यह नोट्स भारतीय कला, विशेषकर चित्रकला के इतिहास और विकास को समझने में मदद करेंगे, जिसमें पांडुलिपि चित्रण पर विशेष ध्यान दिया गया है।
1. भारतीय चित्रकला के सैद्धांतिक आधार
मुख्य स्रोत: विष्णुधर्मोत्तर पुराण का तीसरा खंड, जिसमें 'चित्रसूत्र' नामक अध्याय है। इसे भारतीय कला, खासकर चित्रकला की महत्वपूर्ण स्रोत पुस्तक माना जाता है।
विषय: यह अध्याय 'आकृति बनाने की कला' (प्रतिमा लक्षण) से संबंधित है, जिसे चित्रकला के धर्मसूत्र कहा गया है।
तकनीकी विवरण:
तकनीक, उपकरण और सामग्री: चित्रण के लिए आवश्यक चीज़ें।
सतह: दीवार या भित्ति पर चित्रकला का उल्लेख।
धारणा (Perception) और परिप्रेक्ष्य (Perspective): चित्र को वास्तविक और गहरा दिखाने के तरीके।
मानव आकृतियों का त्रि-आयामीकरण (Three-dimensional forms): आकृतियों को जीवंत और उभरा हुआ दिखाना।
चित्रण के छह अंग (षडंग):
रूप-भेद (Visual differentiation/Form): विभिन्न आकृतियों और रूपों का अंतर।
प्रमाण (Measurement/Proportion): सही माप, अनुपात और संरचना।
भाव (Expression): चित्र में भावनाओं को दर्शाना।
लावण्य योजना (Aesthetic composition): सौंदर्यपूर्ण रचना और आकर्षण।
सदृश (Likeness): वस्तु या व्यक्ति के समान दिखना।
वार्णिकभंगा (Brushwork and color usage): तुलिका और रंगों के उपयोग की कुशलता।
प्रभाव: सदियों तक कलाकारों द्वारा इन धर्मसूत्रों का पालन किया गया, जिससे ये सभी भारतीय चित्रकला शैलियों का आधार बने।
2. मध्यकाल में लघु चित्रकला (Miniature Painting)
विशेषता: मध्यकाल की चित्रकला को उनके छोटे आकार के कारण 'लघु चित्रकारी' कहा जाता था।
अवलोकन: इन्हें हाथों में लेकर करीब से देखा जाता था।
उद्देश्य: इनका उद्देश्य दीवारों पर प्रदर्शित करना नहीं था, क्योंकि महलों और दरबारों की दीवारें भित्ति चित्रों (दीवार चित्रों) से सजी होती थीं।
3. पांडुलिपि चित्रण (Manuscript Illustration)
परिभाषा: चित्रकला का एक बड़ा हिस्सा पांडुलिपि चित्रण के रूप में जाना जाता है, जिसमें महाकाव्यों, काव्य छंदों, और विभिन्न धार्मिक, साहित्यिक, संगीत ग्रंथों (पांडुलिपियों) का चित्रण किया जाता था।
संरचना:
चित्रपट के ऊपरी भाग पर हस्तलिखित छंदों को स्पष्ट आयताकार स्थानों में लिखा जाता था।
कभी-कभी पाठ को चित्र के मुख्य पृष्ठ के बजाय पीछे की तरफ लिखा जाता था।
इन्हें व्यवस्थित रूप से विभिन्न भागों में बांटा जाता था, प्रत्येक भाग में कई चित्र या पृष्ठ होते थे।
प्रत्येक पृष्ठ (फोलियो) का संबंधित लेख चित्र के ऊपरी भाग में या उसके पीछे अंकित होता था।
उदाहरण संग्रह: रामायण, भागवत पुराण, महाभारत, गीत गोविंद, रागमाला आदि के चित्र संकलन।
संरक्षण: प्रत्येक संग्रह को कपड़े के टुकड़े से लपेटकर, राजा या संरक्षक के पुस्तकालय में एक गठरी/पोटली के रूप में रखा जाता था।
4. पुष्पिका पृष्ठ (Colophon Page) और ऐतिहासिक महत्व
महत्वपूर्ण पृष्ठ: संग्रह का सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठ पुष्पिका पृष्ठ होता था।
जानकारी: इसमें संरक्षक का नाम, कलाकार या लेखक का नाम, पांडुलिपि बनने की तिथि और स्थान, या चित्रण पूरा होने की तिथि और अन्य महत्वपूर्ण विवरण होते थे।
