​📝 पाठ्य सामग्री पर आधारित प्रश्नोत्तर

​I. एक पंक्ति के प्रश्नोत्तर (30 प्रश्नोत्तर)

  1. प्रश्न: भारत की विदेश नीति के तीन आधार स्तम्भ क्या हैं? उत्तर: शान्ति, मित्रता, समानता।
  2. प्रश्न: प्राचीन भारतीय परम्परा में किस भावना को महत्त्व दिया गया है? उत्तर: वसुधैव कुटुम्बकम् (अर्थात पूरी पृथ्वी एक परिवार है)।
  3. प्रश्न: भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए किस तरीके का समर्थन किया है? उत्तर: मध्यस्थता द्वारा सुलझाना।
  4. प्रश्न: भारत ने अपनी विदेश नीति में किसका विरोध किया है? उत्तर: साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और रंगभेद का।
  5. प्रश्न: स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय विश्व कितने विरोधी गुटों में विभाजित था? उत्तर: दो विरोधी गुटों में (पूँजीवादी अमेरिका और साम्यवादी सोवियत संघ)।
  6. प्रश्न: गुट निरपेक्षता की नीति का जन्म क्यों हुआ? उत्तर: अपना आर्थिक एवं सर्वांगीण विकास करने के लिए और गुटों की राजनीति से अलग रहने के लिए।
  7. प्रश्न: गुट निरपेक्षता के आन्दोलन को व्यवस्थित रूप किस दशक में प्राप्त हुआ? उत्तर: पाँचवे एवं छठे दशक में।
  8. प्रश्न: गुट निरपेक्ष आन्दोलन का पहला शिखर सम्मेलन कहाँ और कब आयोजित हुआ? उत्तर: बेलग्रेड (सन् 1961)।
  9. प्रश्न: गुट निरपेक्षता को एक आन्दोलन का रूप देने में किन भारतीय प्रधानमंत्री की प्रमुख भूमिका रही? उत्तर: पंडित जवाहरलाल नेहरू।
  10. प्रश्न: पंचशील मूलतः किस धर्म के पाँच व्रतों का पारिभाषिक शब्द है? उत्तर: बौद्ध धर्म।
  11. प्रश्न: पंचशील के सिद्धान्त को सर्वप्रथम भारत ने किस देश के साथ समझौते में अपनाया? उत्तर: चीन (तिब्बत के सम्बन्ध में)।
  12. प्रश्न: पंचशील के सिद्धान्त को कब पहचान प्राप्त हुई? उत्तर: 29 अप्रैल 1954 को।
  13. प्रश्न: किस घटना ने पंचशील को भारत की एक कूटनीतिक भूल सिद्ध कर दिया? उत्तर: सन् 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण।
  14. प्रश्न: 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का समर्थन किस नीति के तहत किया गया है? उत्तर: शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति।
  15. प्रश्न: भारत किस संस्था का प्रारम्भिक सदस्य रहा है और उसका समर्थन करता है? उत्तर: संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO)।
  16. प्रश्न: भारत ने नस्लीय भेदभाव और रंगभेद के विरोध स्वरूप किस देश के साथ कूटनीतिक सम्बन्धों का विच्छेद कर लिया था? उत्तर: दक्षिण अफ्रीका।
  17. प्रश्न: भारत ने अपनी आणविक नीति कब से बनाना शुरू किया? उत्तर: सन् 1960 के बाद से।
  18. प्रश्न: भारत के परमाणु कार्यक्रम के सूत्रधार कौन माने जाते हैं? उत्तर: पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम।
  19. प्रश्न: भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कब और कहाँ किया? उत्तर: 1974 में पोकरण में।
  20. प्रश्न: भारत ने अपना दूसरा परमाणु परीक्षण कब किया? उत्तर: 1998 में।
  21. प्रश्न: भारत की आणविक नीति का मूलभूत सिद्धान्त क्या है? उत्तर: पहले उपयोग न करना (No First Use)।
  22. प्रश्न: सार्क (SAARC) का पूरा नाम क्या है? उत्तर: दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ।
  23. प्रश्न: सार्क की स्थापना कब हुई थी? उत्तर: दिसम्बर 1985 में।
  24. प्रश्न: सार्क के संस्थापक सदस्य देशों की संख्या कितनी थी? उत्तर: सात।
  25. प्रश्न: सार्क देशों में सबसे बाद में कौन-सा देश शामिल हुआ? उत्तर: अफगानिस्तान (अप्रैल 2007 में 14वें शिखर सम्मेलन में)।
  26. प्रश्न: भारत में वर्तमान में लगभग कितने प्रमुख उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं? उत्तर: लगभग 31।
  27. प्रश्न: जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने भारतीय संसद पर कब हमला किया था? उत्तर: 2001 में।
  28. प्रश्न: आतंकवाद का अर्थ क्या है? उत्तर: विधि सम्मत सरकार के विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही करना और जनता को आतंकित करना।
