

  • धार्मिक विषय:

    • वैष्णव संप्रदाय: 16वीं शताब्दी तक राम और कृष्ण से संबंधित भक्ति आंदोलन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में लोकप्रिय हुआ।

    • कृष्ण की लोकप्रियता: ईश्वर और एक आदर्श प्रेमी के रूप में उपासना। प्रेम की धारणा को धार्मिक विषय के रूप में पोषित किया गया, जहाँ भावना और रहस्यवाद का समन्वय था।

    • राधा: मानवीय आत्मा की प्रतीक, परमात्मा में समाहित होने को उद्यत।

    • गीत गोविंद:

      • रचनाकार: जयदेव (12वीं शताब्दी), बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन के दरबारी कवि।

      • विषय: ग्वालों का गीत, संस्कृत काव्य, श्रृंगार रस प्रधान। राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम को भौतिक रूप में दिखाया गया।

      • उदाहरण: वन में कृष्ण और गोपियाँ, गीत गोविंद, मेवाड़, 1550 (छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय, मुंबई)।

    • रसमंजरी:

      • रचनाकार: भानुदत्त (14वीं शताब्दी), बिहार के मैथिल ब्राह्मण।

      • अर्थ: 'आनंद का गुलदस्ता'।

      • विषय: रसों का वर्णन, नायक-नायिकाओं के भेद (उम्र अनुसार- चाल, तरुण, प्रौढ़; आंगिक अनुसार- पद्मिनी, चित्रिणी, शंखिनी, हस्तिनी; भावगत अनुसार- खंडित, नासकसज्जा, अभिसारिका, उत्का आदि)।

      • चित्रकारों ने कृष्ण को प्रतिनिधि (आदर्श) प्रेमी के रूप में चित्रित किया, यद्यपि ग्रंथ में उनका उल्लेख नहीं था।

    • रसिकप्रिया:

      • अर्थ: 'रसिक या पारखी को आनंदित करने वाला'।

      • रचनाकार: केशवदास (1591), ओरछा के राजा मधुकर शाह के दरबारी कवि।

      • भाषा: ब्रजभाषा।

      • विषय: प्रेम, मिलन, वियोग, ईर्ष्या, विवाद, अनबन, गुस्सा जैसी अवस्थाओं की अभिव्यक्ति राधा-कृष्ण के माध्यम से।

    • कविप्रिया:

      • रचनाकार: केशवदास (राय परबीन के सम्मान में रचित)।

      • विषय: प्रेमकथा। दसवें अध्याय में 'बारहमासा' (साल के 12 महीनों का जलवायु/मौसम का सटीक वर्णन, लोगों का दैनिक जीवन, त्योहार)।

    • बिहारी सतसई:

      • रचनाकार: बिहारीलाल (लगभग 1667 ई.), जयपुर के मिर्जा राजा जय सिंह के दरबारी कवि।

      • विषय: सात सौ (सतसई) पद, सूक्ति एवं नैतिक हाजिरजवाबी। मेवाड़ व पहाड़ी शैली में चित्रण।

  • रागमाला चित्रकला:

    • विषय: रागों और रागिनियों की चित्रात्मक अभिव्यक्ति।

    • अवधारणा: प्रत्येक राग एक विशेष अवस्था, दिन के प्रहर, और ऋतु से जुड़ा है।

    • संरचना: सामान्यतया 36 या 42 चित्रित पृष्ठ। एक पुरुष राग (मुखिया) और छह रागिनियाँ (स्त्री)।

    • छह मुख्य राग: भैरव, मालकोस, हिंडोल, दीपक, मेघ और श्री।

  • अन्य साहित्य:

    • प्रेमाख्यान: ढोलामारू, सोनी-महिवाल, मुगावत, चौरपंचाशिका (मेवाड़, 1500), लौरचंदा।

    • महाकाव्य/पुराण: रामायण, भागवतपुराण, महाभारत, देवी महात्म्य।

  • दरबारी एवं ऐतिहासिक विषय:

