एक सिंहावलोकन ब्रिटिश राज के आगमन के साथ ही भारत में समकालीन भारतीय कला का उदय हुआ, जिसने प्राचीन और मध्ययुगीन कला के युग का समापन किया। इस काल के कुछ प्रमुख कलाकार थे:
* राजा रवि वर्मा: अपनी तैलीय चित्रों और प्रिंटमेकिंग (लिथोग्राफी) के लिए जाने जाते हैं।
* अवनीन्द्रनाथ टैगोर: बंगाल स्कूल के संस्थापक और भारतीय कला में एक राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रणेता।
* अमृता शेरगिल: हंगेरियन-भारतीय कलाकार, जो अपनी सशक्त नारीवादी और आधुनिक भारतीय कला के लिए जानी जाती हैं।
* रबीन्द्रनाथ टैगोर: एक बहुमुखी प्रतिभा वाले कलाकार, जिन्होंने साहित्य के साथ-साथ चित्रकला में भी योगदान दिया।
* जैमिनी रॉय: भारतीय लोक कला से प्रेरित होकर अपनी विशिष्ट शैली विकसित करने वाले कलाकार।
इन युवा कलाकारों ने पाश्चात्य कला आंदोलन जैसे जर्मन अभिव्यक्तिवाद, घनवाद (क्यूबिज़्म) और अतियथार्थवाद (सर्फ रियलिज़्म) से प्रेरणा ली, लेकिन साथ ही अपनी भारतीय पहचान बनाए रखने का भी प्रयास किया। इस दौरान, पाश्चात्य तकनीक और भारतीय आध्यात्मिकता का मेल भारतीय कला का मूल भाव बन गया। कलाकारों ने लकड़ी पर कारीगरी, अश्वमुद्र (अक्वाटिंट) और अम्ललेखन (एचिंग) जैसी तकनीकों का भी प्रयोग किया।
कला समूह और आंदोलन:
* कोलकाता ग्रुप (1943): प्रदोष दास गुप्ता, प्राणकिशन पाल, निरोद मजूमदार, परितोष सैन जैसे कलाकारों ने मिलकर अपनी पहली प्रदर्शनी लगाई।
* प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप (मुंबई, 1947): एफ.एन. सूजा, रज़ा, एम.एफ. हुसैन, के.एच. आरा जैसे कलाकारों ने अपनी कलाकृतियां प्रदर्शित कीं।
कुछ कलाकार पाश्चात्य शैली में प्रयोग कर रहे थे, जबकि कुछ अन्य जैसे बिनोद बिहारी मुखर्जी और रामकिंकर बैज ने जापानी कला और बंगाली कला की ओर अपना रुझान दिखाया। बंगाल विचारधारा के देवा प्रसाद राय चौधरी और सरदा उकिल ने भारत के उत्तरी और दक्षिणी भागों में अद्वितीय कला आंदोलनों की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डी.पी. राय चौधरी के शिष्य के.सी.एस. पनिकर और श्रीनिवासलु ने भी समकालीन कला में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रमुख कलाकृतियाँ और कलाकार
1. वर्लपूल (Whirlpool)
* कलाकार: कृष्णा रेड्डी
* समय: 1962
* माध्यम: कागज पर उत्कीर्ण आकृति (इंटैग्लियो ऑन पेपर)
* आकार: 37.5 सेमी x 49.5 सेमी
विवरण:
कृष्णा रेड्डी अपने समय के सबसे प्रसिद्ध प्रिंट मेकर माने जाते हैं। उन्होंने कलाभवन, विश्वभारती और शांतिनिकेतन में शिक्षा प्राप्त की। 'वर्लपूल' उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक है, जिसे इंटैग्लियो पद्धति से बनाया गया है। यह एक प्रिंटमेकिंग तकनीक है जो उभरी हुई सतह के विपरीत होती है; इसमें स्याही खुदे हुए हिस्सों में भर जाती है। तांबे या जस्ता की प्लेट पर रेखाएं उभारी जाती हैं, स्याही लगाई जाती है, और फिर खुरच दी जाती है। एक गीले कागज को मशीन से दबाकर आकृति उभारी जाती है।