  29. प्रश्न: वर्तमान में भारत की विदेश नीति में किन पहलुओं को महत्त्व दिया जाने लगा है? उत्तर: आर्थिक पहलुओं, व्यापार एवं वाणिज्य पर।
  30. प्रश्न: किस देश के साथ भारत के सम्बन्धों में व्यापक सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई है? उत्तर: अमेरिका।

​II. अति लघुतात्मक प्रश्नोत्तर (20 प्रश्नोत्तर)

  1. प्रश्न: भारत की प्राचीन विदेश नीति किस आदर्श पर आधारित थी? उत्तर: भारत की प्राचीन विदेश नीति "वसुधैव कुटुम्बकम्" (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) तथा "सर्व भवन्तु सुखिनः" (सब सुखी हों) जैसे श्रेष्ठ जीवन मूल्यों पर आधारित थी, जो समग्र विकास, हितों की रक्षा और प्रकृति प्रदत्त भेदभाव को नकारने पर बल देती है।
  2. प्रश्न: अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं शान्ति के लिए भारत की विदेश नीति के मुख्य प्रयास क्या हैं? उत्तर: भारत की विदेश नीति अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं शान्ति के लिए प्रयत्न करती है, अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा सुलझाने का समर्थन करती है, और अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों में अपनी आस्था बनाए रखती है।
  3. प्रश्न: भारत की विदेश नीति सैनिक समझौतों और गुटबन्दियों के प्रति क्या दृष्टिकोण रखती है? उत्तर: भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख उद्देश्य सैनिक समझौतों एवं गुट बन्दियों से अलग रहना है, जिससे वह विश्व की समस्याओं पर स्वतन्त्र व न्यायपूर्ण विचार प्रकट कर सके।
  4. प्रश्न: रंगभेद के विरोध में भारत की नीति संक्षेप में बताइए। उत्तर: भारत विश्व की सभी मानव नस्लों व प्रजातियों की समानता का पक्षधर है और नस्ल एवं रंग के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव का प्रबल विरोध करता है; इसी नीति के तहत उसने दक्षिण अफ्रीका से कूटनीतिक सम्बन्ध विच्छेद भी किए थे।
  5. प्रश्न: स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत के समक्ष सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती क्या थी? उत्तर: भारत की प्रथम आवश्यकता अपना आर्थिक एवं सर्वांगीण विकास करना था, जिसके लिए उसे सभी देशों के सहयोग की आवश्यकता थी, इसी कारण उसने गुट निरपेक्षता की नयी अवधारणा तैयार की।
  6. प्रश्न: भारत की विदेश नीति के निर्धारण में भौगोलिक तत्त्वों का क्या महत्त्व रहा है? उत्तर: भौगोलिक तत्त्वों का महत्त्व इसलिए है क्योंकि भारत एक ओर पूर्व सोवियत संघ और साम्यवादी चीन जैसी ताकतों के समीप है, वहीं इसका बड़ा हिस्सा समुद्र से घिरा है, अतः इसकी विदेश नीति में सुरक्षा, शान्ति और मैत्री पर बल दिया गया है।
  7. प्रश्न: भारत की गुट निरपेक्षता की नीति को एक 'सकारात्मक नीति' क्यों कहा जाता है? उत्तर: इसे सकारात्मक नीति इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह विश्व की विभिन्न समस्याओं पर स्वतन्त्र व न्यायपूर्ण विचार प्रकट करती है, और राष्ट्रों को अपने हित के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दोनों गुटों से सन्तुलित सम्बन्ध रखने का मार्ग देती है।
  8. प्रश्न: गुट निरपेक्ष आन्दोलन के किन्हीं चार प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए। उत्तर: इस आन्दोलन को रूप देने में भारत के पंडित जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के टीटो, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर तथा इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो की व्यापक भूमिका रही।
  9. प्रश्न: पंचशील के पाँच सिद्धान्तों में 'सम्मान' से सम्बन्धित सिद्धान्त क्या है? उत्तर: पंचशील का एक सिद्धान्त है: एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और सर्वोच्च सत्ता के लिए सम्मान, तथा दूसरा सिद्धान्त अनाक्रमण की नीति है।