    • शिकार, युद्ध एवं विजय, उत्सव, वनमोज, नृत्य, संगीत, त्यौहार, वैवाहिक उत्सव।

    • राजाओं के छबि चित्रण, दरबारी एवं परिवार के सदस्यगण।

    • शहरी जीवन एवं पशु-पक्षियों के चित्र।

4. प्रमुख राजस्थानी चित्रकला शैलियाँ

4.1. मालवा चित्रकला शैली

  • समय: 16वीं और 17वीं शताब्दी में फली-फूली।

  • प्रतिनिधित्व: हिंदू राजपूत दरबार का।

  • विशेषताएँ:

    • द्वि-आयामी सपाट एवं सरल भाषा।

    • जैन पांडुलिपियों से चौरपंचाशिका पांडुलिपि चित्रों की शैलीगत विकास की पूर्णता।

  • भौगोलिक विस्तार: किसी एक निश्चित क्षेत्र में उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि मध्य भारत के बड़े भू-भाग में फैली (मांडू, नुसरतगढ़, नरस्यंग सहर)।

  • प्रारंभिक तिथियुक्त समूह: अमरू शतक (1652 ई.)।

  • उदाहरण: राग मेघा (माधो दास, नरस्यंग शहर, 1680)।

  • स्रोत: दतिया महल के संग्रह से बड़ी संख्या में चित्र प्राप्त।

  • विशेषता: राजकीय संरक्षकों एवं छवि चित्रण का पूर्ण अभाव, जो दर्शाता है कि दतिया के राजाओं ने इन्हें घुमंतू कलाकारों से खरीदा होगा।

  • मुख्य विषय: रामायण, भागवतपुराण, अमरू शतक, रसिकप्रिया, रागमाला और बारहमासा।

4.2. मेवाड़ चित्रकला शैली

  • महत्व: राजस्थानी चित्रकला का प्रारंभिक महत्वपूर्ण केंद्र

  • उत्पत्ति: 1605 ई. में निसारदीन द्वारा चुनार में चित्रित रागमाला चित्रों से।

  • प्रारंभिक विशेषताएँ (17वीं शताब्दी): प्रत्यक्ष उपागम, सरल संयोजन, छिट-पुट आलंकारिक विवरण, चटक रंग

  • परिष्कार (राजा जगत सिंह, 1628-52):

    • प्रतिभाशाली कलाकार: साहिबदीन और मनोहर

    • साहिबदीन के कार्य: रागमाला (1628), रसिकप्रिया व भागवतपुराण (1648), रामायण के युद्धकांड (1652)।

    • मनोहर का कार्य: रामायण का बालकांड (1649)।

    • जगन्नाथ: 1719 में बिहारी सतसई चित्रित की।

  • शैलीगत नवीनता (साहिबदीन): रामायण युद्धकांड में तिर्यक रेखीय परिप्रेक्ष्य का प्रयोग, युद्ध की विभीषिका दिखाने के लिए। एक से अधिक कथाओं को एक पृष्ठ पर या एक कथा को अलग-अलग पृष्ठों पर चित्रित करना।

  • 18वीं शताब्दी में बदलाव: विषय साहित्य से दरबारी क्रियाकलापों एवं शाही मनोरंजन की ओर स्थानांतरित।

  • रंग: सामान्यतया चटक रंगों का प्रयोग, जिसमें लाल एवं पीले की प्रधानता।

  • नाथद्वारा (17वीं शताब्दी के अंत में): वैष्णव धर्म का गढ़, चित्रशाला में परिवर्तित। भगवान श्रीनाथ जी के बड़े-बड़े चित्र (पिछवाई) कपड़े पर चित्रित।

  • 18वीं शताब्दी में स्वरूप: धर्मनिरपेक्ष एवं दरबारी। छवि चित्रण, बृहदाकार दरबारी दृश्य, शिकार, उत्सव, अंतःपुर, खेल लोकप्रिय।

  • उदाहरण: रामायण का युद्धकांड (साहिबदीन, मेवाड़, 1652); मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह द्वितीय का शिकार (1744); श्रीनाथजी (नाथद्वारा, 1800)।

