शिक्षा का महत्व
शिक्षा मनुष्य के सर्वांगीण विकास का महत्वपूर्ण साधन है। यह मनुष्य को सभ्य बनाती है और हमारी संस्कृति का एक अहम पहलू है। शिक्षा के माध्यम से पिछली पीढ़ियों के अनुभव और उपलब्धियाँ अगली पीढ़ियों तक पहुँचती हैं।
प्राचीन काल में शिक्षा
वैदिक युग
 * ऋग्वैदिक काल: मुख्य पाठ्यक्रम वैदिक साहित्य का अध्ययन था। मंत्रों के शुद्ध उच्चारण पर बल दिया जाता था।
 * अध्ययन सामग्री: वैदिक साहित्य को आसान बनाने के लिए ब्राह्मण, आरण्यक, वेदांग, उपनिषद आदि लिखे गए।
 * शिक्षा का स्वरूप:
   * गुरु-शिष्य संबंध आत्मीय और पवित्र थे।
   * शिष्य गुरु के परिवार के सदस्य के रूप में आश्रमों में रहते थे (गुरु एकाकी जीवन जीते थे)।
   * प्रारंभिक शिक्षा उपनयन संस्कार से शुरू होती थी।
   * शिक्षा मौखिक थी, मंत्रों को कंठस्थ करना होता था।
   * बाद में विभिन्न कलाएँ, दर्शन आदि पढ़ाए जाने लगे।
   * शिक्षा प्रदान करना एक कर्तव्य समझा जाता था; शिष्य गुरु को दक्षिणा भेंट करते थे।
   * विभिन्न व्यवसायों और शिल्पों की शिक्षा भी दी जाती थी।
मौर्य काल
 * बदलाव: व्यापार और शहरीकरण बढ़ने के साथ शिक्षा में भी बदलाव आए।
 * व्यापारी संघों की भूमिका: व्यापारियों के संघ तकनीकी शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र बने। ये खनन, धातु-विज्ञान, बढ़ईगिरी, कपड़ा बुनने और रंगाई करने की विद्या प्रदान करते थे।
 * अन्य विषय: शहरीकरण और जलमार्ग व्यापार के कारण खगोल विज्ञान (नाविकों के लिए) को बढ़ावा मिला।
 * चिकित्सा शिक्षा: चरक (औषधि - 'चरक संहिता') और सुश्रुत (शल्य-क्रिया) प्रसिद्ध थे।
 * जीवन कौशल: शिक्षा जीवन कौशल विषयक थी, जिसमें धनुर्वेद, नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, सैनिक लेखन आदि शामिल थे।
 * कौटिल्य का 'अर्थशास्त्र' शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण था।
गुप्त काल
 * शिक्षा का विस्तार: वैदिक शिक्षा के अतिरिक्त जैन और बौद्ध मत की शिक्षा का भी महत्वपूर्ण स्थान था।
 * अध्ययन विधि: मुख्य रूप से पढ़ाई मौखिक थी, बाद में पुस्तकें भी पढ़नी होती थीं। स्वाध्याय के लिए पुस्तकालय होते थे।
 * बौद्ध मठों का महत्व: बौद्ध मठ शिक्षा के बड़े केंद्र बने, जहाँ विदेशों से भी शिक्षार्थी आते थे। इनकी देखरेख राज्य और धनी वर्ग द्वारा की जाती थी।
 * प्रमुख केंद्र: पाटलिपुत्र (चीनी यात्री फाह्यान ने अध्ययन किया), वाराणसी, मथुरा, नासिक।
 * नालंदा विश्वविद्यालय: संपूर्ण एशिया में प्रसिद्ध, जहाँ वेदान्त दर्शन, पुराण, रामायण, महाभारत, व्याकरण आदि विषय पढ़ाए जाते थे।
 * भाषाएँ: शिक्षा को सरल बनाने के लिए प्राकृत और पालि भाषाओं का प्रयोग किया गया। पुस्तकें ताड़ के पत्तों पर लिखी जाती थीं।
 * कला और शिक्षा में वृद्धि: तक्षशिला और नालंदा उच्च शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे। ह्वेनसांग ने नालंदा में बौद्ध धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया। शीलभद्र वहाँ के कुलपति थे।
 * मंदिरों का उदय: 7वीं और 8वीं शताब्दी में मंदिर भी शिक्षा के केंद्रों के रूप में उभरे।
शिक्षा का उद्देश्य
 * प्राचीन भारत: धर्मनिष्ठ, कर्मनिष्ठ और चरित्रवान व्यक्ति का निर्माण।
 * सर्वांगीण विकास: शिक्षार्थी के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना।
 * सामाजिक कर्तव्य: सुयोग्य नागरिक बनाना, जिसे नागरिक और सामाजिक कर्तव्यों की जानकारी हो।
 * संस्कृति का संरक्षण: शिक्षा द्वारा संस्कृति को जीवित रखना।
विषय (प्राचीन काल)
 * पूर्व वैदिक काल: मुख्य रूप से वैदिक साहित्य का अध्ययन।
 * उत्तर वैदिक काल: वैज्ञानिक औषधीय प्रणाली विकसित हुई।
