1. तुलसीदास: भरत का भ्रातृप्रेम ('रामचरितमानस' से उद्धृत)
प्रसंग:
यह अंश रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड से लिया गया है। वनगमन के पश्चात राम को लौटाने के लिए भरत, वसिष्ठ मुनि और अयोध्या की प्रजा के साथ चित्रकूट आते हैं। सभा में जब राम से अयोध्या लौटने का आग्रह किया जाता है, तो राम गुरु वसिष्ठ के कहने पर अपनी बात रखते हैं। राम के बात समाप्त करने के बाद, गुरु वसिष्ठ के कहने पर और राम का संकेत पाकर, भरत अपने हृदय का उद्गार व्यक्त करते हैं। इस अंश में भरत का निश्छल प्रेम, त्याग, आत्मग्लानि और विनय प्रकट होता है। वे अपनी माता कैकेयी के कृत्य के कारण स्वयं को अपराधी मान रहे हैं और राम की कृपा, स्वभाव तथा अपने संबंधों को याद कर रहे हैं।
व्याख्या:
* "सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई। लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।"
मुनि वसिष्ठ के वचन सुनकर और राम का संकेत पाकर, गुरु और स्वामी को अपने अनुकूल देखकर, भरत अपने सिर पर सारा भार (राम को लौटाने का और परिवार की प्रतिष्ठा का) महसूस करते हैं। वे कुछ कह नहीं पाते और मन ही मन विचार करते हैं।
* "पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े। कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहाँ मैं कहा।।"
उनका शरीर पुलकित हो जाता है और वे सभा में खड़े होते हैं। उनके कमल के समान नेत्रों में प्रेम के आँसू भर आते हैं। वे कहते हैं कि "मेरे कहने का काम तो मुनिनाथ (वसिष्ठ) ने ही पूरा कर दिया। इससे अधिक मैं क्या कहूँ?" (अर्थात मुनि ने सब कुछ कह दिया है, जो वे कहना चाहते थे)।
* "मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ। मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।"
"मैं अपने स्वामी (राम) का स्वभाव जानता हूँ। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझ पर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह रहा है। खेलते समय भी मैंने उनमें कभी नाराजगी नहीं देखी।"
* "सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू। मैं प्रभु कृपा रीति जिय जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।"
"बचपन से मैंने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने कभी मेरे मन को नहीं तोड़ा। मैंने अपने प्रभु की कृपा की रीति को हृदय से जाना है - वे खेल में हारने पर भी मुझे ही जिता देते थे।"
* दोहा: "महूँ सनेह सकोच बस, सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि, पेम पिआसे नैन।।"
"मैंने भी प्रेम और संकोच के वश में होकर उनके सामने कभी कोई बात नहीं कही (विरोध नहीं किया)। आज तक मेरे दर्शन-तृप्त नहीं हुए और मेरे नेत्र प्रेम के प्यासे ही रहे।" (यह उनके असीम प्रेम और विनय को दर्शाता है, कि वे राम से इतने समीप रहते हुए भी कभी पूरी तरह तृप्त नहीं हुए।)
* "बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा। यहठ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा।।"
"विधाता मेरे इस दुलार को सहन नहीं कर सका और नीच कैकेयी के बहाने (माध्यम से) मेरे प्रेम में बाधा डाल दी। यह बात कहते हुए मुझे आज शोभा नहीं देता, क्योंकि अपनी समझ से कौन साधु और पवित्र नहीं होता?" (अर्थात हर कोई खुद को अच्छा ही समझता है, इसलिए अपनी माता पर दोष मढ़ना उचित नहीं)।