'वर्लपूल' में रेड्डी ने परिचित वस्तुओं को नए, अमूर्त रूपों में चित्रित किया है, जिनका मुख्य उद्देश्य प्रकृति के प्रभाव को दर्शाना था। चित्र में सब कुछ एक अंतरिक्षीय भंवर में खोया हुआ प्रतीत होता है। वस्तुएं सादृश्यमूलक नहीं हैं, हालांकि सितारे, फूल और बादल जैसे कुछ प्रतिबिंबों को पहचानना मुश्किल है। कृष्णा रेड्डी का मूर्तिकला का अनुभव उन्हें उत्कीर्ण आकृति के अर्थ और प्रभाव को समझने में मदद करता है, जो उनकी कलाकृति की सुंदरता है।
2. मेडिवल सेंट्स (Medieval Saints)
* कलाकार: बिनोद बिहारी मुखर्जी (1904-1980)
* समय: 1947
* माध्यम: भित्ति चित्र (फ्रेस्को बुओनो)
* संकलन: शांतिनिकेतन, विश्वभारती के हिंदी भवन की दीवार
विवरण:
बिनोद बिहारी मुखर्जी प्रसिद्ध बंगाल स्कूल के चित्रकार नंदलाल बोस के शिष्य थे। उन्हें सौंदर्य से प्रेम था और उन्होंने अपनी कला में इसे अभिव्यक्त किया। उन्होंने जापान से प्राकृतिक दृश्यों को चित्रित करना सीखा और सरल, विवेकपूर्ण रेखाओं का उपयोग किया जिनमें सुलेख के गुण थे। बचपन से ही उनकी आँखें कमजोर थीं और जीवन के अंतिम चरण में वे अंधे हो गए थे, लेकिन इस बाधा ने उनकी रचनात्मक शक्ति को कभी प्रभावित नहीं किया।
मुखर्जी ने अपने जीवनकाल में विभिन्न माध्यमों के साथ प्रयोग किए। अपने अंधेपन के बावजूद, उन्होंने शांतिनिकेतन के कला भवन की दीवार पर एक भित्तिचित्र बनाया।
'मेडिवल सेंट्स' हिंदी भवन की दीवार पर बनाया गया एक फ्रेस्को बुओनो भित्तिचित्र है। इस तकनीक में, रंगों को पानी में मिलाकर गीले चूने के प्लास्टर पर लगाया जाता है, जिससे रंग दीवार का एक स्थायी हिस्सा बन जाते हैं। यह भित्तिचित्र भारत के विभिन्न संतों को दर्शाता है, जिसे दीवार के आकार और आकृति के अनुसार संयोजित किया गया है। लंबी मानवीय आकृतियाँ एक बहती नदी की तरह लयबद्ध दिखाई देती हैं, जो गोथिक चर्च की दीवार पर बनी मूर्तिकला की याद दिलाती हैं। लंबी आकृतियों की ऊर्ध्वाधरता उनकी आध्यात्मिक महानता को दर्शाती है, जबकि छोटी आकृतियाँ दैनिक जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस चित्र में रेखा और हल्के रंगों का प्रयोग किया गया है।
3. वर्ड्स एंड सिंबल्स (Words and Symbols)
* कलाकार: के.सी.एस. पनिकर (1911-1977)
* समय: 1965
* माध्यम: लकड़ी के बोर्ड पर तैलीय रंग
* आकार: 43 सेमी x 124 सेमी
विवरण:
के.सी.एस. पनिकर को दक्षिण भारत में समकालीन कला आंदोलन के प्रणेता के रूप में जाना जाता है। वे मद्रास स्कूल ऑफ आर्ट में बंगाल विचारधारा के गुरु डी.पी. राय चौधरी के शिष्य थे। कलाकार के रूप में स्थापित होने से पहले उन्हें टेलीग्राफ ऑपरेटर और बीमा एजेंट जैसे कई काम करने पड़े। उनकी शैली में काफी बदलाव आए, यथार्थवाद से शुरू होकर ज्यामितीय शैली तक पहुंचे। उन्होंने एक शिक्षक के रूप में कई दक्षिण भारतीय कलाकारों को प्रशिक्षित और प्रोत्साहित किया, और चेन्नई के पास भारत के पहले कला-ग्राम चोलमंडलम की स्थापना की।