चुनौतियाँ: समय के साथ कई पुष्पिका पृष्ठ खो गए या नष्ट हो गए, जिससे विद्वानों को उनकी शैली और अन्य साक्ष्यों के आधार पर चित्रों का विवरण करना पड़ता है।
चित्रकला की संवेदनशीलता: चित्रकला आग, नमी और अन्य आपदाओं के प्रति संवेदनशील होती है।
सामाजिक भूमिका:
कलाकृतियों को अनमोल और कीमती माना जाता था।
ये सुवाह्य (पोर्टेबल) होती थीं।
इन्हें राजकुमारियों के विवाह में या राजाओं व दरबारियों के बीच उपहार के रूप में व्यापक रूप से भेंट किया जाता था।
तीर्थयात्रियों, भिक्षुओं, व्यापारियों और कथावाचकों के साथ दूरदराज के क्षेत्रों में ले जाया जाता था, जिससे शैलियों का आदान-प्रदान होता था (जैसे बूंदी और मेवाड़ के चित्रों का संग्रह)।
5. चित्रकला इतिहास का पुनर्निर्माण: चुनौतियाँ
कठिनाई: चित्रकला के इतिहास का पुनर्निर्माण एक अभूतपूर्व कार्य है।
अदिनांकित कलाकृतियाँ: दिनांकित (Dated) चित्रों की तुलना में अदिनांकित (Undated) कलाकृतियाँ अधिक हैं।
कालानुक्रमिक रिक्त स्थान: कालानुक्रम में व्यवस्थित करने पर कई रिक्त स्थान मिलते हैं, जिससे चित्रण के विकास या समृद्धि का अनुमान लगाना मुश्किल होता है।
बिखरे पृष्ठ: स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब मूल पांडुलिपियों के पृष्ठ विभिन्न संग्रहालयों और निजी संग्रहों में बिखर जाते हैं।
विद्वानों की भूमिका: ये चुनौतियाँ विद्वानों को बार-बार कालक्रम में संशोधन और उसे पुनर्परिभाषित करने के लिए बाध्य करती हैं। अदिनांकित चित्रों को उनकी शैली और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
6. पश्चिम भारतीय चित्रकला शैली
केंद्र: भारत के पश्चिमी भाग में फली-फूली, गुजरात इसका प्रमुख केंद्र था। इसमें राजस्थान का दक्षिणी भाग और मध्य भारत का पश्चिमी भाग भी शामिल था।
संरक्षण:
गुजरात में महत्वपूर्ण बंदरगाहों के कारण संपन्न व्यापारी और स्थानीय सामंत थे, जो कला के सशक्त संरक्षक बने।
मुख्य रूप से जैन समुदाय के व्यापारी वर्ग ने जैन धर्म के विषयों को संरक्षित किया, इसलिए इसे 'जैन चित्रकला' भी कहा जाता है।
शास्त्र दान की परंपरा: सचित्र पांडुलिपियों को मठ के पुस्तकालयों ('भंडार') में दान करना एक परोपकारी और धार्मिक कार्य माना जाता था, जिससे जैन शैली को प्रोत्साहन मिला।
प्रमुख चित्रित ग्रंथ:
कल्पसूत्र: जैन परंपरा का सबसे लोकप्रिय चित्रित ग्रंथ। इसमें 24 तीर्थंकरों के जन्म से लेकर निर्वाण तक की घटनाओं का वर्णन है।
महावीर का जीवन: गर्भाधान, जन्म, गृहत्याग, ज्ञान प्राप्ति, प्रथम उपदेश, और महानिर्वाण।
त्रिशला के 14 स्वप्न: महावीर के गर्भाधान के समय उनकी माता त्रिशला द्वारा देखे गए 14 शुभ स्वप्नों का चित्रण (हाथी, बैल, शेर, देवी लक्ष्मी, कलश आदि)।
कालकाचार्यकथा: आचार्य कालका की कहानी, जिसमें उन्होंने एक दुष्ट राजा से अपनी बहन (एक जैन तपस्विनी) को बचाया। इसमें रोमांचक घटनाएँ और कालका की यात्रा का चित्रण है।
उत्तरायण सूत्र: महावीर की शिक्षाओं और भिक्षुओं की आचार संहिता का वर्णन।
संग्राहिणी सूत्र: 12वीं शताब्दी का एक ब्रह्मांड संबंधी ग्रंथ, जिसमें ब्रह्मांड की संरचना और अंतरिक्ष की अवधारणाएँ शामिल हैं।