* "मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली। फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।।"
"मेरी माता मंदबुद्धि (खराब) है और मैं साधु तथा अच्छा आचरण करने वाला हूँ - ऐसा हृदय में लाना ही करोड़ों प्रकार की कुचाल है। क्या कोदों (एक निम्न अनाज) की बाली में उत्तम धान (शालि) फल सकता है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है?" (भाव यह कि मेरी माता के कर्म खराब थे, तो मैं कैसे खुद को उनसे अलग अच्छा मान सकता हूँ, क्योंकि मैं उन्हीं का पुत्र हूँ। यह उनकी आत्मग्लानि और अपनी माता के प्रति भी एक प्रकार की मार्मिक स्वीकार्यता है।)
* "सपनेहुँ दोस कलेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।"
"स्वप्न में भी किसी को कोई दोष या क्लेश नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र के समान है।" (वे अपनी सारी पीड़ा का कारण अपने भाग्य को मानते हैं, किसी और को नहीं।)
* "बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।"
"अपने पाप के परिणाम को बिना समझे ही, मैं माता को कड़वे वचन कहकर जल गया।" (उन्हें अपनी माता को कटु वचन कहने का भी पश्चाताप है, भले ही माता ने कितना भी अनुचित कार्य किया हो।)
* "हृदय हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा। गुरु गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।"
"मैंने हृदय में सब ओर विचार करके हार मान ली है। एक ही प्रकार से मेरा भला हो सकता है - गुरु, स्वामी (वसिष्ठ) और सिया-राम। इन्हीं से मुझे परिणाम अच्छा लग रहा है।" (अर्थात इन्हीं के आश्रय से मेरा कल्याण संभव है)।
* दोहा: "साधु सभाँ गुर प्रभु निकट, कहउँ सुथल सतिभाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।"
"यह साधुओं की सभा है, गुरु और प्रभु (राम) पास में हैं, मैं इस पवित्र स्थान पर अपने सच्चे भाव कह रहा हूँ। यह प्रेम का दिखावा है या सच, यह तो मुनि (वसिष्ठ) और रघुनाथ (राम) ही जानते हैं।" (यहां भरत की विनम्रता, सत्यनिष्ठा और आत्म-परीक्षण का भाव प्रकट होता है।)
शिल्प सौंदर्य:
* भाषा: साहित्यिक अवधी भाषा का प्रयोग, जो तुलसीदास की अपनी विशिष्ट शैली है। भाषा अत्यंत सहज, सरल और प्रभावपूर्ण है।
* छंद: दोहे और चौपाई छंदों का सुंदर समन्वय। चौपाई में गतिशीलता और दोहे में ठहराव व गहनता का भाव है।
* अलंकार:
* अनुप्रास: "सुनि मुनि बचन", "गुरु गोसाइँ साहिब", "सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू" आदि में अनुप्रास की छटा है।
* उपमा: "नीरज नयन नेह जल बाढ़े" (कमल के समान नेत्र), "मोर अभाग उदधि अवगाहू" (अभाग्य समुद्र के समान), "फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।।" (उदाहरण अलंकार के साथ उपमा का प्रयोग)।
* दृष्टांत/उदाहरण अलंकार: "फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।।"
* पुनरुक्ति प्रकाश: "कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू" (कछु-कछु)
* शैली: वर्णनात्मक और भावात्मक शैली का प्रयोग। संवादों के माध्यम से पात्रों के मनोभावों को सजीव चित्रण।