4.3. बूँदी चित्रकला शैली

  • महत्व: 17वीं शताब्दी में बहुसर्जनात्मक एवं विशिष्ट शैली, उत्तम रंग योजना और उत्कृष्ट औपचारिक अभिकल्प के लिए उल्लेखनीय।

  • आरंभिक चित्रकला: बूंदी रागमाला (1591), चुनार में हाड़ा राजपूत शासक भोज सिंह के शासन काल में चित्रित।

    • चित्रकार: शेख हसन, शेख अली, शेख हातिम (मुगल दरबार के चित्रकारों के शिष्य)।

    • स्थान: चुनार (बनारस के पास)।

  • विकास (संरक्षण):

    • राव छत्रसाल (1631-59): शाहजहाँ द्वारा दिल्ली का वजीर नियुक्त।

    • राव भाओ सिंह (1659-82): उत्साही और भोगालिप्त संरक्षक, अनेक छवि चित्र व तिथियुक्त चित्र।

    • राजा अनिरूद्ध सिंह (1682-1702): रचनात्मक विकास।

    • बुध सिंह: दाढ़ी-मूंछ युक्त छवि, राजनैतिक विवादों के बावजूद योगदान।

  • चरम सीमा: राजा उमेद सिंह (1749-71) के लंबे शासन काल में। चित्रों में सूक्ष्म विवरण।

  • दक्कनी प्रभाव: 18वीं शताब्दी में दक्कनी सौंदर्यगत तत्व (चटक व सजीव रंगों के प्रति प्रेम)।

  • शिकार का चित्रण: बिशेन सिंह (1771-1821) को अकसर शिकार करते हुए चित्रित किया गया।

  • अंतिम चरण: राम सिंह (1821-89) के समय में बूंदी महल के भित्ति चित्र (दरबारी जुलूस, शिकार, कृष्ण कथाएँ)।

  • बूँदी और कोटा की साझा विशेषता:

    • सघन वनस्पतियाँ, सुरम्य भू-दृश्य (पेड़-पौधे, जंगली जीवन, पशु-पक्षी, पहाड़, झरने)।

    • जीवंत घुड़सवारों और हाथियों का अद्वितीय चित्रण।

  • सौंदर्य प्रतिमान (बूँदी कलाकार): छोटी ठिगनी कद-काठी, गोल मुखाकृति, पीछे की ओर बलुआ माथा, तीक्ष्ण नाक, पतली भूरेखा और पतली कमर।

  • दीपक राग का उदाहरण: रात्रि दृश्य, चार दीपकों से प्रकाश, आकाश में तारे, पीला चंद्रमा। कलश पर केवल 'दीपक राग' लिखा होना दर्शाता है कि शीर्षक कलाकार के लिए संकेत होता था।

  • लोकप्रिय विषय: बारहमासा (केशवदास की कविप्रिया के दसवें अध्याय का भाग)।

4.4. कोटा चित्रकला शैली

  • उत्पत्ति: बूँदी की कुशल पारंपरिक चित्रकला से।

  • विशेषता: शिकार के दृश्यों को चित्रित करने में उत्कृष्ट, पशुओं के शिकार के असाधारण उत्साह एवं जुनून का प्रकटीकरण।

  • इतिहास: बूँदी और कोटा 1625 ई. तक एक ही राज्य थे। जहाँगीर ने बूंदी साम्राज्य को विभाजित कर मधु सिंह को कोटा दिया।

  • शुरुआत: जगत सिंह (1658-83) के शासन काल में 1660 में कोटा में अपनी अलग शैली की शुरुआत।

  • प्रारंभिक समानता: कुछ दशकों तक कोटा के चित्रकारों ने बूंदी की कला को ही गृहीत किया, लेकिन मानवकृति और वास्तुकला में गैर-अनुरूपता।

  • विशिष्ट पहचान: आने वाले दशकों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