प्रस्तुत चित्र उनकी प्रसिद्ध श्रंखला 'शब्द और प्रतीक' का एक हिस्सा है। यह एक अद्वितीय प्रयोगात्मक कार्य है जिसमें सुलेख से स्थान भरा गया है। पनिकर ने गणितीय चिह्नों, अरबी आकृतियों और रोमन व मलयालम लिपियों का उपयोग करके ऐसी आकृतियां बनाई हैं जो जन्म पत्रिका जैसी लगती हैं। तांत्रिक प्रतीकात्मक रेखा-चित्रों का भी प्रयोग किया गया है। इन चित्रों में रंगों का प्रयोग नाम मात्र के लिए है।
4. लैंडस्केप इन रेड (Landscape in Red)
* कलाकार: फ्रांसिस न्यूटन सूजा (1924-2002)
* समय: 1961
* माध्यम: तैलीय रंग
* आकार: 78.7 सेमी x 132.1 सेमी
* संकलन: जहांगीर निकोल्सन संग्रहालय
विवरण:
एफ.एन. सूजा का जन्म गोवा में हुआ और उनका पालन-पोषण मुंबई में हुआ। उन्हें स्कूल से और बाद में जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से निष्कासित कर दिया गया था। 1947 में, वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप की स्थापना करने वाले सबसे युवा चित्रकार थे। बाद में, वे भारत छोड़कर लंदन में बस गए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त पांच कलाकारों में से एक बने। उनकी निम्न-वर्गीय पृष्ठभूमि और आर्थिक समस्याओं ने उन्हें समाज के प्रति विद्रोही बना दिया, और उन्होंने अपनी कला के माध्यम से धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया।
सूजा उत्तर-प्रभाववादी और जर्मन अभिव्यक्तिवादी चित्रकारों से प्रभावित थे, विशेष रूप से पिकासो और मातिस से। उन्होंने अपनी एक निजी शैली विकसित की जिसमें भारतीय मंदिर मूर्तिकला और पाश्चात्य शैली का मिश्रण था। सूजा कला के सभी रूपों पर लगातार प्रयोगात्मक कार्य करने वाले कलाकार थे।
सूजा को प्राकृतिक दृश्यों के चित्रण से विशेष लगाव था। 'लैंडस्केप इन रेड' उनकी प्राकृतिक चित्रण वाली कृतियों में एक विशेष स्थान रखता है। यह एक प्रयोगात्मक शहरी दृश्य का चित्र है, जिसमें कलाकार ने शहर को जंगल जैसा दिखाने की कोशिश की है। उनके शहरी प्रकृति चित्रों में शहरों की रहस्यमय प्रकृति का चित्रण होता है। इस चित्र में सुलेखीय रेखाओं को रंगों के साथ संयोजित किया गया है, जिसमें रंग और आकार के छींटे भी डाले गए हैं। परिदृश्य के किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया है। इस चित्र में मुख्य रूप से लाल रंग का प्रयोग किया गया है, फिर भी इसमें गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। सूजा ने अपने करियर में विभिन्न प्रकार के चित्र बनाए, और एक यूरोपीय आलोचक ने उनकी तुलना पिकासो से की है।
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