* नाटकीयता: सभा में भरत के खड़े होने, पुलकित होने और आँखों में आँसू आने का वर्णन अत्यंत नाटकीय और भावपूर्ण है।
* शब्द चयन: 'निरज नयन', 'खुनिस', 'काकू', 'अघ', 'अबहगाहू' जैसे शब्द सटीक और प्रसंगानुकूल हैं।
भाव सौंदर्य:
* भ्रातृप्रेम की पराकाष्ठा: भरत का राम के प्रति अगाध, निश्छल और एकनिष्ठ प्रेम इस अंश का केंद्रीय भाव है। वे राम को अपना स्वामी, गुरु और सर्वस्व मानते हैं।
* आत्मग्लानि और पश्चाताप: माता कैकेयी के कृत्य का सारा भार वे स्वयं पर लेते हैं और स्वयं को पापी मानते हैं, भले ही उनका कोई दोष न हो। यह उनकी महानता और त्याग की भावना को दर्शाता है।
* विनय और समर्पण: भरत की विनम्रता अद्भुत है। वे अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए भी किसी को दोष नहीं देते, बल्कि स्वयं को ही दोषी मानते हैं। उनका संपूर्ण समर्पण राम के चरणों में है।
* गुरु के प्रति श्रद्धा: गुरु वसिष्ठ के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा और उनके वचनों का सम्मान स्पष्ट झलकता है।
* निर्मलता और आदर्श: भरत का चरित्र अत्यंत निर्मल और भारतीय संस्कृति के आदर्श भाई का प्रतीक है। उनका त्याग, प्रेम और निष्ठा अनुकरणीय है।
* स्नेह की सूक्ष्मता: बचपन की यादें, राम द्वारा खेल में जिताने का प्रसंग, उनके प्रेम की गहराई और सहजता को दर्शाता है।
2. सूरदास: 'सोभित कर नवनीत लिए'
प्रसंग:
यह पद सूरदास के 'सूरसागर' से उद्धृत है और बाल लीला से संबंधित है। इसमें कवि ने भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप का अत्यंत मनमोहक, सजीव और वात्सल्यपूर्ण चित्रण किया है। जब कृष्ण बहुत छोटे हैं और घुटनों के बल चलते हुए माखन खा रहे हैं, उस समय का वर्णन है।
व्याख्या:
* "सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन-मंडित, मुख दधि लेप किये।।"
हाथ में ताजा माखन लिए हुए कृष्ण बहुत सुशोभित हो रहे हैं। वे घुटनों के बल चल रहे हैं, जिससे उनका शरीर धूल से सना हुआ है और उनके मुख पर दही का लेप लगा हुआ है।
* "चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिये। लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहिं पिए।।"
उनके गाल सुंदर हैं, नेत्र चंचल हैं और माथे पर गोरोचन का तिलक लगा हुआ है। उनके सिर पर लटें ऐसी लटक रही हैं, मानो मतवाले भंवरों का समूह मादक शहद पीकर मंडरा रहा हो। (यह कृष्ण की सुंदरता को और बढ़ाता है)।
* "कठुला-कंठ वज्र केहरि-नख राजत रुचिर हिए। धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख, का सत कल्प जिए।।"
उनके गले में कठुला (एक प्रकार का आभूषण) और छाती पर वज्र केहरि (बाघ के नाखून) शोभायमान हो रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि इस सुख का एक पल भी धन्य है, इसके सामने सैकड़ों कल्पों तक जीना भी क्या मायने रखता है। (यह कवि की उस बाल-छवि के प्रति अगाध भक्ति और समर्पण को दर्शाता है।)
शिल्प सौंदर्य:
* भाषा: ब्रजभाषा का मधुर और सरस प्रयोग। सूरदास की ब्रजभाषा अपनी माधुर्य और प्रवाहमयता के लिए प्रसिद्ध है।
* छंद: गेय पद शैली, जो भक्ति पदों के लिए उपयुक्त है। इसे गाया जा सकता है।
* अलंकार:
* अनुप्रास: "सोभित कर नवनीत", "घुटुरुनि चलत रेनु तन-मंडित", "मादक मधुहिं" आदि में अनुप्रास की छटा है।