 * चिकित्सा और औषधि विज्ञान: तक्षशिला और वाराणसी जैसे केंद्रों पर, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता महत्वपूर्ण ग्रंथ थे।
 * गणित: व्यापार और वाणिज्य के कारण अंकगणित, रेखागणित, बीजगणित, खगोल विज्ञान और ज्योतिष का अध्ययन होता था। आर्यभट्ट ने 'आर्यभट्टीय' लिखा।
 * भाषाएँ: संस्कृत का प्रयोग उच्च वर्ग द्वारा। बौद्ध और जैन मतों के उदय के साथ पालि और प्राकृत जैसी स्थानीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ा (अशोक के शिलालेखों में स्थानीय भाषा)। दक्षिण भारत में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाओं का विकास हुआ।
मध्यकालीन शिक्षा
 * दिल्ली सल्तनत: केन्द्रीय शासन द्वारा मुस्लिम शिक्षा प्रणाली को प्रसारित करने का प्रयास।
 * फारसी का महत्व: सरकारी कार्यों में फारसी का प्रयोग होने लगा, जिससे हिंदुओं ने भी इसका अध्ययन शुरू किया।
 * मकतब और मदरसे:
   * मकतब: प्रारंभिक स्तर की शिक्षा (धार्मिक)।
   * मदरसे: उच्च शिक्षा (कुरान आदि का अध्ययन), शासन या उससे जुड़े लोगों द्वारा देखरेख।
   * प्रसिद्ध मदरसे: दिल्ली के मुइज्जी, नासिरी, फिरौजी; बीदर का महमूद गजनी का मदरसा; फतेहपुर सीकरी में अबुल फजल का मदरसा।
 * अन्य भाषाओं का विकास: हिंदी, संस्कृत आदि भाषाओं के साहित्य में भी प्रगति हुई।
 * मुगल शासकों का संरक्षण: शिक्षा और साहित्य के संरक्षक थे, लेकिन मुख्य ध्यान इस्लाम पर केंद्रित था।
 * उर्दू का उदय: फारसी और हिंदी के संपर्क से उर्दू भाषा का उदय हुआ।
 * अनुवाद कार्य: संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद शुरू हुआ। अकबर ने विद्वानों (अबुल फजल, फैजी, रहीम) को संरक्षण दिया।
भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा
 * ईस्ट इंडिया कंपनी (प्रारंभिक दिन): लगभग 150 वर्षों तक शिक्षा पर कोई विशेष ध्यान नहीं।
 * प्रारंभिक प्रयास:
   * 1781: वॉरेन हेस्टिंग्स ने कलकत्ता मदरसे की स्थापना की।
   * 1784: विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की (उद्देश्य: प्राचीन भारत के इतिहास, संस्कृति, साहित्य की खोज)।
   * 1791: जोनाथन डंकन ने वाराणसी में संस्कृत कॉलेज की स्थापना की।
   * लॉर्ड वेलेजली: फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता की स्थापना (कंपनी के असैनिक अधिकारियों की शिक्षा के लिए)।
   * ईसाई मिशनरी: प्राथमिक स्कूल खोलकर पश्चिमी शिक्षा का प्रसार (मुख्य उद्देश्य: धर्मांतरण)।
19वीं शताब्दी में शिक्षा
 * चार्टर एक्ट 1813: भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए एक लाख रुपये वार्षिक का प्रावधान।
 * प्रारंभिक शिक्षण संस्थान:
   * 1820: डेविड हेयर ने कलकत्ता में बिशप कॉलेज की स्थापना की।
   * 1817: राजा राममोहन राय, डेविड हेयर आदि ने कलकत्ता में हिंदू कॉलेज की स्थापना की (बाद में प्रेसीडेंसी कॉलेज)।
 * चार्टर एक्ट 1833: शिक्षा के लिए राशि बढ़ाकर सालाना दस लाख रुपये।
 * शिक्षा के माध्यम पर बहस: 'प्राच्य शिक्षा' (संस्कृत, अरबी, फारसी) बनाम 'आंग्ल शिक्षा' (अंग्रेजी) के समर्थक दो दल थे।
 * मैकाले का मिनट (1835): लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम बनाने का निर्णय लिया, जिससे 'डाउनवर्ड फिल्ट्रेशन थ्योरी' (उच्च वर्ग को शिक्षित कर ज्ञान का निम्न वर्ग तक पहुँचना) पर बल दिया गया।
 * वुड का घोषणापत्र (1854): भारत में शिक्षा की एक व्यापक योजना:
   * लोक-शिक्षा विभाग की स्थापना।
   * गाँवों में देशी भाषा की प्राथमिक पाठशालाएँ।
   * कलकत्ता, बंबई (मुंबई) और मद्रास (चेन्नई) में विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएँ।
   * महिला शिक्षा को बढ़ावा।
   * अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना।
   * निजी संस्थानों को प्रोत्साहन हेतु अनुदान।
 * विश्वविद्यालयों की स्थापना: 1857 में बंबई, मद्रास और कलकत्ता में विश्वविद्यालय स्थापित हुए। हंटर शिक्षा आयोग (1882-1883) की सिफारिश पर 1882 में पंजाब और 1887 में इलाहाबाद में भी विश्वविद्यालय खुले।
 * लॉर्ड कर्जन के प्रयास: 1901 में विश्वविद्यालयों का सम्मेलन, 1904 में भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम पारित हुआ।
 * 1910: भारत सरकार ने शिक्षा विभाग की स्थापना की।
 * अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव: प्रशासनिक कार्यालयों के लिए कर्मचारी तैयार करने हेतु अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया गया, जिससे भारत में शिक्षितों की एक नई श्रेणी का जन्म हुआ।
स्वतंत्र भारत में शिक्षा
 * राधाकृष्णन आयोग (1948): विश्वविद्यालय शिक्षा पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए नियुक्त।
 * विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC): 1953 में राधाकृष्णन आयोग की सिफारिश पर गठन।
 * कोठारी आयोग (1964): डी. दौलतसिंह कोठारी की अध्यक्षता में गठित।
   * प्रतिवेदन: "शांतिपूर्ण सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र साधन शिक्षा है।"
 * शिक्षा समवर्ती सूची में (1976): 42वें संविधान संशोधन द्वारा शिक्षा को समवर्ती सूची में शामिल किया गया, जिसका अर्थ है कि शिक्षा केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी होगी।
विभिन्न शिक्षा स्तरों पर पहलें
 * प्रारंभिक शिक्षा (14 वर्ष तक):
   * संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत राज्यों को चौदह वर्ष की आयु तक बच्चों के लिए अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने के निर्देश।
   * नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986): शिक्षा की अधिकाधिक पहुँच, पंजीकरण, 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए विद्यालयों में ठहराव, और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर बल।
   * सर्व शिक्षा अभियान (2001): 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य।
 * माध्यमिक शिक्षा (14-18 वर्ष):
   * राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान: माध्यमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण का लक्ष्य।
   * व्यावसायिक शिक्षा: विद्यार्थियों को रोजगार के लिए तैयार करना। 1968 की पहली शिक्षा नीति में इस पर जोर दिया गया। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में औद्योगिक और अभियांत्रिकी शिक्षा पर बल।
 * उच्च शिक्षा:
   * माध्यमिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद महाविद्यालय में प्रवेश।
   * विशेष रूप से स्त्रियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए नामांकन बढ़ाने की आवश्यकता।
 * प्रौढ़ एवं दूरस्थ शिक्षा:
   * प्रौढ़ शिक्षा: अशिक्षा दूर करने के लिए अनिवार्य लक्ष्य। छठी योजना में 15 से 35 वर्ष की आयु के वयस्कों में शिक्षा प्रसार को महत्व।
   * राष्ट्रीय साक्षरता अभियान: इन व्यक्तियों को शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण देना।
   * दूरस्थ शिक्षा: उन शिक्षार्थियों के लिए वरदान है जिन्हें औपचारिक शिक्षा बीच में छोड़नी पड़ती है। पत्राचार द्वारा या आधुनिक संचार साधनों से शिक्षा ग्रहण की जा सकती है।
   * खुली व्यवस्था: विषयों के चयन, शिक्षण के माध्यम और परीक्षा प्रणाली में लचीलापन।
   * प्रमुख केंद्र: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय