1. भारतीय कला का हास और पुनर्जागरण
* 19वीं सदी का प्रारंभ: ब्रिटिश राज के प्रभाव से भारतीय कला का पतन, दस्तकारी, भित्तिचित्रों और लघु-चित्रकला का लगभग लोप।
* यूरोपीय तैलीय चित्रों का प्रभाव, पारंपरिक भारतीय चित्रकला का फीका पड़ना।
* भारतीय कलाकारों द्वारा पैतृक कला को सकारात्मक रूप से देखना और यूरोपीय पूर्व-ब्रिटिश राज कला से आगे बढ़ने का प्रयास।
2. प्रमुख कलाकार और शैलियाँ
* राजा रवि वर्मा:
* पौराणिक विषयों पर आधारित चित्रकला के लिए प्रसिद्ध।
* तैलीय रंगों में पाश्चात्य कला का प्रभाव।
* अवनींद्रनाथ टैगोर:
* चित्रकला में एक नई शैली का सृजन।
* शिष्य: नंदलाल बोस, विनोद बिहारी और अन्य।
* नवजागृति और राष्ट्रवाद की भावना प्रमुख।
* बंगाल स्कूल:
* 20वीं सदी के पहले भाग में कला के क्षेत्र में उत्पत्ति।
* विषय: भारत की प्राचीन और पौराणिक कहानियाँ।
* पाश्चात्य यथार्थवाद को अस्वीकृत किया, भारतीय कला के आदर्शवाद को प्राथमिकता दी।
* जामिनी राय:
* अपनी कला में लोक कला को अपनाया।
* रवींद्रनाथ टैगोर:
* अपनी चित्रकला में अभिव्यक्ति और अभिव्यंजना को प्रस्तुत किया।
* भारतीय और चीनी शैली का अनुसरण करते हुए पारंपरिक पानी के रंगों और तकनीक के साथ प्रयोग।
* प्रेरणा: लघुचित्र, भित्तिचित्र और लोककला।
* अमृता शेरगिल और अन्य कलाकार:
* बाद में पाश्चात्य और भारतीय परंपराओं को अपनाया।
* अमृता शेरगिल का अद्वितीय योगदान: भारतीय आधुनिक कला में पहली महिला कलाकार।
* समकालीन भारतीय कला के इतिहास में इन सभी कलाकारों ने विशिष्ट कलाकृतियाँ बनाईं।
प्रमुख कृतियाँ:
1. हंस दमयंती (Hansa Damyanti)
* शीर्षक: हंस दमयंती
* माध्यम: कैनवास पर तैलीय रंग
* समय: 1899
* कलाकार: राजा रवि वर्मा
* संकलन: नई दिल्ली स्थित आधुनिक कला का राष्ट्रीय संग्रहालय (NGMA)
* सामान्य विवरण:
* भारत के ख्याति प्राप्त कलाकारों में से एक, केरल के किलिमनूर से।
* भारतीय कला के इतिहास में एक क्रांतिकारी कलाकार।
* यूरोपीय विचारधारा वाले कलाकारों के प्रतिनिधि।
* पानी और तैलीय रंगों की तकनीक में ख्याति अर्जित की।
* भारतीय पौराणिक कथाओं की नायिकाओं को चित्रित किया।
* देवी-देवताओं के चित्र अभी भी घरों और मंदिरों में मुद्रित चित्रों (कैलेंडर, पोस्टर) पर विद्यमान हैं।
* कलाकृतियों में दुष्यंत-शकुंतला, नल-दमयंती की कथाएँ और महाभारत के प्रसंग विशेष स्थान रखते हैं।
* चित्र का विवरण:
* राजा रवि वर्मा की सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक।
* 1899 में तैलीय रंगों से बनाया गया।
* मद्रास (चेन्नई) फाइन आर्ट प्रदर्शनी में सनसनी फैलाई।
* पाश्चात्य तकनीक का सफल प्रयोग स्पष्ट।
* यूरोपीय शैली की सशक्त अभिव्यक्ति का आकर्षण।
* चित्रित स्त्रियों में दमयंती सबसे खूबसूरत।
* दृश्य: दमयंती लाल साड़ी पहने अपने प्रेमी नल का संदेश हंस के माध्यम से सुन रही है। हंस नल के प्रेम का बखान करता है।
* दमयंती की मौन प्रेम भावना आँखों की चमक और गालों की कांति से अभिव्यक्त।
* रूप कोमल, गरिमापूर्ण और सुंदर।
* विषय के अनुरूप खड़ी आकृति और भाव-भंगिमा।
* रंगों के मिश्रण की कला में रवि वर्मा की श्रेष्ठता।
* योगदान:
* पारंपरिक भारतीय कला, समकालीन तंजावुर विचारधारा और पाश्चात्य शास्त्रीय यथार्थवाद के बीच एक कड़ी।
* महान कलाकार और देशभक्त।
* निधन: 2 अक्टूबर 1906।
2. ब्रह्मचारी (Brahmacharies)
* शीर्षक: ब्रह्मचारी (Brahmacharies)
* माध्यम: कैनवास पर तैलीय रंग
* समय: 1938
* कलाकार: अमृता शेरगिल
* संकलन: नई दिल्ली स्थित आधुनिक कला का राष्ट्रीय संग्रहालय (NGMA)
* सामान्य विवरण:
* 20वीं सदी में समकालीन भारतीय कला में एक महान घटना।
* पिता: सरदार उमराव सिंह शेरगिल; माँ: लेडी अंतोइनेट (हंगरी)।
* प्रारंभिक जीवन यूरोप में, पेरिस में उच्च स्तरीय कला शिक्षा।
* उत्तर-प्रभाववादी कलाकारों (मोदिग्लियानी, गॉग्विन) से प्रभावित।
* 1921 में भारत आईं।