  10. प्रश्न: शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का सार क्या है? उत्तर: यह नीति परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले राष्ट्रों को मैत्रीपूर्वक रहने के लिए प्रेरित करती है। यह रचनात्मक विकास का समर्थन करती है और युद्ध का विरोध करते हुए शान्ति तथा निशस्त्रीकरण का समर्थन करती है।
  11. प्रश्न: भारत साम्राज्यवाद का विरोध क्यों करता है? उत्तर: भारत स्वयं साम्राज्यवाद का शिकार रहा है और उसके दुष्परिणामों को अनुभव कर चुका है, इसलिए वह इसे शोषण का साधन मानता है और एशिया तथा अफ्रीका के स्वतन्त्रता के लिए संघर्षरत राष्ट्रों का समर्थन करता है।
  12. प्रश्न: संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति भारत की क्या प्रतिबद्धता है? उत्तर: भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य रहा है, उसकी नीतियों का समर्थन करता है, उसके आदेशों एवं अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का अनुपालन करता है, तथा आवश्यकता पड़ने पर उसने शान्ति सेना भी प्रदान की है।
  13. प्रश्न: भारत परमाणु अप्रसार सन्धि (NPT) और व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि (CTBT) पर हस्ताक्षर क्यों नहीं करना चाहता था? उत्तर: भारत इन सन्धियों की शर्तों को भेदभावपूर्ण मानता था, क्योंकि ये सन्धियाँ केवल पाँच परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों के एकाधिकार को बनाए रखती थीं, जबकि भारत की सुरक्षा को भी संकट था।
  14. प्रश्न: भारत की आणविक नीति का प्रमुख उद्देश्य क्या है? उत्तर: भारत की आणविक नीति का प्रमुख उद्देश्य यह है कि वह परमाणु शस्त्र विहीन संसार के लिए वचनबद्ध है, परन्तु जब तक अन्य परमाणु सम्पन्न राष्ट्र अपने अस्त्र नष्ट नहीं करते, भारत अपनी सुरक्षा हेतु न्यूनतम सुरक्षात्मक परमाणु अस्त्र रखेगा।
  15. प्रश्न: सार्क (SAARC) की स्थापना के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या था? उत्तर: सार्क की स्थापना दक्षिण एशिया के सात पड़ोसी देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग के लिए की गई, जिसका मुख्य बल आपसी तनाव को कम करने एवं स‌द्भाव बढ़ाने पर है, तथा व्यापार, विकास जैसे विषयों पर सहयोग की संभावनाएँ तलाशना है।
  16. प्रश्न: आतंकवाद से आप क्या समझते हैं? उत्तर: आतंकवाद विधि सम्मत सरकार के विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही करना, हिंसा की धमकी देना, व्यक्तिगत हिंसात्मक कृत्य करना और लोगों को आतंकित करना है।
  17. प्रश्न: भारत के लिए आतंकवाद की समस्या एक गम्भीर चुनौती क्यों है? उत्तर: आतंकवाद भारत के लिए गम्भीर चुनौती है क्योंकि जम्मू-कश्मीर तथा देश के अन्य भागों में अनेक उग्रवादी संगठन विघटनकारी घटनाओं को अंजाम देते हैं, और कुछ राष्ट्र अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए आतंकवादी संगठनों को शह एवं प्रश्रय दे रहे हैं।
  18. प्रश्न: 2010 और 2015 में अमेरिका के राष्ट्रपति की भारत यात्रा ने किस ओर संकेत दिया? उत्तर: इन यात्राओं ने भारत-अमेरिका सम्बन्धों में व्यापक सुधार की प्रक्रिया और भारत की विदेश नीति में आये सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत दिया।
  19. प्रश्न: भारत की विदेश नीति में 'निरन्तरता एवं गत्यात्मकता' का क्या अर्थ है? उत्तर: 'निरन्तरता' का अर्थ है कि यह शान्ति, मैत्री और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे अपने श्रेष्ठ आदर्शों पर कायम है, जबकि 'गत्यात्मकता' का अर्थ है कि यह विश्व के बदलते परिवेश और राष्ट्रीय हितों की माँग के अनुसार अपने आर्थिक पहलुओं को महत्त्व देकर परिवर्तन करती रही है।
  20. प्रश्न: भारत की विदेश नीति ने देश की सांस्कृतिक पहचान को किस प्रकार विस्तार दिया है? उत्तर: भारत की विदेश नीति ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय कला, संस्कृति, वेशभूषा, खान-पान आदि को पहचान मिली है, जिससे देश की सांस्कृतिक पहचान को विस्तार मिला है।

​III. लघुत्तरात्मक प्रश्नोत्तर (10 प्रश्नोत्तर)

  1. प्रश्न: भारत की विदेश नीति के किन्हीं चार प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। उत्तर: भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
    • अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं शान्ति: अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा और शान्ति के लिए लगातार प्रयत्न करना और विवादों को मध्यस्थता द्वारा सुलझाना।
    • साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का विरोध: सभी प्रकार के शोषण का विरोध करना तथा स्वतन्त्रता के लिए संघर्षरत राष्ट्रों की सहायता करना।
    • गुटों से अलग रहना: सैनिक समझौतों एवं गुट बन्दियों से अलग रहकर विश्व समस्याओं पर निष्पक्ष राय रखना।
    • आर्थिक सहयोग: सभी देशों के साथ व्यापार, उद्योग, निवेश एवं प्रौद्योगिकी को सक्रिय व सरल बनाना।
  2. प्रश्न: गुट निरपेक्षता की नीति की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए। उत्तर: गुट निरपेक्षता की मुख्य विशेषताएँ:
    • गुटों की राजनीति से दूरी: यह पूँजीवादी एवं साम्यवादी गुटों के परस्पर संघर्ष से दूर रहने का निर्णय था।
    • स्वतन्त्र नीति: यह नीति विश्व की समस्याओं पर स्वतन्त्र व न्यायपूर्ण विचार प्रकट करती है।
    • सकारात्मक नीति: यह राष्ट्रहित में दोनों गुटों से मैत्रीपूर्ण व सन्तुलित सम्बन्ध रखकर विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने की अनुमति देती है।
    • नव स्वतन्त्र राष्ट्रों का मार्ग: इसने दासता से मुक्त हुए नव स्वतन्त्र राष्ट्रों के लिए एक नवीन मार्ग प्रशस्त किया।
  3. प्रश्न: पंचशील के किन्हीं पाँच सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। उत्तर: पंचशील के पाँच सिद्धान्त निम्न प्रकार हैं:
    • एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और सर्वोच्च सत्ता के लिए सम्मान
    • अनाक्रमण की नीति
    • एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना
    • समानता और पारस्परिक लाभ
    • शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति
  4. प्रश्न: शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के प्रति भारत के विश्वास को समझाइए। उत्तर: भारतीय दर्शन में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का समर्थन किया गया है, इसलिए भारत ने परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले राष्ट्रों को मैत्रीपूर्वक रहने के लिए प्रेरित किया है। यह नीति रचनात्मक विकास की समर्थक है और युद्ध का विरोध करते हुए शान्ति तथा आवश्यक निशस्त्रीकरण का समर्थन करती है। भारत ने युद्ध की सम्भावनाएँ बनने पर अनेक बार मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई है, जो शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में उसके विश्वास को दर्शाती है।
  5. प्रश्न: साम्राज्यवाद तथा रंगभेद के विरोध के सम्बन्ध में भारत की नीति स्पष्ट कीजिए। उत्तर:
    • साम्राज्यवाद का विरोध: भारत स्वयं साम्राज्यवाद का शिकार रहा है, इसलिए वह दुनिया में इसके किसी भी रूप का प्रबल विरोध करता है। उसने एशिया तथा अफ्रीका के उन सभी राष्ट्रों का समर्थन किया जो अपनी स्वतन्त्रता के लिए संघर्षशील थे, और सभी के लिए आत्म-निर्णय के अधिकार का समर्थन किया।
    • रंगभेद का विरोध: भारत विश्व की सभी मानव नस्लों व प्रजातियों की समानता का पक्षधर है। उसने नस्ल एवं रंग के आधार पर भेदभाव का प्रबल विरोध किया और इस नीति पर चलने वाले देशों (जैसे दक्षिण अफ्रीका) के विरुद्ध कूटनीतिक सम्बन्ध विच्छेद जैसे कदम उठाए।
  6. प्रश्न: संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति भारत की क्या भूमिका रही है? उत्तर: भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य रहा है और उसकी नीतियों तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों की अनुपालना करता रहा है। भारत ने विवादों पर भी संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयों का पालन किया है। उसने इस संगठन में उच्च पदों को सशोभित किया है और आवश्यकता पड़ने पर शान्ति सेना भी प्रदान की है। वर्तमान में भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भी प्रयत्नशील है।
