* मानव सभ्यता की उत्पत्ति और विकास को समझना।
* विभिन्न संस्कृतियों, साम्राज्यों के उत्थान-पतन का अध्ययन।
* सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक और कलात्मक विकास को जानना।
* मानव सभ्यता को प्रभावित करने वाले तत्वों की पहचान करना।
* उन्नत सामाजिक जीवन के लिए सभ्यताओं का इतिहास आवश्यक है।
उद्देश्य
* विश्व की प्राचीन सभ्यताओं की जानकारी प्राप्त करना।
* नदियों के किनारे सभ्यताओं के विकास के कारण जानना।
* प्राचीन सभ्यताओं के सामाजिक और राजनैतिक जीवन की विशेषताओं का वर्णन करना।
* धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की उपलब्धियों को समझना।
* विभिन्न सभ्यताओं के पतन के कारणों को जानना।
सभ्यता का अर्थ
* संसाधन और कला कौशल जिनसे मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता है।
* मानव के क्रियाकलाप जो स्वतंत्र और सुरक्षित जीवन देते हैं।
* मानव व्यवहारों का ज्ञान या सामाजिक अनुशासन जिससे मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
प्राचीन सभ्यताओं के नदियों के किनारे विकास के कारण
* जीवन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्रमुख नदियों और नदी घाटियों में विकास।
* कारण:
* जल व भोजन की उपलब्धता।
* सुरक्षा की चिंता।
* पशुपालन।
* उपयुक्त जलवायु।
* धातुओं की सुलभ प्राप्ति।
* यातायात के साधन।
* उदाहरण: सिंधु-सरस्वती सभ्यता (सिंधु-सरस्वती नदी), मिस्र की सभ्यता (नील नदी), फारस की सभ्यता (दजला-फरात नदी), चीन की सभ्यता (हवांग हो एवं सिकियांग नदियां)।
1.1 वैदिक सभ्यता
परिचय
* स्थान: सप्त सिंधु प्रदेश।
* जानकारी के स्रोत: वेद।
* संस्थापक: आर्य (जो मूलतः भारत के निवासी माने जाते हैं)।
वैदिक साहित्य
* आर्य विद्वानों द्वारा रचित साहित्य।
* चार वेद: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
* प्रत्येक संहिता में वैदिक ऋचाएं, धार्मिक अनुष्ठान विधियां, दार्शनिक सिद्धांत और आध्यात्मिक ज्ञान।
* अपौरुषेय: ऋषियों द्वारा समय-समय पर दृष्ट।
राजनैतिक संगठन
* प्रारंभिक अवस्था: शिशु-अवस्था।
* सबसे छोटी इकाई: कुटुम्ब/कुल/परिवार।
* ग्राम: अनेक परिवारों को मिलाकर।
* विश: कुछ ग्रामों के समूह।
* जन: अनेक विशों के समूह।
* प्रधान: राजन, गोप या चाक।
* जनतांत्रिक संस्थाएं: सभा व समिति (राजा की स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण हेतु)।
* कालान्तर में: कबीलाई राज्यों की जगह क्षेत्रीय राज्यों का उदय, राजतंत्र का विकास, राजा की शक्ति में वृद्धि।
* प्रमुख जनपद: कुरु, पांचाल, गांधार, कैकय, भद्र, काशी, कलिंग, अंग, मगध, लिच्छवी, मल्ल, अवन्ति, कौशल, शिवि आदि।
* राजा का राज्याभिषेक विधि-विधानपूर्वक।
सामाजिक जीवन
* विशेषता: सादगीपूर्ण, स्वाभाविक, समानता पर आधारित, पवित्र।
* वर्ग व्यवस्था:
* प्रारंभ में कोई भेदभाव नहीं, कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था।
* चार वर्ण: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
* मनुष्य अपनी क्षमता, योग्यता और रुचि के अनुसार व्यवसाय चुनने को स्वतंत्र।
* परिवार:
* सबसे छोटी एवं महत्वपूर्ण इकाई।
* विशेषताएं: संयुक्त परिवार एवं पितृसत्तात्मकता।
* मुखिया: वयोवृद्ध पुरुष (गृहपति)।
* विवाह: पवित्र एवं धार्मिक संस्कार, वयस्क होने पर। पति-पत्नी दोनों की धार्मिक अनुष्ठानों में उपस्थिति अनिवार्य।
* स्त्रियों की स्थिति:
* सम्मान का भाव।
* कन्या को पर्याप्त स्नेह एवं अधिकार।
* पुत्रियों को पुत्र के समान शिक्षा का अधिकार।
* विदुषी महिलाएं: मैत्रेयी, गार्गी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, अपाला, घोषा।
* आश्रम व्यवस्था:
* आदर्श आयु 100 वर्ष, चार भागों में विभक्त।
* आश्रम: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास।
* लक्ष्य: मनुष्य को कर्मनिष्ठ बनाना, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करना।
* भोजन व वस्त्राभूषण:
* मुख्य आहार: दूध, खीर, दही, घी, जौ, गेहूँ, उड़द, चावल।
* वस्त्र: सूती, ऊनी, रेशम, मृगचर्म से निर्मित।
* आभूषण: स्वर्ण व रजत निर्मित, स्त्री-पुरुष दोनों प्रिय थे।
आर्थिक जीवन
* प्रधानता: ग्राम्य जीवन।
* मुख्य व्यवसाय: कृषि एवं पशुपालन, वाणिज्य व व्यापार के भी प्रमाण।
* कृषि:
* आजीविका का मुख्य स्रोत।
* दो बैलों से खेत जोते जाते थे।
* वर्षा पर निर्भरता अधिक।
* सिंचाई के लिए कुएं और नहरें।
