सामाजिक पाठ 1 प्राचीन इतिहास का अध्ययन: एक अवलोकनपरिचय



 * मानव सभ्यता की उत्पत्ति और विकास को समझना।
 * विभिन्न संस्कृतियों, साम्राज्यों के उत्थान-पतन का अध्ययन।
 * सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक और कलात्मक विकास को जानना।
 * मानव सभ्यता को प्रभावित करने वाले तत्वों की पहचान करना।
 * उन्नत सामाजिक जीवन के लिए सभ्यताओं का इतिहास आवश्यक है।
उद्देश्य
 * विश्व की प्राचीन सभ्यताओं की जानकारी प्राप्त करना।
 * नदियों के किनारे सभ्यताओं के विकास के कारण जानना।
 * प्राचीन सभ्यताओं के सामाजिक और राजनैतिक जीवन की विशेषताओं का वर्णन करना।
 * धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की उपलब्धियों को समझना।
 * विभिन्न सभ्यताओं के पतन के कारणों को जानना।
सभ्यता का अर्थ
 * संसाधन और कला कौशल जिनसे मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता है।
 * मानव के क्रियाकलाप जो स्वतंत्र और सुरक्षित जीवन देते हैं।
 * मानव व्यवहारों का ज्ञान या सामाजिक अनुशासन जिससे मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
प्राचीन सभ्यताओं के नदियों के किनारे विकास के कारण
 * जीवन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्रमुख नदियों और नदी घाटियों में विकास।
 * कारण:
   * जल व भोजन की उपलब्धता।
   * सुरक्षा की चिंता।
   * पशुपालन।
   * उपयुक्त जलवायु।
   * धातुओं की सुलभ प्राप्ति।
   * यातायात के साधन।
 * उदाहरण: सिंधु-सरस्वती सभ्यता (सिंधु-सरस्वती नदी), मिस्र की सभ्यता (नील नदी), फारस की सभ्यता (दजला-फरात नदी), चीन की सभ्यता (हवांग हो एवं सिकियांग नदियां)।
1.1 वैदिक सभ्यता
परिचय
 * स्थान: सप्त सिंधु प्रदेश।
 * जानकारी के स्रोत: वेद।
 * संस्थापक: आर्य (जो मूलतः भारत के निवासी माने जाते हैं)।
वैदिक साहित्य
 * आर्य विद्वानों द्वारा रचित साहित्य।
 * चार वेद: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
 * प्रत्येक संहिता में वैदिक ऋचाएं, धार्मिक अनुष्ठान विधियां, दार्शनिक सिद्धांत और आध्यात्मिक ज्ञान।
 * अपौरुषेय: ऋषियों द्वारा समय-समय पर दृष्ट।
राजनैतिक संगठन
 * प्रारंभिक अवस्था: शिशु-अवस्था।
 * सबसे छोटी इकाई: कुटुम्ब/कुल/परिवार।
 * ग्राम: अनेक परिवारों को मिलाकर।
 * विश: कुछ ग्रामों के समूह।
 * जन: अनेक विशों के समूह।
 * प्रधान: राजन, गोप या चाक।
 * जनतांत्रिक संस्थाएं: सभा व समिति (राजा की स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण हेतु)।
 * कालान्तर में: कबीलाई राज्यों की जगह क्षेत्रीय राज्यों का उदय, राजतंत्र का विकास, राजा की शक्ति में वृद्धि।
 * प्रमुख जनपद: कुरु, पांचाल, गांधार, कैकय, भद्र, काशी, कलिंग, अंग, मगध, लिच्छवी, मल्ल, अवन्ति, कौशल, शिवि आदि।
 * राजा का राज्याभिषेक विधि-विधानपूर्वक।
सामाजिक जीवन
 * विशेषता: सादगीपूर्ण, स्वाभाविक, समानता पर आधारित, पवित्र।
 * वर्ग व्यवस्था:
   * प्रारंभ में कोई भेदभाव नहीं, कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था।
   * चार वर्ण: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
   * मनुष्य अपनी क्षमता, योग्यता और रुचि के अनुसार व्यवसाय चुनने को स्वतंत्र।
 * परिवार:
   * सबसे छोटी एवं महत्वपूर्ण इकाई।
   * विशेषताएं: संयुक्त परिवार एवं पितृसत्तात्मकता।
   * मुखिया: वयोवृद्ध पुरुष (गृहपति)।
   * विवाह: पवित्र एवं धार्मिक संस्कार, वयस्क होने पर। पति-पत्नी दोनों की धार्मिक अनुष्ठानों में उपस्थिति अनिवार्य।
 * स्त्रियों की स्थिति:
   * सम्मान का भाव।
   * कन्या को पर्याप्त स्नेह एवं अधिकार।
   * पुत्रियों को पुत्र के समान शिक्षा का अधिकार।
   * विदुषी महिलाएं: मैत्रेयी, गार्गी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, अपाला, घोषा।
 * आश्रम व्यवस्था:
   * आदर्श आयु 100 वर्ष, चार भागों में विभक्त।
   * आश्रम: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास।
   * लक्ष्य: मनुष्य को कर्मनिष्ठ बनाना, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करना।
 * भोजन व वस्त्राभूषण:
   * मुख्य आहार: दूध, खीर, दही, घी, जौ, गेहूँ, उड़द, चावल।
   * वस्त्र: सूती, ऊनी, रेशम, मृगचर्म से निर्मित।
   * आभूषण: स्वर्ण व रजत निर्मित, स्त्री-पुरुष दोनों प्रिय थे।
आर्थिक जीवन
 * प्रधानता: ग्राम्य जीवन।
 * मुख्य व्यवसाय: कृषि एवं पशुपालन, वाणिज्य व व्यापार के भी प्रमाण।
 * कृषि:
   * आजीविका का मुख्य स्रोत।
   * दो बैलों से खेत जोते जाते थे।
   * वर्षा पर निर्भरता अधिक।
   * सिंचाई के लिए कुएं और नहरें।