  7. प्रश्न: भारत ने अपनी आणविक नीति क्यों बनाई और उसके प्रमुख बिन्दु क्या हैं? उत्तर:
    • कारण: 1960 के बाद तेजी से बदलते विश्व परिदृश्य और परमाणु निःशस्त्रीकरण की आड़ में अमेरिका, रूस व चीन जैसे परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों के भेदभावपूर्ण कार्यक्रमों ने भारत को अपनी सुरक्षा के लिए आत्म-निर्भर होने के लिए प्रेरित किया।
    • प्रमुख बिन्दु: भारत ने 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षण किए। उसकी नीति है कि वह परमाणु अस्त्रों का पहले उपयोग नहीं करेगा (No First Use), और परमाणु शस्त्र-विहीन संसार के लिए वचनबद्ध है, परन्तु जब तक अन्य परमाणु सम्पन्न राष्ट्र अपने अस्त्र नष्ट नहीं करते, भारत अपनी सुरक्षा हेतु न्यूनतम परमाणु अस्त्र रखेगा।
  8. प्रश्न: सार्क (SAARC) की स्थापना कब और क्यों की गई? उत्तर:
    • स्थापना: सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ) की स्थापना दिसम्बर 1985 में की गई।
    • उद्देश्य: यह दक्षिण एशिया के सात (वर्तमान में आठ) पड़ोसी देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग स्थापित करने के लिए बनाया गया संगठन है। इसका मुख्य उद्देश्य आपसी तनाव को कम करने एवं स‌द्भाव बढ़ाने पर बल देना है। इसमें कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण आदि क्षेत्रों में आपसी सहयोग की अपार संभावनाएँ हैं।
  9. प्रश्न: भारत के समक्ष आतंकवाद की समस्या एक गम्भीर चुनौती क्यों है? उत्तर: आतंकवाद भारत के लिए गम्भीर चुनौती है क्योंकि यहाँ लगभग 31 प्रमुख उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं, जिनमें से कुछ पाक अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान में अड्डे बनाए हुए हैं। ये संगठन जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य भागों में विघटनकारी घटनाओं को अंजाम देते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ राष्ट्र अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों को शह एवं प्रश्रय देकर भारत के विरुद्ध छद्मयुद्ध (Proxy War) को प्रायोजित कर रहे हैं।
  10. प्रश्न: भारत की विदेश नीति में निरन्तरता एवं गत्यात्मकता को स्पष्ट कीजिए। उत्तर:
    • निरन्तरता: यह विश्व शान्ति, मैत्री, वसुधैव कुटुम्बकम् और गुट निरपेक्षता जैसे अपने उच्च मानवीय एवं गौरवशाली आदर्शों और आधार स्तम्भों के प्रति लगातार वचनबद्ध रही है।
    • गत्यात्मकता: विश्व के बदलते परिवेश, शीतयुद्ध की समाप्ति तथा आर्थिक विकास की आवश्यकता के अनुसार इसमें परिवर्तन भी हुआ है। इसने अब अपने आर्थिक पहलुओं (व्यापार, वाणिज्य, निवेश) को महत्त्व देना प्रारम्भ कर दिया है, और अमेरिका जैसे देशों से सम्बन्धों में व्यापक सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ की है।

​IV. निबन्धात्मक प्रश्नोत्तर (5 प्रश्नोत्तर)

  1. प्रश्न: भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्त्वों की विवेचना कीजिए। उत्तर:भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्त्व 🗺️ ​भारत की विदेश नीति किसी एक कारक पर नहीं, बल्कि कई महत्त्वपूर्ण तत्त्वों पर आधारित है, जिनमें तत्कालीन परिस्थितियाँ, भौगोलिक कारक और सांस्कृतिक प्रभाव शामिल हैं:
    • 1. तत्कालीन परिस्थितियाँ एवं गुट निरपेक्षता: स्वतन्त्रता प्राप्ति (1947) के समय पूरा विश्व पूँजीवादी अमेरिका और साम्यवादी सोवियत संघ के दो विरोधी गुटों में विभाजित था (शीतयुद्ध)। भारत को अपनी आर्थिक एवं सर्वांगीण विकास के लिए सभी देशों के सहयोग की आवश्यकता थी। अतः देश की एकता और अखण्डता को बनाए रखने के लिए, और किसी गुट में शामिल न होने के लिए गुट निरपेक्षता की एक नई अवधारणा तैयार हुई। यह तात्कालिक चुनौती विदेश नीति का एक मूलभूत तत्त्व बन गई।