* उपमा: "लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन" में उत्प्रेक्षा अलंकार है (मनु शब्द का प्रयोग)।
* विशेषण विपर्यय: "रुचिर हिए" (सुंदर हृदय)
* रूपक: अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण की बाल लीला को साक्षात चित्रित किया गया है।
* शैली: चित्रात्मक और वर्णनात्मक शैली। कवि ने कृष्ण के बाल रूप का एक-एक अंग प्रत्यंग का सजीव चित्रण किया है, जिससे पाठक के मन में एक चित्र उभर आता है।
* नाद सौंदर्य: शब्दों का ऐसा चयन है कि पढ़ने मात्र से एक संगीतात्मकता और नाद सौंदर्य का अनुभव होता है।
* बिंब विधान: कृष्ण की गतिशील छवि, माखन खाते हुए मुख का बिंब, धूल से सने शरीर का बिंब, लटों का बिंब - सभी अत्यंत सजीव हैं।
भाव सौंदर्य:
* वात्सल्य रस की पराकाष्ठा: यह पद वात्सल्य रस का उत्कृष्ट उदाहरण है। सूरदास ने कृष्ण के बाल रूप को इतनी सहजता और आत्मीयता से चित्रित किया है कि पाठक का हृदय प्रेम से भर उठता है।
* मनोहरी बाल छवि: कृष्ण की चंचलता, भोलापन और माखन के प्रति उनका अनुराग अत्यंत मनोहर रूप में प्रस्तुत हुआ है। धूल, दही, चंचल आँखें - ये सभी बाल-सुलभ क्रीड़ाओं को दर्शाते हैं।
* ईश्वर का सहज रूप: सूरदास ने ईश्वर को एक सामान्य बालक के रूप में प्रस्तुत कर उनके मानवीय पक्ष को उजागर किया है, जिससे भक्त उनके साथ सहज संबंध स्थापित कर पाते हैं।
* भक्ति और आनंद: कवि ने इस बाल-छवि के दर्शन को जीवन का सबसे बड़ा सुख बताया है। यह दर्शाता है कि सूरदास के लिए कृष्ण का बाल रूप ही उनकी भक्ति और आनंद का परम स्रोत था।
* सांसारिक सुखों से मुक्ति: अंतिम पंक्ति "धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख, का सत कल्प जिए।।" यह बताती है कि लौकिक सुखों की अपेक्षा ईश्वर के बाल रूप का एक पल का दर्शन भी अधिक महत्वपूर्ण है, जो मुक्ति और परमानंद प्रदान करता है।
3. मीराँबाई: 'माई री म्हां लियाँ गोविन्दाँ मोल'
प्रसंग:
यह पद मीराँबाई की भक्ति और उनके अनन्य प्रेम का प्रतीक है। इसमें मीराँ अपने आराध्य श्री कृष्ण को (गोविंदा) को 'मोल' लेने की बात कर रही हैं, यानी उन्हें पूरी तरह से अपना बना लिया है। यह पद मीराँ के कृष्ण प्रेम की दृढ़ता, निडरता और सामाजिक लोकापवाद की परवाह न करने वाले स्वभाव को दर्शाता है।
व्याख्या:
* "माई री म्हां लियाँ गोविन्दाँ मोल।।"
हे माँ! मैंने गोविंदा (श्री कृष्ण) को मोल ले लिया है (अर्थात उन्हें अपना बना लिया है)। यह मीराँ की दृढ़ घोषणा है।
* "थे कह्यां छाणे म्हां कां चोड्डे, लियाँ बजन्ता ढोल।"
तुम कहती हो कि मैंने उन्हें चोरी-छिपे लिया है, लेकिन मैंने तो उन्हें ढोल बजाकर (खुलेआम, सबके सामने) लिया है। (मीराँ का समाज की परवाह न करने वाला विद्रोही स्वभाव स्पष्ट होता है)।
* "थे कह्यां मुंहोधो म्हां कहह्यां सस्तो, लिया री तराजां तोल।"
तुम कहती हो कि मैंने उन्हें बहुत महंगा (अमूल्य) लिया है, मैं कहती हूँ कि मैंने उन्हें सस्ता लिया है, क्योंकि मैंने उन्हें तराजू में तोलकर लिया है। (यह पंक्ति विरोधाभासी लग सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह है कि मीराँ के लिए कृष्ण का प्रेम इतना सहज और स्वाभाविक है कि उन्हें वह महंगा नहीं लगता, बल्कि उन्होंने अपने प्रेम, भक्ति और सर्वस्व समर्पण के तराजू से उन्हें पा लिया है।)
* "तण वारां म्हां जीवण वारा, वारां अमोलक मोल।"
मीराँ कहती हैं कि मैंने उन्हें अपने प्राणों के बदले लिया है, अमूल्य मोल देकर लिया है। (यहां मीराँ अपने प्रेम की गहराई को बताती हैं कि उन्होंने अपने जीवन को दांव पर लगाकर, सर्वस्व त्याग कर कृष्ण को प्राप्त किया है। यह पहले की 'सस्तो' कहने वाली बात के पूरक के रूप में आता है - उनके लिए यह सस्ता है क्योंकि उन्होंने अपनी आत्मा और जीवन को दाँव पर लगाया है, जो उन्हें तुच्छ लगता है, जबकि कृष्ण का प्रेम अमूल्य है।)
* "मीरों के प्रभु दरसण दीन्याँ, पूरब जनम को कोल।।"
मीराँ कहती हैं कि उनके प्रभु ने उन्हें दर्शन दिए हैं, यह पूर्व जन्म का कोई वचन (प्रतिज्ञा) था। (यह पंक्ति बताती है कि मीराँ का कृष्ण प्रेम आकस्मिक नहीं है, बल्कि जन्म-जन्मांतर का संबंध है, जो इस जन्म में पूर्ण हुआ है।)
शिल्प सौंदर्य:
* भाषा: राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा का प्रयोग। मीराँ की भाषा में लोकजीवन की सहजता और भक्ति की गहराई का अद्भुत मिश्रण है।
* छंद: गेय पद शैली, जो सहज ही मुखरित होकर हृदय में उतर जाती है।
* अलंकार:
* अनुप्रास: "माई री म्हां लियाँ गोविन्दाँ मोल", "थे कह्यां छाणे म्हां कां चोड्डे" आदि में अनुप्रास की सुंदर छटा है।
* पुनरुक्ति प्रकाश: "तोल तोल" (कुछ संस्करणों में यह प्रयोग मिलता है, हालांकि यहां "तराजां तोल" है, जिसमें पुनरुक्ति नहीं)
* विरोधाभास: "मुंहोधो म्हां कहह्यां सस्तो" - मूल्य के संदर्भ में यह विरोधाभास उनके प्रेम की विलक्षणता को दर्शाता है।
* शैली: सीधी, स्पष्ट और निर्भीक शैली। मीराँ ने अपने भावों को बिना किसी लाग-लपेट के अभिव्यक्त किया है।
* लोकगीत का प्रभाव: पद में लोकगीत की सहजता और गेयता है, जो इसे जनमानस में प्रिय बनाती है।
* संवादात्मकता: "माई री" संबोधन और "थे कह्यां" जैसे वाक्यांश पद को संवादात्मक बनाते हैं।
भाव सौंदर्य:
* अनन्य कृष्ण भक्ति: मीराँ के कृष्ण के प्रति अटूट, अनन्य और एकनिष्ठ प्रेम का प्रकटीकरण। वे कृष्ण को अपना सर्वस्व मानती हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं।
* निर्भीकता और विद्रोह: समाज के तानों और लोकापवाद की मीराँ को कोई परवाह नहीं। वे अपने प्रेम को छिपाती नहीं, बल्कि ढोल बजाकर सार्वजनिक करती हैं, जो उनकी निर्भीकता और सामाजिक रूढ़ियों के प्रति विद्रोह को दर्शाता है।
* समर्पण का भाव: कृष्ण को "मोल" लेने का अर्थ है उनके लिए सर्वस्व समर्पण कर देना। अपने प्राणों को भी वे इस प्रेम के आगे तुच्छ मानती हैं।
* जन्म-जन्मांतर का संबंध: "पूरब जनम को कोल" वाली पंक्ति मीराँ के प्रेम को केवल इस जन्म तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे एक दिव्य और अनादि संबंध के रूप में स्थापित करती है। यह उनके विश्वास की गहराई को दर्शाता है।
* प्रेम की सहजता और स्वाभाविकता: मीराँ के लिए कृष्ण प्रेम इतना स्वाभाविक है कि उन्हें वह 'सस्ता' लगता है, भले ही उन्होंने उसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया हो। यह प्रेम की गहनतम अवस्था है।
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