  • राम सिंह प्रथम (1686-1708): विषयों की विविधता बढ़ी, वन दृश्य चित्रों को वास्तविक विषय के रूप में चित्रित किया।

  • उमेद सिंह (1770-1819): उनके समय के कोटा चित्र शिकार और शतरंज के जुए को दर्शाते हैं (जो एक सामाजिक प्रथा बन गया था)।

  • विशिष्टता: विशिष्ट रूप से सहज, सुलेखन के निष्पादन और मुख्यतः दोहरे नयनपट में छाया अंकित करने पर जोर। पशुओं एवं युद्ध के प्रतिपादन में उत्कृष्ट प्रदर्शन।

  • उदाहरण: महाराजा राम सिंह प्रथम, मुकुंदगढ़ में शेरों का शिकार करते हुए (1695)।

4.5. बीकानेर चित्रकला शैली

  • स्थापना: राव बीका राठौर ने 1488 में बीकानेर राज्य की स्थापना की।

  • अनूप सिंह (1669-98): एक पुस्तकालय स्थापित किया जो पांडुलिपियों एवं चित्रकला का कोष बना।

  • मुगल प्रभाव: लंबे मुगल संगति के परिणामस्वरूप बीकानेर में एक विशेष चित्रकला भाषा का विकास हुआ जो मुगल शैली के लालित्य और रंग पट्टिका से प्रभावित थी।

  • कलाकार:

    • करण सिंह ने: उस्ताद अली रजा (दिल्ली का मुख्य कलाकार) को नियुक्त किया (लगभग 1650)।

    • अनूप सिंह के शासन काल में: रुकनुद्दीन मुख्य कलाकार था (जिसके पूर्वज मुगल दरबार से आए थे)।

      • शैली: देशज मुहावरों के साथ दक्षिणी/दक्कनी और मुगल परंपरा का मिश्रण।

      • कार्य: रामायण, रसिकप्रिया और दुर्गा सप्तशती का चित्रण।

      • अन्य कलाकार: इब्राहिम, नाथू, साहिबदौन और ईसा।

  • चित्रशाला (मंडी): बीकानेर में चित्रशाला बनाने की प्रथा प्रचलित थी, जहाँ कलाकारों का समूह मुख्य चित्रकार के निर्देशन में चित्र रचना करते थे। रुकनुद्दीन, इब्राहिम और नाथू कुछ व्यावसायिक चित्रशालाओं को संभालते थे।

  • अभिलेखन प्रथा: चित्र पूर्ण होने पर, दरबार के अभिलेखविद् मुख्य कलाकार का नाम और दिनांक चित्र के पीछे लिखते थे। 'गुदराई' शब्द का प्रयोग होता था, जिसका अर्थ 'ऊपर उठाना' था।

  • कार्य: नवीन चित्रों के निर्माण के अतिरिक्त, चित्रों की मरम्मत/सुधार और पुराने चित्रों को बनवाने का कार्य भी चित्रशाला को सौंपा जाता था।

  • छबि चित्रण: बीकानेर शैली के कलाकार के छबि चित्रण अद्वितीय हैं, जिनमें वंशावली की जानकारी भी शामिल है। उन्हें उस्तास या उस्ताद कहते हैं।

  • चित्रकारों की शैली:

    • रुकनुद्दीन: कोमल रंगों की तान से सुंदर चित्र।

    • इब्राहिम: धुँधले स्वप्न जैसा गुण, चेहरे सुंदरता के साथ सुडौल।

    • प्रमुख चित्रण संग्रह: बारहमासा, रागमाला, रसिकप्रिया।

  • दस्तावेजीकरण: बही के हिसाब-किताब, राजसी अभिलेख, दिन-प्रतिदिन की दैनंदिनी और शिलालेखों ने बीकानेर चित्रों को सर्वश्रेष्ठ-दस्तावेज़ों वाली चित्रकला शैली बना दिया। मारवाड़ी और कभी-कभी फारसी अभिलेखों से कलाकार, दिनांक, निर्माण स्थल, अवसर आदि का पता चलता है।