    • 2. भौगोलिक तत्त्व: किसी भी राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति उसकी विदेश नीति को प्रभावित करती है। भारत एक ओर पूर्व सोवियत संघ (अब रूस) तथा चीन जैसी बड़ी ताकतों के समीप है, वहीं दूसरी ओर इसका दक्षिण-पूर्वी हिस्सा समुद्र से घिरा हुआ है। इस स्थिति ने भारत के लिए अपनी सुरक्षा, शान्ति और मैत्री को प्राथमिकता देना अनिवार्य कर दिया, क्योंकि उसकी क्षेत्रीय अखण्डता और सामुद्रिक सुरक्षा दोनों ही महत्त्वपूर्ण थीं।
    • 3. प्राचीन संस्कृति और विचारधारा का प्रभाव: भारत की विदेश नीति पर उसकी प्राचीन संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा है। विश्व बन्धुत्व (वसुधैव कुटुम्बकम्), विश्व शान्ति और सहिष्णुता काल से ही भारत के प्रेरक मूल्य रहे हैं। इसके अतिरिक्त, स्वतन्त्रता संग्राम के तात्कालिक नेताओं (जैसे पं. नेहरू) के आदर्शों, जिनमें साम्राज्यवाद और रंगभेद का विरोध शामिल था, ने भी इसकी दिशा को प्रभावित किया है।
    • 4. आर्थिक आवश्यकताएँ: गुट निरपेक्षता के पीछे एक प्रमुख कारण अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना था। भारत को अपने विकास के लिए तकनीकी, निवेश और व्यापार की आवश्यकता थी। इस कारण, भारत की विदेश नीति में सभी देशों के साथ व्यापार, उद्योग, निवेश एवं प्रौद्योगिकी के सक्रिय व सरल सम्बन्ध बनाने को प्रमुख उद्देश्य बनाया गया।
    ​ये तत्त्व एक साथ मिलकर भारत की विदेश नीति को एक ऐसा स्वरूप प्रदान करते हैं जो आदर्शवादी (शान्ति) और व्यवहारिक (सुरक्षा व विकास) दोनों है।
  2. प्रश्न: भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत वर्णन कीजिए। उत्तर:भारत की विदेश नीति की मुख्य विशेषताएँ ⭐ ​भारत की विदेश नीति कुछ विशिष्ट सिद्धान्तों और नीतियों पर आधारित है जो इसकी वैश्विक पहचान को दर्शाते हैं:
    • 1. गुट निरपेक्षता (Non-Alignment): यह नीति इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इसका अर्थ है कि शीतयुद्ध के समय दोनों गुटों (पूँजीवादी अमेरिका और साम्यवादी सोवियत संघ) की राजनीति से स्वयं को अलग रखना। यह एक सकारात्मक नीति है, क्योंकि यह विश्व की समस्याओं पर स्वतन्त्र व न्यायपूर्ण विचार प्रकट करती है और नव स्वतन्त्र राष्ट्रों को अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए विकास पर ध्यान केन्द्रित करने का मार्ग प्रशस्त करती है।
    • 2. पंचशील का सिद्धान्त (Five Principles): पंचशील (पाँच सिद्धान्त) का प्रतिपादन भारत और चीन के बीच 1954 के समझौते में किया गया। ये सिद्धान्त शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का आधार हैं। इनमें अनाक्रमण, एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता का सम्मान, आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप, समानता और पारस्परिक लाभ जैसे नैतिक बल के प्रतीक सिद्धान्त शामिल हैं। हालांकि 1962 में चीन के आक्रमण से इसे आघात लगा, पर भारत का इन सिद्धान्तों में विश्वास आज भी है।
    • 3. साम्राज्यवाद तथा रंगभेद का विरोध: भारत स्वयं उपनिवेशवाद का शिकार रहा है, इसलिए वह विश्व में इसके किसी भी रूप का प्रबल विरोध करता है। इसी प्रकार, वह नस्ल और रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को समानता के सिद्धान्त के प्रतिकूल मानता है। भारत ने नस्लभेदी शासन वाले देशों (जैसे दक्षिण अफ्रीका) के विरुद्ध कठोर कदम उठाए और स्वतन्त्रता के लिए संघर्षरत राष्ट्रों का मनोबल बढ़ाया।
    • 4. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का समर्थन: भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य रहा है और विश्व शान्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों की अनुपालना के लिए इस संस्था का दृढ़ता से समर्थन करता है। भारत ने विवादों पर उसके निर्णयों का पालन किया है और आवश्यकता पड़ने पर अपनी शान्ति सेना भी प्रदान की है, जो विश्व बन्धुत्व के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
    • 5. शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व: भारतीय दर्शन की "वसुधैव कुटुम्बकम्" की अवधारणा से प्रेरित यह नीति, परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले राष्ट्रों को भी मैत्रीपूर्वक रहने के लिए प्रेरित करती है। भारत रचनात्मक विकास की धारा का पक्षधर रहा है, और युद्ध का विरोध करते हुए निशस्त्रीकरण का समर्थन करता है।
