हिंदी कक्षा 12 पाठ 1 कबीर और जायसी दोहों की प्रसंग और व्याख्या

(क) कबीर
(i) सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार। लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार ।।
प्रसंग: यह दोहा संत कबीरदास द्वारा रचित है और इसमें सतगुरु की महिमा का वर्णन किया गया है। कबीरदास जी ने गुरु को ईश्वर से भी बढ़कर माना है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को अज्ञानता से निकालकर ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं।
व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि सतगुरु की महिमा अपरंपार है, उनका कोई अंत नहीं है (अनंत)। उन्होंने अपने शिष्यों पर अपरिमित उपकार (अनंत किया उपगार) किए हैं। गुरु ने शिष्य की अनंत आँखें खोल दी हैं (लोचन अनंत उघाड़िया), अर्थात उनके ज्ञान-चक्षु खोल दिए हैं, जिससे वे अनंत परमात्मा का दर्शन (अनंत दिखावणहार) कर सके हैं। यहाँ 'अनंत' शब्द का प्रयोग कई अर्थों में हुआ है - गुरु की महिमा, उनका उपकार, ज्ञान-चक्षु और परमात्मा। इस दोहे में गुरु के महत्व और उनके द्वारा प्रदान किए गए ज्ञान के प्रकाश को दर्शाया गया है।
(ii) लाली मेरे लाल की. जित देखूँ तित लाल। लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ।।
प्रसंग: यह दोहा भी संत कबीरदास द्वारा रचित है। इसमें ईश्वर के सर्वव्यापी प्रेम और भक्त पर उसके प्रभाव का वर्णन किया गया है। यह बताता है कि किस प्रकार भक्त ईश्वर के रंग में रंग जाता है।
व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि मेरे प्रिय (लाल) अर्थात परमात्मा की लाली (प्रेम या प्रभाव) इतनी अद्भुत है कि मैं जहाँ भी देखता हूँ, मुझे वही लाली दिखाई देती है (जित देखूँ तित लाल)। जब मैं स्वयं उस लाली को देखने गया (लाली देखन मैं गई), तो मैं स्वयं भी उस लाली में रंग गया, अर्थात ईश्वरमय हो गया (मैं भी हो गई लाल)। यहाँ 'लाली' शब्द ईश्वर के प्रेम, उसकी उपस्थिति, उसकी ज्योति और उसके प्रभाव का प्रतीक है। यह दोहा भक्त और भगवान के एकाकार होने की स्थिति को दर्शाता है, जहाँ भक्त स्वयं को ईश्वर के रंग में पूरी तरह से रंग लेता है।
(ख) मलिक मुहम्मद जायसी
नीचे दिए गए अंश में जायसी ने प्रेम की महिमा, विरह के महत्व और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर प्रकाश डाला है। यह अंश जायसी के किसी खंडकाव्य (संभवतः पद्मावत) का हिस्सा प्रतीत होता है, जहाँ वे भक्ति और प्रेम के माध्यम से परम सत्य को प्राप्त करने की बात कर रहे हैं। यहाँ दिए गए पदों की व्याख्या इस प्रकार है:
प्रसंग: यह अंश मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित है, जो प्रेममार्गी सूफी काव्य परंपरा के प्रमुख कवि हैं। इसमें वे प्रेम, विरह, भक्ति और संसार की नश्वरता का वर्णन करते हुए ईश्वर प्राप्ति के मार्ग का निरूपण कर रहे हैं।
व्याख्या:
 * कै अस्तुति जब बहुत मनावा। सबद अकूत मँडप महँ आवा ।।: जब बहुत स्तुति (प्रार्थना) की जाती है और मन से ईश्वर को मनाया जाता है, तब असीमित (अकूत) शब्द या ईश्वर का संदेश मन के मंदिर (मँडप) में आता है। यह भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
 * मानुष पेम भएउ बैकुंठी। नाहिं त काह, छार भरि मूठी।2।: मनुष्य प्रेम के कारण ही वैकुंठ (स्वर्ग) प्राप्त करता है, अर्थात प्रेम से ही मुक्ति मिलती है। यदि प्रेम न हो, तो मनुष्य की क्या हैसियत है? वह तो मुट्ठी भर राख के समान है, नश्वर है। यहाँ प्रेम की महिमा को सर्वोपरि बताया गया है।
 * पेमहिं माहँ बिरह-रस रसा। मैन के घर मधु अमृत बसा।3।: प्रेम के भीतर ही विरह का रस घुला हुआ होता है। जिस प्रकार कामदेव के घर (प्रेम) में ही अमृत और मधु बसता है, उसी प्रकार प्रेम में विरह का अनुभव भी महत्वपूर्ण होता है। विरह प्रेम को और भी गहरा बनाता है।
 * निसत धाइ जौं मरै त काहा। सत जौं करै बैठि तेहि लाहा ।4।: यदि कोई रात-दिन दौड़कर (परेशान होकर) मर भी जाए तो क्या लाभ? सच्चा लाभ तो तभी होता है जब मनुष्य धैर्यपूर्वक बैठकर (चिंतन-मनन कर) सत्य का अनुसरण करे। यह अधीरता त्यागकर सत्य और धैर्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
 * एक बार जौं मन देइ सेवा। सेवहि फल प्रसन्न होइ देवा ।5।: यदि मनुष्य एक बार भी सच्चे मन से सेवा करता है, तो उस सेवा के फल से देवता प्रसन्न हो जाते हैं। यह सच्ची श्रद्धा और सेवा के महत्व को बताता है।
 * सुनि कै सबद मँडप झनकारा। बैठा आइ पुरुब के बारा I 6: जब शब्द (ईश्वर का संकेत या आदेश) सुना जाता है और मन का मंदिर झंकार उठता है (आनंदित होता है), तब व्यक्ति पूर्व दिशा से (ज्ञान या नई शुरुआत के प्रतीक के रूप में) आकर बैठ जाता है। यह ईश्वरीय प्रेरणा से प्राप्त होने वाली शांति और दिशा को दर्शाता है।
 * पिंड चढ़ाइ छार जेति आँटी। माटी भएउ अंत जो माटी ।7।: जितनी भी राख पिंड (शरीर) पर लगी थी, वह अंततः मिट्टी में मिल गई। यह शरीर की नश्वरता और अंततः मिट्टी में मिल जाने की सच्चाई को बताता है।
 * माटी मोल न किछु लहै, औ माटी सब मोल। दिस्टि जौं माटी सौं करै, माटी होइ अमोल ।: मिट्टी का वैसे तो कोई मोल नहीं होता (अर्थात नश्वर शरीर)। लेकिन यही मिट्टी सब कुछ का मोल है (इसी से सब कुछ बनता है)। यदि व्यक्ति अपनी दृष्टि इस मिट्टी पर (नश्वरता पर) केंद्रित करे, तो यह मिट्टी भी अमूल्य हो जाती है, अर्थात उसे नश्वरता का ज्ञान हो जाता है और वह अमरता की ओर बढ़ता है। यह शरीर की नश्वरता को स्वीकार कर आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ने का संकेत है।
इन दोहों और पंक्तियों में कबीर और जायसी दोनों ने भारतीय भक्ति और सूफी परंपरा के गहरे विचारों को सरल और मार्मिक भाषा में प्रस्तुत किया है।

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