  • उदाहरण: गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण (शहादीन, बीकानेर, 1690); गायों से घिरे कृष्ण (बीकानेर, 1777)।

4.6. किशनगढ़ चित्रकला शैली

  • विशिष्ट पहचान: उत्कृष्ट बनावट और धनुषाकार भौहों से बने चेहरे, कमल की पंखुड़ी के समान हलकी गुलाबी रंग की आँख, झुकी पलकें, एक सुगठित नुकीली नाक और पतले होंठ जैसी शैलीकृत विशेषताएँ।

  • स्थापना: किशन सिंह ने 1609 ई. में किशनगढ़ राज्य की स्थापना की।

  • संरक्षण:

    • मानसिंह (1658-1706): मध्य 17वीं शताब्दी में कलाकार पहले से काम कर रहे थे।

    • राज सिंह (1706-48): 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में विशिष्ट शैली विकसित हुई (लंबी मानवाकृति, हरे रंग का प्रचुर प्रयोग, मनोरम दृश्य)।

    • बल्लभाचार्य का पुष्टि मार्ग: राज सिंह के प्रयासों से कृष्ण लीला किशनगढ़ शासकों का पसंदीदा विषय बना।

  • मशहूर कलाकार: निहालचंद (सावंत सिंह का सबसे मशहूर कलाकार)।

    • कार्य: 1735-57 तक सावंत सिंह के लिए कार्य किया, सावंत सिंह की कविताओं पर चित्र संयोजित किए (मुख्यतः दिव्य युगल राधा-कृष्ण पर)।

    • चित्रण: दरबारी परिवेश में प्रायः विशाल मनोरम परिदृश्य में छोटी आकृतियों के रूप में बारीकी से चित्रित।

  • रंग: किशनगढ़ कलाकारों ने सुस्पष्ट रंगों द्वारा दृश्यों के चित्रण को उजागर किया।

  • उदाहरण: एक मंडप में कृष्ण और राधा (निहाल चंद, किशनगढ़, 1750)।

4.7. जोधपुर चित्रकला शैली (मारवाड़ शैली)

  • मुगल प्रभाव: 16वीं शताब्दी में मुगल राजनैतिक उपस्थिति का सौंदर्यात्मक दृष्टि (छवि चित्रण, दरबारी दृश्य) पर प्रभाव, लेकिन स्वदेशी लोक शैली संस्कृति हावी रही।

  • प्रारंभिक संग्रह: रागमाला पाली में चित्रित एक आरंभिक चित्र संग्रह (कलाकार वीरजी द्वारा 1623 में)।

  • शुरुआत: 17वीं शताब्दी के मध्य में महाराजा जसवंत सिंह (1638-78) के काल में।

  • महत्व: छवि चित्रण एवं दरबारी जीवन को प्रदर्शित करने वाले दस्तावेज़ी चित्रों की प्रथा 1640 में शुरू हुई और 19वीं शताब्दी में छायाचित्रों के आगमन तक विशिष्ट एकाधिकार रहा। यह चित्रों के अभिलेख वृत्तांत का पर्याय बन गया।

  • धार्मिक झुकाव: जसवंत सिंह का श्रीनाथजी के वल्लभ पंथ की ओर व्यक्तिगत झुकाव, कृष्ण से संबंधित विषयों (भागवत पुराण) को संरक्षित किया।

  • अजित सिंह (1679-1724): औरंगजेब के साथ 25 वर्षों के युद्ध के बाद राजा बने। वीर दुर्गादास राठौर की बहादुरी कविताओं और दरबारी चित्रकला में प्रसिद्ध हुई। दुर्गादास के घुड़सवारी के छवि चित्र बहुत प्रसिद्ध हुए।

  • अंतिम चरण (मानसिंह, 1803-43):

    • महत्वपूर्ण चित्र संग्रह: रामायण (1804), ढोला-मारू, पंचतंत्र (1804), शिवपुराण।

    • रामायण चित्र: कलाकार ने जोधपुर को राम की अयोध्या के रूप में प्रस्तुत किया (बाजार, गलियाँ, प्रवेशद्वार उस समय के जोधपुर का आभास)।