पृष्ठों की संरचना: ग्रंथों में या तो बहुत कम या अत्यधिक चित्र मिलते हैं। विशिष्ट पृष्ठों को लेखन और चित्रण के लिए वर्गों में विभाजित किया जाता था।
संरक्षण: पांडुलिपि के पृष्ठों को एक साथ रखने के लिए ऊपर और नीचे 'पटलिस' नामक लकड़ी के आवरण का उपयोग होता था, जिन्हें एक छेद से रस्सी द्वारा बाँधा जाता था।
सामग्री: 14वीं शताब्दी में कागज़ के आने से पहले, प्रारंभिक जैन चित्रकला ताड़ के पत्तों पर बनाई जाती थी (सबसे पहली पांडुलिपि 11वीं शताब्दी की है)। पत्तियों को तैयार करके नुकीले उपकरण से लिखा जाता था।
प्रारंभिक चित्रण: ताड़ के पत्तों पर सीमित स्थान के कारण, चित्रण केवल पटलिस तक ही सीमित था, जिसमें देवी-देवताओं और जैन आचार्यों की आकृतियों को चमकीले रंगों से चित्रित किया जाता था।
शैलीगत विशेषताएँ:
संयोजन (Composition): विशेष प्रकार की योजनाबद्ध और सरलीकृत भाषा का विकास, चित्र पटल को विभिन्न घटनाओं के लिए वर्गों में विभाजित किया गया।
रंग और रेखाएँ: चमकीले रंग, कपड़े के अलंकरण का प्रभाव, पतली, लहरदार रेखाओं का प्रबल उपयोग।
चेहरे: चेहरे को त्रि-आयामों में दर्शाने के लिए एक अतिरिक्त आँख का उपयोग।
वास्तुकला: सल्तनत कालीन गुंबद और नुकीले मेहराब का चित्रण (गुजरात, मांडू, जौनपुर, पाटन में सुल्तानों की राजनीतिक उपस्थिति दर्शाता है)।
स्वदेशी प्रभाव: चंदवा, पर्दे, मेज़, कुर्सी, वेशभूषा आदि में स्वदेशी और स्थानीय जीवन शैली का प्रभाव।
भू-दृश्य: प्रकृति-दृश्य का चित्रण विस्तृत न होकर सांकेतिक होता था।
स्वर्ण काल: लगभग 1350-1450 ई. (सौ वर्ष) को जैन चित्रकला का सबसे रचनात्मक काल माना जाता है।
परिवर्तन: इस काल में चित्रों की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव आया, जहाँ मुख्य चित्र के हाशिये पर देवी-देवताओं के साथ आकर्षक भू-दृश्य, नृत्य करती मानव आकृतियाँ और वाद्ययंत्र बजाते संगीतकारों का चित्रण किया गया।
समृद्धि का प्रतीक: चित्रों में स्वर्ण और लाजवर्त (लैपिस लाजुली) का प्रचुर उपयोग संरक्षकों की संपन्नता और सामाजिक स्थिति को दर्शाता है।
अन्य विषय: धार्मिक ग्रंथों के अलावा, तीर्थपट, मंडल और गैर-धार्मिक कहानियों को भी जैन समुदाय के लिए चित्रित किया जाता था।
समानांतर परंपरा: 15वीं और 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सामंतों, जमींदारों, धनी नागरिकों आदि के बीच चित्रकला की एक समानांतर परंपरा मौजूद थी, जिसमें धर्मनिरपेक्ष, धार्मिक और साहित्यिक विषयों का चित्रण था।
यह स्वदेशी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है, जो राजस्थान के राजदरबार की शैलियों और मुगलों के प्रभाव से पहले विकसित हुई।
उदाहरण: महापुराण, चौरपंचाशिका, महाभारत का अरण्यक पर्व, भागवत पुराण, गीत गोविंद।
नामकरण: इस काल और शैली को 'पूर्व-मुगल' या 'पूर्व-राजस्थानी शैली' या 'स्वदेशी शैली' भी कहा जाता है।
मानव संरचना की शैली: इस काल में मानव संरचना की एक विशेष शैली विकसित हुई, जिसमें पारदर्शी वस्त्रों का चित्रण और नायिका के सिर पर गुब्बारे जैसी ओढ़नी (कड़े और नुकीले किनारों वाली) दिखाई देती है।