  3. प्रश्न: पंचशील के सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए तथा यह बताइए कि 1962 की घटना के बाद भी भारत का उनमें विश्वास क्यों बना हुआ है? उत्तर:पंचशील के सिद्धान्त और प्रासंगिकता 🕊️
    • पंचशील का अर्थ: पंचशील बौद्ध धर्म के पाँच व्रतों का पारिभाषिक शब्द है, जिसका अर्थ है पाँच सिद्धान्त। विदेश नीति के सम्बन्ध में इसे सर्वप्रथम 29 अप्रैल 1954 को तिब्बत के सम्बन्ध में भारत एवं चीन समझौते में प्रतिपादित किया गया था। ये सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आचरण की एक नैतिक संहिता प्रस्तुत करते हैं।
    • पंचशील के सिद्धान्त:
      1. एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और सर्वोच्च सत्ता के लिए सम्मान।
      2. अनाक्रमण की नीति: एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करना।
      3. एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना।
      4. समानता और पारस्परिक लाभ: सम्बन्धों में दोनों पक्षों के हितों को महत्त्व देना।
      5. शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति: परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बावजूद मैत्रीपूर्वक साथ रहना।
    • 1962 के बाद भी विश्वास का कारण: सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके यह सिद्ध कर दिया कि पंचशील एक आदर्शवादी अवधारणा है। इस घटना से भारत की विदेश नीति एवं वैश्विक प्रतिष्ठा को भारी आघात लगा और आलोचकों ने इसे कूटनीतिक भूल माना। लेकिन, भारत का इन सिद्धान्तों में विश्वास इसलिए बना रहा है क्योंकि:
      1. नैतिक आदर्श: ये सिद्धान्त भारतीय संस्कृति के मूल शान्ति, मैत्री और सह-अस्तित्व के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंडित नेहरू ने भी कहा था कि इन सिद्धान्तों का यदि पालन किया जाए तो अनेक समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
      2. वैश्विक आवश्यकता: शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद भी, विश्व में संघर्ष, आतंकवाद और अन्तर्राष्ट्रीय विवाद बने हुए हैं। ऐसे में, अहस्तक्षेप, अनाक्रमण और सह-अस्तित्व के सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को एक दृढ़ एवं व्यवहारिक आधार प्रदान कर सकते हैं।
      3. विदेश नीति का आधार: ये सिद्धान्त आज भी भारत की विदेश नीति के आधारभूत मूल्यों में शामिल हैं और यह अपने सम्बन्धों को स्थापित करने में इनका उपयोग करता है।
  4. प्रश्न: भारत की आणविक नीति का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए। उत्तर:भारत की आणविक नीति ⚛️
    • पृष्ठभूमि और उद्देश्य: भारत ने 1960 के दशक के बाद अपनी आणविक नीति बनाना शुरू किया। इसका मूल कारण अमेरिका, रूस व चीन जैसे परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों द्वारा परमाणु निःशस्त्रीकरण की आड़ में अपना एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश थी। भारत की सुरक्षा को देखते हुए, खासकर चीन जैसे परमाणु सम्पन्न राष्ट्र के समीप होने के कारण, डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के मार्गदर्शन में क्षेत्र में आत्म-निर्भर होना समय की मांग थी। भारत ने परमाणु अप्रसार सन्धि (NPT) और व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि (CTBT) की भेदभावपूर्ण शर्तों को स्वीकार नहीं किया।
    • प्रमुख बिन्दु:
      1. परीक्षण: भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण 1974 में (शांतिपूर्ण उद्देश्य) और दूसरा परीक्षण 1998 में (सुरक्षात्मक) पोकरण में किया।
      2. 'पहले उपयोग नहीं' की नीति (No First Use - NFU): भारत की नीति है कि वह परमाणु अस्त्रों का पहले उपयोग नहीं करेगा, केवल किसी परमाणु हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई करेगा।
