भारत की लोककला में आर्यों से पूर्व की संस्कृतियों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता है। भारतीय पारंपरिक जीवन में विभिन्न धर्म, संप्रदाय और विश्वास साथ-साथ विकसित हुए हैं। शाक्त, वैष्णव और बौद्ध संप्रदाय लोक कलाकारों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण समाज की कला और शिल्प की ज़रूरतें स्थानीय कलाकारों और शिल्पकारों द्वारा पूरी की जाती हैं। ये ज़रूरतें मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं:
* कर्मकांडी अथवा आनुष्ठानिक: धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं से संबंधित कला।
* उपयोगितावादी: रोज़मर्रा के जीवन में काम आने वाली वस्तुएँ।
* वैयक्तिक: व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और नए स्वरूपों का निर्माण।
कर्मकांडी लोककला में पटचित्र, पिछवाई, अल्पना और कोलम शामिल हैं। उपयोगितावादी लोककला में लकड़ी की सजावटी खुदाई, सुई-धागे की कढ़ाई, डलिया बनाना और मिट्टी के बर्तन बनाना जैसी चीज़ें शामिल हैं। यह कला आमतौर पर बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के ग्रामीण कलाकारों द्वारा की जाती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहती है। उदाहरण के लिए, पक्की मिट्टी के खिलौनों की परिकल्पना में 5000 वर्षों में शायद ही कोई बदलाव आया है, क्योंकि हड़प्पा सभ्यता में भी इसी तरह के खिलौने बनाए जाते थे।
कुछ लोक कलाकार समय-समय पर नए स्वरूपों के साथ प्रयोग करते हैं, जिससे नई लोककला का जन्म होता है। ये कलाकार पुरानी शैलियों में थोड़े बदलाव करके नई शैलियों को जन्म देते हैं। इस तरह के नवीन प्रयोग मधुबनी चित्रकला, कंथा और कालीघाट के पटचित्रों में देखे जा सकते हैं।
4.1 कोलम
* शीर्षक: कलश से फर्श पर की गई चित्रकारी
* शैली: कोलम
* कलाकार: कोई अज्ञात घरेलू महिला
* माध्यम: चावल की पिट्टी तथा रंग
* समय: 1992
* उपलब्धि का स्थान: तमिलनाडु में तंजावुर के पास एक बस्ती
सामान्य विवरण:
कोलम विश्वभर की कई संस्कृतियों में फर्श की सजावट का एक लोकप्रिय रूप है। भारत में भी, देश के हर हिस्से में फर्श पर विभिन्न माध्यमों से सजावट की जाती है, जैसे अल्पना, रंगोली, कोलम और सांझी। दक्षिण भारत में सांस्कृतिक और धार्मिक त्योहारों पर कोलम एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पोंगल और अन्य त्योहारों के दौरान, प्रत्येक घर के सामने और पूजा वेदी के सामने फर्श पर यह सजावट की जाती है।
भारत में फर्श की सजावट के अन्य माध्यमों की तरह, कोलम को भी भाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कोलम बनाने की परिकल्पना और इसका मूल पारंपरिक है। इसे फूलों से ज्यामितीय रूप में बनाया जाता है। इसे बनाने के लिए, फर्श पर पानी छिड़ककर उसे नम या सीलनभरा कर देना चाहिए। मोटे चावल को पीसकर बने पाउडर को अंगूठे और आगे की उंगली के बीच पकड़कर रखते हैं। हाथ को घुमाते हुए चावल का पाउडर फर्श पर गिराया जाता है। फर्श पर बनाई जाने वाली आकृति पहले से तय होती है। ज़रूरी यह है कि चावल का पाउडर बिना रुकावट के लगातार गिरता रहे ताकि आकृति स्पष्ट रूप से उभरती रहे। लगातार अभ्यास से यह कलाकृति अच्छे तरीके से बन जाती है। लड़कियाँ यह कला अपनी माँ, दादी और नानी से सीखती हैं। इस सांकेतिक महत्व के अलावा, यह क्रिया जीवन का सही अर्थ भी समझा देती है। चावल का पाउडर आसानी से मिल जाता है, जो यह भी दर्शाता है कि कला को जीवन की व्यावहारिकताओं का भी ध्यान रखना चाहिए।
कोलम पेंटिंग एक गृहिणी बनाती है। इससे कलाकार स्वाभाविक रूप से कलाकृति बनाना सीखता है। इसमें अलग-अलग सांकेतिक आकार जैसे घड़े, लैंप और नारियल के पेड़ का उपयोग किया जाता है। ये सभी भारतीय ग्रामीण जीवन के अनिवार्य अंग हैं। ये मूल रूप से ज्यामितीय आकार के होते हैं, जिसमें लाल, नारंगी, नीले, पीले और गुलाबी जैसे चमकीले रंगों का प्रयोग किया जाता है।
4.2 फुलकारी
* शीर्षक: चादर
* कलाकार: अज्ञात
* शैली: फुलकारी