   * पशु: गाय, हाथी, घोड़ा, भैंस, हरिण, भेड़, बकरी, गधा पालतू पशु थे।
   * गाय: पवित्र व आर्थिक समृद्धि का केंद्र, 'अकण्या' (वध न करने योग्य) कहा गया।
 * शिल्पकला एवं उद्योग:
   * मुख्य व्यवसाय: सुनार, लुहार, नाविक, रथकार, रंगरेज, बढ़ई।
   * मूल्य की इकाई: गाय।
   * हिरण्य: स्वर्ण धातु हेतु प्रयुक्त (आभूषण, स्वर्णमुद्रा/निष्क)।
   * भिषक (वैद्य): टूटी हड्डी जोड़ने का वर्णन।
 * व्यापार वाणिज्य:
   * जल एवं स्थल मार्गों से व्यापार।
   * उन्नत व्यवसाय: अनाज, वस्त्र, चमड़ा।
   * पणि: समृद्ध एवं धनी व्यापारी।
धार्मिक जीवन
 * विशेषता: सरल धर्म।
 * पूजा: प्राकृतिक शक्तियों को दैवीय शक्तियाँ मानकर पूजते थे।
 * उद्देश्य: देवताओं को प्रसन्न कर सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना।
 * प्रार्थना: स्तुति व यज्ञों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करते थे।
 * प्रमुख देवता: इंद्र, सूर्य, अग्नि, वायु, उषा, वरुण, विष्णु, पृथ्वी, बृहस्पति।
 * यज्ञ: देवताओं के मिलन का सांसारिक स्थान (ऋग्वेद में उल्लेख)।
   * प्रकार: नित्य यज्ञ और नैमित्तिक यज्ञ।
1.2 सिंधु-सरस्वती सभ्यता
परिचय
 * विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान।
 * सिंधु नदी उद्गम: तिब्बत के कैलाश मानसरोवर के उत्तर में स्थित हिमनद।
 * सरस्वती नदी उद्गम: शिवालिक की पहाड़ियां।
   * वर्तमान में भौतिक रूप से विलुप्त, परंतु भू-उपग्रह चित्रों से बहाव क्षेत्र का पता चला है।
   * वैदिक साहित्य, रामायण व महाभारत में अस्तित्व के प्रमाण।
खोज
 * सर्वप्रथम: 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने हड़प्पा गाँव में प्राचीन बस्ती के अवशेष देखे।
 * पुरातत्वेता सर अलेक्जेंडर कनिंघम (1872 ई.): हड़प्पा की यात्रा, चित्रांकित मृद्भांड एकत्रित किए, प्राचीन सभ्यता का अनुमान लगाया, पर काल निर्धारण नहीं कर पाए।
 * सर्वप्रथम खोज (1921 ई.): डॉ. दयाराम साहनी ने हड़प्पा में।
 * एक वर्ष बाद (1922 ई.): डॉ. राखलदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो की खोज की।
 * जॉन मार्शल (1924 ई.): हड़प्पा पर विस्तृत रिपोर्ट दी, मिस्र और मेसोपोटामिया जितनी प्राचीन बताया।
 * अन्य विद्वान: एन.एल. जूमदार, माधोस्वरूप वत्स, के.एन. दीक्षित, अर्नेस्ट मैके, व्हीलर, अमलेन्दु घोष, बाल कृष्ण थापर, स्टीन आदि।
 * उत्खनन कार्य: 1921 ई. में हड़प्पा से प्रारंभ होकर 1959 ई. में कालीबंगा की जानकारी मिलने तक निरंतर जारी।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता का काल
 * डॉ. राखलदास बनर्जी: विश्व की प्राचीनतम सभ्यता होने का गौरव।
 * धर्मपाल अग्रवाल (वैज्ञानिक कार्बन पद्धति): 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू.।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता से संबंधित स्थल
 * कुल खोजे गए स्थल: 1500 (भारत में 900, पाकिस्तान में 600)।
 * पाकिस्तान में: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, गनवेरीवाला।
 * भारत में: कालीबंगा, राखीगढ़ी, धोलावीरा, लोथल, रंगपुर आदि।
   * बलूचिस्तान: सुत्कागेनडोर, सुत्काकोह, बालाकोट, अनीरा, निन्डीवाडी आदि।
   * पंजाब (पाकिस्तान): हरप्पा, रहमानवेरी, सरायीत, मनेरीवाल आदि।
   * पंजाब (भारत): रूपड़, संगोल, कोटला निहंग खान आदि।
   * हरियाणा: बनावली, पीथाथल, राखीगढ़ी आदि।
   * उत्तर प्रदेश: आलमगीरपुर (मेरठ), कौशांबी (इलाहाबाद), हुलास (सहारनपुर) आदि।
   * राजस्थान: कालीबंगा, पीलूंड, ओशियाणा (भीलवाड़ा) आदि।
   * गुजरात: रंगपुर, लोथल, सुरकोटड़ा, रोजदी, प्रभासपाटन, मालावण, भगतरान, धौलावीरा, देशालपुर आदि।
   * महाराष्ट्र: दाइमाबाद (अहमदनगर)।
   * जम्मू-कश्मीर: मांडा (जम्मू)।
नगर-निर्माण योजना
 * प्रमुख विशेषता: नगरों के निर्माण में एकरूपता (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल में)।
 * सड़कों एवं नालियों का उचित प्रबंधन।
 * भवन निश्चित योजना के अनुसार।
 * विकसित नगरपालिका प्रशासन का अनुमान।
 * दो-स्तरीय नगर: दुर्ग या गढ़ी (शासक निवास, सार्वजनिक भवन) और निचला शहर (आवासीय भवन)।
 * सड़क व्यवस्था:
   * आवागमन की सुविधा हेतु समुचित व्यवस्था।
   * सड़कों एवं गलियों का जाल।
   * चौड़ी सड़कें, छोटी उप-सड़कों से जुड़ी।
   * पूरब से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण दिशा।
   * कूड़ा फेंकने के लिए गड्ढे।
   * पानी का जमाव रोकने हेतु किनारों से ढलुवाँ।
   * एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
 * जल निकास प्रणाली व स्वच्छता:
   * पीने का पानी कुओं से (लगभग प्रत्येक बड़े घर में, कुछ सार्वजनिक कुएं भी)।
   * पानी की निकासी के लिए अच्छी नाली व्यवस्था (अधिकतर ढकी हुई)।
   * सफाई हेतु बीच-बीच में गड्ढे (ढक्कन हटाकर साफ करने योग्य)।
   * प्राचीन काल की अन्य सभ्यताओं से विशिष्ट उपलब्धि।
 * भवन निर्माण योजना:
   * योजनाबद्ध तरीके से निर्मित।
   * प्रत्येक घर में आंगन, चारों तरफ कमरे।
   * रसोईघर, शौचालय एवं स्नानागार का प्रबंध।
   * कुएं एवं नालियों की व्यवस्था।
   * प्रकाश और वायु प्रवाह का समुचित प्रबंध।
   * शौचालय एवं कूड़ेदान का होना उन्नत सोच का परिचायक।
 * मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार:
   * दुर्ग के भीतर विशाल जलकुंड।
   * माप: लंबाई 12 मीटर, चौड़ाई 7 मीटर, गहराई 2.5 मीटर।
   * प्रवेश हेतु दक्षिणी और उत्तरी सिरों पर ईंटों की सीढ़ियां।
   * आनुष्ठानिक स्नान के लिए प्रयोग होता था।
आर्थिक जीवन
 * कृषि:
   * कालीबंगा में हलों द्वारा खेतों के जोतने का प्रमाण।
   * विभिन्न प्रकार के अनाज, फल एवं सब्जियां उपजाते थे।
   * गेहूं, जौ, तिल, सरसों, राई और मटर की खेती।
   * खजूर, तरबूज, नारियल, नींबू, अनार जैसे फल।
   * अतिरिक्त अनाज राज्य द्वारा नियंत्रित गोदामों में सुरक्षित।
 * पशुपालन:
   * मिट्टी के बर्तनों पर चित्र, मुहरें एवं अस्थि-अवशेषों से जानकारी।
   * सूअर, भेड़, बकरी, गाय, कूबड़ वाले बैल, भैंस, कुत्ता, हाथी, ऊंट पालतू पशु थे।
 * व्यापार वाणिज्य:
   * स्थल व जल दोनों मार्गों से।
   * परिवहन: बैलगाड़ियां, ऊंट (स्थल मार्ग), नावें (जलमार्ग)।
   * आयात: तांबा, सोना, टिन, चांदी, मणियां (बलूचिस्तान, राजस्थान, मैसूर, अफगानिस्तान, हजारी बाग, तिब्बत, तुर्किस्तान)।
   * मिस्र या बेबीलोन से आयातित मिट्टी के बर्तन।
   * बंदरगाह: लोथल में अवशेष।
   * पश्चिम एशिया व अरब सागरीय प्रदेशों से व्यापार।
   * बहरीन में हड़प्पा की मुद्राएं, मेसोपोटामिया में हड़प्पा युगीन मुहरें मिलीं।
   * प्रचलन: मुद्रा (मुहर) एवं वस्तु विनिमय।
 * उद्योग धंधे:
   * अति कुशल उद्योग धंधों के क्षेत्र में।
   * मुख्य औद्योगिक वर्ग: कुम्हार, सुनार, लुहार, जौहरी, शिल्पी, समतराश, बुनकर, रंगरेज।
   * धातुओं को गलाने, ढालने और धातु सम्मिश्रण में दक्ष।
सामाजिक जीवन
 * स्रोत: उत्खनन में प्राप्त पुरावशेष।
 * विशेषता: सरल, सादगी और पवित्रता से युक्त।
 * सामाजिक वर्गीकरण (संभवतः):
   * (क) विद्वान, पुरोहित, ज्योतिषी, वैद्य।
   * (ख) योद्धा, सैनिक व राजकीय अधिकारी।
   * (ग) व्यापारी, श्रमिक, शिल्पकार, कारीगर।
 * परिवार व्यवस्था:
   * समाज की प्रमुख इकाई परिवार।
   * पृथक आवास योजना।
   * शांतिपूर्ण जीवन-यापन, सार्वजनिक सम्पन्नता, सामूहिक एवं संगठित समाज लक्ष्य।
 * स्त्रियों का स्थान:
   * बहुसंख्यक नारी मूर्तियों की प्राप्ति, मातृदेवी की उपासना।
   * नारी का उत्कृष्ट स्थान।
   * स्त्री-पुरुष समान रूप से सभी उत्सवों में भाग लेते थे।
धार्मिक जीवन
 * विशेषता: बहुदेववादी और प्रकृतिपूजक।
 * पूजा: प्रकृति की विभिन्न शक्तियां (अग्नि, वृक्ष, जल, पशु)।
 * जानकारी का आधार: उत्खनन में प्राप्त मूर्तियां एवं मुहरों पर चित्र।
 * मातृदेवी की पूजा: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो तथा अन्य स्थानों से बड़ी संख्या में मिट्टी की मूर्तियां (मातृदेवी का प्रतीक)।
 * प्रमुख देवता: पशुपति शिव (योगी की मुद्रा में बैठे हुए त्रिमूर्ति का चित्र)।
   * एक मुहर पर तीन मुख और दो सींगों वाले योगी की मुद्रा, चारों तरफ हाथी, बाघ, गैंडा तथा भैंसा।
   * पुरातत्वेत्ता इसे 'योगीश्वर' एवं 'पशुपति शिव' की मूर्ति मानते हैं।
भाषा एवं लिपि
 * भाषा एवं लिपि का विकास (व्यापार का हिसाब-किताब रखने के लिए)।
 * असंख्य लिपिबद्ध मुहरें प्राप्त।
 * लिपि: अभी तक संतोषजनक और सर्वमान्य ढंग से पढ़ी नहीं जा सकी है, प्रयास जारी।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अवसान
 * समय: 1700 ई.पू. के लगभग।
 * कारण (बताए गए): अतिवृष्टि, अनावृष्टि, जलवायु परिवर्तन, विदेशी आक्रमण, पर्यावरणीय कारक।
 * निष्कर्ष: भारत की प्राचीनतम, कांस्यकालीन, नगरीय, वाणिज्य प्रधान सभ्यता। पर्यावरण बोध, स्वच्छता, कला, विज्ञान और तकनीकी विकास में उत्कृष्ट। सुव्यवस्थित प्रशासन, सुसंगठित समाज, समृद्ध आर्थिक जीवन, उन्नत एवं पवित्रता से ओत-प्रोत जीवन। विश्व की अन्य सभ्यताओं में मौलिक एवं विशिष्ट स्थान।
1.3 माया सभ्यता
परिचय
 * स्थान: मेक्सिको का यूकाटन, ग्वाटेमाला, होंडुरास। मेसो अमेरिकन सभ्यता भी कहा जाता है।
 * शुरुआत: 1500 ई.पू.