* पशु: गाय, हाथी, घोड़ा, भैंस, हरिण, भेड़, बकरी, गधा पालतू पशु थे।
* गाय: पवित्र व आर्थिक समृद्धि का केंद्र, 'अकण्या' (वध न करने योग्य) कहा गया।
* शिल्पकला एवं उद्योग:
* मुख्य व्यवसाय: सुनार, लुहार, नाविक, रथकार, रंगरेज, बढ़ई।
* मूल्य की इकाई: गाय।
* हिरण्य: स्वर्ण धातु हेतु प्रयुक्त (आभूषण, स्वर्णमुद्रा/निष्क)।
* भिषक (वैद्य): टूटी हड्डी जोड़ने का वर्णन।
* व्यापार वाणिज्य:
* जल एवं स्थल मार्गों से व्यापार।
* उन्नत व्यवसाय: अनाज, वस्त्र, चमड़ा।
* पणि: समृद्ध एवं धनी व्यापारी।
धार्मिक जीवन
* विशेषता: सरल धर्म।
* पूजा: प्राकृतिक शक्तियों को दैवीय शक्तियाँ मानकर पूजते थे।
* उद्देश्य: देवताओं को प्रसन्न कर सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना।
* प्रार्थना: स्तुति व यज्ञों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करते थे।
* प्रमुख देवता: इंद्र, सूर्य, अग्नि, वायु, उषा, वरुण, विष्णु, पृथ्वी, बृहस्पति।
* यज्ञ: देवताओं के मिलन का सांसारिक स्थान (ऋग्वेद में उल्लेख)।
* प्रकार: नित्य यज्ञ और नैमित्तिक यज्ञ।
1.2 सिंधु-सरस्वती सभ्यता
परिचय
* विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान।
* सिंधु नदी उद्गम: तिब्बत के कैलाश मानसरोवर के उत्तर में स्थित हिमनद।
* सरस्वती नदी उद्गम: शिवालिक की पहाड़ियां।
* वर्तमान में भौतिक रूप से विलुप्त, परंतु भू-उपग्रह चित्रों से बहाव क्षेत्र का पता चला है।
* वैदिक साहित्य, रामायण व महाभारत में अस्तित्व के प्रमाण।
खोज
* सर्वप्रथम: 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने हड़प्पा गाँव में प्राचीन बस्ती के अवशेष देखे।
* पुरातत्वेता सर अलेक्जेंडर कनिंघम (1872 ई.): हड़प्पा की यात्रा, चित्रांकित मृद्भांड एकत्रित किए, प्राचीन सभ्यता का अनुमान लगाया, पर काल निर्धारण नहीं कर पाए।
* सर्वप्रथम खोज (1921 ई.): डॉ. दयाराम साहनी ने हड़प्पा में।
* एक वर्ष बाद (1922 ई.): डॉ. राखलदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो की खोज की।
* जॉन मार्शल (1924 ई.): हड़प्पा पर विस्तृत रिपोर्ट दी, मिस्र और मेसोपोटामिया जितनी प्राचीन बताया।
* अन्य विद्वान: एन.एल. जूमदार, माधोस्वरूप वत्स, के.एन. दीक्षित, अर्नेस्ट मैके, व्हीलर, अमलेन्दु घोष, बाल कृष्ण थापर, स्टीन आदि।
* उत्खनन कार्य: 1921 ई. में हड़प्पा से प्रारंभ होकर 1959 ई. में कालीबंगा की जानकारी मिलने तक निरंतर जारी।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता का काल
* डॉ. राखलदास बनर्जी: विश्व की प्राचीनतम सभ्यता होने का गौरव।
* धर्मपाल अग्रवाल (वैज्ञानिक कार्बन पद्धति): 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू.।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता से संबंधित स्थल
* कुल खोजे गए स्थल: 1500 (भारत में 900, पाकिस्तान में 600)।
* पाकिस्तान में: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, गनवेरीवाला।
* भारत में: कालीबंगा, राखीगढ़ी, धोलावीरा, लोथल, रंगपुर आदि।
* बलूचिस्तान: सुत्कागेनडोर, सुत्काकोह, बालाकोट, अनीरा, निन्डीवाडी आदि।
* पंजाब (पाकिस्तान): हरप्पा, रहमानवेरी, सरायीत, मनेरीवाल आदि।
* पंजाब (भारत): रूपड़, संगोल, कोटला निहंग खान आदि।
* हरियाणा: बनावली, पीथाथल, राखीगढ़ी आदि।
* उत्तर प्रदेश: आलमगीरपुर (मेरठ), कौशांबी (इलाहाबाद), हुलास (सहारनपुर) आदि।
* राजस्थान: कालीबंगा, पीलूंड, ओशियाणा (भीलवाड़ा) आदि।
* गुजरात: रंगपुर, लोथल, सुरकोटड़ा, रोजदी, प्रभासपाटन, मालावण, भगतरान, धौलावीरा, देशालपुर आदि।
* महाराष्ट्र: दाइमाबाद (अहमदनगर)।
* जम्मू-कश्मीर: मांडा (जम्मू)।
नगर-निर्माण योजना
* प्रमुख विशेषता: नगरों के निर्माण में एकरूपता (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल में)।
* सड़कों एवं नालियों का उचित प्रबंधन।
* भवन निश्चित योजना के अनुसार।
* विकसित नगरपालिका प्रशासन का अनुमान।
* दो-स्तरीय नगर: दुर्ग या गढ़ी (शासक निवास, सार्वजनिक भवन) और निचला शहर (आवासीय भवन)।
* सड़क व्यवस्था:
* आवागमन की सुविधा हेतु समुचित व्यवस्था।
* सड़कों एवं गलियों का जाल।
* चौड़ी सड़कें, छोटी उप-सड़कों से जुड़ी।
* पूरब से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण दिशा।
* कूड़ा फेंकने के लिए गड्ढे।
* पानी का जमाव रोकने हेतु किनारों से ढलुवाँ।
* एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
* जल निकास प्रणाली व स्वच्छता:
* पीने का पानी कुओं से (लगभग प्रत्येक बड़े घर में, कुछ सार्वजनिक कुएं भी)।
* पानी की निकासी के लिए अच्छी नाली व्यवस्था (अधिकतर ढकी हुई)।
* सफाई हेतु बीच-बीच में गड्ढे (ढक्कन हटाकर साफ करने योग्य)।
* प्राचीन काल की अन्य सभ्यताओं से विशिष्ट उपलब्धि।
* भवन निर्माण योजना:
* योजनाबद्ध तरीके से निर्मित।
* प्रत्येक घर में आंगन, चारों तरफ कमरे।
* रसोईघर, शौचालय एवं स्नानागार का प्रबंध।
* कुएं एवं नालियों की व्यवस्था।
* प्रकाश और वायु प्रवाह का समुचित प्रबंध।
* शौचालय एवं कूड़ेदान का होना उन्नत सोच का परिचायक।
* मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार:
* दुर्ग के भीतर विशाल जलकुंड।
* माप: लंबाई 12 मीटर, चौड़ाई 7 मीटर, गहराई 2.5 मीटर।
* प्रवेश हेतु दक्षिणी और उत्तरी सिरों पर ईंटों की सीढ़ियां।
* आनुष्ठानिक स्नान के लिए प्रयोग होता था।
आर्थिक जीवन
* कृषि:
* कालीबंगा में हलों द्वारा खेतों के जोतने का प्रमाण।
* विभिन्न प्रकार के अनाज, फल एवं सब्जियां उपजाते थे।
* गेहूं, जौ, तिल, सरसों, राई और मटर की खेती।
* खजूर, तरबूज, नारियल, नींबू, अनार जैसे फल।
* अतिरिक्त अनाज राज्य द्वारा नियंत्रित गोदामों में सुरक्षित।
* पशुपालन:
* मिट्टी के बर्तनों पर चित्र, मुहरें एवं अस्थि-अवशेषों से जानकारी।
* सूअर, भेड़, बकरी, गाय, कूबड़ वाले बैल, भैंस, कुत्ता, हाथी, ऊंट पालतू पशु थे।
* व्यापार वाणिज्य:
* स्थल व जल दोनों मार्गों से।
* परिवहन: बैलगाड़ियां, ऊंट (स्थल मार्ग), नावें (जलमार्ग)।
* आयात: तांबा, सोना, टिन, चांदी, मणियां (बलूचिस्तान, राजस्थान, मैसूर, अफगानिस्तान, हजारी बाग, तिब्बत, तुर्किस्तान)।
* मिस्र या बेबीलोन से आयातित मिट्टी के बर्तन।
* बंदरगाह: लोथल में अवशेष।
* पश्चिम एशिया व अरब सागरीय प्रदेशों से व्यापार।
* बहरीन में हड़प्पा की मुद्राएं, मेसोपोटामिया में हड़प्पा युगीन मुहरें मिलीं।
* प्रचलन: मुद्रा (मुहर) एवं वस्तु विनिमय।
* उद्योग धंधे:
* अति कुशल उद्योग धंधों के क्षेत्र में।
* मुख्य औद्योगिक वर्ग: कुम्हार, सुनार, लुहार, जौहरी, शिल्पी, समतराश, बुनकर, रंगरेज।
* धातुओं को गलाने, ढालने और धातु सम्मिश्रण में दक्ष।
सामाजिक जीवन
* स्रोत: उत्खनन में प्राप्त पुरावशेष।
* विशेषता: सरल, सादगी और पवित्रता से युक्त।
* सामाजिक वर्गीकरण (संभवतः):
* (क) विद्वान, पुरोहित, ज्योतिषी, वैद्य।
* (ख) योद्धा, सैनिक व राजकीय अधिकारी।
* (ग) व्यापारी, श्रमिक, शिल्पकार, कारीगर।
* परिवार व्यवस्था:
* समाज की प्रमुख इकाई परिवार।
* पृथक आवास योजना।
* शांतिपूर्ण जीवन-यापन, सार्वजनिक सम्पन्नता, सामूहिक एवं संगठित समाज लक्ष्य।
* स्त्रियों का स्थान:
* बहुसंख्यक नारी मूर्तियों की प्राप्ति, मातृदेवी की उपासना।
* नारी का उत्कृष्ट स्थान।
* स्त्री-पुरुष समान रूप से सभी उत्सवों में भाग लेते थे।
धार्मिक जीवन
* विशेषता: बहुदेववादी और प्रकृतिपूजक।
* पूजा: प्रकृति की विभिन्न शक्तियां (अग्नि, वृक्ष, जल, पशु)।
* जानकारी का आधार: उत्खनन में प्राप्त मूर्तियां एवं मुहरों पर चित्र।
* मातृदेवी की पूजा: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो तथा अन्य स्थानों से बड़ी संख्या में मिट्टी की मूर्तियां (मातृदेवी का प्रतीक)।
* प्रमुख देवता: पशुपति शिव (योगी की मुद्रा में बैठे हुए त्रिमूर्ति का चित्र)।
* एक मुहर पर तीन मुख और दो सींगों वाले योगी की मुद्रा, चारों तरफ हाथी, बाघ, गैंडा तथा भैंसा।
* पुरातत्वेत्ता इसे 'योगीश्वर' एवं 'पशुपति शिव' की मूर्ति मानते हैं।
भाषा एवं लिपि
* भाषा एवं लिपि का विकास (व्यापार का हिसाब-किताब रखने के लिए)।
* असंख्य लिपिबद्ध मुहरें प्राप्त।
* लिपि: अभी तक संतोषजनक और सर्वमान्य ढंग से पढ़ी नहीं जा सकी है, प्रयास जारी।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अवसान
* समय: 1700 ई.पू. के लगभग।
* कारण (बताए गए): अतिवृष्टि, अनावृष्टि, जलवायु परिवर्तन, विदेशी आक्रमण, पर्यावरणीय कारक।
* निष्कर्ष: भारत की प्राचीनतम, कांस्यकालीन, नगरीय, वाणिज्य प्रधान सभ्यता। पर्यावरण बोध, स्वच्छता, कला, विज्ञान और तकनीकी विकास में उत्कृष्ट। सुव्यवस्थित प्रशासन, सुसंगठित समाज, समृद्ध आर्थिक जीवन, उन्नत एवं पवित्रता से ओत-प्रोत जीवन। विश्व की अन्य सभ्यताओं में मौलिक एवं विशिष्ट स्थान।
1.3 माया सभ्यता
परिचय
* स्थान: मेक्सिको का यूकाटन, ग्वाटेमाला, होंडुरास। मेसो अमेरिकन सभ्यता भी कहा जाता है।
* शुरुआत: 1500 ई.पू.
