कला के संरक्षकों का अभाव और सीमित निर्माण कार्य (12वीं शताब्दी ईस्वी के बाद)
वंशों का पतन: 12वीं शताब्दी ईस्वी के बाद, भारत में शक्तिशाली वंशों के पतन के कारण कला के संरक्षकों की कमी हो गई।
परियोजनाओं का अभाव: इस काल में बड़े पैमाने पर कला परियोजनाएं शुरू नहीं की गईं।
सीमित मंदिर निर्माण: राजस्थान, बंगाल और ओडिशा में कुछ मंदिर बने, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम थी।
मुस्लिम शासकों का ध्यान: मुस्लिम शासकों ने निर्माण कार्य को मुख्य रूप से किलों और मकबरों तक सीमित रखा, जिससे वास्तुकला को ज़्यादा प्रोत्साहन नहीं मिला।
सचित्र पांडुलिपियों का विकास
समृद्धि का स्रोत: इस काल में बड़ी संख्या में सचित्र हस्तलिखित पांडुलिपियां तैयार हुईं, जिससे भारतीय कला समृद्ध हुई।
धर्म और संप्रदाय: ये पांडुलिपियां मुख्य रूप से हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म से संबंधित थीं।
मुख्य केंद्र: बंगाल, गुजरात और बिहार इन सचित्र पांडुलिपियों के मुख्य केंद्र थे।
पाल शैली: बंगाल और बिहार में पाल वंश के संरक्षण में पाल शैली की पांडुलिपियां तैयार हुईं।
जैन पांडुलिपियां: जैन धार्मिक पांडुलिपियां भी बिहार में लिखी और सचित्र की गईं।
निर्माण विधि: ये पांडुलिपियां ताड़ के पत्तों पर लिखी जाती थीं, जहाँ चित्रों के लिए जगह छोड़ी जाती थी।
मंदिर वास्तुकला का विकास
दिलवाड़ा मंदिर: माउंट आबू के दिलवाड़ा में संगमरमर के मंदिर समूह इस काल के सुंदर उदाहरण हैं।
टेराकोटा मंदिर: बंगाल और ओडिशा में पक्की मिट्टी (टेराकोटा) से बने मंदिर भी बहुत सुंदर हैं।
राजपूत और मुगल चित्रकला का उत्कर्ष (16वीं से 19वीं शताब्दी ईस्वी)
काल: राजपूत और मुगल चित्रकला 16वीं से 19वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान खूब फली-फूली।
राजपूत चित्रकला: इस पर लोक-चित्रकला और अजंता चित्रकला का प्रभाव था।
मुगल चित्रकला: यह फारसी और राजपूत चित्रकला का मिश्रण थी।
पतन: 18वीं शताब्दी के बाद भारतीय कला का पतन शुरू हो गया।
सीखने के उद्देश्य
इस पाठ को पढ़ने के बाद आप निम्न में सक्षम होंगे:
12वीं से 18वीं शताब्दी ईस्वी तक भारत में कला की स्थिति का वर्णन करना।
भारतीय कला के पतन के कारणों को समझना।
इस काल की हस्तलिखित पांडुलिपि के चित्रों को समझना।
राजपूत शैली की महत्वपूर्ण कलाकृतियों का वर्णन करना।
पक्की मिट्टी (टेराकोटा) के मंदिरों के बारे में जानना।
प्रमुख कलाकृतियाँ
1. श्रृंगार 👰♀️
शीर्षक: श्रृंगार
शैली: गुलेर घराना
समय: 18वीं शताब्दी ईस्वी
कलाकार: अज्ञात
माध्यम: टेम्परा
सामान्य विवरण:
गुलेर: कांगड़ा घाटी के पास एक छोटा पहाड़ी राज्य, अपनी लघु चित्रकला के लिए प्रसिद्ध।
विकास: 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी के दौरान विभिन्न राजाओं के संरक्षण में विकसित हुई।
प्रभाव: लोक-कला और मुगल लघुचित्र शैली का प्रभाव।
परिणति: 18वीं शताब्दी ईस्वी में अपनी परिपक्व अवस्था तक पहुँची।
विशेषता: पौराणिक कृष्ण और राधा की प्रेम कथाओं का चित्रण (दिव्य प्रेम का प्रतीक)। रामायण, महाभारत, शाही चित्र और राज-सभा के दृश्य भी दर्शाए गए।
चित्र का विवरण:
विषय: एक दुल्हन को विवाह के लिए सजाया जा रहा है।
संयोजन: आकृतियाँ वास्तुकला की चौखट में समन्वय और संतुलन के साथ बनाई गई हैं।
विभिन्न पात्र:
अग्रभाग में: एक नौकरानी चंदन का लेप बना रही है, दूसरी दुल्हन के पैर में पायल पहना रही है।
दो अन्य आकृतियाँ: एक आईना लिए है, दूसरी फूलों की माला बना रही है।
अन्य: एक महिला सहायिका के साथ दुल्हन के बाल संवार रही है, एक बुजुर्ग महिला निरीक्षण कर रही है।
कलात्मकता: कलाकार ने दुल्हन के लजाने और लालित्यपूर्ण भंगिमा का शानदार चित्रण किया है।
शैलीगत विशेषता: संवेदनशील चेहरे, सौम्य व्यवहार और रंगों का कोमल मिश्रण गुलेर शैली की पहचान हैं।
2. जैन लघुचित्र (कल्पसूत्र) 📜
शीर्षक: कल्पसूत्र
कलाकार: अज्ञात
शैली: जैन पांडुलिपि चित्र
समय: 15वीं शताब्दी ईस्वी
माध्यम: ताड़ की पत्तियों पर टेम्परा
सामान्य विवरण:
विकास: भारत में 7वीं से 15वीं शताब्दी ईस्वी तक जैन लघु-चित्रों का विकास हुआ।
विषय: जैन धर्मग्रंथ, जैसे 'कालकाचार्य कथा' और 'कल्पसूत्र', पार्श्वनाथ, नेमिनाथ, ऋषभनाथ और अन्य तीर्थंकरों के चित्रों से सजाए गए थे।
मुख्य केंद्र: पंजाब, बंगाल, ओडिशा, गुजरात और राजस्थान।
निर्माण: पांडुलिपियां मुख्य रूप से ताड़ के पत्तों पर लिखी जाती थीं, चित्र उन्हीं पर बनाए जाते थे।
रंग: स्थानीय रूप से उपलब्ध रंगों का प्रयोग, विशेष रूप से लाल और पीले रंग, साथ ही स्वर्णिम और रजत रंग।
मानवीय आकृतियाँ:
चेहरे रूपरेखा के रूप में, जिनमें एक आँख चेहरे की रूपरेखा से बाहर निकली हुई लगती थी (सामने का दृश्य)।
आकृतियों के मुख्य भाग भी अग्रभाग की ओर।
स्त्री आकृतियों ने बहुत गहने पहन रखे होते थे।
रेखाओं को विशेष महत्व दिया गया था।
कल्पसूत्र का विवरण:
विषय: जैन धर्म की विधियों की पुस्तक का एक चित्र।
संयोजन: चित्र का समस्त स्थान आयतों और चौकोरों में बांटा गया है।
रंगों का प्रयोग:
पुरुषों, स्त्रियों और पशुओं का चित्रण लाल रंग की पृष्ठभूमि में।
पीले रंग से प्रत्येक खंड को दर्शाया गया।
कथाक्रम: प्रत्येक खंड में 'कल्पसूत्र' की कहानी का अलग-अलग कथाक्रम।
कीमती सामग्री: स्वर्ण और सामुद्रिक रंग के कीमती पत्थरों का प्रयोग।
शैलीगत विशेषता: पूरी तरह से लोक शैली पर केंद्रित, आकार में चपटापन, रूढ़िवादी अभिव्यक्ति, परिदृश्य का अभाव।
कलात्मकता: कलाकार की वास्तुकला के प्रति अंतर्निहित कल्पना विशेष रूप से दिलचस्प। प्रभावकारी रेखाएं और शरीर की रेखाओं का बिंदुओं से प्रयोग सौंदर्य बढ़ाता है।
3. रासलीला (विष्णुपुर टेराकोटा) 💃🕺
शीर्षक: विष्णुपुर टेराकोटा
कलाकार: अज्ञात
स्थान: पश्चिम बंगाल के विष्णुपुर में पंचमुरा मंदिर।
समय: 17वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास
माध्यम: पक्की मिट्टी (टेराकोटा) की टाइल्स
सामान्य विवरण:
विष्णुपुर: पश्चिम बंगाल का एक छोटा शहर, कभी बांकुरा जिले के शासकों की राजधानी।
कला: कई छोटे-छोटे मंदिर टेराकोटा की टाइल्स से सजे हुए हैं।
विषय-वस्तु: 18वीं और 19वीं शताब्दी ईस्वी की विभिन्न संस्कृतियों और धार्मिक घरानों को दर्शाती है।
मंदिरों का समर्पण: अधिकांश मंदिर या तो शिवजी को या विष्णुजी को समर्पित हैं।
धार्मिक प्रथाएं: पक्की मिट्टी की टाइल्स पर उभरी हुई विषय-वस्तु विभिन्न धार्मिक प्रथाओं को दर्शाती है।
आकृतियाँ: शिव, दुर्गा और राधा-कृष्ण की आकृतियाँ रामायण और महाभारत के पात्रों के साथ दिखाई देती हैं।
सामाजिक जीवन: कलाकार ने समकालीन सामाजिक जीवन, मानव, पशु और पक्षियों के जीवन से संबंधित विभिन्न विषयों को भी चित्रित किया है।
मंदिर वास्तुकला: बंगाल की झोपड़ी प्रकार की एक मंजिली या दो मंजिली डिजाइन पर आधारित।
सजावट: दीवारों को पक्की मिट्टी की छोटी टाइल्स से सजाया गया है, जो मिट्टी के गारे से चिपकाई गई हैं।
निर्माण विधि: ये टाइल्स ईंटों जैसे खांचों से बनाई जाती हैं और आग में तपाकर पक्की मिट्टी की तरह बनाई जाती हैं।
'रासलीला' का विवरण:
विषय: राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम को उनके साथी गोप और गोपियों के साथ दर्शाया गया है।
संयोजन: एक चौकोर स्थान पर तीन गोलों को केंद्रित कर किया गया है।
केन्द्रीय आकृति: बीच के गोले में राधा-कृष्ण की आकृतियाँ।
अन्य गोले: शेष दो गोलों में कुछ आकृतियाँ एक-दूसरे का हाथ पकड़े दिखाई गई हैं।
कोनों की सजावट: चौकोर के चारों कोनों को मानव, पशु और पक्षियों की आकृतियों से सजाया गया है।
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