    • सामान्य विशेषता: सभी शैलियों में स्थानीय वास्तुकला, पहनावा और सांस्कृतिक पहलू, कृष्ण, राम और अन्य कहानियों से जुड़े हुए हैं।

  • नाथ संप्रदाय: मानसिंह नाथ संप्रदाय के अनुयायी थे, उनकी चित्रकला में नाथ गुरुओं के साथ चित्र मिलते हैं। नाथ चरित (1824) भी चित्रित किया गया।

  • 19वीं शताब्दी तक मेवाड़ चित्र: वर्णन में कम जानकारी (यदा-कदा तिथियाँ, कम कलाकार के नाम)।

  • उदाहरण: ढोला और मारू (जोधपुर, 1810)।

4.8. जयपुर चित्रकला शैली

  • उत्पत्ति: पूर्व राजधानी आमेर में, जो मुगल राजधानियों (आगरा, दिल्ली) के निकटतम थी।

  • मुगल प्रभाव: शुरुआती समय से ही जयपुर के शासकों ने मुगल सम्राटों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे, जिससे आमेर में कलात्मकता बहुत प्रभावित हुई।

    • राजा भारमत्त (अकबर से बेटी का विवाह), भगवंत दास (अकबर के घनिष्ठ मित्र), मानसिंह (अकबर के विश्वसनीय सैन्य प्रमुख)।

  • नई राजधानी: सवाई जय सिंह (1699-1743) ने 1727 में अपने नाम पर जयपुर की स्थापना की और आमेर से स्थानांतरित हुए।

  • विकास (सवाई जय सिंह): जयपुर चित्रकला शैली संपन्न हुई और एक नामांकित स्वतंत्र शैली के रूप में उभरी।

    • दिल्ली से मुगल कलाकारों को अपनी चित्रशाला का हिस्सा बनाया गया।

    • वैष्णव संप्रदाय के प्रति आकर्षित, राधा-कृष्ण विषय पर अनेक चित्र।

    • संग्रह: रसिकप्रिया, गीत-गोविंद, बारहमासा और रागमाला पर आधारित।

    • विशेषता: नायक की आकृति शासक से मिलती-जुलती।

    • छवि चित्रण: बहुत लोकप्रिय।

    • कलाकार: साहिबराम (निपुण चित्रकार), मुहम्मद शाह।

  • सवाई इश्वरी सिंह (1743-50): कला का संरक्षण। धार्मिक/साहित्यिक ग्रंथों के अतिरिक्त अवकाश के क्षणों (हाथी की सवारी, शिकार, हाथी के झगड़े) को भी चित्रित किया।

  • सवाई माधो सिंह (1750-67): दरबारी जीवन की घटनाओं को अंकित कराने की ओर आकर्षित।

  • 18वीं शताब्दी (सवाई प्रताप सिंह, 1779-1803):

    • मुगल प्रभाव कम हुआ।

    • जयपुर शैली पुनर्निर्मित सौंदर्यशास्त्र के साथ, मुगल और स्वदेशी शैलीगत विशेषताओं का मिश्रण बनी।

    • दूसरा संपन्न काल। लगभग 50 कलाकारों को नियुक्त किया।

    • स्वयं: विद्वान, कवि, बहुसर्जक लेखक और कृष्ण के उत्साही अनुयायी।

    • पुनः प्रोत्साहन: शाही छवि चित्रण, दरबारी शान-शौकत के अतिरिक्त साहित्यिक और धार्मिक विषयों (गीत गोविंद, रागमाला, भागवत पुराण)।

    • नकल: कई स्थानों पर छापकर भी अनेक चित्रों की प्रतियाँ बनवाई गई।

  • 19वीं शताब्दी का आरंभ: सोने का प्रचुर मात्रा में प्रयोग। बड़े आकार की आकृतियाँ और जीवंत-आकार के छवि चित्रों का निर्माण।

  • उदाहरण: गोधुली का समय (जयपुर, 1750)।

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