* उच्च काल: 300 ई. से 800 ई. तक (कला, गणित, वास्तुशास्त्र, ज्योतिष और लेखन में आगे)।
* स्वर्ण युग: इस काल को कलात्मक विकास का स्वर्ण युग कहा जाता है।
* खेती और शहर विकसित हुए।
* उल्लेखनीय इमारतें: पिरामिड (धार्मिक केंद्रों के रूप में)।
* ह्रास: 900 ई. के बाद नगर खाली होने लगे।
* आधार फसल: मक्का (धार्मिक क्रियाकलाप एवं उत्सव मक्का बोने, उगाने और काटने से जुड़े)।
* कृषि: उन्नत तरीके, अच्छी पैदावार। शासक वर्ग, पुरोहित और प्रधानों को उन्नत संस्कृति विकसित करने में सहायता मिली।
* लिपि: चित्रात्मक, अभी तक पूरी तरह से पढ़ी नहीं जा सकी है।
* खगोलीय ज्ञान: सबसे बड़ी विशेषता।
* कैलेंडर: विभिन्न घटनाओं, धार्मिक त्योहारों और जन्म-मरण संबंधी बातों का लेखा-जोखा रखने के लिए।
* माया कैलेंडर का एक साल 200 दिन का।
* तारीखें तीन तरह से निर्धारित: लंबी गिनती, ज़ॉल्किन (ईश्वरीय कैलेंडर), हाब (नागरिक कैलेंडर)।
* भविष्यवाणियां करते थे।
* मान्यता: कैलेंडर की तारीखें खत्म होने पर प्रलय और नए युग की शुरुआत।
* पतन के कारण (विभिन्न मत): विदेशी आक्रमण, विद्रोह, प्राकृतिक आपदा (सूखा, महामारी)।
1.4 मेसोपोटामिया की सभ्यता
परिचय
* शाब्दिक अर्थ: 'दो नदियों के बीच की भूमि' (यूनानी भाषा में मेसो=मध्य, पोटमस=जल)।
* आधुनिक नाम: इराक।
* नदियां: दजला एवं फरात (टर्की के काकेशस पहाड़ों से निकलती हैं, फारस की खाड़ी में मिलती हैं)।
* विकसित सभ्यताएं (क्रमशः): सुमेरिया की सभ्यता (सुमेरियन लोग), बेबीलोनिया की सभ्यता (मिश्रित जातियां), असीरिया की सभ्यता।
मेसोपोटामिया के राज्यों का उत्थान और पतन
* सुमेरियन सभ्यता:
* उत्तर से आर्मीनियन पर्वतीय प्रदेशों से आए सुमेरियन लोग।
* नगर राज्य सरकारें स्थापित कीं (उर, लगाश, एरेक, एरिडुक प्रसिद्ध)।
* प्रथम शक्तिशाली राजा: सारगॉन प्रथम (अक्कद से आया था, सुमेर और अक्कद को मिलाकर सुदृढ़ राज्य)।
* पतन: लगातार विदेशी आक्रमणों से।
* बेबीलोन सभ्यता:
* सर्वाधिक प्रतापी राजा: हम्मूराबी।
* नगर राज्यों की लड़ाइयों को रोका, एक जैसे कानून लागू कर दृढ़ राज्य स्थापित किया।
* बेबीलोन में लोगों की अपनी कोई सभ्यता नहीं थी, उन्होंने जीती हुई घाटी से अपनाया।
* सुमेरिया से प्रारंभ और असीरिया में अंत।
* असीरियाई साम्राज्य (लगभग 1100 से 612 ई.पू.):
* सीरिया, फिलिस्तीन, फिनिशिया आदि को जीतकर विशाल साम्राज्य।
* दूसरा शक्तिशाली बेबीलोनियन साम्राज्य (612 ई.पू. - 539 ई.पू.):
* काल्डियाई लोगों ने असीरियाई लोगों को पराजित कर स्थापित किया।
मेसोपोटामिया सभ्यता की विशेषताएं
1. हम्मूराबी की विधि संहिता
* हम्मूराबी (एमेराइट जाति का राजा) के शासन काल में बेबीलोनिया की उन्नति।
* प्रसिद्धि का कारण: हम्मूराबी की विधि संहिता।
* उत्कीर्ण: आठ फीट ऊंचे काले पत्थर पर।
* उद्देश्य: समस्त प्रजाजनों को कानून की जानकारी।
* दंड सिद्धांत: 'जैसे को तैसा' और 'खून का बदला खून'।
* जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से संबंधित कानून।
2. मेसोपोटामिया का सामाजिक जीवन
* तीन वर्ग (संपन्नता के आधार पर):
* उच्च वर्ग: राजकीय उच्चाधिकारी, सामंत, पुरोहित, समृद्ध लोग।
* मध्यम वर्ग: व्यापारी, जमींदार, दुकानदार।
* निम्न वर्ग/दास वर्ग: युद्ध में पराजित सैनिक।
* प्रचलन: संयुक्त परिवार प्रणाली।
3. आर्थिक जीवन
* (अ) कृषि व पशुपालन:
* मुख्य व्यवसाय: कृषि।
* भूमि स्वामित्व: राजा, सामंत, धनी व्यापारी, पुरोहित।
* नदियों के किनारे उपजाऊ मिट्टी, अच्छी सिंचाई व्यवस्था।
* राज्य द्वारा कृषि कार्य एवं सिंचाई में मदद।
* खेती: गेहूं, जौ, खजूर की बहुतायत में खेती।
* हल और बैल प्रयुक्त होते थे।
* द्वितीय स्तर का व्यवसाय: पशुपालन।
* पालतू पशु: गाय, बैल, भेड़, बकरी, सूअर, गधे, खच्चर।
* (ब) व्यापार व उद्योग:
* उद्योग धंधे: ऊन, चमड़ा, कांसा, सोना, चांदी, तांबा आदि से संबंधित।
* धातुओं से औजार, यंत्र, आभूषण बनाए जाते थे।
* उद्योग-धंधे उन्नत अवस्था में।
* दूरस्थ देशों से व्यापार (भारत की सिंधु-सरस्वती सभ्यता से व्यापारिक संबंध)।
* सिंधु-सरस्वती सभ्यता की कई वस्तुएं मेसोपोटामिया के 'उर' नगर की खुदाई में मिलीं।
4. धर्म एवं दर्शन
* धर्म का उद्देश्य: सांसारिक सुखों की प्राप्ति।
* विशेषता: बहुदेववादी, कर्मकांड प्रधान, पुरोहित प्रधान।
* धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा पाप-मुक्त होने की मान्यता।
* दर्शन: नैतिक जीवन का अच्छा फल, पापमय जीवन का बुरा फल (स्वर्ग एवं नरक का ज्ञान)।
5. ज्ञान-विज्ञान
* प्रगति: गणित, ज्योतिष, खगोलशास्त्र।
* सूर्य, चंद्रमा, तारों और ग्रहों की गति का अध्ययन।
* समय गणना: दिन को 24 घंटों में बांटा, 60 सेकंड का मिनट, 60 मिनट का एक घंटा।
* धूप घड़ी और जल घड़ी से समय की गणना।
* रेखागणित: वृत्त को 360 डिग्री में विभाजित करना।
* जोड़, बाकी, गुणा, भाग का ज्ञान।
6. कला
* स्थापत्य: दो मंजिला पक्की ईंटों के भवन एवं मंदिरों का निर्माण।
* गुम्बद, मेहराब और स्तंभ मंदिर।
* महत्वपूर्ण खोज: मेहराब।
* चित्रकला और संगीतकला में रुचि।
7. कीलाक्षर लिपि
* प्रथम लिपि का विकास: सुमेरिया में।
* चित्रलिपि से विकसित होकर कीलाक्षर लिपि (क्यूनिफार्म लिपि) में परिणत।
* मिट्टी की तख्तियों पर सरकंडे की कलम से लिखते थे।
* उपयोग: सुमेरिया के व्यापारी हिसाब-किताब रखने के लिए करते थे।
1.5 मिस्र की सभ्यता
परिचय
* स्थान: नील नदी की घाटी (अफ्रीका महाद्वीप की प्रमुख नदी)।
* हेरोडोटस (इतिहासकार): मिस्र को नील नदी का वरदान कहा।
* नील नदी: इथोपिया के युगांडा स्थित पर्वत से निकलती है, मिस्र के मध्य से बहती हुई भूमध्य सागर में गिरती है।
* नील नदी के कारण ही मिस्र का अस्तित्व।
मिस्र की प्रमुख विशेषताएं
1. सामाजिक जीवन
* शासक: फराओ (प्रजा पर निरंकुश सत्ता)।
* समाज (5 वर्गों में विभक्त): राज परिवार, सामंत, पुरोहित, मध्यम वर्ग, दास।
* दास वर्ग की स्थिति दयनीय।
* राजवंश, सामंत, एवं पुरोहित बड़े राजमहलों में रहते थे।
* स्त्रियों की स्थिति: उच्च स्थान प्राप्त।
2. आर्थिक जीवन
* (अ) कृषि व पशुपालन:
* खेती: गेहूं, जौ, खजूर, अंजीर, अंगूर।
* नील नदी में बाढ़ के पानी को सिंचाई हेतु संग्रह।
* मिस्र के शासन द्वारा कृषि कार्यों में मदद।
* मुख्य पालतू पशु: गाय, भेड़, बकरी, बंदर, गधा।
* (ब) व्यापार व उद्योग:
* कला: पत्थर के गुलदस्ते, प्याले, तश्तरियां एवं मिट्टी के बर्तन बनाते थे।
* चमड़े के वस्त्र, ढाल एवं पैपिरस से कागज बनाना जानते थे।
* लकड़ी पर नक्काशी, कांच पर चित्रकारी, नाव, चटाई, रस्सी, ईंट भी बनाते थे।
* व्यापार: नील नदी मार्ग से नौकाओं द्वारा विदेशी व्यापार।
* प्रचलन: वस्तु विनिमय।
* व्यापार राज्य के नियंत्रण में, निजी व्यापार बहुत कम।
3. धार्मिक जीवन
* विशेषता: धर्म प्रधान समाज।
* फराओ: ईश्वर का प्रतिनिधि समझते थे।
* सूर्य: संसार का कर्ता मानते थे, सम्राट सूर्य का पुत्र।
* पूजा: आकाश, अग्नि, वायु, ओसिरिस (नील नदी) तथा सिन (चंद्रमा)।
* अखनाटन (फराओ): केवल सूर्य की पूजा, अन्य देवताओं की पूजा पर रोक (एकेश्वरवाद का प्रयास)।
* पुनः बहुदेववाद प्रचलित हो गया।
4. ज्ञान-विज्ञान
* प्रगति: ज्योतिष व गणित (विश्व सभ्यताओं के लिए अनुकरणीय)।
* चिकित्सा एवं शरीर शास्त्र का ज्ञान, स्वास्थ्य सुरक्षा।
* धूप घड़ी व जल घड़ी का आविष्कार।
* मृतक शव को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न रसायनों का आविष्कार।
* मिस्र का पंचांग अन्य सभ्यताओं ने अपनाया।
* अपनी वर्णमाला विकसित की, पैपिरस वृक्ष से कागज का निर्माण।
* विशेष उपलब्धि: पिरामिड निर्माण।
II. पिरामिड निर्माण
* मिस्र की कला की अद्वितीय देन।
* विश्वास: मृत्यु के बाद शव में आत्मा निवास करती है।
* उद्देश्य: मृतक शव को विशेष रसायन का लेप लगाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखना।
* समाधियां: शवों को सुरक्षित रखने के लिए बनाई जाती थीं (पिरामिड कहलाते थे)।
* शव: पिरामिड में रखे शवों को 'ममी' कहा जाता था।
* मानक निर्धारण: प्रत्येक प्रस्तरखंड का माप समान।
* उदाहरण: गीज़ा एवं खुफू के पिरामिड (वास्तुकला का कलात्मक वैभव, आज भी विश्व के सात आश्चर्यों में)।
* गीज़ा का पिरामिड: 481 फीट ऊंचा, 755 फीट चौड़ा, 23 लाख पत्थर के टुकड़े (2.5-2.5 टन के)।
* बाहर: विशालकाय नृसिंह की मूर्ति (स्फिंक्स)।
1.6 चीन की सभ्यता
परिचय
* स्थान: हवांग हो और चांग जियांग (यांग्त्सी-सीक्यांग) नदियों की घाटियां।
* जाति: मुख्यतः मंगोलियाई (तिब्बती, हूण, मांचू, मियाओ आदि का मिश्रण भी)।
* शासक राजवंश: शांग वंश, चाऊ वंश, चिन वंश, हान वंश, तांग वंश (चिन वंश के कारण 'चीन' नाम)।
चीन सभ्यता की विशेषताएं
1. सामाजिक जीवन