      3. न्यूनतम निवारक क्षमता: भारत परमाणु शस्त्र-विहीन संसार के लिए वचनबद्ध है, परन्तु जब तक अन्य परमाणु सम्पन्न राष्ट्र अपने अस्त्र नष्ट नहीं करते, भारत अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम सुरक्षात्मक परमाणु अस्त्र रखेगा।
    • आलोचनात्मक विश्लेषण:
      • सकारात्मक पक्ष:
        • ​इस नीति ने अणुशक्ति पर पश्चिमी देशों एवं चीन के एकाधिकार को तोड़ दिया और भारत की सुरक्षा को मजबूत किया।
        • ​NFU की नीति भारत के शान्तिप्रिय देश होने की छवि को बनाए रखती है।
        • ​इसने भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया।
      • नकारात्मक पक्ष/आलोचना:
        • ​1998 के परीक्षणों पर पाँचों परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी।
        • ​कुछ आलोचकों का मानना है कि NFU की नीति को बनाए रखने में भारत को चीन और पाकिस्तान जैसे देशों से लगातार सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, और कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति की समीक्षा होनी चाहिए।
    ​कुल मिलाकर, भारत की आणविक नीति एक ओर शान्ति और सदभाव के प्रति वचनबद्ध है, वहीं दूसरी ओर अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा की पूर्ति करने में पूर्णतः समर्थ रही है।
  5. प्रश्न: भारत की विदेश नीति का मूल्यांकन करते हुए उसकी वर्तमान प्रासंगिकता एवं चुनौतियों पर प्रकाश डालिए। उत्तर:भारत की विदेश नीति का मूल्यांकन: अतीत से वर्तमान तक 📈 ​भारत की विदेश नीति को अतीत से लेकर वर्तमान तक गौरवशाली माना जाता रहा है, क्योंकि यह प्रायः अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने में समर्थ रही है, साथ ही उच्च मानवीय आदर्शों (वसुधैव कुटुम्बकम्, शान्ति) को भी बनाए रखा है।
    • सकारात्मक मूल्यांकन (प्रासंगिकता):
      1. आदर्शों का निर्वहन: गुट निरपेक्षता और पंचशील के सिद्धान्तों के माध्यम से भारत ने अपनी वैचारिक स्वतन्त्रता को बनाए रखा और नवोदित राष्ट्रों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
      2. सुरक्षा की गारंटी: आणविक नीति अपनाकर भारत ने सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की और पश्चिमी देशों के एकाधिकार को तोड़ा।
      3. सांस्कृतिक विस्तार: विदेश नीति के कारण भारतीय कला, संस्कृति, वेशभूषा और खान-पान को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, जिससे भारत की सांस्कृतिक शक्ति (Soft Power) में वृद्धि हुई है।
      4. गत्यात्मकता: समय की माँग के अनुसार, नीति ने आर्थिक पहलुओं (व्यापार, वाणिज्य) को महत्त्व देना प्रारम्भ किया है, जिससे अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ सम्बन्धों में सुधार हुआ है।
    • चुनौतियाँ और आलोचना:
      1. आदर्शवाद पर आघात: 1962 में चीन के आक्रमण ने पंचशील जैसे आदर्शवादी सिद्धान्तों की व्यावहारिकता पर प्रश्नचिह्न लगाया।
      2. आतंकवाद: वर्तमान में आतंकवाद और कुछ राष्ट्रों द्वारा प्रायोजित छद्मयुद्ध भारत की सबसे बड़ी चुनौती है, जिसने देश में शान्ति और विश्वास को खंडित किया है।
      3. सीमा विवाद: पड़ोसी देशों (पाकिस्तान, चीन) के साथ सीमा विवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता (जैसे सार्क की अप्रभावीता) भारत की विदेश नीति के समक्ष बड़ी चुनौतियाँ हैं।
      4. बदलते वैश्विक समीकरण: शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद गुट निरपेक्षता की उपयोगिता पर सवाल उठते रहे हैं, हालांकि भारत ने इसे नवीन चुनौतियों (पर्यावरण, मानव अधिकार, आतंकवाद) के समाधान में सहयोग करने के लिए विस्तारित कर इसकी प्रासंगिकता बनाए रखी है।
    निष्कर्ष: भारत की विदेश नीति में निरन्तरता एवं गत्यात्मकता दिखाई देती है। उसने अपने मूल सिद्धान्तों को नहीं त्यागा है, परन्तु विश्व के बदलते परिवेश के अनुसार अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए इसमें आवश्यक परिवर्तन किए हैं। विगत बीस वर्षों में आर्थिक एवं तकनीकी प्रगति के कारण भारत को एक नई वैश्विक भूमिका प्राप्त हुई है।