 * उच्च काल: 300 ई. से 800 ई. तक (कला, गणित, वास्तुशास्त्र, ज्योतिष और लेखन में आगे)।
 * स्वर्ण युग: इस काल को कलात्मक विकास का स्वर्ण युग कहा जाता है।
 * खेती और शहर विकसित हुए।
 * उल्लेखनीय इमारतें: पिरामिड (धार्मिक केंद्रों के रूप में)।
 * ह्रास: 900 ई. के बाद नगर खाली होने लगे।
 * आधार फसल: मक्का (धार्मिक क्रियाकलाप एवं उत्सव मक्का बोने, उगाने और काटने से जुड़े)।
 * कृषि: उन्नत तरीके, अच्छी पैदावार। शासक वर्ग, पुरोहित और प्रधानों को उन्नत संस्कृति विकसित करने में सहायता मिली।
 * लिपि: चित्रात्मक, अभी तक पूरी तरह से पढ़ी नहीं जा सकी है।
 * खगोलीय ज्ञान: सबसे बड़ी विशेषता।
   * कैलेंडर: विभिन्न घटनाओं, धार्मिक त्योहारों और जन्म-मरण संबंधी बातों का लेखा-जोखा रखने के लिए।
   * माया कैलेंडर का एक साल 200 दिन का।
   * तारीखें तीन तरह से निर्धारित: लंबी गिनती, ज़ॉल्किन (ईश्वरीय कैलेंडर), हाब (नागरिक कैलेंडर)।
   * भविष्यवाणियां करते थे।
   * मान्यता: कैलेंडर की तारीखें खत्म होने पर प्रलय और नए युग की शुरुआत।
 * पतन के कारण (विभिन्न मत): विदेशी आक्रमण, विद्रोह, प्राकृतिक आपदा (सूखा, महामारी)।
1.4 मेसोपोटामिया की सभ्यता
परिचय
 * शाब्दिक अर्थ: 'दो नदियों के बीच की भूमि' (यूनानी भाषा में मेसो=मध्य, पोटमस=जल)।
 * आधुनिक नाम: इराक।
 * नदियां: दजला एवं फरात (टर्की के काकेशस पहाड़ों से निकलती हैं, फारस की खाड़ी में मिलती हैं)।
 * विकसित सभ्यताएं (क्रमशः): सुमेरिया की सभ्यता (सुमेरियन लोग), बेबीलोनिया की सभ्यता (मिश्रित जातियां), असीरिया की सभ्यता।
मेसोपोटामिया के राज्यों का उत्थान और पतन
 * सुमेरियन सभ्यता:
   * उत्तर से आर्मीनियन पर्वतीय प्रदेशों से आए सुमेरियन लोग।
   * नगर राज्य सरकारें स्थापित कीं (उर, लगाश, एरेक, एरिडुक प्रसिद्ध)।
   * प्रथम शक्तिशाली राजा: सारगॉन प्रथम (अक्कद से आया था, सुमेर और अक्कद को मिलाकर सुदृढ़ राज्य)।
   * पतन: लगातार विदेशी आक्रमणों से।
 * बेबीलोन सभ्यता:
   * सर्वाधिक प्रतापी राजा: हम्मूराबी।
   * नगर राज्यों की लड़ाइयों को रोका, एक जैसे कानून लागू कर दृढ़ राज्य स्थापित किया।
   * बेबीलोन में लोगों की अपनी कोई सभ्यता नहीं थी, उन्होंने जीती हुई घाटी से अपनाया।
   * सुमेरिया से प्रारंभ और असीरिया में अंत।
 * असीरियाई साम्राज्य (लगभग 1100 से 612 ई.पू.):
   * सीरिया, फिलिस्तीन, फिनिशिया आदि को जीतकर विशाल साम्राज्य।
 * दूसरा शक्तिशाली बेबीलोनियन साम्राज्य (612 ई.पू. - 539 ई.पू.):
   * काल्डियाई लोगों ने असीरियाई लोगों को पराजित कर स्थापित किया।
मेसोपोटामिया सभ्यता की विशेषताएं
1. हम्मूराबी की विधि संहिता
 * हम्मूराबी (एमेराइट जाति का राजा) के शासन काल में बेबीलोनिया की उन्नति।
 * प्रसिद्धि का कारण: हम्मूराबी की विधि संहिता।
 * उत्कीर्ण: आठ फीट ऊंचे काले पत्थर पर।
 * उद्देश्य: समस्त प्रजाजनों को कानून की जानकारी।
 * दंड सिद्धांत: 'जैसे को तैसा' और 'खून का बदला खून'।
 * जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से संबंधित कानून।
2. मेसोपोटामिया का सामाजिक जीवन
 * तीन वर्ग (संपन्नता के आधार पर):
   * उच्च वर्ग: राजकीय उच्चाधिकारी, सामंत, पुरोहित, समृद्ध लोग।
   * मध्यम वर्ग: व्यापारी, जमींदार, दुकानदार।
   * निम्न वर्ग/दास वर्ग: युद्ध में पराजित सैनिक।
 * प्रचलन: संयुक्त परिवार प्रणाली।
3. आर्थिक जीवन
 * (अ) कृषि व पशुपालन:
   * मुख्य व्यवसाय: कृषि।
   * भूमि स्वामित्व: राजा, सामंत, धनी व्यापारी, पुरोहित।
   * नदियों के किनारे उपजाऊ मिट्टी, अच्छी सिंचाई व्यवस्था।
   * राज्य द्वारा कृषि कार्य एवं सिंचाई में मदद।
   * खेती: गेहूं, जौ, खजूर की बहुतायत में खेती।
   * हल और बैल प्रयुक्त होते थे।
   * द्वितीय स्तर का व्यवसाय: पशुपालन।
   * पालतू पशु: गाय, बैल, भेड़, बकरी, सूअर, गधे, खच्चर।
 * (ब) व्यापार व उद्योग:
   * उद्योग धंधे: ऊन, चमड़ा, कांसा, सोना, चांदी, तांबा आदि से संबंधित।
   * धातुओं से औजार, यंत्र, आभूषण बनाए जाते थे।
   * उद्योग-धंधे उन्नत अवस्था में।
   * दूरस्थ देशों से व्यापार (भारत की सिंधु-सरस्वती सभ्यता से व्यापारिक संबंध)।
   * सिंधु-सरस्वती सभ्यता की कई वस्तुएं मेसोपोटामिया के 'उर' नगर की खुदाई में मिलीं।
4. धर्म एवं दर्शन
 * धर्म का उद्देश्य: सांसारिक सुखों की प्राप्ति।
 * विशेषता: बहुदेववादी, कर्मकांड प्रधान, पुरोहित प्रधान।
 * धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा पाप-मुक्त होने की मान्यता।
 * दर्शन: नैतिक जीवन का अच्छा फल, पापमय जीवन का बुरा फल (स्वर्ग एवं नरक का ज्ञान)।
5. ज्ञान-विज्ञान
 * प्रगति: गणित, ज्योतिष, खगोलशास्त्र।
 * सूर्य, चंद्रमा, तारों और ग्रहों की गति का अध्ययन।
 * समय गणना: दिन को 24 घंटों में बांटा, 60 सेकंड का मिनट, 60 मिनट का एक घंटा।
 * धूप घड़ी और जल घड़ी से समय की गणना।
 * रेखागणित: वृत्त को 360 डिग्री में विभाजित करना।
 * जोड़, बाकी, गुणा, भाग का ज्ञान।
6. कला
 * स्थापत्य: दो मंजिला पक्की ईंटों के भवन एवं मंदिरों का निर्माण।
 * गुम्बद, मेहराब और स्तंभ मंदिर।
 * महत्वपूर्ण खोज: मेहराब।
 * चित्रकला और संगीतकला में रुचि।
7. कीलाक्षर लिपि
 * प्रथम लिपि का विकास: सुमेरिया में।
 * चित्रलिपि से विकसित होकर कीलाक्षर लिपि (क्यूनिफार्म लिपि) में परिणत।
 * मिट्टी की तख्तियों पर सरकंडे की कलम से लिखते थे।
 * उपयोग: सुमेरिया के व्यापारी हिसाब-किताब रखने के लिए करते थे।
1.5 मिस्र की सभ्यता
परिचय
 * स्थान: नील नदी की घाटी (अफ्रीका महाद्वीप की प्रमुख नदी)।
 * हेरोडोटस (इतिहासकार): मिस्र को नील नदी का वरदान कहा।
 * नील नदी: इथोपिया के युगांडा स्थित पर्वत से निकलती है, मिस्र के मध्य से बहती हुई भूमध्य सागर में गिरती है।
 * नील नदी के कारण ही मिस्र का अस्तित्व।
मिस्र की प्रमुख विशेषताएं
1. सामाजिक जीवन
 * शासक: फराओ (प्रजा पर निरंकुश सत्ता)।
 * समाज (5 वर्गों में विभक्त): राज परिवार, सामंत, पुरोहित, मध्यम वर्ग, दास।
 * दास वर्ग की स्थिति दयनीय।
 * राजवंश, सामंत, एवं पुरोहित बड़े राजमहलों में रहते थे।
 * स्त्रियों की स्थिति: उच्च स्थान प्राप्त।
2. आर्थिक जीवन
 * (अ) कृषि व पशुपालन:
   * खेती: गेहूं, जौ, खजूर, अंजीर, अंगूर।
   * नील नदी में बाढ़ के पानी को सिंचाई हेतु संग्रह।
   * मिस्र के शासन द्वारा कृषि कार्यों में मदद।
   * मुख्य पालतू पशु: गाय, भेड़, बकरी, बंदर, गधा।
 * (ब) व्यापार व उद्योग:
   * कला: पत्थर के गुलदस्ते, प्याले, तश्तरियां एवं मिट्टी के बर्तन बनाते थे।
   * चमड़े के वस्त्र, ढाल एवं पैपिरस से कागज बनाना जानते थे।
   * लकड़ी पर नक्काशी, कांच पर चित्रकारी, नाव, चटाई, रस्सी, ईंट भी बनाते थे।
   * व्यापार: नील नदी मार्ग से नौकाओं द्वारा विदेशी व्यापार।
   * प्रचलन: वस्तु विनिमय।
   * व्यापार राज्य के नियंत्रण में, निजी व्यापार बहुत कम।
3. धार्मिक जीवन
 * विशेषता: धर्म प्रधान समाज।
 * फराओ: ईश्वर का प्रतिनिधि समझते थे।
 * सूर्य: संसार का कर्ता मानते थे, सम्राट सूर्य का पुत्र।
 * पूजा: आकाश, अग्नि, वायु, ओसिरिस (नील नदी) तथा सिन (चंद्रमा)।
 * अखनाटन (फराओ): केवल सूर्य की पूजा, अन्य देवताओं की पूजा पर रोक (एकेश्वरवाद का प्रयास)।
 * पुनः बहुदेववाद प्रचलित हो गया।
4. ज्ञान-विज्ञान
 * प्रगति: ज्योतिष व गणित (विश्व सभ्यताओं के लिए अनुकरणीय)।
 * चिकित्सा एवं शरीर शास्त्र का ज्ञान, स्वास्थ्य सुरक्षा।
 * धूप घड़ी व जल घड़ी का आविष्कार।
 * मृतक शव को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न रसायनों का आविष्कार।
 * मिस्र का पंचांग अन्य सभ्यताओं ने अपनाया।
 * अपनी वर्णमाला विकसित की, पैपिरस वृक्ष से कागज का निर्माण।
 * विशेष उपलब्धि: पिरामिड निर्माण।
II. पिरामिड निर्माण
 * मिस्र की कला की अद्वितीय देन।
 * विश्वास: मृत्यु के बाद शव में आत्मा निवास करती है।
 * उद्देश्य: मृतक शव को विशेष रसायन का लेप लगाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखना।
 * समाधियां: शवों को सुरक्षित रखने के लिए बनाई जाती थीं (पिरामिड कहलाते थे)।
 * शव: पिरामिड में रखे शवों को 'ममी' कहा जाता था।
 * मानक निर्धारण: प्रत्येक प्रस्तरखंड का माप समान।
 * उदाहरण: गीज़ा एवं खुफू के पिरामिड (वास्तुकला का कलात्मक वैभव, आज भी विश्व के सात आश्चर्यों में)।
 * गीज़ा का पिरामिड: 481 फीट ऊंचा, 755 फीट चौड़ा, 23 लाख पत्थर के टुकड़े (2.5-2.5 टन के)।
 * बाहर: विशालकाय नृसिंह की मूर्ति (स्फिंक्स)।
1.6 चीन की सभ्यता
परिचय
 * स्थान: हवांग हो और चांग जियांग (यांग्त्सी-सीक्यांग) नदियों की घाटियां।
 * जाति: मुख्यतः मंगोलियाई (तिब्बती, हूण, मांचू, मियाओ आदि का मिश्रण भी)।
 * शासक राजवंश: शांग वंश, चाऊ वंश, चिन वंश, हान वंश, तांग वंश (चिन वंश के कारण 'चीन' नाम)।
चीन सभ्यता की विशेषताएं
1. सामाजिक जीवन
 * समाज (चार भागों में विभक्त):
   * (i) सामंत, पुरोहित एवं शिक्षित (मंडारिन वर्ग)।
   * (ii) शिल्पकार वर्ग।
   * (iii) व्यापारी वर्ग।
   * (iv) कृषक वर्ग।
 * मंडारिन वर्ग: शिक्षित वर्ग, विद्वता के आधार पर कोई भी प्रवेश कर सकता था। विद्याध्ययन एवं ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रसिद्ध।
 * परिवार: समाज की प्रमुख इकाई, संयुक्त परिवार प्रथा पितृप्रधान। वयोवृद्ध परिवार का मुखिया और आदरणीय।
 * स्त्रियों की स्थिति: दयनीय होती गई, अनेक नियंत्रण।
 * प्रचलन: तलाक एवं पर्दा प्रथा।
 * स्त्रियों को तलाक देने का अधिकार नहीं था।
2. आर्थिक जीवन
 * (अ) कृषि व पशुपालन:
   * निर्भरता: मुख्यतः कृषि पर।
   * खेती: गेहूं, चावल, कपास, चाय।
   * रेशम के कीड़े पाले जाते थे।
   * मुख्य पालतू पशु: गाय, बैल, भेड़, बकरी, सूअर एवं कुत्ता।
 * (ब) व्यापार-उद्योग:
   * चाऊ युग में व्यापार: नमक, रेशम, फर और मछली।
   * विदेशी व्यापार का विकास (मध्य एशिया, भारत, अफगानिस्तान, फारस और लंका से)।
   * निपुणता: चीनी मिट्टी के बर्तन बनाना, पॉलिश करना, उच्च कोटि का रेशम तैयार करना एवं ताश बनाना।
   * रेशम मार्ग: उत्तरी चीन से पश्चिम का मार्ग।
3. धार्मिक जीवन
 * विशेषता: सरल, सादा और परिष्कृत धर्म।
 * पूजा: प्राकृतिक शक्तियों के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र, पूर्वजों आदि की पूजा।
 * प्रथा: जादू-टोना द्वारा प्रेतात्माओं को नियंत्रित करना।
4. दर्शन
 * प्रगति: दर्शन के क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति।
 * प्रसिद्धि: 'सौ दार्शनिक संप्रदायों' के लिए।
 * प्रमुख दार्शनिक: कन्फ्यूशियस, मेंशियस, लाओत्से, मोत्सू।
 * कन्फ्यूशियस: भ्रम व अंधविश्वास का विरोधी।
   * 'पंचगुण' सिद्धांत (जीवन को सुखमय बनाने हेतु): दया, ज्ञान, न्याय, सत्यता और सेवा-भक्ति।
   * कहावतें: "जो कुछ तुम अपने साथ किया जाना पसंद नहीं करते, वह दूसरों के साथ मत करो।"
 * लाओत्से: विचार 'ताओ-ते-चिंग' में संग्रहित (ताओवाद)।
5. ज्ञान-विज्ञान
 * विशेषता: जिज्ञासु।
 * अपना पंचांग बनाया।
 * आविष्कार: कुतुबनुमा (दिशासूचक यंत्र) चीनी नाविकों द्वारा।
 * बारूद, कागज, छापाखाना का आविष्कार सर्वप्रथम चीन में।
II. चीन की दीवार
 * सर्वश्रेष्ठ प्रतीक: चीन की महान दीवार।
 * निर्माता: शी-व्हांग टी।
 * उद्देश्य: उत्तर-पश्चिम से आने वाले बर्बर जातियों (हू्णों) के आक्रमणों से रक्षा।
 * माप: 1800 मील लंबी, 20 फीट चौड़ी, 22 फीट ऊंची।
 * संरचना: 20 हजार बुर्ज, 23 हजार स्तंभ और दस हजार सुरक्षा चौकियां।
1.7 यूनान की सभ्यता
परिचय
 * स्थान: यूरोप के दक्षिण-पश्चिम कोने में भूमध्य सागर में स्थित छोटा देश। तीन तरफ से समुद्र से घिरा, छोटी-छोटी पहाड़ियों से भरा।
 * अंधकारपूर्ण युग (ई.पू. 12वीं से 8वीं शताब्दी):
   * जानकारी: इलियड और ओडिसी (होमर द्वारा रचित महाकाव्य)।
 * नगर-राज्यों का उदय (लगभग ई.पू. 800):
   * कुछ यूनानी गांवों के समूहों ने मिलकर नगर-राज्यों का रूप लिया।
   * प्रत्येक नगर-राज्य अपनी पहाड़ी या घाटी को ही अपना देश समझता था।
   * प्रत्येक नगर-राज्य की अपनी सरकार और अपना देव।
 * प्रमुख नगर-राज्य: स्पार्टा और एथेंस।
यूनानी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएं
1. स्पार्टा नगर राज्य का जीवन
 * यूनान के अन्य राज्यों से भिन्न सैनिक राज्य।
 * निवासी: अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण और जन्मजात योद्धा।
 * प्रशिक्षण: 7 वर्ष की आयु से बालकों को कष्ट सहने एवं लड़ाकू योद्धा बनने का प्रशिक्षण।
 * साहित्य: केवल सैनिक सफलताओं और शूरवीरों का यशोगान।
 * यूनानी संस्कृति के निर्माण में कोई योगदान नहीं।
 * पेलोपोनीशियन युद्ध (ई.पू. 431 से 404 तक): स्पार्टा और एथेंस के बीच, स्पार्टा विजयी।
2. एथेंस नगर राज्य का जीवन
 * स्पार्टा से बिल्कुल भिन्न विकास।
 * सैन्यवाद के स्थान पर लोकतन्त्र का विकास।
 * स्थान: एक्रोपोलिस नामक दुर्ग के चारों ओर बसा।
 * प्रारंभ में: लिखित कानून न होने से शासकों की मनमानी।
 * ब्रेको: सर्वप्रथम न्यायाधीश, कानूनों को लिपिबद्ध किया।
 * सोलन: निर्बल लोगों के हित में अनेक कानून, न्याय के समक्ष सबको बराबर किया।
 * क्लैस्थनीज: अनेक सुधारों द्वारा सर्वसाधारण को व्यापक राजनीतिक अधिकार, एथेंस में जनतंत्र मजबूत किया।