* माध्यम: कपड़ों की कढ़ाई (रंगीन धागे से)
* समय: समकालीन
सामान्य विवरण:
फुलकारी का वास्तविक अर्थ "फूलों का काम" है। यह एक प्रकार की कढ़ाई है जिसे आमतौर पर पंजाब की ग्रामीण महिलाएँ करती हैं। यह कढ़ाई छोटे-बड़े कपड़ों पर की जाती है। इन कपड़ों का उपयोग विभिन्न कामों के लिए होता है, जैसे घूंघट, सिर ढंकने वाले कपड़े, चादर और बिस्तर को ढंकने वाले कपड़े। यह कढ़ाई मोटे कपड़े पर चमकीले सिल्क के धागों से की जाती है, जिन्हें कपड़े के पीछे से रफू करके सिला जाता है। ये टाँके गिने हुए होते हैं।
फुलकारी की परिकल्पना मूल रूप से ज्यामितीय आकार की होती है। कपड़े के चारों ओर चौकोर और त्रिकोण आकार की आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जिनमें खुशनुमा रंगों की कढ़ाई की जाती है। प्रायः सरल आकृतियाँ बनाई जाती हैं और फिर बड़ी-बड़ी आकृतियाँ बनती हैं। इसमें चौकोर, छींटे, त्रिकोण, सीधी रेखाएँ और टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ अलग-अलग बदलाव के साथ काढ़ी जाती हैं। इस पूरी योजना में जिस रंग की प्रधानता रहती है, वह पंजाब में पके गेहूँ का स्वर्णिम रंग होता है।
स्त्रियाँ पहले अलग-अलग हिस्सों की बाहरी रूपरेखा को सुई से उभारती हैं और फिर एक निकटवर्ती दूसरे हिस्से को विरोधी रंगों से भरती हैं। ऊर्ध्वाधर (खड़े हुए) तथा क्षैतिज (समतल) धागों के कारण बहुत सुंदर और आकर्षक नमूने बनते हैं।
सबसे लोकप्रिय फुलकारी के काम की परिकल्पना पारंपरिक ज्यामितीय आकार की होती है। तारों को सुनहरे पीले और सफेद रंग मिश्रित रजत (चांदी के रंग से मिलता जुलता रंग) रंग के धागों से लाल कपड़े पर काढ़ा जाता है। मुख्य रूप से परिकल्पना में एक बड़े सितारे के चारों ओर छोटे सितारे विभिन्न रूप में काढ़े जाते हैं, जिससे कपड़े पर एक हीरे जैसी आकृति उभर आती है। रेशम के धागे की चमक से कपड़े का लाल आधार का प्रभाव बहुत मनभावन लगता है।
4.3 कंथा कढ़ाई
* शीर्षक: बंगाली 'कंथा'
* कलाकार: अज्ञात
* शैली: कंथा कढ़ाई
* माध्यम: रेशमी कपड़े पर रंगीन धागों से कढ़ाई
* समय: समकालीन
सामान्य विवरण:
बंगाल में कढ़ाई और रजाई (लिहाफ) पर अत्यंत मनमोहक कढ़ाई की लोक प्रथा है, जिसे 'कंथा' कहते हैं। उपयोग न की जाने वाली पुरानी साड़ियों तथा धोतियों से कंथा बनाई जाती है। इन्हें मोटा (भारी) बनाने के लिए जोड़कर सिला जाता है। बंगाल में सभी श्रेणी की महिलाएँ यह काम करती हैं, विशेषतः वृद्ध महिलाएँ अपने अतिरिक्त समय में यह काम करती हैं। रंगीन धागों से पुरानी साड़ियों (किनारों) पर कंथाओं को साड़ी की सतह से सिला जाता है। साड़ियों की सतह पर अलग-अलग तरह की परिकल्पना की जाती है। रजाइयाँ (लिहाफ), शादी की बैले, शीशे तथा गहने-जवाहरातों को ढकने के लिए कपड़ों पर भी कढ़ाई की जाती है।
कंथाओं के मोटिफ और डिज़ाइन ग्रामीण प्राकृतिक दृश्यों, कर्मकांडी और धार्मिक क्रियाओं (मंडला), नित्य प्रयोग में आने वाली वस्तुओं, ग्रामीण त्योहारों, सर्कस शैली और अन्य मनोरंजन प्रदान करने वाले खेलकूद तथा ऐतिहासिक हस्तियों (विक्टोरिया से लेनिन तक) के चित्रों से लिए जाते हैं। इन कंथाओं के मोटिफ दर्शाते हैं कि इनके कलाकार यद्यपि प्रायः अनपढ़ होते हैं, लेकिन इनमें अपने आस-पास की वस्तुओं को गौर से देखने की गहरी निरीक्षण शक्ति होती है।
सूचीबद्ध कंथा एक प्रकार की साड़ी है जो एक विशिष्ट पारंपरिक शैली और तकनीक से सिली होती है। इसमें विभिन्न प्रकार के पशु तथा मानवी आकृति के मोटिफ हैं। साड़ी के गुलाबी आधार पर विभिन्न रंगों के धागों से चेन स्टिच (श्रृंखला धागों की कढ़ाई) पद्धति से कढ़ाई की जाती है। इसमें सफेद, हरा, बैंगनी, लाल, पीला तथा काले रंग का प्रयोग किया जाता है। राजा जैसा दिखने वाला एक व्यक्ति घोड़े पर बैठा है, जिसके सिर पर छाता (छत्र) है और उसके हाथ में विशेष प्रकार की चिड़ियाँ तथा मधुमक्खियाँ मोटिफ के रूप में प्रयोग की गई हैं। इस मोटिफ में कालीघाट पटचित्र का प्रभाव बहुत स्पष्ट है।
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