अन्य औपचारिक तत्व: जल निकायों, क्षितिज, वनस्पतियों, जीवों का चित्रण विभिन्न प्रकार की रेखाओं से किया गया, जो 17वीं शताब्दी की आरंभिक राजस्थानी चित्रकला को प्रभावित करते हैं।
7. सल्तनत चित्रकला शैली
उदय: 12वीं शताब्दी के अंत में मध्य एशिया के सल्तनत राजवंशों के शासन में आने के बाद, भारतीय चित्रों में फ़ारसी, तुर्क और अफ़ग़ान का प्रभाव देखा गया, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ सुल्तानों ने चित्रों का निर्माण करवाया (जैसे मालवा, गुजरात, जौनपुर)।
मिश्रण: इन दरबारों में स्थानीय और कुछ मध्य एशियाई कलाकारों के काम करने से स्वदेशी और फ़ारसी शैलियों के मिश्रण से एक नई शैली का उदय हुआ, जिसे 'सल्तनत चित्रकला' कहा गया।
विशेषताएँ: यह एक शैली से ज़्यादा एक पद्धति थी, जिसमें फ़ारसी मिश्रण का प्रभाव था - स्वदेशी चित्रण पद्धति के साथ फ़ारसी तत्व (रंग, शरीर-रचना, अलंकरण की सूक्ष्मता, सरल प्राकृतिक दृश्य) एक साथ दिखते थे।
सर्वोत्तम उदाहरण: नासिर शाह खिलजी के शासनकाल (1500-10 ई.) के दौरान मांडू में चित्रित 'निमतनामा' (पकवानों की किताब)।
इसमें व्यंजनों, शिकार, दवाओं, सौंदर्य प्रसाधन और इत्र के निर्माण के दिशानिर्देश भी दिए गए हैं।
अन्य उदाहरण: सूफी विचारों पर आधारित कहानियाँ और 'लौराचंदा' चित्रकला।
8. पाल चित्रकला शैली
अवधि: पूर्वी भारत के पाल शासकों (750 से 12वीं शताब्दी के मध्य) के समय में लिखित सचित्र पांडुलिपियाँ 11वीं और 12वीं शताब्दी की प्रारंभिक चित्रकला के उदाहरण हैं। यह बौद्ध कला का अंतिम प्रमुख काल था।
केंद्र: नालंदा और विक्रमशिला जैसे महाविहार (विश्वविद्यालय) बौद्ध ज्ञान और कला के महान केंद्र थे।
यहाँ बौद्ध धर्म से संबंधित असंख्य पांडुलिपियाँ और वज्रयान बौद्ध देवी-देवताओं के चित्र ताड़पत्र पर चित्रित किए गए।
कांस्य मूर्तियों की ढलाई के लिए भी कार्यशालाएँ थीं।
प्रसार: दक्षिण-पूर्व एशिया के छात्र और तीर्थयात्री शिक्षा और धार्मिक शिक्षा के लिए इन केंद्रों में आते थे और पालकालीन बौद्ध कला के कांस्य और सचित्र पांडुलिपियों के नमूने अपने साथ ले जाते थे। इससे पाल कला का नेपाल, तिब्बत, बर्मा, श्रीलंका और जावा जैसे देशों में प्रसार हुआ।
शैलीगत विशेषताएँ:
जैन चित्रकला की कोणीय रेखाओं के विपरीत, पाल शैली में लयात्मक और प्रवाहमान रेखाएँ तथा हल्की रंग योजना प्रमुख विशेषताएँ हैं।
अजंता की तरह, पाल शैली में मठों में मूर्तिकला पद्धति और चित्रों में समानांतर कला शैली का अनुभव होता है।
प्रमुख उदाहरण: 'अष्टसहस्त्रिका प्रज्ञापर्मिता' (ऑक्सफोर्ड की बोडलियन लाइब्रेरी में)। यह ताड़पत्र पर निर्मित पालकालीन बौद्ध पांडुलिपि का एक श्रेष्ठ उदाहरण है।
इसका चित्रण नालंदा विश्वविद्यालय में, पाल शासक रामपाल के पंद्रहवें राजवर्ष (11वीं शताब्दी के अंतिम तिमाही) में हुआ।
इसमें छह चित्रित पृष्ठ और दोनों ओर चित्रित लकड़ी के आवरण हैं, जो पांडुलिपि को सुरक्षित रखते थे।
पतन: मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन के बाद पाल राजवंश कमजोर हो गया। अंततः 13वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में बौद्ध विहारों के नष्ट होने के साथ पाल कला का अंत हो गया।
0 Comments