 * 'यूनानी जनतंत्र का पिता': क्लैस्थनीज।
 * एथेंस व ईरानियों का युद्ध (मैराथन मैदान में): ईरानी सम्राट दारा ने यूनान पर आक्रमण किया, यूनान विजयी।
 * परिणाम: एथेंस यूनानी राज्यों में प्रमुख बना।
3. पेराक्लीज युग
 * शासनकाल: ई.पू. 465 में एथेंस की राजसत्ता पेराक्लीज के हाथों में आई।
 * विशेषता: यूनान का सर्वश्रेष्ठ जनतांत्रिक नेता।
 * उसके नेतृत्व में एथेंस की सर्वतोमुखी उन्नति।
 * स्वर्णकाल: यूनानी इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है।
 * व्यक्तित्व के योगदान के कारण 'पेराक्लीज युग' कहा जाता है।
II. यूनानी सभ्यता का योगदान
 * प्रगति: सभ्यता के हर क्षेत्र में चहुमुखी प्रगति।
 * सर्वोत्तम: पेराक्लीज के समय के एथेंस का वैभव।
 * दर्शन: पाश्चात्य दर्शन की विभिन्न शाखाओं को जन्म दिया और नामकरण किया।
 * प्रसिद्ध दार्शनिक: सुकरात, प्लेटो और अरस्तू।
   * सुकरात: ज्ञान मनुष्य को जीवन में सही आचरण करने और सुख का रास्ता दिखाता है।
 * साहित्य: होमर के महाकाव्यों 'इलियड' और 'ओडिसी' का यूनानी साहित्य पर अमिट प्रभाव।
 * इतिहास: हेरोडोटस को 'इतिहास का पिता' कहा जाता है (संसार में सबसे पहले इतिहास की पुस्तकें लिखीं)।
 * विज्ञान:
   * आर्किमिडीज: प्राचीन विश्व का महान वैज्ञानिक।
   * यूक्लिड: रेखागणित के ज्ञान को विस्तृत किया।
   * हिप्पोक्रेट्स: आधुनिक चिकित्साशास्त्र की नींव रखी।
   * पाइथागोरस: महान गणितज्ञ।
 * खेल: ओलंपिक खेल (ई.पू. 776 में शुरू हुए, ओलंपिया नामक जगह पर आयोजित, राजा 'जीयस' के सम्मान में)।
1.8 रोम की सभ्यता
परिचय
 * योगदान: यूनान ने संस्कृति की नींव डाली, रोम ने उसकी रक्षा कर उसे दूर-दूर के देशों तक फैलाया।
 * मुख्य केंद्र: इटली।
 * इटली ने यूनान और यूरोप की संस्कृतियों को मिलाने में कड़ी का कार्य किया।
 * एथेंस की तरह नगर राज्य से महान साम्राज्य स्थापित किया।
 * आगमन: लगभग 200 ई.पू. में आल्पस पर्वतों को पार कर कुछ जातियां इटली में बसीं (एटुस्कन जाति)।
 * नींव: लैटिनस जाति ने एटुस्कनों को पराजित कर रोमन सभ्यता की नींव डाली।
रोम का इतिहास
 * प्रारंभ: राजतंत्र से।
 * गणतंत्र की स्थापना: छठी शताब्दी ई.पू. में राजा का पद समाप्त कर दिया गया।
 * शासन प्रणाली: सीनेट व सभा।
 * समाज (दो वर्गों में बंटा):
   * (अ) पैट्रिशियन: उच्च व कुलीन वर्ग।
   * (ब) प्लीबियन: किसान, मजदूर व मध्यम वर्ग।
 * संघर्ष: लगभग सौ वर्षों तक पैट्रिशियन और प्लीबियन लोगों में संघर्ष।
 * परिणाम: रोम में लिखित कानून संहिता स्वीकृत की गई ('बारह तख्तियों के कानून' कहलाते हैं), प्लीबियनों को सभी राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए।
I. कार्थेज से युद्ध
 * कार्थेज नगर: अफ्रीका के उत्तरी तट पर (भूमध्य सागर में रोम के प्रसार से गहरा धक्का लगा)।
 * संघर्ष: रोम व कार्थेज के निवासियों के मध्य 264 ई.पू. से 146 ई.पू. तक लंबा संघर्ष (प्यूनिक युद्ध)।
 * यूनान ने कार्थेज निवासियों की सहायता की।
 * परिणाम: युद्धों की समाप्ति के बाद रोम ने यूनान पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया।
II. जूलियस सीज़र
 * परिस्थिति: लगातार युद्धों के कारण रोम की सत्ता सेनापतियों के हाथों में आ गई।
 * निर्माण: ई.पू. प्रथम शताब्दी में प्रतिभाशाली सेनापति जूलियस सीजर की महान विजयों ने रोमन साम्राज्य का निर्माण किया।
 * उच्च पदों पर नियुक्ति का अधिकार अपने हाथों में लिया, प्रशासनिक व्यवस्था को केंद्रित किया।
 * सीनेट के स्वरूप में भी परिवर्तन किया।
 * इच्छा: रोम में निरंकुश राजतंत्र की स्थापना।
 * विरोध: गणतंत्र के पक्षधर उसके विरोधी बन गए।
 * हत्या: 44 ई.पू. में जूलियस सीजर की हत्या कर दी गई।
III. ऑक्टेवियन (अगस्टस)
 * उत्तराधिकारी: जूलियस सीजर की हत्या के बाद तीन सदस्यों का 'ट्राइमविरेट' स्थापित किया गया।
 * प्रमुख सदस्य: ऑक्टेवियन (अगस्टस के नाम से भी जाना जाता है)।
 * शासनकाल: 31 ई.पू. से 14 ई. तक।
 * सुधार: साम्राज्य में सुख एवं समृद्धि को जन्म दिया।
 * चरमोत्कर्ष: रोमन साम्राज्य का चरमोत्कर्ष हुआ।
 * स्वर्णयुग: रोमन इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है।
IV. रोमन सभ्यता की देन
 * विश्व को सबसे बड़ी देन: रोम के कानून और शासन करने के सिद्धांत।
 * सम्राट जस्टिनियन: कानूनों का संग्रह करके विधि संहिता बनाई (जस्टिनियन कोड)।
 * शिक्षा, भाषा व साहित्य: यूनानियों के संपर्क से उन्नति हुई।