* समाज (चार भागों में विभक्त):
* (i) सामंत, पुरोहित एवं शिक्षित (मंडारिन वर्ग)।
* (ii) शिल्पकार वर्ग।
* (iii) व्यापारी वर्ग।
* (iv) कृषक वर्ग।
* मंडारिन वर्ग: शिक्षित वर्ग, विद्वता के आधार पर कोई भी प्रवेश कर सकता था। विद्याध्ययन एवं ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रसिद्ध।
* परिवार: समाज की प्रमुख इकाई, संयुक्त परिवार प्रथा पितृप्रधान। वयोवृद्ध परिवार का मुखिया और आदरणीय।
* स्त्रियों की स्थिति: दयनीय होती गई, अनेक नियंत्रण।
* प्रचलन: तलाक एवं पर्दा प्रथा।
* स्त्रियों को तलाक देने का अधिकार नहीं था।
2. आर्थिक जीवन
* (अ) कृषि व पशुपालन:
* निर्भरता: मुख्यतः कृषि पर।
* खेती: गेहूं, चावल, कपास, चाय।
* रेशम के कीड़े पाले जाते थे।
* मुख्य पालतू पशु: गाय, बैल, भेड़, बकरी, सूअर एवं कुत्ता।
* (ब) व्यापार-उद्योग:
* चाऊ युग में व्यापार: नमक, रेशम, फर और मछली।
* विदेशी व्यापार का विकास (मध्य एशिया, भारत, अफगानिस्तान, फारस और लंका से)।
* निपुणता: चीनी मिट्टी के बर्तन बनाना, पॉलिश करना, उच्च कोटि का रेशम तैयार करना एवं ताश बनाना।
* रेशम मार्ग: उत्तरी चीन से पश्चिम का मार्ग।
3. धार्मिक जीवन
* विशेषता: सरल, सादा और परिष्कृत धर्म।
* पूजा: प्राकृतिक शक्तियों के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र, पूर्वजों आदि की पूजा।
* प्रथा: जादू-टोना द्वारा प्रेतात्माओं को नियंत्रित करना।
4. दर्शन
* प्रगति: दर्शन के क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति।
* प्रसिद्धि: 'सौ दार्शनिक संप्रदायों' के लिए।
* प्रमुख दार्शनिक: कन्फ्यूशियस, मेंशियस, लाओत्से, मोत्सू।
* कन्फ्यूशियस: भ्रम व अंधविश्वास का विरोधी।
* 'पंचगुण' सिद्धांत (जीवन को सुखमय बनाने हेतु): दया, ज्ञान, न्याय, सत्यता और सेवा-भक्ति।
* कहावतें: "जो कुछ तुम अपने साथ किया जाना पसंद नहीं करते, वह दूसरों के साथ मत करो।"
* लाओत्से: विचार 'ताओ-ते-चिंग' में संग्रहित (ताओवाद)।
5. ज्ञान-विज्ञान
* विशेषता: जिज्ञासु।
* अपना पंचांग बनाया।
* आविष्कार: कुतुबनुमा (दिशासूचक यंत्र) चीनी नाविकों द्वारा।
* बारूद, कागज, छापाखाना का आविष्कार सर्वप्रथम चीन में।
II. चीन की दीवार
* सर्वश्रेष्ठ प्रतीक: चीन की महान दीवार।
* निर्माता: शी-व्हांग टी।
* उद्देश्य: उत्तर-पश्चिम से आने वाले बर्बर जातियों (हू्णों) के आक्रमणों से रक्षा।
* माप: 1800 मील लंबी, 20 फीट चौड़ी, 22 फीट ऊंची।
* संरचना: 20 हजार बुर्ज, 23 हजार स्तंभ और दस हजार सुरक्षा चौकियां।
1.7 यूनान की सभ्यता
परिचय
* स्थान: यूरोप के दक्षिण-पश्चिम कोने में भूमध्य सागर में स्थित छोटा देश। तीन तरफ से समुद्र से घिरा, छोटी-छोटी पहाड़ियों से भरा।
* अंधकारपूर्ण युग (ई.पू. 12वीं से 8वीं शताब्दी):
* जानकारी: इलियड और ओडिसी (होमर द्वारा रचित महाकाव्य)।
* नगर-राज्यों का उदय (लगभग ई.पू. 800):
* कुछ यूनानी गांवों के समूहों ने मिलकर नगर-राज्यों का रूप लिया।
* प्रत्येक नगर-राज्य अपनी पहाड़ी या घाटी को ही अपना देश समझता था।
* प्रत्येक नगर-राज्य की अपनी सरकार और अपना देव।
* प्रमुख नगर-राज्य: स्पार्टा और एथेंस।
यूनानी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएं
1. स्पार्टा नगर राज्य का जीवन
* यूनान के अन्य राज्यों से भिन्न सैनिक राज्य।
* निवासी: अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण और जन्मजात योद्धा।
* प्रशिक्षण: 7 वर्ष की आयु से बालकों को कष्ट सहने एवं लड़ाकू योद्धा बनने का प्रशिक्षण।
* साहित्य: केवल सैनिक सफलताओं और शूरवीरों का यशोगान।
* यूनानी संस्कृति के निर्माण में कोई योगदान नहीं।
* पेलोपोनीशियन युद्ध (ई.पू. 431 से 404 तक): स्पार्टा और एथेंस के बीच, स्पार्टा विजयी।
2. एथेंस नगर राज्य का जीवन
* स्पार्टा से बिल्कुल भिन्न विकास।
* सैन्यवाद के स्थान पर लोकतन्त्र का विकास।
* स्थान: एक्रोपोलिस नामक दुर्ग के चारों ओर बसा।
* प्रारंभ में: लिखित कानून न होने से शासकों की मनमानी।
* ब्रेको: सर्वप्रथम न्यायाधीश, कानूनों को लिपिबद्ध किया।
* सोलन: निर्बल लोगों के हित में अनेक कानून, न्याय के समक्ष सबको बराबर किया।
* क्लैस्थनीज: अनेक सुधारों द्वारा सर्वसाधारण को व्यापक राजनीतिक अधिकार, एथेंस में जनतंत्र मजबूत किया।
* 'यूनानी जनतंत्र का पिता': क्लैस्थनीज।