* अजंता के भित्तिचित्रों और कांगड़ा के लघुचित्रों से प्रभावित और प्रेरित।
* कलाकृतियाँ केवल प्रतिरूप नहीं, बल्कि उनके दर्शन को दर्शाती हैं, रंग, आकार और भावनाओं का संयोजन।
* दक्षिण भारत के दौरे से प्रेरणा मिली, जिससे 'दुल्हन का श्रृंगार' (The Bride's Toilette), 'ब्रह्मचारी' (The Brahmacharies) और 'बाजार जाते हुए दक्षिण भारतीय ग्रामीण' (South Indian Villagers going to market) जैसे चित्र बनाए।
* चित्र का विवरण:
* अमृता की पारंपरिक दक्षिण भारत में प्रचलित हिंदू प्रथाओं और विश्वासों की समझ का सुंदर उदाहरण।
* दृश्य: पांच आकृतियाँ (कुछ ब्रह्मचारी विद्यार्थी) आश्रम में।
* उनकी सहजता और हिंदू आस्थाओं पर पूर्ण विश्वास चित्रित।
* समतल धरातल पर सीधे खड़े रूप में चित्रित।
* रंगों को महत्व: गहरे लाल रंग की पृष्ठभूमि, धोतियाँ, हरा और भूरा-सा तटस्थ अग्रभाग।
* समग्र संयोजन की शांति को बाधित नहीं करते।
* धोतियों के सफेद रंगों में सूक्ष्म भिन्नता, एकरूपता का अहसास।
* चित्र के मध्य भाग में श्वेतांबर आकृति, जिसके चारों ओर काले और भूरे रंग के शरीर।
* गहरी लाल पृष्ठभूमि सावधानी से बनाई गई है।
* योगदान:
* सात वर्षों में बनाए गए चित्रों के लिए याद किया जाता है।
* प्रतिभा, रंग और ब्रश का मनोयोग से उपयोग प्रशंसनीय।
* पश्चिमी प्रशिक्षण और पूर्वी विचारों का सामंजस्य, जिससे वह लोकप्रिय हुईं।
* कला विषयों के प्रति ईमानदारी और रंगों का प्रयोग उनके चित्रों को शाश्वत बनाता है।
* अधिकांश चित्र देश-प्रेम और देश के निवासियों की जीवन शैली को प्रदर्शित करते हैं।
* अपने समकालीन चित्रकारों में सबसे युवा, अल्पकालिक जीवन।
3. दि अट्रियम (The Atrium)
* शीर्षक: दि अट्रियम (The Atrium)
* माध्यम: कागज पर पानी के रंग
* समय: 1920
* आकार: 12.5 x 9.5 इंच
* कलाकार: गगनेन्द्रनाथ टैगोर
* संकलन: रवींद्र भारती सोसाइटी, जोरासन्को, कोलकाता
* सामान्य विवरण:
* जन्म: 1867, कोलकाता के टैगोर परिवार में।
* समकालीन भारतीय चित्रकारों में अग्रणी स्थान।
* 1910 के दौरान की प्रमुख कृतियाँ: हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के चित्र, कला चैतन्य की जीवनगाथा, भारतीय जीवन दर्शाते चित्र।
* भाई अबनींद्रनाथ की कला का समर्थन किया।
* यूरोप की घनवादी विचारधारा की ओर रुझान।
* जीवन के अंतिम वर्षों में अपनी स्पष्ट शैली विकसित की, अपनी छाप का घनवाद।
* घनवाद का मूल: अभिव्यक्ति को गूढ़ ज्यामितीय आकारों के माध्यम से अभिव्यक्त करना।
* प्रयोगों के बाद अपनी तकनीक विकसित की।
* समतल, छाया वाले आकारों को रंगों द्वारा आच्छादित करके रहस्यमय बनाया।
* संयोजन के विशेषज्ञ (गुरु)।
* कला चित्रों में हल्के रंग, छाया के चिह्न, ज्यामितीय आकार और सरल आकार।
* पाश्चात्य कला शैली का अंधानुकरण नहीं किया।
* महान लेखक और समीक्षक भी, कार्टून (व्यंग्य चित्र) भी चर्चित।
* व्यंग्य चित्रों के माध्यम से कोलकाता के विभिन्न दृश्यों और मनोरंजक जीवन को दर्शाया।
* पाश्चात्य संस्कृति से जुड़े बंगालियों पर किए गए व्यंग्य चित्रों के लिए भी चर्चित।
* चित्र का विवरण:
* गगनेन्द्रनाथ टैगोर के चित्रों में से एक असाधारण भित्ति कृति।
* उनकी कृतियों पर घनवाद के प्रभाव का नमूना।
* घनवाद: वर्णित वस्तुओं को ज्यामितीय आकार में संयोजित किया जाता है।
* उन्होंने अपने चित्रों में यही शैली अपनाई।
* रंगों के प्रयोग से प्रकाश और छाया के अपूर्व संयोजन से प्रभाव दर्शाया।
* प्रारंभिक कृतियों में बहुत से रंगों का प्रयोग, लेकिन इस चित्र में विभिन्न छाया और रंगों का प्रयोग।
* आकृतियाँ अमूर्त हैं, फिर भी चित्र को समझना आसान है।
* उस समय के किसी भी कलाकार ने इस पाश्चात्य अवधारणा पर प्रयोग नहीं किया।
* योगदान:
* आज भी एक ऐसे कलाकार के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने कई प्रयोग किए।
* निधन: 1938।
* अपने चित्रों और व्यंग्य चित्रों के द्वारा आज भी जीवित हैं।
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