 * लैटिन भाषा: पश्चिमी यूरोप में सभी शिक्षित व्यक्तियों की भाषा बन गई।
 * प्लिनी की 'नेचुरल हिस्ट्री': लैटिन भाषा में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक ग्रंथ।
 * ज्योतिष: पंचांग (कैलेंडर) का निर्माण (जूलियस सीजर ने किया, जुलाई महीने का नाम उन्हीं के नाम पर)।
 * स्पष्ट है कि रोमन सभ्यता ने विश्व सभ्यता को प्रभावित किया।
1.9 राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएं
I. कालीबंगा (हनुमानगढ़)
 * अर्थ: 'काले रंग की मिट्टी की चूड़ियां'।
 * स्थान: उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर (सरस्वती) नदी के तट पर।
 * अवशेष: सुरक्षा प्राचीर से घिरे दो टीले।
   * पूर्वी टीला: साधारण जन बस्ती के साक्ष्य।
   * पश्चिमी टीला: दुर्ग (संभवतः उच्च वर्ग निवास करता होगा)।
 * महत्वपूर्ण साक्ष्य: जुते हुए खेत के साक्ष्य (संसार में प्राचीनतम)।
 * धार्मिक अनुष्ठान: कच्ची ईंटों से निर्मित चबूतरों पर पंक्तिबद्ध अग्नि वेदिकाओं के प्रमाण।
 * पुरावशेष: मिट्टी से निर्मित अनेक बर्तन।
 * लिपि: मिट्टी के बर्तनों और मुहरों पर अंकित लिपि सैंधव लिपि से मिलती-जुलती है, अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
 * भवन निर्माण: पत्थरों के अभाव के कारण दीवारें सूर्यतपी ईंटों से बनती थीं और मिट्टी से जोड़ी जाती थीं।
 * सफाई व्यवस्था: व्यक्तिगत और सार्वजनिक नालियां, कूड़ा डालने के बर्तन।
 * ह्रास/पतन: संभवतः वर्षा की कमी, नदी का पानी कम होता गया, भू-भाग रेत का समुद्र बन गया (सरस्वती नदी के लुप्त होने का उल्लेख पुराणों में)।
II. आहड़ (उदयपुर)
 * स्थान: उदयपुर के समीप।
 * विकास: बेड़च (आयड़) नदी की घाटियों में।
 * अन्य नाम: 'ताम्रवती नगरी' (तांबे के औजारों के बनने का केंद्र प्रमाणित होता है)।
 * दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में: 'आघाटपुर' के नाम से पुकारा जाता था।
 * स्थानीय नाम: 'धूलकोट'।
 * पुरावशेष: तांबे की कुल्हाड़ियां, प्रस्तर के औजार एवं अन्य उपकरण।
 * आभूषण: कीमती पत्थरों (गोमेद, स्फटिक आदि) का उपयोग।
 * मिट्टी के बर्तन: कालीबंगा की तरह अधिक संख्या में, बिना चित्रांकन के भी सुंदर।
 * कृषि: आहड़ सभ्यता के लोग कृषि से परिचित थे।
   * बड़े-बड़े बर्तन तथा अन्न पीसने के पत्थर मिले हैं (अन्न उत्पादन प्रमाणित)।
 * पारिवारिक व्यवस्था: एक मकान में 4 से 6 बड़े चूल्हों का होना वृहत परिवार व सामूहिक भोजन व्यवस्था पर प्रकाश डालता है।
 * प्रसार: आहड़ के समीपवर्ती क्षेत्रों गिलुंड (राजसमंद), बालाथल (उदयपुर), बागौर (भीलवाड़ा) से आहड़-सभ्यता के प्रसार की जानकारी।
 * आयड़ (बेड़च) नदी घाटी तक सीमित न रहकर बनास व चंबल नदियों की घाटी से लेकर गुजरात में कच्छ तक विस्तृत थी।
III. बालाथल (उदयपुर)
 * युग: ताम्रपाषाण युगीन स्थल।
 * स्थान: उदयपुर के वल्लभनगर में।
 * उत्खनन कार्य: मार्च 1983 में प्रारंभ, 7 वर्षों तक चला।
   * नेतृत्व: डॉ. देव कोठारी (इंस्टीट्यूट ऑफ राजस्थान स्टडीज, राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर)।
   * अन्य: डॉ. वी.एन. मिश्रा, डॉ. वी.एस. शिंदे, डॉ. आर.के. मोहंती, डॉ. ललित पांडे, डॉ. जीवन खरकवाल (डेक्कन कॉलेज, पूना)।
 * विस्तार: आहड़ का ही एक विस्तार।
 * अस्तित्व: लगभग 3200 ई.पू. तक अस्तित्व में आ चुकी थी।
1. ताम्र उपकरण
 * प्रयोग: तांबे से बने उपकरणों और अस्त्रों का प्रयोग।
 * उपकरण: कुल्हाड़ी, चाकू, छैनी, उस्तरा तथा बाण के फलक।
 * पत्थर के बने हुए औजार भी मिले हैं।
 * कारण: तांबे की सुगमता से उपलब्धता।
2. बर्तन
 * प्रकार: विशेष आकार-प्रकार के चमकदार मिट्टी के बर्तन (दो प्रकार के: चिकनी मिट्टी की दीवारों वाले, खुरदरी दीवारों वाले)।
 * रंग: काले, लाल और गहरे लाल रंग। लेप किया हुआ।
 * चित्र: काले तथा लाल बर्तनों पर सामान्यतः सफेद रंग के चित्र।
 * दुर्ग संरचना: बालाथल के टीले के मध्य में एक विशाल दुर्ग स्वरूप संरचना।
   * माप: दीवारें 3.15 मीटर ऊंची, लगभग 5 मीटर मोटी।
   * क्षेत्र: 5600 वर्ग मीटर में फैला।
   * निर्माण: मिट्टी तथा पत्थरों से।
 * भवन: ग्यारह कमरों के बड़े भवन की रचना (ताम्रपाषाण काल की द्वितीय अवस्था में निर्मित)।
 * धातु गलाने की भट्टियां: आहड़ में तांबा गलाने की भट्टियां, बालाथल में लोहा गलाने की भट्टियां के अवशेष।

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