* एथेंस व ईरानियों का युद्ध (मैराथन मैदान में): ईरानी सम्राट दारा ने यूनान पर आक्रमण किया, यूनान विजयी।
* परिणाम: एथेंस यूनानी राज्यों में प्रमुख बना।
3. पेराक्लीज युग
* शासनकाल: ई.पू. 465 में एथेंस की राजसत्ता पेराक्लीज के हाथों में आई।
* विशेषता: यूनान का सर्वश्रेष्ठ जनतांत्रिक नेता।
* उसके नेतृत्व में एथेंस की सर्वतोमुखी उन्नति।
* स्वर्णकाल: यूनानी इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है।
* व्यक्तित्व के योगदान के कारण 'पेराक्लीज युग' कहा जाता है।
II. यूनानी सभ्यता का योगदान
* प्रगति: सभ्यता के हर क्षेत्र में चहुमुखी प्रगति।
* सर्वोत्तम: पेराक्लीज के समय के एथेंस का वैभव।
* दर्शन: पाश्चात्य दर्शन की विभिन्न शाखाओं को जन्म दिया और नामकरण किया।
* प्रसिद्ध दार्शनिक: सुकरात, प्लेटो और अरस्तू।
* सुकरात: ज्ञान मनुष्य को जीवन में सही आचरण करने और सुख का रास्ता दिखाता है।
* साहित्य: होमर के महाकाव्यों 'इलियड' और 'ओडिसी' का यूनानी साहित्य पर अमिट प्रभाव।
* इतिहास: हेरोडोटस को 'इतिहास का पिता' कहा जाता है (संसार में सबसे पहले इतिहास की पुस्तकें लिखीं)।
* विज्ञान:
* आर्किमिडीज: प्राचीन विश्व का महान वैज्ञानिक।
* यूक्लिड: रेखागणित के ज्ञान को विस्तृत किया।
* हिप्पोक्रेट्स: आधुनिक चिकित्साशास्त्र की नींव रखी।
* पाइथागोरस: महान गणितज्ञ।
* खेल: ओलंपिक खेल (ई.पू. 776 में शुरू हुए, ओलंपिया नामक जगह पर आयोजित, राजा 'जीयस' के सम्मान में)।
1.8 रोम की सभ्यता
परिचय
* योगदान: यूनान ने संस्कृति की नींव डाली, रोम ने उसकी रक्षा कर उसे दूर-दूर के देशों तक फैलाया।
* मुख्य केंद्र: इटली।
* इटली ने यूनान और यूरोप की संस्कृतियों को मिलाने में कड़ी का कार्य किया।
* एथेंस की तरह नगर राज्य से महान साम्राज्य स्थापित किया।
* आगमन: लगभग 200 ई.पू. में आल्पस पर्वतों को पार कर कुछ जातियां इटली में बसीं (एटुस्कन जाति)।
* नींव: लैटिनस जाति ने एटुस्कनों को पराजित कर रोमन सभ्यता की नींव डाली।
रोम का इतिहास
* प्रारंभ: राजतंत्र से।
* गणतंत्र की स्थापना: छठी शताब्दी ई.पू. में राजा का पद समाप्त कर दिया गया।
* शासन प्रणाली: सीनेट व सभा।
* समाज (दो वर्गों में बंटा):
* (अ) पैट्रिशियन: उच्च व कुलीन वर्ग।
* (ब) प्लीबियन: किसान, मजदूर व मध्यम वर्ग।
* संघर्ष: लगभग सौ वर्षों तक पैट्रिशियन और प्लीबियन लोगों में संघर्ष।
* परिणाम: रोम में लिखित कानून संहिता स्वीकृत की गई ('बारह तख्तियों के कानून' कहलाते हैं), प्लीबियनों को सभी राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए।
I. कार्थेज से युद्ध
* कार्थेज नगर: अफ्रीका के उत्तरी तट पर (भूमध्य सागर में रोम के प्रसार से गहरा धक्का लगा)।
* संघर्ष: रोम व कार्थेज के निवासियों के मध्य 264 ई.पू. से 146 ई.पू. तक लंबा संघर्ष (प्यूनिक युद्ध)।
* यूनान ने कार्थेज निवासियों की सहायता की।
* परिणाम: युद्धों की समाप्ति के बाद रोम ने यूनान पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया।
II. जूलियस सीज़र
* परिस्थिति: लगातार युद्धों के कारण रोम की सत्ता सेनापतियों के हाथों में आ गई।
* निर्माण: ई.पू. प्रथम शताब्दी में प्रतिभाशाली सेनापति जूलियस सीजर की महान विजयों ने रोमन साम्राज्य का निर्माण किया।
* उच्च पदों पर नियुक्ति का अधिकार अपने हाथों में लिया, प्रशासनिक व्यवस्था को केंद्रित किया।
* सीनेट के स्वरूप में भी परिवर्तन किया।
* इच्छा: रोम में निरंकुश राजतंत्र की स्थापना।
* विरोध: गणतंत्र के पक्षधर उसके विरोधी बन गए।
* हत्या: 44 ई.पू. में जूलियस सीजर की हत्या कर दी गई।
III. ऑक्टेवियन (अगस्टस)
* उत्तराधिकारी: जूलियस सीजर की हत्या के बाद तीन सदस्यों का 'ट्राइमविरेट' स्थापित किया गया।
* प्रमुख सदस्य: ऑक्टेवियन (अगस्टस के नाम से भी जाना जाता है)।
* शासनकाल: 31 ई.पू. से 14 ई. तक।
* सुधार: साम्राज्य में सुख एवं समृद्धि को जन्म दिया।
* चरमोत्कर्ष: रोमन साम्राज्य का चरमोत्कर्ष हुआ।
* स्वर्णयुग: रोमन इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है।
IV. रोमन सभ्यता की देन
* विश्व को सबसे बड़ी देन: रोम के कानून और शासन करने के सिद्धांत।
* सम्राट जस्टिनियन: कानूनों का संग्रह करके विधि संहिता बनाई (जस्टिनियन कोड)।
* शिक्षा, भाषा व साहित्य: यूनानियों के संपर्क से उन्नति हुई।
* लैटिन भाषा: पश्चिमी यूरोप में सभी शिक्षित व्यक्तियों की भाषा बन गई।
* प्लिनी की 'नेचुरल हिस्ट्री': लैटिन भाषा में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक ग्रंथ।
* ज्योतिष: पंचांग (कैलेंडर) का निर्माण (जूलियस सीजर ने किया, जुलाई महीने का नाम उन्हीं के नाम पर)।
* स्पष्ट है कि रोमन सभ्यता ने विश्व सभ्यता को प्रभावित किया।
1.9 राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएं
I. कालीबंगा (हनुमानगढ़)
* अर्थ: 'काले रंग की मिट्टी की चूड़ियां'।
* स्थान: उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर (सरस्वती) नदी के तट पर।
* अवशेष: सुरक्षा प्राचीर से घिरे दो टीले।
* पूर्वी टीला: साधारण जन बस्ती के साक्ष्य।
* पश्चिमी टीला: दुर्ग (संभवतः उच्च वर्ग निवास करता होगा)।
* महत्वपूर्ण साक्ष्य: जुते हुए खेत के साक्ष्य (संसार में प्राचीनतम)।
* धार्मिक अनुष्ठान: कच्ची ईंटों से निर्मित चबूतरों पर पंक्तिबद्ध अग्नि वेदिकाओं के प्रमाण।
* पुरावशेष: मिट्टी से निर्मित अनेक बर्तन।
* लिपि: मिट्टी के बर्तनों और मुहरों पर अंकित लिपि सैंधव लिपि से मिलती-जुलती है, अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
* भवन निर्माण: पत्थरों के अभाव के कारण दीवारें सूर्यतपी ईंटों से बनती थीं और मिट्टी से जोड़ी जाती थीं।
* सफाई व्यवस्था: व्यक्तिगत और सार्वजनिक नालियां, कूड़ा डालने के बर्तन।
* ह्रास/पतन: संभवतः वर्षा की कमी, नदी का पानी कम होता गया, भू-भाग रेत का समुद्र बन गया (सरस्वती नदी के लुप्त होने का उल्लेख पुराणों में)।
II. आहड़ (उदयपुर)
* स्थान: उदयपुर के समीप।
* विकास: बेड़च (आयड़) नदी की घाटियों में।
* अन्य नाम: 'ताम्रवती नगरी' (तांबे के औजारों के बनने का केंद्र प्रमाणित होता है)।
* दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में: 'आघाटपुर' के नाम से पुकारा जाता था।
* स्थानीय नाम: 'धूलकोट'।
* पुरावशेष: तांबे की कुल्हाड़ियां, प्रस्तर के औजार एवं अन्य उपकरण।
* आभूषण: कीमती पत्थरों (गोमेद, स्फटिक आदि) का उपयोग।
* मिट्टी के बर्तन: कालीबंगा की तरह अधिक संख्या में, बिना चित्रांकन के भी सुंदर।
* कृषि: आहड़ सभ्यता के लोग कृषि से परिचित थे।
* बड़े-बड़े बर्तन तथा अन्न पीसने के पत्थर मिले हैं (अन्न उत्पादन प्रमाणित)।
* पारिवारिक व्यवस्था: एक मकान में 4 से 6 बड़े चूल्हों का होना वृहत परिवार व सामूहिक भोजन व्यवस्था पर प्रकाश डालता है।
* प्रसार: आहड़ के समीपवर्ती क्षेत्रों गिलुंड (राजसमंद), बालाथल (उदयपुर), बागौर (भीलवाड़ा) से आहड़-सभ्यता के प्रसार की जानकारी।
* आयड़ (बेड़च) नदी घाटी तक सीमित न रहकर बनास व चंबल नदियों की घाटी से लेकर गुजरात में कच्छ तक विस्तृत थी।
III. बालाथल (उदयपुर)
* युग: ताम्रपाषाण युगीन स्थल।
* स्थान: उदयपुर के वल्लभनगर में।
* उत्खनन कार्य: मार्च 1983 में प्रारंभ, 7 वर्षों तक चला।
* नेतृत्व: डॉ. देव कोठारी (इंस्टीट्यूट ऑफ राजस्थान स्टडीज, राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर)।
* अन्य: डॉ. वी.एन. मिश्रा, डॉ. वी.एस. शिंदे, डॉ. आर.के. मोहंती, डॉ. ललित पांडे, डॉ. जीवन खरकवाल (डेक्कन कॉलेज, पूना)।
* विस्तार: आहड़ का ही एक विस्तार।
* अस्तित्व: लगभग 3200 ई.पू. तक अस्तित्व में आ चुकी थी।
1. ताम्र उपकरण
* प्रयोग: तांबे से बने उपकरणों और अस्त्रों का प्रयोग।
* उपकरण: कुल्हाड़ी, चाकू, छैनी, उस्तरा तथा बाण के फलक।
* पत्थर के बने हुए औजार भी मिले हैं।
* कारण: तांबे की सुगमता से उपलब्धता।
2. बर्तन
* प्रकार: विशेष आकार-प्रकार के चमकदार मिट्टी के बर्तन (दो प्रकार के: चिकनी मिट्टी की दीवारों वाले, खुरदरी दीवारों वाले)।
* रंग: काले, लाल और गहरे लाल रंग। लेप किया हुआ।
* चित्र: काले तथा लाल बर्तनों पर सामान्यतः सफेद रंग के चित्र।
* दुर्ग संरचना: बालाथल के टीले के मध्य में एक विशाल दुर्ग स्वरूप संरचना।
* माप: दीवारें 3.15 मीटर ऊंची, लगभग 5 मीटर मोटी।
* क्षेत्र: 5600 वर्ग मीटर में फैला।
* निर्माण: मिट्टी तथा पत्थरों से।
* भवन: ग्यारह कमरों के बड़े भवन की रचना (ताम्रपाषाण काल की द्वितीय अवस्था में निर्मित)।
* धातु गलाने की भट्टियां: आहड़ में तांबा गलाने की भट्टियां, बालाथल में लोहा गलाने की भट्टियां के अवशेष।
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